जयपुर संभाग के मंदिरों को समझने की कुंजी गौड़ीय सम्प्रदाय है — कृष्ण की तीन प्राचीन मूर्तियों की कथा से जयपुर, आमेर और करौली के मंदिर आपस में जुड़ जाते हैं। इस भाग में कृष्ण के गौड़ीय मंदिर, जयपुर के अन्य मंदिर, दौसा-अलवर-तिजारा के मंदिर और सीकर-झुंझुनूं के मंदिर क्रम से दिए गए हैं।
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1. कृष्ण के गौड़ीय मंदिर
जगत शिरोमणि मंदिर — आमेर
- मीरां जिस श्याम-वर्ण कृष्ण-प्रतिमा की उपासना करती थीं, वही यहाँ स्थापित है; चित्तौड़ पर जीत के बाद मानसिंह उसे आमेर ले आए।
- पुत्र जगतसिंह की स्मृति में कनकावती (मानसिंह प्रथम की महारानी) ने यह तीन मंज़िला वैष्णव मंदिर खड़ा करवाया।
- तोरण के सामने की छतरी में 1620 ई. में प्रतिष्ठित सफेद संगमरमर का गरुड़।
तीन विग्रहों की कथा
मान्यता: दादी के निर्देश पर कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने कृष्ण की तीन मूर्तियाँ बनवाईं — गोविन्द देव जी (जयपुर), गोपीनाथ जी (जयपुर) और मदन मोहन जी (करौली)। ये मथुरा में थे, पर महमूद गजनवी के हमले के समय ज़मीन में दबा दिए गए। रूप गोस्वामी को गोविन्द देव की मूर्ति 1525 ई. में वृंदावन के गौमा टीला से मिली; रघुनाथ भट्ट गोस्वामी पूजा करते थे और आमेर के मानसिंह प्रथम ने 1590 ई. में वृंदावन में भव्य मंदिर बनवाया।
गोविन्द देव जी — जयपुर
- सम्प्रदाय ➜ गौड़ीय — राजस्थान में इसकी प्रथम पीठ
- निर्माण ➜ सवाई जयसिंह, 1735 ई.
- स्थान ➜ सिटी पैलेस परिसर, जयनिवास उद्यान; बिना शिखर का मंदिर
- गोविन्दजी की गायों के चारे के लिए अकबर से 135 बीघा ज़मीन मिली थी।
- औरंगजेब के काल में मथुरा के मंदिर टूटे तो गोसाईं पुजारी विग्रह लेकर जयपुर आए; जयसिंह ने गोविन्द देव को अपने चन्द्रमहल के पास प्रतिष्ठित करवाया।
गोपीनाथ जी — जयपुर
- यह भी गौड़ीय मंदिर; विग्रह गोविन्द देव के साथ ही वृंदावन से आया। पुरानी बस्ती में भव्य मंदिर — यह भी सवाई जयसिंह का बनवाया।
- यमुना-तट के वंशीवट पर संत परमानंद को यह मूर्ति मिली, जिसकी सेवा-पूजा उन्होंने मधु गोस्वामी को दे दी।
- औरंगजेब के मंदिर-ध्वंस में 1699 ई. में मधु पंडित इसे कामां ले आए; वहाँ से वर्धमान (प० बंगाल) के शासक त्रिलोकचन्द और रानी भानुमति जयपुर लाए। जयपुर में प्रवेश श्रावण कृष्ण 13, शनिवार को हुआ।
ट्रिक: तीन विग्रह — गोविन्द देव (जयपुर), गोपीनाथ (जयपुर), मदन मोहन (करौली); तीनों गौड़ीय सम्प्रदाय के।
2. जयपुर के अन्य मंदिर
आमेर और गलता जी
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| अम्बिकेश्वर महादेव | आमेर | निर्माण कोकिलदेव ने, जीर्णोद्धार मिर्जा राजा जयसिंह ने; कछवाहों के बनवाए देव-प्रासादों में सबसे प्राचीन |
| सूर्य मंदिर | आमेर | आमेर के निवासी चामुण्डहरि के बेटे ने बनवाया — यह बात 954 ई. का शिलालेख बताता है |
| कल्याण जी का मंदिर | आमेर | प्रतिहारकालीन कला का उत्तम उदाहरण |
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मोती डूँगरी और शहर
| मंदिर | किसने / कब | विशेष |
|---|---|---|
| राजेश्वर शिवालय (मोती डूँगरी) | 1864 — रामसिंह द्वितीय | जयपुर राजाओं का निजी मंदिर; केवल महाशिवरात्रि पर आम जनता के लिए खुलता है |
| मोती डूँगरी गणेश | 1761 ई. — माधोसिंह प्रथम | प्रतिमा माधोसिंह की रानी अपने पीहर मावली से लाई थीं |
| लक्ष्मीनारायण (बिड़ला मंदिर) | बी.एम. बिड़ला फ़ाउंडेशन, 1988 ई. | मकराना के सफेद संगमरमर का; मोती डूँगरी की तलहटी में |
| कल्की मंदिर | 1739 ई. — सवाई जयसिंह | कलयुग के अवतार कल्की का विष्णु मंदिर; दक्षिणायन शिखर शैली; राजस्थान का प्रथम कल्की मंदिर कहा जाता है |
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ध्यान दें: जयपुर के राजाओं का निजी मंदिर = मोती डूँगरी का राजेश्वर शिवालय (1864, रामसिंह द्वितीय)।
3. दौसा, अलवर, तिजारा
दौसा
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| हर्षद माता | आभानेरी | मूलतः विष्णु मंदिर; राजा चाँद ने 8वीं सदी में बनवाया; प्रतिहारकालीन महामारू शैली; मंदिर स्वास्तिक के आकार का; 11वीं सदी में महमूद गजनवी के हमले से बुरी तरह क्षतिग्रस्त; देवी “उल्लास की देवी”; प्रसिद्ध चाँद बावड़ी यहीं |
| मेहन्दीपुर बालाजी | मेहन्दीपुर | हनुमान जी की प्रतिमा किसी शिल्पी ने नहीं बनाई, वह पर्वत का ही हिस्सा है; भूत-प्रेत पीड़ित आते हैं; चैत्र पूर्णिमा मेला; दो पहाड़ियों के बीच घाटी में बसे होने से “मेहन्दीपुर घाटा” |
अलवर
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| नीलकंठेश्वर महादेव | सरिस्का (पारानगर) | प्रतिहारकालीन; 1010 ई. में अजयपाल (राजोरगढ़ परगने के राजा) ने बनवाया, तब पारानगर शहर आबाद था; काले नीलम धातु का शिवलिंग; नृत्य करते गणेश की मूर्ति; कुछ विद्वान बड़गुर्जर राजा मंथन देव को निर्माता मानते हैं |
| भर्तृहरि मंदिर | अलवर | उज्जैन के राजा भर्तृहरि ने अंतिम दिन यहीं तप में बिताए; “कनफटे साधुओं का कुम्भ”; हर साल दो बार — वैशाख और भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की सप्तमी-अष्टमी — लक्खी मेला लगता है |
| पांडुपोल हनुमान | अलवर | हनुमान जी की शयन मुद्रा की प्रतिमा; अज्ञातवास में कौरव-सेना से घिरे पांडवों के लिए भीम ने गदा मारकर पहाड़ में रास्ता बनाया, तभी से “पांडुपोल” |
| सोमनाथ मंदिर | भानगढ़ | बनवाने वाले माधोसिंह — आमेर के राजा मानसिंह के छोटे भाई; गुजरात के सोमनाथ की प्रतिकृति |
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खैरथल-तिजारा
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| तिजारा जैन मंदिर | तिजारा | 8वें तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का; प्रतिमा देहरा नामक स्थान से मिली |
| बाबा मोहनराम का थान | मलिकपुर (भिवाड़ी) | — |
ट्रिक: नौगजा = 9 गज = 27 फुट की पार्श्वनाथ प्रतिमा; नौगाँवा = मल्लीनाथ।
4. सीकर व झुंझुनूं
हर्षनाथ मंदिर — सीकर
- यहीं से वि.सं. 1030 (973 ई.) का शिलालेख मिला, जो सांभर (शाकम्भरी) के चौहान विग्रहराज द्वितीय के काल का है; मंदिर का इतिहास उसी से पता चलता है।
- लेख बताता है कि काम 961 ई. में चौहान राजा सिंहराज ने आरंभ करवाया और विग्रहराज द्वितीय के समय पूरा हुआ।
- औरंगजेब के सेनापति खानजहाँ बहादुर ने 1679 ई. में इसे तुड़वाया; बाद में सीकर के महाराजा शिवसिंह ने टूटे टुकड़े जोड़कर फिर बनवाया।
खाटूश्याम जी — सीकर
यह कृष्ण के रूप श्याम जी का मंदिर है। जनश्रुति के अनुसार भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक का शीश कृष्ण ने महाभारत-युद्ध से पहले रणचंडी को बलि देने के लिए उतार लिया और वरदान दिया कि कलियुग में “श्याम” नाम से पूजा होगी। इसीलिए यहाँ शीश ही पूजा जाता है और वे “शीश के दानी” कहलाते हैं।
- मूर्ति का चेहरा दाढ़ी-मूँछ वाला है; भक्त गुलाब का फूल चढ़ाते हैं।
- मंदिर की नींव 1720 ई. में जोधपुर (मारवाड़) के राजा अजीतसिंह के पुत्र अभयसिंह ने रखी — वर्तमान रूप तभी का है।
- राज्य के 2024-25 के बजट-भाषण में खाटूश्याम मंदिर के विकास हेतु 100 करोड़ रुपये रखे गए।
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| सप्त गौमाता मंदिर | रैवासा (सीकर) | सप्त गौमाता का राजस्थान में पहला मंदिर |
झुंझुनूं
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| लोहार्गल के मंदिर | लोहार्गल | घाटी मालकेतु पर्वत की, जिसमें कई मंदिर, बावड़ियाँ और पवित्र सूरज कुण्ड हैं; मालखेत जी की चौबीस कोसी परिक्रमा — गोगा नवमी से भाद्रपद अमावस्या तक |
| रघुनाथ जी का मंदिर | खेतड़ी | रानी चुंडावत (राजा बख्तावर की पत्नी) ने बनवाया; श्रीराम और लक्ष्मण की मूँछों वाली प्रतिमा |
रिवीजन पॉइंटर्स
- तीन विग्रह — गोविन्द देव जी (जयपुर), गोपीनाथ जी (जयपुर) और मदन मोहन जी (करौली); तीनों गौड़ीय सम्प्रदाय के।
- गोविन्द देव जी का मंदिर 1735 में सवाई जयसिंह ने बनवाया; यह बिना शिखर का मंदिर है।
- जगत शिरोमणि मंदिर (आमेर) कनकावती ने पुत्र जगतसिंह की स्मृति में बनवाया।
- जयपुर के राजाओं का निजी मंदिर मोती डूँगरी का राजेश्वर शिवालय है (1864, रामसिंह द्वितीय)।
- कल्की मंदिर 1739 में सवाई जयसिंह ने बनवाया — राजस्थान का प्रथम कल्की मंदिर कहा जाता है।
- हर्षद माता (आभानेरी) मूलतः विष्णु मंदिर है, प्रतिहारकालीन महामारू शैली का; यहीं प्रसिद्ध चाँद बावड़ी है।
- नीलकंठेश्वर महादेव (सरिस्का, पारानगर) 1010 ई. में अजयपाल ने बनवाया; भर्तृहरि मंदिर «कनफटे साधुओं का कुम्भ» है।
- हर्षनाथ मंदिर (सीकर) का शिलालेख वि.सं. 1030 (973 ई.) का है; काम 961 ई. में सिंहराज ने शुरू करवाया।
- खाटूश्याम जी में बर्बरीक का शीश पूजा जाता है, इसीलिए वे «शीश के दानी» कहलाते हैं; नींव 1720 में रखी गई।
अगले भाग में अजमेर, ब्यावर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, भीलवाड़ा और टोंक के मंदिर — पुष्कर, मेड़ता का मीरां मंदिर, डिग्गी का कल्याण जी — तथा जोधपुर और बीकानेर संभाग के मंदिर।
पिछला भाग: राजस्थान के मंदिर: उदयपुर संभाग (भाग 2) एवं हाड़ौती व पूर्वी राजस्थान
अगला भाग: राजस्थान के मंदिर: अजमेर संभाग एवं जोधपुर व बीकानेर संभाग (भाग 1)
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