देवियों के अध्याय में सबसे काम की चीज़ है जोड़ी बनाना — कौन-सी देवी किस वंश या जाति की कुलदेवी है और मंदिर कहाँ है। इस भाग में ढूँढाड़ की देवियाँ, अलवर की नारायणी माता, जीण माता, सकराय माता और राणी सती आती हैं, फिर बदनौर-निमाज, नागौर, डीडवाना-कुचामन, भीलवाड़ा और जोधपुर संभाग की देवियाँ। अंत में चामुण्डा माता, आईजी माता और ओसियाँ की देवियाँ विस्तार से रखी गई हैं।
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1. ढूँढाड़ की अन्य देवियाँ
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| जमुवाय माता | जमुवा रामगढ़ (जयपुर) | ढूँढाड़ के कछवाहा वंश की कुलदेवी; मंदिर दुल्हराय (तेजकरण) ने बनवाया |
| ज्वाला माता | जोबनेर (जयपुर) | खंगारोत वंश (कछवाहों की एक शाखा) की कुलदेवी; मेला चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में |
| शाकंभरी माता | साँभर (जयपुर) | चौहान वंश की कुलदेवी; साँभर झील के पास पहाड़ी के निकट प्राचीन मंदिर |
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जमुवाय माता
- जमुवाय माता की प्रतिमा गाय और बछड़े सहित है।
- दुल्हराय ने बुढ़वाय देवी की कृपा से ढूँढाड़ में माँच के मीणों को परास्त किया और यह मंदिर बनवाया।
- अन्नपूर्णा इनका दूसरा नाम है। युगों में इनके नाम बदले — पहले मंगलाय, फिर हड़वाय, द्वापर में बूढ़वाय, कलियुग में जमुवाय।
ज्वाला माता, शाकम्भरी, नकटी, खलकाणी
- जोबनेर के बारे में माना जाता है कि सती (राजा दक्ष की पुत्री, शिव की पहली पत्नी) का घुटना यहीं आ गिरा था; उसे देवी का चिह्न मानकर ज्वाला माता पूजी जाने लगीं।
- साँभर में विश्वास है कि चौहानों के आदि पुरुष वासुदेव के काल से ही इस देवी की उपासना चली आ रही है।
- नकटी माता गाँववालों को चोर-डाकुओं के आने की चेतावनी दे देती थीं; इससे क्रुद्ध लुटेरों ने उनकी मूर्ति की नाक तोड़ दी — तभी से नकटी माता कहलाईं।
2. अलवर की देवियाँ
नारायणी माता — बरवा डूँगरी (अलवर)
- नाई जाति की कुलदेवी; मूल नाम करमेती।
- मंदिर प्रतिहार शैली में बना है; पुजारी मीणा जाति का होता है और मीणा भी इन्हें आराध्य मानते हैं — अब पूजा के अधिकार पर मीणा व नाई जातियों में विवाद चल रहा है।
- पति गणेश की सर्पदंश से मृत्यु होने पर ये उसी स्थान पर पति के साथ सती हो गई थीं।
जनश्रुति: विवाह के बाद करमेती पति के साथ ससुराल जा रही थीं; तेज़ धूप से बचने को बरगद के नीचे रुके, वहीं साँप ने पति को डस लिया। साँझ को घर लौटते मीणा युवकों ने मदद करके लकड़ियाँ जुटाईं और चिता तैयार की; करमेती सती हो गईं। सती होने से पहले उन्होंने ग्वालों को आशीर्वाद दिया — उसी स्थान से लगभग 3 किमी लम्बी प्राकृतिक जलधारा निकलती है।
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| धोलागढ़ माता | बहतुकलाँ (अलवर) | गौड़ ब्राह्मणों की कुलदेवी; वैशाख शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक मेला |
| जिलाणी माता | बहरोड़ (कोटपूतली-बहरोड़) | गुर्जर समाज की महिला; धर्मान्तरण के विरोध में सहयोग देने के कारण लोक में देवी रूप में पूजित |
3. जीण माता
- मूल नाम ➜ जयन्ती बाई
- जन्म ➜ घाँघू गाँव (चूरू)
- पिता-भाई ➜ घंघराय चौहान की पुत्री · भाई हर्ष
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- जीण माता नवदुर्गाओं की श्रेणी में आती हैं; भागवत पुराण के नवें स्कंध में भी उनका ज़िक्र है।
- मंदिर में देवी की आदमकद अष्टभुजी मूर्ति है; सामने घी और तेल के दो दीपक बरसों से बिना बुझे जलते हैं — इनकी ज्योति की व्यवस्था दिल्ली के चौहान शासकों ने शुरू की थी।
- चढ़ावे में ढाई प्याले मदिरा चढ़ती है और बकरे का कान काटकर बलि दी जाती है।
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भाई-बहन की पहाड़ियाँ
- काजल शिखर ➜ मुख्य मंदिर से सटी पहाड़ी; भाभी के ताने से आहत जयन्ती बाई यहीं तप करने लगीं।
- मनाने आए भाई हर्ष भी विफल रहे तो पास की पहाड़ी (हर्ष पर्वत) पर स्वयं तप में लीन हुए; आज वे हर्ष भैरव कहलाते हैं।
- सारे राजस्थानी लोकदेवों में यही एकमात्र भाई-बहन की जोड़ी है।
मधुमक्खियों की देवी
लोक-कथा: मंदिरों की मूर्तियाँ तोड़ता औरंगज़ेब जब जीण माता के द्वार पहुँचा, तो वहाँ से ज़हरीली मधुमक्खियों का झुंड उमड़ा और मुग़ल सेना भागी। बादशाह ने देवी से क्षमा चाही; तब से दिल्ली से हर महीने सवा मन तेल अखण्ड ज्योति के लिए आता रहा। इसी से जीण माता “मधुमक्खियों की देवी” कहलाईं।
भामरिया (भ्रमर) माता
मुख्य मंदिर के पीछे तहखाने में भामरिया माता विराजमान हैं; उनके आगे किसी योद्धा का पीतल का मस्तक रखा है। कहते हैं वह परमार राजा जगदेव पंवार का है (सम्राट भोज का भतीजा), जिसने देवी के आगे आत्मबलि दी थी।
4. सकराय माता, राणी सती, मनसा
सकराय माता
- खण्डेलवाल जाति की कुलदेवी।
- मंदिर मलयकेतु/मालकेतु पर्वत पर स्थित है; इनका अन्य मंदिर सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में है।
- चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में मेला जुटता है।
राणी सती माता — झुंझुनूं
- अग्रवाल समाज की कुलदेवी; असली नाम नारायणी बाई, पति तनधनदास।
- हिसार (हरियाणा) के नवाब के सिपाहियों ने छल से पति को मार डाला; इन्होंने तलवार उठाकर उन सभी का संहार किया और फिर पति के साथ सती हुईं।
- इस परिवार की कुल 13 स्त्रियाँ सती हो चुकी हैं; आम बोलचाल में इन्हें “दादीजी / सती दादी” कहा जाता है।
मनसा माता
- मंदिर झुंझुनूं-चूरू क्षेत्र में माने जाते हैं।
ध्यान दें: सकराय = शंकरा का अपभ्रंश; शाकम्भरी का नाम साँभर की देवी (चौहानों की कुलदेवी) के लिए। दोनों को अलग रखें।
5. बदनौर व निमाज की देवियाँ
कुशाला माता — बदनौर (ब्यावर)
- इन्हें चामुण्डा माता का रूप समझा जाता है।
- मेला भाद्रपद कृष्ण एकादशी से अमावस्या के बीच चलता है।
- राणा कुम्भा ने 1457 ई. में बैराठगढ़ (बदनौर) की लड़ाई में महमूद खिलजी प्रथम पर जीत की याद में यह मंदिर बनवाया।
मरकंडी माता — निमाज (ब्यावर)
- मंदिर प्रतिहार काल का है; देवी का एक नाम “मगरमंडी” भी है।
6. नागौर की देवियाँ
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| भँवाल माता | भँवाल ग्राम (नागौर) | ढाई प्याले शराब का भोग; प्राचीन शक्तिपीठ — चामुण्डा और महिषमर्दिनी के रूपों की पूजा |
| ब्राह्मणी मंदिर | नागौर | इसे बरमाया या योगिनी मंदिर भी कहते हैं |
| दधिमाता | गोठ-मांगलोद (नागौर) | दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी |
दधिमाता का मंदिर
- प्रतिहारकालीन स्थापत्य का उदाहरण; शैली महामारु है और शिखर नागर शैली में बना है।
- गोठ और मांगलोद दो अलग गाँव हैं; मंदिर दोनों के निकट है।
- दीवारों पर राम के वनवास से रावण-वध तक की कथा के 9वीं सदी के चित्र बने हैं।
ध्यान दें: ढाई प्याले शराब का भोग — भँवाल माता (नागौर) और जीण माता (सीकर) दोनों में; पर मंदिर-शैली व शिलालेख का प्रश्न हो तो दधिमाता।
7. डीडवाना-कुचामन व भीलवाड़ा
कैवाय माता — परबतसर
- मंदिर परबतसर के किणसरिया गाँव में है।
- दहिया राजवंश की कुलदेवी हैं।
- 999 ई. का एक शिलालेख मिला है, जिसमें चौहान राजा दुर्लभराज और उनके दहिया सामन्त “चच्च” का नाम आता है।
| देवी | स्थान |
|---|---|
| सरकी माता (पाडा माता) का मंदिर | डीडवाना झील के पास (डीडवाना-कुचामन) |
| धनोप माता | धनोप गाँव (भीलवाड़ा) |
8. जोधपुर संभाग
| ज़िला | देवियाँ |
|---|---|
| जोधपुर | चामुण्डा · आईजी (बिलाड़ा) · सच्चियाय व पीपला (ओसियाँ) |
| बाड़मेर | विरात्रा (चौहटन) |
| बालोतरा | नागणेची (नगाणा) · राणी भटियाणी (जसोल) · लवणीय (पचपदरा) |
9. चामुण्डा माता व आईजी माता
चामुण्डा माता — जोधपुर
- प्रतिहारों की इंदा शाखा की कुलदेवी; जोधपुर के राठौड़ों की इष्टदेवी; शहर में इतना मान है कि “जोधपुर की देवी” कहलाती हैं।
- इंदा शाखा के परिहार राजा उगमजी ने पौत्री लीला दे (गंगदे की पुत्री) का विवाह राव चूण्डा से किया और दहेज में मंडोर दिया; इसी अवसर पर चूण्डा ने मंडोर में चामुण्डा माता का मंदिर बनवाया।
- राव जोधा (चूण्डा के पोते) ने 1460 ई. में प्रतिमा मंडोर से मँगाकर जोधपुर किले के चामुण्डा बुर्ज पर स्थापित करवाई।
आईजी माता — बिलाड़ा (जोधपुर)
- कुलदेवी ➜ सिरवी जाति (क्षत्रिय) की
- मूल नाम ➜ जीजी बाई
- जन्म ➜ अंबापुर (गुजरात) में डाबी राजपूत बीका जी के घर, 1415 ई.
- उनकी सुंदरता देखकर माण्डू के बादशाह (महमूद खिलजी) उन्हें बेगम बनाना चाहता था; इसलिए जीजी बाई मालवा छोड़कर पिता के साथ बिलाड़ा आ गईं।
- यहाँ आने के बाद वे रामदेवजी की शिष्या बन गईं।
- मंदिर नीम के नीचे होता है; इसे “दरगाह” और समाधि-स्थान को “बडेर” कहते हैं।
- मान्यता है कि इनके दीपक की लौ से केसर झरती है।
10. ओसियाँ की देवियाँ
सच्चियाय माता (सच्चिका) — ओसियाँ
- ओसवालों (श्वेताम्बर जैन) की कुलदेवी।
- परमार शासक उपलदेव ने 9वीं सदी में मंदिर बनवाया; शैली परमारकालीन “मारू-गुर्जर” है।
- गर्भगृह में कसौटी पत्थर की मूर्ति है — वास्तव में महिषासुरमर्दिनी; सच्चियाय माता महिषासुरमर्दिनी का सात्त्विक रूप हैं।
दुंडिमिल नामक साधु के शाप से नगरी वीरान हो गई थी। परमारवंशी राजकुमार उपलदेव ने आकर यहाँ शरण ली और देवी के चबूतरे पर सो गया। स्वप्न में देवी ने दर्शन देकर दबे धन, पत्थर की खान और पानी का पता बताया और कहा — पहले मेरा मंदिर बनाओ, तब शहर बसाना।
- ओसियाँ में तीन हरिहर मंदिर हैं (हरिहर = विष्णु-शिव का संयुक्त रूप)।
- राजस्थान में केवल ओसियाँ ऐसी जगह है जहाँ 8वीं–12वीं सदी — चार शताब्दियों — तक अलग-अलग सम्प्रदायों के मंदिर बनते रहे: वैष्णव, शैव, सूर्य, जैन और देवी मंदिर।
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| पीपला माता | ओसियाँ (जोधपुर) | दूसरे नाम पपलाज/पिपलाज माता; अब मंदिर में पूजा नहीं होती |
11. रैपिड फायर तथ्य
- वंश की कुलदेवी ➜ जमुवाय माता (कछवाहा), ज्वाला माता, जोबनेर (खंगारोत), शाकंभरी माता, साँभर (चौहान)
- नाई जाति की कुलदेवी ➜ नारायणी माता, बरवा डूँगरी (अलवर); मूल नाम करमेती
- भाई-बहन की एकमात्र जोड़ी ➜ जीण माता (जयन्ती बाई) और भाई हर्ष (हर्ष भैरव); जीण «मधुमक्खियों की देवी» कहलाती हैं
- ढाई प्याले शराब का भोग ➜ जीण माता और भँवाल माता (नागौर) दोनों में
- खण्डेलवाल व अग्रवाल ➜ सकराय माता खण्डेलवालों की; राणी सती (झुंझुनूं) अग्रवालों की कुलदेवी
- कुशाला माता ➜ बदनौर; राणा कुम्भा ने 1457 ई. की जीत की याद में मंदिर बनवाया
- दधिमाता / कैवाय माता ➜ दाधीच ब्राह्मणों की / दहिया राजवंश की कुलदेवी
- चामुण्डा माता ➜ जोधपुर; राव जोधा ने 1460 ई. में प्रतिमा मंडोर से मँगवाकर किले में स्थापित की
- सिरवी व ओसवाल ➜ आईजी माता (बिलाड़ा) सिरवियों की; सच्चियाय माता (ओसियाँ) ओसवालों की कुलदेवी
अगले भाग में जोधपुर संभाग की बची देवियाँ — बाड़मेर-बालोतरा, पाली, जालौर, सिरोही — तथा जैसलमेर की सात कल्याणी देवियाँ और बीकानेर की करणी माता।
पिछला भाग: राजस्थान की लोकदेवियाँ: उदयपुर संभाग एवं जयपुर, अलवर व शेखावाटी (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान की लोकदेवियाँ: जोधपुर संभाग (भाग 2) एवं जैसलमेर व बीकानेर
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