राजस्थान के लोक वाद्यंत्र: घन वाद्य एवं अवनद्ध (ताल) वाद्य – Rajasthan Art and Culture Chapter 52

घन, अवनद्ध और सुषिर वाद्यों की बनावट, राज्य वाद्य, जाति-जनजाति के वाद्य और प्रसिद्ध वादक।

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In this chapter (18 sections)
  1. वाद्यों के तीन वर्ग
  2. राज्य वाद्य और रिकॉर्ड
  3. घन वाद्य
  4. तश्तरी-ताल वाद्य
  5. घंटियाँ और श्रीमंडल
  6. घुँघरू और अन्य घन वाद्य
  7. अवनद्ध (ताल) वाद्य
  8. डमरू, डैरू, चंग, खंजरी
  9. ढोलक, ढोल, मादल, पखावज
  10. नगाड़ा परिवार
  11. सुषिर वाद्य
  12. शहनाई-परिवार
  13. बाँसुरी, अलगोजा, नड़, सतारा
  14. युद्ध-मंदिर के बड़े फूँक वाद्य
  15. मशक, मोरचंग, पुंगी
  16. जाति और जनजाति के वाद्य
  17. प्रसिद्ध वादक
  18. रिवीजन पॉइंटर्स

वाद्यों के प्रश्न अक्सर बनावट देखकर ही हल हो जाते हैं — धातु का है तो घन, खाल मढ़ी है तो अवनद्ध और मुँह से फूँकना पड़े तो सुषिर। इस भाग में तीनों वर्गों की पहचान और राज्य वाद्य, फिर घन, अवनद्ध और सुषिर वाद्य एक-एक करके, अंत में जाति-जनजाति के वाद्य और प्रसिद्ध वादक दिए गए हैं। हर वाद्य के साथ उसकी बनावट और बजाने वाले का नाम जोड़ा गया है, ताकि जोड़ी बनाकर याद रखना आसान रहे।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान के लोक वाद्यंत्र, 6 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 नक्शे, 24 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. वाद्यों के तीन वर्ग

वर्गपहचानउदाहरण
घन वाद्यधातु के बने; उन पर चोट करने या आपस में टकराने से स्वर निकलता हैकरताल, खड़ताल, मंजीरा, झांझ, झालर, घंटा, घुघरू
अवनद्ध (ताल) वाद्यचमड़े (खाल) से मढ़े हुएढोलक, ढोल, नगाड़ा, डमरू, चंग, खंजरी, मादल
सुषिर वाद्यमुँह से फूँक मारकर बजाए जाते हैंशहनाई, बाँसुरी, अलगोजा, पुंगी, मशक, सींगा

2. राज्य वाद्य और रिकॉर्ड

  • राज्य वाद्य ➜ अलगोजा
  • अवनद्ध में सबसे बड़ा ➜ नौबत
  • अवनद्ध में सबसे प्राचीन ➜ ढोलक

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

ध्यान दें: चंग, डफ, ढपली और घेरा एक ही वाद्य-परिवार के नाम हैं — इलाके और बनावट के हिसाब से नाम बदल जाता है।

3. घन वाद्य

घन वाद्य धातु के होते हैं; इन पर चोट करके या दो टुकड़े टकराकर स्वर निकाला जाता है। ज़्यादातर भजन-कीर्तन और नृत्य में काम आते हैं।

4. तश्तरी-ताल वाद्य

वाद्यबनावटकहाँ / कौन
करतालदो चौकोर लकड़ी के टुकड़े, उनमें पीतल की छोटी तश्तरियाँ; टकराने पर मधुर झंकारसाधु-संन्यासी भजन में
खड़तालकैर, शीशम या बबूल की 6–8 इंच लम्बी, 2 इंच चौड़ी पट्टियाँ; कोने गोल; एक हाथ में अँगूठे के भीतरी हिस्से व अन्य चार उँगलियों के बीच पकड़ी जाती हैंविदेशी “कास्टनेट” से मिलती-जुलती
मंजीरापीतल/काँसे की मिश्रित धातु की कटोरी-आकार गोल तश्तरी; हमेशा जोड़े में टकराकरतेरहताली नृत्य में कामड़ स्त्रियों के हाथ में; कीर्तन में ढोलक की संगत
झांझमंजीरे का बड़ा रूपशेखावाटी में कच्छी घोड़ी नृत्य व धार्मिक भजन

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: खड़ताल का जादूगर — सद्दीक खाँ मांगणियार (झंपली गाँव, बाड़मेर); एक और प्रसिद्ध खड़ताल कलाकार — गाजी खान बरना।

5. घंटियाँ और श्रीमंडल

वाद्यपहचान
टिकोराघर की पूजा-आरती के समय; इसे घंटी भी कहते हैं; वीर घंटा का छोटा रूप
वीर घंटामंदिर में आरती के समय पुजारी एक हाथ से बजाता है; टिकोरा का बड़ा रूप
घंटा / घड़ियालपीतल का गोलाकार बड़ा वाद्य; मंदिर में डोरी या साँकल से लटका रहता है; भीतर लटके डंडे की चोट से बजता है

घंटों का आकार

  1. टिकोरा (सबसे छोटा)
  2. वीर घंटा
  3. घंटा / घड़ियाल (सबसे बड़ा)

6. घुँघरू और अन्य घन वाद्य

वाद्यबनावटकिसके हाथ में
लेजिम गरासियाबाँस का धनुष-आकार टुकड़ा, उसकी ज़ंजीर में पीतल की छोटी गोल पत्तियाँ; हिलाने पर झनझनाहटगरासिया जनजाति (नाम इसी से); आज स्कूली बच्चे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में
रमझौलचमड़े की पट्टी पर ढेर सारे छोटे घुँघरूनृतकियाँ पैरों में बाँधती हैं
घुघरूबेर के आकार के पीतल/काँसे के नन्हे गोले, जिनके भीतर कंकड़ या लोहे की गोलियाँ खनकती हैंनृतक पैरों पर बाँधते हैं

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

7. अवनद्ध (ताल) वाद्य

जो वाद्य चमड़े से बने हों उन्हें अवनद्ध या ताल वाद्य कहते हैं। इनमें सबसे प्राचीन ढोलक है और सबसे बड़ा नौबत।

8. डमरू, डैरू, चंग, खंजरी

वाद्यपहचानकौन
डैरूडमरू का बड़ा भाई; बाएँ हाथ में थामकर दाएँ हाथ की छोटी छड़ी से बजता हैगोगाजी के भक्त
डमरूशिवजी का वाद्य; दोनों ओर चमड़ा मढ़ा; इसका छोटा रूप डुग-डुगीमदारी भी
खंजरीचंग का छोटा रूप-सा; घेरा आम की लकड़ी का, उसमें धातु की गोल झाँझनियाँ जड़ी होती हैंकामड़, भील, कालबेलिया
  • चंग का छोटा रूप ढपली कहलाता है।
  • चंग, डफ और घेरा एक ही वाद्य के नाम हैं — इलाके के प्रभाव से नाम बदलते हैं।
  • सामान्यतः जब घेरा गोल की जगह अष्टभुजाकार होता है, तब उसे डफ कहते हैं।

9. ढोलक, ढोल, मादल, पखावज

वाद्यबनावटबजने का अवसर
ढोलकशीशम, नीम या सागवान के तने को खोखला करके बनती है; अवनद्ध में सबसे प्राचीनधार्मिक भजन-कीर्तन, शुभ अवसर
ढोललोहे या लकड़ी का गोल घेरा, दोनों मुँह चमड़े से मढ़े; ढोलक की तरह रस्सी से कसा; डोरी गले में डालकर खड़े-खड़े बजता है—
मादलमिट्टी का ढाँचा (मोलेला, राजसमंद की मिट्टी-कला से जुड़ा) जिसके दोनों सिरों पर चमड़ा चढ़ा है; एक सिरा बड़ा, एक छोटा; बजाने से पहले खाल पर जौ का आटा लगाया जाता है; रावलों की मादल में डोरी कसने के लिए पखावज जैसे काठ के गुटकेभील — गवरी नाट्य; गरासिया — मांदल नृत्य

ट्रिक: पखावज के प्रसिद्ध कलाकार — पंडित पुरुषोत्तम दास और भवानीशंकर कथक (बीदासर, चूरू)।

10. नगाड़ा परिवार

वाद्यबनावटअवसर / क्षेत्र
नगाड़ाभैंसे के चमड़े का; जोड़ा (नर + मादा); आकार में नौबत से छोटामांगलिक अवसर पर शहनाई के साथ; रामलीला, नौटंकी, ख्याल; मेवात का लोकप्रिय
निशाननगाड़े से थोड़ा बड़ाप्राचीन काल में युद्ध में
नौबतचार फुट गहरे आधे-अण्डे जैसे कुण्ड पर भैंसे की खाल; वादक खड़ा होकर डंडों से बजाता है; ताल-वाद्यों में सबसे विशालपहले युद्ध में, अब मंदिरों में
बम / टामक / दमामालोहे की कढ़ाई से बना ढाई-तीन फुट ऊँचा नगाड़ा; भैंसे की खाल; भारी लकड़ी के डंडेमुख्यतः मेवात; भरतपुर में रसिया गीत के साथ

सुषिर वर्ग के “अन्य” वाद्यों में बरगु का नाम भी गिनाया जाता है।

11. सुषिर वाद्य

जिन्हें मुँह से फूँक मारकर बजाते हैं, वे सुषिर वाद्य हैं। इनमें शहनाई सर्वश्रेष्ठ और मोरचंग सबसे छोटा है।

12. शहनाई-परिवार

वाद्यपहचानकौन / कहाँ
शहनाईफूँक वाद्यों में श्रेष्ठतम; दूसरे नाम सुन्दरी/नफीरी; चिलम-आकार की नली टाली, सागवान या शीशम की लकड़ी की, उसमें 8 छेद; विवाह-मंगल के मौक़ों परनगाड़े के साथ जोड़ी; कलाकार — बिस्मिल्लाह खाँ; राजस्थान में चाँद मोहम्मद खाँ
सुरनाईशहनाई और टोटो से मिलता आकार; विवाह-मांगलिक अवसर; शीशम की लकड़ी, पीतल-ताँबे की नली वाली शहनाई जैसी दिखती है; शहनाई शास्त्रीय, सुरनाई लोकवाद्यप्रसिद्ध वादक — पेपे खाँ
टोटोशहनाई का देशी रूपजोगी, भील, ढोली

13. बाँसुरी, अलगोजा, नड़, सतारा

वाद्यबनावटकौन / कहाँ
बाँसुरीबाँस या लकड़ी की खोखली नली; सुरों के लिए तय दूरी पर 6 छेद और मुँह की ओर फूँकने का एक अलग छेद; श्रीकृष्ण का वाद्यकलाकार — हरिप्रसाद चौरसिया, पन्नालाल घोष
अलगोजा4 से 7 छेद वाली दो बाँसुरियाँ; वादक दोनों एक साथ मुँह में रखकर बजाता है; कैर की लकड़ी सेभील व कालबेलिया; हाड़ौती, खैरथल-तिजारा और अलवर में अधिक चलन; राज्य वाद्य; कलाकार — रामनाथ चौधरी (जयपुर)
सताराबाँसुरी, अलगोजा और शहनाई का मिश्रित रूप; अलगोजे जैसी दो बाँसुरियाँजैसलमेर, बालोतरा, बाड़मेर में; मुस्लिम कलाकार व गड़रिये

14. युद्ध-मंदिर के बड़े फूँक वाद्य

वाद्यबनावटप्रयोग
बांकियाबिगुल का बड़ा रूप; पीतल या स्टील कासरगड़ा जाति का खानदानी वाद्य; आजकल ब्रास बैंड में भी
बिगुलसेना व पुलिस का वाद्यप्राचीन काल में युद्ध में
सींगा / सींगीधनुषाकार पीतल की नली; पुराने समय में जानवरों के सींग से भी बनता थासाधु-संन्यासी; युद्ध में बजने से “रणसिंगा”
भूंगलपीतल की नली, लगभग तीन हाथ कीभवाई जाति का प्रमुख वाद्य; युद्धों में बजने से “रणभेरी“

15. मशक, मोरचंग, पुंगी

वाद्यकैसे बनता / बजता हैकौन
मशकबकरे के चमड़े का थैला, बैगपाइपर जैसा; एक नली से मुँह से हवा भरते हैं, दूसरी ओर दो नलियों से हवा निकलती है; काँख में दबाकर बजता है; मशकबाजा भी कहते हैंपूर्वी राजस्थान में सबसे ज़्यादा; पुलिस और सुरक्षा-बल बैंडों का मुख्य वाद्य; भैरूजी के भोपे भी बजाते हैं
मोरचंगलोहे की छड़ों का छोटा वाद्य; होंठों के बीच दबाकर बजता है, फूँक नहीं मारी जाती, फिर भी इसे सुषिर में गिना जाता है; ज्यूज़ हार्प; सुषिर वाद्यों में सबसे छोटा—
पुंगी / बीनविशेष तुम्बे की; आगे के हिस्से में दो नलियाँ; साँप को मंत्रमुग्ध करने में काम आती है; कालबेलिया नृत्य में भीकालबेलिया/सँपेरे — कालबेलिया जाति का प्रमुख वाद्य

रोचक तथ्य: मोरचंग को “ज्यूज़ हार्प” कहते हैं; यह फूँक के बिना बजता है फिर भी सुषिर वर्ग में है — सबसे छोटा।

16. जाति और जनजाति के वाद्य

जाति / जनउनके वाद्य
कालबेलियापुंगी/बीन, घुरालियो, अलगोजा, चंग/ढप/घेरा, खंजरी
भीलमादल (गवरी नाट्य), अलगोजा, खंजरी, टोटो
गरासियालेजिम गरासिया, मादल (मांदल नृत्य)
कामड़मंजीरा (तेरहताली), खंजरी

17. प्रसिद्ध वादक

कलाकारवाद्यस्थान
सद्दीक खाँ मांगणियारखड़ताल (जादूगर)झंपली गाँव, बाड़मेर
गाजी खान बरनाखड़ताल—
रामनाथ चौधरीअलगोजाजयपुर
करणा भीलनड़—

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. घन वाद्य धातु के होते हैं, अवनद्ध वाद्य खाल से मढ़े होते हैं और सुषिर वाद्य मुँह से फूँककर बजाए जाते हैं।
  2. राज्य वाद्य अलगोजा है।
  3. अवनद्ध वाद्यों में सबसे बड़ा नौबत है और सबसे प्राचीन ढोलक।
  4. सुषिर में शहनाई सर्वश्रेष्ठ और मोरचंग सबसे छोटा है; मोरचंग फूँक के बिना बजता है, फिर भी सुषिर वर्ग में गिना जाता है।
  5. खड़ताल के जादूगर सद्दीक खाँ मांगणियार (झंपली गाँव, बाड़मेर) हैं; मंजीरा तेरहताली नृत्य में कामड़ स्त्रियों के हाथ में रहता है।
  6. चंग, डफ और घेरा एक ही वाद्य-परिवार के नाम हैं, और चंग का छोटा रूप ढपली कहलाता है।
  7. घंटों का आकार क्रम से बढ़ता है — टिकोरा सबसे छोटा, फिर वीर घंटा, और घंटा / घड़ियाल सबसे बड़ा।
  8. मादल भीलों के गवरी नाट्य और गरासियों के मांदल नृत्य में बजता है।
  9. पुंगी / बीन कालबेलिया जाति का प्रमुख वाद्य है; अलगोजा के प्रसिद्ध कलाकार रामनाथ चौधरी (जयपुर) हैं।

अगले भाग में आदिवासी राजस्थान की तस्वीर — कितने, कहाँ और किस क्रम में — और सबसे बड़ी जनजाति मीणा तथा सबसे प्राचीन जनजाति भील का परिचय।

पिछला भाग: राजस्थान के लोकगीत: विरह व शृंगार के गीत

अगला भाग: राजस्थान की जनजातियाँ: मीणा जनजाति एवं भील जनजाति (भाग 1)

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