हस्तकला का अध्याय असल में «कला + जगह + पहचान» का मिलान है — थेवा प्रतापगढ़ से जुड़ता है, मोलेला राजसमंद से और कोटा डोरिया कैथून से। इस भाग में हस्तकला की संस्थाएँ, भौगोलिक संकेतक, जाजम व दाबू छपाई, बस्सी की काष्ठ कला, मोलेला, नाथद्वारा, सांझी, थेवा, बाँसवाड़ा-डूँगरपुर की कलाएँ, कोटा डोरिया और भरतपुर संभाग की कलाएँ क्रम से दी गई हैं।
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1. हस्तकला व संस्थाएँ
हाथों से कलात्मक और आकर्षक वस्तुएँ बनाने की कला को हस्तकला (हस्तशिल्प) कहते हैं। राजस्थान की ऐसी वस्तुएँ भारत ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रिय हैं — इसीलिए राज्य को “हस्तशिल्प कलाओं का खज़ाना” कहा जाता है।
- सबसे बड़ा केन्द्र ➜ बोरनाडा (जोधपुर)
- “हस्तकलाओं का तीर्थ” ➜ जयपुर
- उपनाम ➜ हस्तशिल्प कलाओं का खज़ाना — राजस्थान
संस्थाएँ व केन्द्र
| संस्था / केन्द्र | स्थान | ख़ास बात |
|---|---|---|
| राजसीको | मुख्यालय जयपुर | हस्तकला उद्योग को सबसे अधिक संरक्षण देने वाली संस्था; स्थापना 3 जून 1961; कलाकारों का सामान अपने “राजस्थली” शोरूम से बेचती है |
| हस्तशिल्प डिज़ाइन विकास एवं शोध केन्द्र | जयपुर | — |
| हैंडलूम डिज़ाइन डेवलपमेंट एंड ट्रेनिंग सेन्टर | नागौर | — |
शिल्पग्राम — चार स्थान
हस्तशिल्प-व्यवसाय और लोक कलाओं को प्रोत्साहन देने के लिए शिल्पग्राम बनाए गए हैं — हवाला (उदयपुर), पाल (जोधपुर), पुष्कर (अजमेर) और रामसिंहपुरा (सवाई माधोपुर)।
ट्रिक: चार शिल्पग्राम = उदयपुर, जोधपुर, अजमेर, सवाई माधोपुर — हर संभाग का एक-एक कोना।
2. भौगोलिक संकेतक (GI)
राजस्थान की 14 शिल्पकलाओं को अब तक GI टैग मिल चुका है। इनमें कोटा डोरिया, मोलेला क्ले वर्क, ब्ल्यू पॉटरी और कठपुतली को उत्पाद और लोगो — दोनों के लिए अलग-अलग टैग मिले; इसीलिए नीचे की सूची में 18 प्रविष्टियाँ दिखती हैं, पर शिल्प एक ही रहता है।
| वर्ष | हस्तकला | क्षेत्र |
|---|---|---|
| 2006 | कोटा डोरिया (उत्पाद) — राजस्थान की पहली GI हस्तकला | कैथून (कोटा), मांगरोल (बारां) |
| 2009 | जयपुर की ब्ल्यू पॉटरी | जयपुर |
| 2009 | मोलेला क्ले वर्क | मोलेला (राजसमंद) |
| 2009 | राजस्थान की कठपुतलियाँ | उदयपुर |
… शेष 12 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: 2023 में एक साथ पाँच — पिछवाई, जोधपुरी बंधेज, उदयपुर की कोफ्तगिरी, उस्ता कला, बीकानेर की कशीदाकारी। 2009 में तीन — ब्ल्यू पॉटरी, मोलेला, कठपुतली।
ध्यान दें: चार शिल्पों के उत्पाद और लोगो में दो साल का फ़र्क — कोटा डोरिया 2006 व 2011, मोलेला · ब्ल्यू पॉटरी · कठपुतली 2009 व 2017।
3. जाजम व दाबू छपाई
जाजम छपाई
मोटे सूती धागों को रेजा/रेजी में बुनकर जो मोटी दरी बनती है, वह जाजम है। इस पर कई रंगों की हाथ-छपाई होती है; यह शुभ व धार्मिक अवसरों पर ज़मीन पर बिछाई जाती है। रंग — ज़्यादातर लाल और हरा। केन्द्र — चित्तौड़गढ़।
दाबू — आकोला
- आकोला (चित्तौड़गढ़) के छीपा परिवार दाबू छपाई करते हैं; यहाँ के छपे घाघरे प्रसिद्ध हैं।
- दाबू = वह लेई या लुगदी जिसे कपड़े के उस हिस्से पर दबाकर लगाते हैं जहाँ रंग नहीं चढ़ाना; रंगाई के बाद वही हिस्सा बिना रंग का रह जाता है।
| दाबू का प्रकार | केन्द्र |
|---|---|
| मिट्टी व गोंद का दाबू | आकोला (चित्तौड़गढ़) |
| मोम / मैण का दाबू | सवाई माधोपुर |
| मिट्टी का दाबू | बालोतरा |
4. बस्सी की काष्ठ कला
कावड़
- छोटी मंदिरनुमा काष्ठ-कृति, जिसमें कई कपाट खुलते-बंद होते हैं; हर कपाट पर देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं के चित्र — रामायण, महाभारत, श्रीकृष्ण-लीला।
- इसे “चलता-फिरता देवालय” कह सकते हैं। कावड़िया भाट इसे गोद में रखकर लय में गीत-पद्य गाता है और कथा के साथ-साथ एक-एक कपाट खुलता जाता है।
- पूरी कावड़ में लाल रंग प्रधान रहता है। बनाने वाले — बस्सी के खेरादी (सुथार) परिवार।
बेवाण और गणगौर
- बेवाण ➜ लकड़ी का छोटा मंदिरनुमा विमान (“मिनिएचर वुडन टेम्पल”); जलझूलनी एकादशी जैसे अवसरों पर देव-विग्रह इसी में बैठाकर सवारी निकलती है।
- गणगौर के उत्सव पर गणगौर-ईसर की सवारी में काम आने वाली लकड़ी की मूर्तियाँ भी बस्सी में बनती हैं।
- बस्सी में गणगौर, कावड़, बेवाण और लकड़ी की दूसरी कलाकृतियाँ बनती हैं; इस काष्ठ कला के जन्मदाता — प्रभात जी सुथार।
5. मोलेला की टेराकोटा
मोलेला (राजसमंद) अपने मृदा शिल्प (टेराकोटा) के लिए जाना जाता है। यहाँ मिट्टी की लोक-देवी-देवताओं वाली मूर्तियाँ और दूसरी कलाकृतियाँ बनती हैं।
- आकार देने का काम केवल हाथों से, गीली मिट्टी पर; साँचे नहीं लगते।
- मिट्टी मोलेला के तालाब से आती है, जिसमें गधे की लीद भी मिलाते हैं।
- सबसे ज़्यादा मूर्तियाँ भगवान देवनारायण की बनती हैं।
- प्रसिद्ध कलाकार ➜ मोहनलाल कुम्हार (पद्मश्री 2012), खेमराज, राजेन्द्र कुमार
- GI ➜ उत्पाद — 2009; लोगो — 2017
6. नाथद्वारा — पिछवाई व पाने
पिछवाई
- कृष्ण-मंदिरों में प्रतिमा के पीछे की दीवार को चित्रित कपड़े से ढका जाता है; उस पर कृष्ण-जीवन की घटनाएँ बनती हैं — यही पिछवाई है।
- इसका प्रयोग ख़ास तौर पर वल्लभ सम्प्रदाय के मंदिरों में सबसे अधिक है; विकास लगभग 1700 ई. के आसपास।
- नाथद्वारा में पारम्परिक नाप ➜ 10 × 7 फ़ीट और 3 × 5 फ़ीट; काम जाँगिड़ व गौड़ ब्राह्मण परिवार करते हैं।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
पाने
छोटे काग़ज़ पर बने देवी-देवताओं के चित्र पाने कहलाते हैं। श्रीनाथजी के पाने सबसे ज़्यादा कलात्मक होते हैं, जिनमें 24 शृंगारों का चित्रण मिलता है।
तारकशी
चाँदी के तारों को गूँथकर बनाए गए गहने तारकशी के जेवर कहलाते हैं — केन्द्र नाथद्वारा व जयपुर।
याद रखें: पिछवाई = कपड़ा + श्रीनाथजी के पीछे; पाने = काग़ज़ + श्रीनाथजी के 24 शृंगार। पिछवाई को 2023 में GI मिला।
7. सांझी
- मेवाड़ में श्राद्ध पक्ष (भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या) में कुँवारी कन्याएँ सफ़ेद पुती दीवार पर 15 दिन रोज़ गोबर से सांझी बनाती और पूजती हैं।
- सजावट ➜ आटा, हल्दी, कुमकुम, काँच, कपड़ा, लाख और कौड़ियाँ।
- पहले से दसवें दिन तक रोज़ एक-दो प्रतीक ही बनते हैं; आख़िरी पाँच दिन बहुत बड़ी रचना बनती है — संझ्या कोट।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
8. थेवा कला — प्रतापगढ़
थेवा — रंगीन काँच पर सोने के बारीक चित्रांकन की कला; इसे काँच पर की जाने वाली एक प्रकार की मीनाकारी कहा जा सकता है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| काँच | मुख्यतः बेल्जियम का रंगीन काँच |
| थारणा | काँच पर लगाई सोने की अति-पतली वर्क पर बनी बारीक जाली |
| वाड़ा | काँच को कसने वाला चाँदी के महीन तार का फ्रेम |
- भारत का एकमात्र परिवार, जिसके एक ही परिवार के लोगों को किसी हस्तकला के लिए 8 बार राष्ट्रपति पुरस्कार मिला।
- सोनी परिवार के कलाकार ➜ राजेन्द्र कुमार, गिरीश कुमार, रामविलास, बेनीराम और महेशराज।
- नवम्बर 2002 में थेवा कला पर 5 रुपये का डाक टिकट; 2014 में GI।
9. बाँसवाड़ा-डूँगरपुर व अन्य
| कला | स्थान | पहचान |
|---|---|---|
| भराड़ी | कुशलगढ़ (बाँसवाड़ा) | भील जनजाति की लोकदेवी; विवाह पर घर की दीवारों पर बनने वाली मांगलिक चित्रकारी भी इसी नाम से |
| आम पापड़ | बाँसवाड़ा | प्रसिद्ध |
| तीर-कमान | चन्दुजी का गढ़ा (बाँसवाड़ा), बोडीगामा (डूँगरपुर) | निर्माण के लिए प्रसिद्ध |
| रमकड़ा कला | गलियाकोट (डूँगरपुर) | सोप स्टोन / चीया पत्थर की मूर्तियाँ — “रमकड़ा उद्योग” |
10. कोटा डोरिया
सूती धागों के साथ रेशमी धागे और ज़री का काम जिस साड़ी में हो, वह कोटा डोरिया / मसूरिया मलमल साड़ी है। निर्माण का मुख्य केन्द्र कैथून (कोटा); मांगरोल (बारां) में भी बनती है। इसे “राजस्थान की बनारसी साड़ी” कहते हैं।
मसूरिया साड़ी की कहानी
- कोटा रियासत के दीवान झाला जालिम सिंह ने मैसूर से कुछ बुनकर बुलवाए
- उनमें से महमूद मसूरिया ने यहाँ यह साड़ी बनानी शुरू की
- आगे यही साड़ी कोटा डोरिया / मसूरिया के नाम से जानी गई
- पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ख़ुद मसूरिया साड़ी पहनकर न्यूयॉर्क में मॉडलिंग की, साथ ही खादी व कोटा डोरिया को प्रचारित किया; इसी के लिए 2007 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र का “वुमन टुगेदर अवार्ड” मिला।
- GI ➜ उत्पाद के लिए 2006, लोगो के लिए 2011।
- भौगोलिक संकेतक पाने वाली राजस्थान की पहली हस्तकला।
11. भरतपुर संभाग की कलाएँ
| कला | केन्द्र | पहचान |
|---|---|---|
| खस इत्र | सवाई माधोपुर, डीग, भरतपुर | खस से बनने वाला इत्र |
| तुड़िया कला | राजाखेड़ा (धौलपुर) | नकली आभूषण बनाने की कला |
| खजूर के पंखे | कामां (डीग) | खजूर के पत्तों से हाथ के पंखे |
रिवीजन पॉइंटर्स
- हस्तकला का सबसे बड़ा केन्द्र बोरनाडा (जोधपुर) है, और जयपुर को «हस्तकलाओं का तीर्थ» कहा जाता है।
- राजसीको की स्थापना 3 जून 1961 को हुई; यह हस्तकला उद्योग को सबसे अधिक संरक्षण देती है और अपने «राजस्थली» शोरूम से कलाकारों का सामान बेचती है।
- चार शिल्पग्राम हैं — हवाला (उदयपुर), पाल (जोधपुर), पुष्कर (अजमेर) और रामसिंहपुरा (सवाई माधोपुर)।
- अब तक 14 शिल्पकलाओं को GI टैग मिला है; कोटा डोरिया 2006 में राजस्थान की पहली GI हस्तकला बनी।
- 2009 में तीन GI मिले — ब्ल्यू पॉटरी, मोलेला क्ले वर्क और कठपुतली; 2023 में पाँच — पिछवाई, जोधपुरी बंधेज, उदयपुर की कोफ्तगिरी, उस्ता कला और बीकानेर की कशीदाकारी।
- मोलेला (राजसमंद) की टेराकोटा सिर्फ़ हाथों से बनती है, साँचे नहीं लगते; सबसे ज़्यादा मूर्तियाँ देवनारायण की बनती हैं; मोहनलाल कुम्हार को 2012 में पद्मश्री मिला।
- पिछवाई कपड़े पर बनकर श्रीनाथजी के पीछे टँगती है, जबकि पाने छोटे काग़ज़ पर बनते हैं और उनमें 24 शृंगारों का अंकन मिलता है।
- थेवा कला (प्रतापगढ़) रंगीन काँच पर सोने की बारीक जाली की कला है; सोनी परिवार को 8 बार राष्ट्रपति पुरस्कार मिला और 2014 में इसे GI मिला।
- कोटा डोरिया (मसूरिया) साड़ी का मुख्य केन्द्र कैथून (कोटा) है, मांगरोल (बारां) में भी बनती है; इसे «राजस्थान की बनारसी साड़ी» कहते हैं।
अगले भाग में राजस्थान की हस्तकलाएँ — जयपुर संभाग के पॉटरी, छपाई, मीनाकारी और धातु-शिल्प से लेकर अजमेर-भीलवाड़ा की फड़ कला और जोधपुर संभाग की कलाएँ।
पिछला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: ढूँढाड़ स्कूल एवं चित्रकार, चित्र व संस्थाएँ
अगला भाग: राजस्थान की हस्तकलाएँ: जयपुर संभाग एवं अजमेर व जोधपुर संभाग
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