वाद्यों के प्रश्न अक्सर बनावट देखकर ही हल हो जाते हैं — धातु का है तो घन, खाल मढ़ी है तो अवनद्ध और मुँह से फूँकना पड़े तो सुषिर। इस भाग में तीनों वर्गों की पहचान और राज्य वाद्य, फिर घन, अवनद्ध और सुषिर वाद्य एक-एक करके, अंत में जाति-जनजाति के वाद्य और प्रसिद्ध वादक दिए गए हैं। हर वाद्य के साथ उसकी बनावट और बजाने वाले का नाम जोड़ा गया है, ताकि जोड़ी बनाकर याद रखना आसान रहे।
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1. वाद्यों के तीन वर्ग
| वर्ग | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| घन वाद्य | धातु के बने; उन पर चोट करने या आपस में टकराने से स्वर निकलता है | करताल, खड़ताल, मंजीरा, झांझ, झालर, घंटा, घुघरू |
| अवनद्ध (ताल) वाद्य | चमड़े (खाल) से मढ़े हुए | ढोलक, ढोल, नगाड़ा, डमरू, चंग, खंजरी, मादल |
| सुषिर वाद्य | मुँह से फूँक मारकर बजाए जाते हैं | शहनाई, बाँसुरी, अलगोजा, पुंगी, मशक, सींगा |
2. राज्य वाद्य और रिकॉर्ड
- राज्य वाद्य ➜ अलगोजा
- अवनद्ध में सबसे बड़ा ➜ नौबत
- अवनद्ध में सबसे प्राचीन ➜ ढोलक
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
ध्यान दें: चंग, डफ, ढपली और घेरा एक ही वाद्य-परिवार के नाम हैं — इलाके और बनावट के हिसाब से नाम बदल जाता है।
3. घन वाद्य
घन वाद्य धातु के होते हैं; इन पर चोट करके या दो टुकड़े टकराकर स्वर निकाला जाता है। ज़्यादातर भजन-कीर्तन और नृत्य में काम आते हैं।
4. तश्तरी-ताल वाद्य
| वाद्य | बनावट | कहाँ / कौन |
|---|---|---|
| करताल | दो चौकोर लकड़ी के टुकड़े, उनमें पीतल की छोटी तश्तरियाँ; टकराने पर मधुर झंकार | साधु-संन्यासी भजन में |
| खड़ताल | कैर, शीशम या बबूल की 6–8 इंच लम्बी, 2 इंच चौड़ी पट्टियाँ; कोने गोल; एक हाथ में अँगूठे के भीतरी हिस्से व अन्य चार उँगलियों के बीच पकड़ी जाती हैं | विदेशी “कास्टनेट” से मिलती-जुलती |
| मंजीरा | पीतल/काँसे की मिश्रित धातु की कटोरी-आकार गोल तश्तरी; हमेशा जोड़े में टकराकर | तेरहताली नृत्य में कामड़ स्त्रियों के हाथ में; कीर्तन में ढोलक की संगत |
| झांझ | मंजीरे का बड़ा रूप | शेखावाटी में कच्छी घोड़ी नृत्य व धार्मिक भजन |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: खड़ताल का जादूगर — सद्दीक खाँ मांगणियार (झंपली गाँव, बाड़मेर); एक और प्रसिद्ध खड़ताल कलाकार — गाजी खान बरना।
5. घंटियाँ और श्रीमंडल
| वाद्य | पहचान |
|---|---|
| टिकोरा | घर की पूजा-आरती के समय; इसे घंटी भी कहते हैं; वीर घंटा का छोटा रूप |
| वीर घंटा | मंदिर में आरती के समय पुजारी एक हाथ से बजाता है; टिकोरा का बड़ा रूप |
| घंटा / घड़ियाल | पीतल का गोलाकार बड़ा वाद्य; मंदिर में डोरी या साँकल से लटका रहता है; भीतर लटके डंडे की चोट से बजता है |
घंटों का आकार
- टिकोरा (सबसे छोटा)
- वीर घंटा
- घंटा / घड़ियाल (सबसे बड़ा)
6. घुँघरू और अन्य घन वाद्य
| वाद्य | बनावट | किसके हाथ में |
|---|---|---|
| लेजिम गरासिया | बाँस का धनुष-आकार टुकड़ा, उसकी ज़ंजीर में पीतल की छोटी गोल पत्तियाँ; हिलाने पर झनझनाहट | गरासिया जनजाति (नाम इसी से); आज स्कूली बच्चे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में |
| रमझौल | चमड़े की पट्टी पर ढेर सारे छोटे घुँघरू | नृतकियाँ पैरों में बाँधती हैं |
| घुघरू | बेर के आकार के पीतल/काँसे के नन्हे गोले, जिनके भीतर कंकड़ या लोहे की गोलियाँ खनकती हैं | नृतक पैरों पर बाँधते हैं |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
7. अवनद्ध (ताल) वाद्य
जो वाद्य चमड़े से बने हों उन्हें अवनद्ध या ताल वाद्य कहते हैं। इनमें सबसे प्राचीन ढोलक है और सबसे बड़ा नौबत।
8. डमरू, डैरू, चंग, खंजरी
| वाद्य | पहचान | कौन |
|---|---|---|
| डैरू | डमरू का बड़ा भाई; बाएँ हाथ में थामकर दाएँ हाथ की छोटी छड़ी से बजता है | गोगाजी के भक्त |
| डमरू | शिवजी का वाद्य; दोनों ओर चमड़ा मढ़ा; इसका छोटा रूप डुग-डुगी | मदारी भी |
| खंजरी | चंग का छोटा रूप-सा; घेरा आम की लकड़ी का, उसमें धातु की गोल झाँझनियाँ जड़ी होती हैं | कामड़, भील, कालबेलिया |
- चंग का छोटा रूप ढपली कहलाता है।
- चंग, डफ और घेरा एक ही वाद्य के नाम हैं — इलाके के प्रभाव से नाम बदलते हैं।
- सामान्यतः जब घेरा गोल की जगह अष्टभुजाकार होता है, तब उसे डफ कहते हैं।
9. ढोलक, ढोल, मादल, पखावज
| वाद्य | बनावट | बजने का अवसर |
|---|---|---|
| ढोलक | शीशम, नीम या सागवान के तने को खोखला करके बनती है; अवनद्ध में सबसे प्राचीन | धार्मिक भजन-कीर्तन, शुभ अवसर |
| ढोल | लोहे या लकड़ी का गोल घेरा, दोनों मुँह चमड़े से मढ़े; ढोलक की तरह रस्सी से कसा; डोरी गले में डालकर खड़े-खड़े बजता है | — |
| मादल | मिट्टी का ढाँचा (मोलेला, राजसमंद की मिट्टी-कला से जुड़ा) जिसके दोनों सिरों पर चमड़ा चढ़ा है; एक सिरा बड़ा, एक छोटा; बजाने से पहले खाल पर जौ का आटा लगाया जाता है; रावलों की मादल में डोरी कसने के लिए पखावज जैसे काठ के गुटके | भील — गवरी नाट्य; गरासिया — मांदल नृत्य |
ट्रिक: पखावज के प्रसिद्ध कलाकार — पंडित पुरुषोत्तम दास और भवानीशंकर कथक (बीदासर, चूरू)।
10. नगाड़ा परिवार
| वाद्य | बनावट | अवसर / क्षेत्र |
|---|---|---|
| नगाड़ा | भैंसे के चमड़े का; जोड़ा (नर + मादा); आकार में नौबत से छोटा | मांगलिक अवसर पर शहनाई के साथ; रामलीला, नौटंकी, ख्याल; मेवात का लोकप्रिय |
| निशान | नगाड़े से थोड़ा बड़ा | प्राचीन काल में युद्ध में |
| नौबत | चार फुट गहरे आधे-अण्डे जैसे कुण्ड पर भैंसे की खाल; वादक खड़ा होकर डंडों से बजाता है; ताल-वाद्यों में सबसे विशाल | पहले युद्ध में, अब मंदिरों में |
| बम / टामक / दमामा | लोहे की कढ़ाई से बना ढाई-तीन फुट ऊँचा नगाड़ा; भैंसे की खाल; भारी लकड़ी के डंडे | मुख्यतः मेवात; भरतपुर में रसिया गीत के साथ |
सुषिर वर्ग के “अन्य” वाद्यों में बरगु का नाम भी गिनाया जाता है।
11. सुषिर वाद्य
जिन्हें मुँह से फूँक मारकर बजाते हैं, वे सुषिर वाद्य हैं। इनमें शहनाई सर्वश्रेष्ठ और मोरचंग सबसे छोटा है।
12. शहनाई-परिवार
| वाद्य | पहचान | कौन / कहाँ |
|---|---|---|
| शहनाई | फूँक वाद्यों में श्रेष्ठतम; दूसरे नाम सुन्दरी/नफीरी; चिलम-आकार की नली टाली, सागवान या शीशम की लकड़ी की, उसमें 8 छेद; विवाह-मंगल के मौक़ों पर | नगाड़े के साथ जोड़ी; कलाकार — बिस्मिल्लाह खाँ; राजस्थान में चाँद मोहम्मद खाँ |
| सुरनाई | शहनाई और टोटो से मिलता आकार; विवाह-मांगलिक अवसर; शीशम की लकड़ी, पीतल-ताँबे की नली वाली शहनाई जैसी दिखती है; शहनाई शास्त्रीय, सुरनाई लोकवाद्य | प्रसिद्ध वादक — पेपे खाँ |
| टोटो | शहनाई का देशी रूप | जोगी, भील, ढोली |
13. बाँसुरी, अलगोजा, नड़, सतारा
| वाद्य | बनावट | कौन / कहाँ |
|---|---|---|
| बाँसुरी | बाँस या लकड़ी की खोखली नली; सुरों के लिए तय दूरी पर 6 छेद और मुँह की ओर फूँकने का एक अलग छेद; श्रीकृष्ण का वाद्य | कलाकार — हरिप्रसाद चौरसिया, पन्नालाल घोष |
| अलगोजा | 4 से 7 छेद वाली दो बाँसुरियाँ; वादक दोनों एक साथ मुँह में रखकर बजाता है; कैर की लकड़ी से | भील व कालबेलिया; हाड़ौती, खैरथल-तिजारा और अलवर में अधिक चलन; राज्य वाद्य; कलाकार — रामनाथ चौधरी (जयपुर) |
| सतारा | बाँसुरी, अलगोजा और शहनाई का मिश्रित रूप; अलगोजे जैसी दो बाँसुरियाँ | जैसलमेर, बालोतरा, बाड़मेर में; मुस्लिम कलाकार व गड़रिये |
14. युद्ध-मंदिर के बड़े फूँक वाद्य
| वाद्य | बनावट | प्रयोग |
|---|---|---|
| बांकिया | बिगुल का बड़ा रूप; पीतल या स्टील का | सरगड़ा जाति का खानदानी वाद्य; आजकल ब्रास बैंड में भी |
| बिगुल | सेना व पुलिस का वाद्य | प्राचीन काल में युद्ध में |
| सींगा / सींगी | धनुषाकार पीतल की नली; पुराने समय में जानवरों के सींग से भी बनता था | साधु-संन्यासी; युद्ध में बजने से “रणसिंगा” |
| भूंगल | पीतल की नली, लगभग तीन हाथ की | भवाई जाति का प्रमुख वाद्य; युद्धों में बजने से “रणभेरी“ |
15. मशक, मोरचंग, पुंगी
| वाद्य | कैसे बनता / बजता है | कौन |
|---|---|---|
| मशक | बकरे के चमड़े का थैला, बैगपाइपर जैसा; एक नली से मुँह से हवा भरते हैं, दूसरी ओर दो नलियों से हवा निकलती है; काँख में दबाकर बजता है; मशकबाजा भी कहते हैं | पूर्वी राजस्थान में सबसे ज़्यादा; पुलिस और सुरक्षा-बल बैंडों का मुख्य वाद्य; भैरूजी के भोपे भी बजाते हैं |
| मोरचंग | लोहे की छड़ों का छोटा वाद्य; होंठों के बीच दबाकर बजता है, फूँक नहीं मारी जाती, फिर भी इसे सुषिर में गिना जाता है; ज्यूज़ हार्प; सुषिर वाद्यों में सबसे छोटा | — |
| पुंगी / बीन | विशेष तुम्बे की; आगे के हिस्से में दो नलियाँ; साँप को मंत्रमुग्ध करने में काम आती है; कालबेलिया नृत्य में भी | कालबेलिया/सँपेरे — कालबेलिया जाति का प्रमुख वाद्य |
रोचक तथ्य: मोरचंग को “ज्यूज़ हार्प” कहते हैं; यह फूँक के बिना बजता है फिर भी सुषिर वर्ग में है — सबसे छोटा।
16. जाति और जनजाति के वाद्य
| जाति / जन | उनके वाद्य |
|---|---|
| कालबेलिया | पुंगी/बीन, घुरालियो, अलगोजा, चंग/ढप/घेरा, खंजरी |
| भील | मादल (गवरी नाट्य), अलगोजा, खंजरी, टोटो |
| गरासिया | लेजिम गरासिया, मादल (मांदल नृत्य) |
| कामड़ | मंजीरा (तेरहताली), खंजरी |
17. प्रसिद्ध वादक
| कलाकार | वाद्य | स्थान |
|---|---|---|
| सद्दीक खाँ मांगणियार | खड़ताल (जादूगर) | झंपली गाँव, बाड़मेर |
| गाजी खान बरना | खड़ताल | — |
| रामनाथ चौधरी | अलगोजा | जयपुर |
| करणा भील | नड़ | — |
रिवीजन पॉइंटर्स
- घन वाद्य धातु के होते हैं, अवनद्ध वाद्य खाल से मढ़े होते हैं और सुषिर वाद्य मुँह से फूँककर बजाए जाते हैं।
- राज्य वाद्य अलगोजा है।
- अवनद्ध वाद्यों में सबसे बड़ा नौबत है और सबसे प्राचीन ढोलक।
- सुषिर में शहनाई सर्वश्रेष्ठ और मोरचंग सबसे छोटा है; मोरचंग फूँक के बिना बजता है, फिर भी सुषिर वर्ग में गिना जाता है।
- खड़ताल के जादूगर सद्दीक खाँ मांगणियार (झंपली गाँव, बाड़मेर) हैं; मंजीरा तेरहताली नृत्य में कामड़ स्त्रियों के हाथ में रहता है।
- चंग, डफ और घेरा एक ही वाद्य-परिवार के नाम हैं, और चंग का छोटा रूप ढपली कहलाता है।
- घंटों का आकार क्रम से बढ़ता है — टिकोरा सबसे छोटा, फिर वीर घंटा, और घंटा / घड़ियाल सबसे बड़ा।
- मादल भीलों के गवरी नाट्य और गरासियों के मांदल नृत्य में बजता है।
- पुंगी / बीन कालबेलिया जाति का प्रमुख वाद्य है; अलगोजा के प्रसिद्ध कलाकार रामनाथ चौधरी (जयपुर) हैं।
अगले भाग में आदिवासी राजस्थान की तस्वीर — कितने, कहाँ और किस क्रम में — और सबसे बड़ी जनजाति मीणा तथा सबसे प्राचीन जनजाति भील का परिचय।
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