राजस्थान की हस्तकलाएँ: वस्त्र-कलाएँ एवं अन्य हस्तकलाएँ – Rajasthan Art and Culture Chapter 18

लहरिया, बांधनी-चुनरी, गोटा-मुकेश, कढ़ाई-पेचवर्क, लाख, मांडणा और राजस्थानी खान-पान का सार।

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In this chapter (11 sections)
  1. लहरिया व मोठड़ा
  2. बांधनी, चुनरी व धनक
  3. गोटा, बादला व मुकेश
  4. छपाई — पूरे राजस्थान में
  5. कढ़ाई, पेचवर्क व बातिक
  6. ग्रामीण घरेलू शिल्प
  7. जट कतराई, पेपरमैशी, लाख
  8. थापे व मांडणा
  9. पतंगबाज़ी, पुरस्कार, बजट
  10. राजस्थान के प्रसिद्ध खान-पान
  11. रिवीजन पॉइंटर्स

कपड़े की कलाओं के नाम आपस में बहुत मिलते-जुलते हैं, इसलिए असली अंतर धारी, बूँद और बुनाई के ढंग से ही पकड़ में आता है। लहरिया में आड़ी लहर होती है, चुनरी में बूँदें और धनक में बड़ी चौकोर बूँदें। इस भाग में लहरिया-मोठड़ा, बांधनी, गोटा-बादला-मुकेश, छपाई, कढ़ाई, लाख, जट कतराई, थापे-मांडणा, पुरस्कार और खान-पान क्रमवार लिए गए हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान की हस्तकलाएँ, 7 चॉक-बोर्ड चित्र, 26 नक्शे, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. लहरिया व मोठड़ा

  • आड़ी (तिरछी लहरदार) धारियों में रंगा कपड़ा लहरिया है — पगड़ी, साड़ी, ओढ़नी, सब रूपों में। केन्द्र — जयपुर।
  • श्रावण में, ख़ासकर तीज पर स्त्रियाँ लहरिया ओढ़नी और पुरुष लहरिया पगड़ी पहनते हैं।
  • रंग ➜ एक, दो, तीन, पाँच या सात; पाँच रंग शुभ गिने जाते हैं, इसीलिए मांगलिक अवसरों पर पंचरंग लहरिया।
प्रकारपहचान
प्रतापशाहीसाहित्य में इसका उल्लेख मिलता है
राजाशाहीजयपुर के रंगरेज व नीलगर रंगते; चमकदार गुलाबी आड़ी रेखाएँ
समुद्रलहरजयपुर के रंगरेज; चौड़ी-चौड़ी आड़ी धारियाँ; 2, 3, 5 या 7 रंगों में

ध्यान दें: मोठड़ा — यदि धारियाँ केवल एक ओर से हों तो लहरिया; दोनों तरफ़ से आकर आपस में कटें तो मोठड़ा। मोठड़े जोधपुर के प्रसिद्ध।

2. बांधनी, चुनरी व धनक

बांधनी — सूती या रेशमी कपड़े पर मोम लगे धागे से डिज़ाइन बाँधकर रंग में डुबोने की कला। यह कला राजस्थान और गुजरात, दोनों में प्राचीन काल से चली आ रही है। केन्द्र — जयपुर व शेखावाटी; जोधपुरी बंधेज को 2023 में GI मिला।

  • चुनरी ➜ बूँदों के आधार पर बना डिज़ाइन; जयपुर की प्रसिद्ध (जोधपुर की भी)।
  • चुनरी के प्रकार ➜ बेल, सुआ, त्रिबूँदी, संगम, पीला, मोठड़ा, डाबा, लाड्डू, पतंगा, चौखाना, धनक।
  • धनक ➜ बड़ी-बड़ी चौकोर बूँदों वाला अलंकरण।

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

ट्रिक: लहरिया = आड़ी लहर · चुनरी = बूँदें · धनक = बड़ी चौकोर बूँदें।

3. गोटा, बादला व मुकेश

गोटा — सूती ताने पर बादले (चमकीले तार) से बुना चमकीला फीता / पट्टी / बेल, जो कपड़ों के किनारे पर टाँका जाता है। निर्माण-केन्द्र — खंडेला (सीकर) व भिनाय (अजमेर)। चौड़ाई के अनुसार गोटा चौमास्या या आठमास्या भी होता है।

नामक्या है
लप्पाबुनाई में ही डिज़ाइन वाला चौड़ा गोटा
लप्पीलप्पा की कम चौड़ाई वाला रूप; बिंदुओं के आधार पर चौदानी (दाना), सतदानी, नौदानी
किरणबादले की झालर; नवविवाहिता की साड़ी के आँचल व घूँघट वाले भाग में
गोखरूगोटे को मोड़कर तिकोने डिज़ाइन में बना फूल

… शेष 5 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

शब्दअर्थ
कलाबतूसुनहरा तार
बादलासोने या चाँदी के तार को चपटा करके तैयार धागा — इसी से गोटा बनता और मुकेश की कढ़ाई होती है
मुकेशरेशमी या सूती कपड़े पर बादले से बनी छोटी-छोटी बिंदकियों की कढ़ाई

ट्रिक: गोटे के नौ नाम — लप्पा, लप्पी, किरण, बांकड़ी, गोखरू, नक्शी, बिजिया, चम्पाकली, लहरगोटा। किरण = घूँघट-आँचल की झालर, गोखरू = तिकोना फूल।

4. छपाई — पूरे राजस्थान में

इलाक़ाछपाई की पहचान
पीपाड़, जोधपुर, पालीबड़े और सशक्त अलंकरण; लाल, काला, नीला, हरा
बाड़मेर व बालोतराअजरख व मलीर छपाई
आहड़ (उदयपुर) व भीलवाड़ाज़्यादातर लाल-काले में चुनरी की छपाई; ओढ़नी की शोभा बढ़ाने के लिए पीले-गुलाबी-हरे से तोता, मोर, फूल-पत्ती

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ध्यान दें: आहड़ (उदयपुर) के पास की चुनरी छपाई और भीलवाड़ा की भोडल (अभ्रक) छपाई — दोनों भीलवाड़ा-मेवाड़ पट्टी की पहचान हैं।

5. कढ़ाई, पेचवर्क व बातिक

  • कढ़ाई ➜ रंग-बिरंगे धागों से कपड़े पर कलात्मक चित्रण। उल्टी बखिया, चेन और लम्बे-छोटे टाँकों की बारीक कढ़ाई पूर्वी व दक्षिणी राजस्थान में होती है।
  • भरत, सूफ़, हुरमजी, आरी ➜ कढ़ाई और पेचवर्क से जुड़े शब्द।
  • मोती भारत कढ़ाई ➜ जालौर।
कलाक्या है / कहाँ
चटपटी / पेचवर्ककपड़े पर मनचाहे डिज़ाइन ट्रेस करके काटकर दूसरे कपड़े पर टिकाकर धागे से तुरपाई; शेखावाटी में ख़ास, तथा बाड़मेर और अजमेर के तिलोनिया में भी
बातिक (खंडेला, सीकर)कपड़े पर मोम की तह चढ़ाकर रंग-योजना से चित्रकारी; उद्भव दक्षिण भारत में; सिद्धहस्त कलाकार आर. बी. रायजादा
रालीबिछाने की चीज़; जैसलमेर की ज़मीन पर बिछने वाली राली पर महीन कशीदाकारी

6. ग्रामीण घरेलू शिल्प

नामक्या है
वीलग्रामीण महिलाएँ घर सजाने व रोज़ के सामान को सुरक्षित रखने के लिए बाँस की खपच्चियों + चिकनी मिट्टी से महलनुमा आकृति बनाती हैं; पश्चिमी राजस्थान में सबसे प्रसिद्ध
घोड़ा बावसीमिट्टी के कलात्मक घोड़े; भील व गरासिया समाज में गहरी आस्था; मनौती पूरी होने पर इष्टदेव को चढ़ाए जाते हैं
सोहरियाअनाज रखने के लिए मिट्टी के कलात्मक पात्र
बटेवड़ा / बटोड़ा / पिंडारागोबर के उपलों की क़रीने से चुनाई करके चारों ओर गोबर से लीपा ढेर; ढूँढाड़ के बटेवड़े प्रसिद्ध

7. जट कतराई, पेपरमैशी, लाख

जट कतराई

ऊँट के जीवित रहते उसके बाल काटकर बनाई चित्रकारी। बीकानेर के कैमल फेस्टिवल और पुष्कर पशु मेले में प्रतियोगिता होती है; प्रसिद्ध कलाकार अशोक टांक (पुष्कर)।

पेपरमैशी / कुट्टी का काम — जयपुर

  • काग़ज़, चाक, मिट्टी, फ़ेविकोल, गोंद आदि को गलाकर बनी कुट्टी और मुल्तानी मिट्टी के पेस्ट से तरह-तरह के पात्र बनाना।
  • जयपुर में यह काम महाराजा रामसिंह (1835–1880) के समय से हो रहा है।
  • प्रसिद्ध कलाकार ➜ कान्तिप्रसाद, श्रीचंद, देवीसिंह, कुँवरसिंह, साँवलसिंह, जमना प्रसाद, दीनदयाल।

लाख का काम

  • मणिहार जाति के लोग करते हैं। प्रमुख केन्द्र — जयपुर व उदयपुर; सीकर ज़िले के फतेहपुर व लक्ष्मणगढ़ में भी।
  • प्रसिद्ध कलाकार ➜ शादाब अहमद (जयपुर) और स्व. इकराम अहमद खान (उन्हें लाइफ़टाइम गोल्डन अचीवमेंट अवार्ड मिला)।
  • लाख की चूड़ियाँ “मोकड़ी” कहलाती हैं।
शिल्पकेन्द्र
लाख की चूड़ियाँजयपुर, जोधपुर
लाख के आभूषण व खिलौनेउदयपुर
लाख की पॉटरीबीकानेर
लकड़ी के दरवाज़ों पर कुराईशेखावाटी

पत्थर-धातु की मूर्तियाँ

मूर्तियाँकेन्द्र
संगमरमरजयपुर
लाल पत्थरथानागाजी (अलवर), सिकंदरा (दौसा)
संगमरमर व सजावटी कलाकृतियाँकिशोरी गाँव (अलवर)
जस्ते की मूर्तियाँजोधपुर

8. थापे व मांडणा

  • थापे ➜ ग्रामीण स्त्रियाँ त्योहारों-उत्सवों पर परम्परागत रंगों से हथेलियों के निशान बनाती हैं — जैसे नागपंचमी, शीतला और गणगौर के थापे।
  • मांडणा ➜ घर के आँगन, द्वार, चौक, पूजा-स्थल और दूसरी चीज़ों को खड़िया, गेरू, हिरमिच, पेवड़ी, काजल, हल्दी आदि से रेखाओं के आलेखन द्वारा सजाना।
  • तीर्थयात्रा से सकुशल लौटने की ख़ुशी में “पुष्कर पेड़ी” तथा “पथवारी” मांडी जाती है।
प्रमुख मांडणे
पगल्या
चौकड़ी
ताम

9. पतंगबाज़ी, पुरस्कार, बजट

पतंगबाज़ी

  • लखनऊ से एक मुसलमान पतंगसाज़ परिवार को जयपुर बुलाकर बसाने वाले शासक — महाराजा सवाई रामसिंह (1833–1880)।
  • मकर संक्रांति पर जयपुर में पतंगें उड़ाई जाती हैं; ढूँढाड़ के कानोता में ढूँढ नदी के मैदान में अब भी पतंगों का दंगल देखने लायक़ होता है।
  • इस पर्व पर तिल को “पितृतर्पण व हीम धन्य” भी कहते हैं।

पुरस्कार

पुरस्कारदेने वाला / राशिहाल का विजेता
लाइफ़टाइम अचीवमेंट लोक कला पुरस्कारडॉ. कोमल कोठारी की स्मृति में; शिल्पग्राम महोत्सव में; 2,51,000 रुपये—
राजस्थान हस्तशिल्प रत्न पुरस्कारराजसीको; 1.00 लाख (राज्य-स्तरीय, हर वर्ष)2021 — बाबूलाल मारोटिया
राजस्थान बुनकर रत्न पुरस्कारराजसीको; 1.00 लाख (राज्य-स्तरीय, हर वर्ष)2021 — गंगासिंह गौतम

बजट घोषणा 2024-25

राजस्थान में “माटी कला सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस” स्थापित किया जाएगा।

10. राजस्थान के प्रसिद्ध खान-पान

व्यंजनप्रसिद्ध स्थान
दाल-बाटी-चूरमाराजस्थान का प्रसिद्ध भोजन
दाल कचौरीकोटा
प्याज कचौरीजोधपुर
मावा कचौरीजोधपुर

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. धारियाँ केवल एक ओर से हों तो लहरिया; दोनों तरफ़ से आकर कटें तो मोठड़ा — मोठड़े जोधपुर के प्रसिद्ध हैं।
  2. लहरिया ➜ आड़ी लहर, चुनरी ➜ बूँदें, धनक ➜ बड़ी चौकोर बूँदें — यह तीनों का फ़र्क याद रखें।
  3. जोधपुरी बंधेज को 2023 में GI मिला।
  4. गोटे के निर्माण-केन्द्र खंडेला (सीकर) व भिनाय (अजमेर) हैं; बादले से ही गोटा बनता है और मुकेश की कढ़ाई होती है।
  5. बाड़मेर व बालोतरा की पहचान अजरख व मलीर छपाई है; बातिक का केन्द्र खंडेला (सीकर) है।
  6. लाख की चूड़ियाँ «मोकड़ी» कहलाती हैं और यह काम मणिहार जाति के लोग करते हैं।
  7. जट कतराई ऊँट के बाल से बनती है; प्रसिद्ध कलाकार अशोक टांक (पुष्कर) हैं।
  8. बजट 2024-25 में «माटी कला सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस» स्थापित करने की घोषणा हुई।
  9. दाल कचौरी कोटा की प्रसिद्ध है, जबकि प्याज कचौरी और मावा कचौरी जोधपुर की।

अगले भाग में आभूषणों की प्राचीनता, अंगों के हिसाब से बँटवारा और रत्न-नगरी जयपुर, फिर सिर, कान, नाक, दाँत और गले के गहने।

पिछला भाग: राजस्थान की हस्तकलाएँ: जयपुर संभाग एवं अजमेर व जोधपुर संभाग

अगला भाग: राजस्थान के आभूषण: सिर, कान, नाक और दाँत एवं गले के आभूषण

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ · राजस्थान के आभूषण

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

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