लोकदेवताओं को समझने का आसान तरीका यह सवाल है — इन्होंने प्राण किसके लिए दिए, गायों के लिए या गाँव के लिए? इसी से पूरे वर्ग बन जाते हैं। इस भाग में देवनारायणजी, देवबाबा और भूरिया बाबा (गौतमेश्वर) के बाद वीर योद्धा व बलिदानियों की श्रेणी आती है, जिसमें कल्लाजी, बिग्गाजी, फत्ताजी, पनराजजी और बाबा झुँझार जी क्रमवार दिए गए हैं।
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1. देवनारायणजी
- वंश ➜ नागवंशीय बगड़ावत गुर्जर
- जन्म ➜ मालासेरी के जंगल (गोठ दड़ावता, आसींद, भीलवाड़ा) — 1243 ई., माघ शुक्ल षष्ठी
- काल ➜ 1243 ई. से 1290 ई.
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उपनाम
- वास्तविक नाम उदयसिंह/उदल जी; संतानें बाला और बाली।
- जन्म से पहले ही पिता सवाईभोज, अपने 23 भाइयों के साथ, भीनाय के राव दुर्जन से लड़ते मारे जा चुके थे। माता सेदू बालक को लेकर मायके मालवा चली गईं, जहाँ उसका बचपन बीता।
- सिर्फ़ 10 वर्ष की आयु में पिता का प्रतिशोध लेने लौटते समय राह में धारा नगरी पड़ी, जहाँ राजा जयसिंह देव परमार की कन्या पीपलदे से उनका विवाह हुआ।
मुख्य मंदिर: आसींद (भीलवाड़ा)
- यहाँ सवाईभोज, देवनारायण और सेदू के मंदिर हैं; मेला भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को।
- देवनारायण के देवरों-मंदिरों में मूर्ति के साथ ईंटें भी पूजित हैं।
- मेले के दिन गुर्जर दूध नहीं बेचते और दही नहीं जमाते।
ट्रिक: देवनारायणजी का मेला शुक्ल सप्तमी, तेजाजी का शुक्ल दशमी — दोनों भाद्रपद; ईंट = देवनारायण; बैलगाड़ी = हड़बूजी।
देवनारायणजी — फड़ व कथा
- देवनारायण की फड़ ➜ गुर्जर भोपे जन्तर वाद्य के साथ गाते हैं; सभी लोकदेवताओं की फड़ों में सबसे प्राचीन और सबसे लम्बी।
- देवनारायण की फड़ पर ₹5 का डाक टिकट 2 सितम्बर 1992 को निकला; यह राजस्थान में किसी फड़ पर आया पहला टिकट है।
- देवनारायणजी के स्वयं के चित्र पर भी 2011 में ₹5 का टिकट छपा।
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आयुर्वेद के ज्ञाता
आयुर्वेद और तंत्र-विद्या में निपुण देवजी ने औषधि के रूप में गोबर और नीम की उपयोगिता समझाई।
राज्य क्रांति के जनक
भिनाय (अब ब्यावर ज़िले में) के राजा का वध कर उन्होंने सिंहासन पर बड़े भाई महेन्द्र को बिठाया।
अन्य मंदिर
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| देवमाली | ब्यावर | यहीं देह-त्याग; पुत्रों ने तपस्या की |
| देवधाम जोधपुरिया | निवाई, टोंक | दीवारों पर बगड़ावतों की शौर्य-गाथाओं के चित्र |
| देव डूँगरी पहाड़ | चित्तौड़गढ़ | निर्माण राणा साँगा ने करवाया |
2. देवबाबा
- उपनाम ➜ गुर्जर-ग्वालों के संरक्षक · कष्ट-निवारक देव
- मुख्य मंदिर ➜ नगला जहाज (भरतपुर)
- पूजा-स्थल ➜ नीम के पेड़ के नीचे
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- पशुओं के इलाज की जानकारी के कारण चरवाहे और ग्वाले इन्हें अपना इष्ट मानते हैं।
- दोनों मेलों में चरवाहों व ग्वालों को भोजन कराने की रीत है।
- मान्यता है कि मृत्यु के बाद भी इन्होंने बहन एलारी के घर भात भरा।
3. भूरिया बाबा (गौतमेश्वर)
- उपनाम ➜ गोड़वाड़ के मीणाओं के आराध्य · वीरता के प्रतीक
- मंदिर ➜ पीसलिया (शिवगंज तहसील, सिरोही) — सिरोही-पाली सीमा पर सुकड़ी नदी (पतित गंगा) के किनारे
- मेला ➜ 13 से 15 अप्रैल
- अरावली की गोड़वाड़ पट्टी में रहने वाले मीणों का यह सबसे बड़ा मेला है।
- पुरानी रीति से मेले में वर्दीधारी पुलिस नहीं जा सकती; सारा प्रबंध समाज के पंच सँभालते हैं।
- मीणा परिवार अपने दिवंगतों की अस्थियाँ सुकड़ी नदी में इसी मेले के अवसर पर बहाते हैं।
4. वीर योद्धा व बलिदानी
| वर्ग | लोकदेवता |
|---|---|
| गौ-रक्षा के लिए शहीद | गोगाजी · तेजाजी · पाबूजी · पनराजजी · बिग्गाजी · देवनारायणजी |
| गाँव-रक्षा के लिए शहीद | फत्ताजी · झुंझारजी |
ट्रिक: पनराजजी और बिग्गाजी दोनों गौ-रक्षक; फत्ताजी और झुंझारजी गाँव-रक्षक — “गौ में बिग्गा-पनराज, गाँव में फत्ता-झुंझार”।
5. वीर कल्लाजी राठौड़
- जन्म ➜ सामियाना गाँव (मेड़ता, नागौर) — 1544 ई., आश्विन शुक्ल अष्टमी
- काल ➜ 1544 से 1568 ई.
- जन्म का नाम ➜ केसरसिंह (मीराबाई इनकी बुआ थीं)
उपनाम
रोचक तथ्य: गुजरात में इनकी पहचान भाथी खत्री की है, जबकि मालवा में ये जुझारू वीर नायक कहलाते हैं।
चित्तौड़ का तीसरा साका
- अकबर के चित्तौड़ पर हमले (फरवरी 1568; दुर्ग का पतन 23 फरवरी को) में घायल ताऊ जयमल को कंधे पर बिठाकर कल्लाजी ने तलवार चलाई — इसी से उनका नाम पड़ा “चार हाथ, दो सिर वाले देवता”।
- सिर कट जाने के बाद भी उनका कबंध (धड़) देर तक मुग़लों से लड़ता रहा और अनेक सैनिकों को मारा।
- चित्तौड़गढ़ दुर्ग की भैरवपोल के निकट चार खम्भों की छतरी इनकी स्मृति में है।
रूण्डेला (रेला) — मुख्य पीठ
- रूण्डेला (रेला) ➜ ग्राम पंचायत बरोड़ा, सलूम्बर — इनकी मुख्य पीठ है। यहाँ के महन्त कल्लाजी के अनुज तेजसिंह के वंशज हैं। साथ ही महासती कृष्णा कुँवर का मंदिर है।
- पूजा की शुरुआत यहीं से हुई, फिर क्रमशः मेवाड़ व आसपास मंदिर बनते गए।
- यहाँ आश्विन शुक्ल अष्टमी को मेला भरता है।
अन्य मान्यताएँ
- डूँगरपुर के सामलिया में उनकी काले पत्थर की मूर्ति है, जहाँ केसर और अफ़ीम का चढ़ावा चढ़ता है।
- सर्वाधिक मान्यता बाँसवाड़ा में है (लगभग 200 मंदिर); इनके थान पर भूत-प्रेत ग्रस्त लोगों और रोगी पशुओं का इलाज होता है।
- जड़ी-बूटियों के ज्ञान और सिद्धियों से असाध्य रोगों का इलाज करते थे।
कृष्णा कुँवर की कथा
शिवगढ़ के राव कृष्णदास की बेटी कृष्णा कुँवर भीलों (गमेती पेमला) के दमन में कल्लाजी की सहयोगी थीं; इसी दौरान दोनों ने एक-दूसरे को विवाह का वचन दे दिया। ब्याह से पहले ही कल्लाजी मुग़लों से जूझते हुए वीरगति पा गए। लोककथा है कि वचन निभाने कल्लाजी सिरविहीन धड़ लेकर पहुँचे, और कृष्णा कुँवर उसी शव के साथ रूण्डेला में चिता पर बैठ गईं — आज वहीं विशाल मंदिर है।
6. वीर बिग्गाजी
- उपनाम ➜ जाखड़ समाज के कुलदेवता
- जन्म ➜ रीड़ी गाँव (बीकानेर), जाट परिवार — 1301 ई.
- पिता-माता ➜ रावमोहन और सुल्तानी (चूहड़ जी गोदारा की बेटी, कपूरीसर-लूणकरणसर)
- इन्होंने पूरा जीवन गौ-सेवा में बिताया।
- मुस्लिम लुटेरों से गायें छुड़ाने में उन्होंने प्राण दिए — 1393 ई. में राठाली जोहड़ी (मालासर से 35 मील; बीकानेर) की लड़ाई में वे झुंझार (शहीद) हुए।
- डूँगरगढ़ तहसील का बिग्गा गाँव (पुराना नाम गोमटिया) इनके नाम पर है।
7. वीर फत्ताजी
- जन्म ➜ साँथू गाँव (जालौर), गज्जारणी परिवार
- मुख्य मंदिर ➜ साँथू (जालौर)
- मेला ➜ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल नवमी
- शस्त्र-विद्या के ज्ञाता थे।
- गाँव को लुटेरों से बचाते हुए उन्होंने प्राण दिए; इसीलिए ग्राम-रक्षक शहीद लोकदेवता कहलाते हैं।
8. वीर पनराजजी
- जन्म ➜ नगा गाँव (जैसलमेर), भाटी राजपूत परिवार
- मुख्य स्थान ➜ पनराजसर गाँव (जैसलमेर)
- मेला ➜ पनराजसर में भाद्रपद शुक्ल 10 और माघ शुक्ल 10
- जैसलमेर के काठोड़ी गाँव के एक ब्राह्मण परिवार की गायें लुटेरों (मुस्लिम) से बचाने में उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया।
- गर्दन कटने (झुंझार होने) के बाद भी युद्ध किया था।
9. बाबा झुँझार जी
- जन्म ➜ इमलोहा गाँव (सीकर), राजपूत परिवार
- मुख्य मंदिर ➜ स्यालोदड़ा (सीकर)
- मेला ➜ प्रतिवर्ष रामनवमी को
- गाँव पर लुटेरों का हमला हुआ तो उन्होंने भाइयों संग डटकर मुक़ाबला किया; एक ही कुल के तीन भाई गाँव की रक्षा में काम आए।
- उधर से गुज़रता एक दूल्हा-दुल्हन का जोड़ा भी मारा गया।
- मंदिर में प्रस्तर प्रतिमाएँ हैं — भाइयों की तथा दो प्रतिमाएँ दूल्हा-दुल्हन की।
रिवीजन पॉइंटर्स
- देवनारायणजी नागवंशीय बगड़ावत गुर्जर थे; जन्म 1243 ई. में, मुख्य मंदिर आसींद (भीलवाड़ा) में और मेला भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को भरता है।
- देवनारायण की फड़ जन्तर वाद्य के साथ गाई जाती है और सभी लोकदेवताओं की फड़ों में सबसे प्राचीन व सबसे लम्बी है; उस पर 2 सितम्बर 1992 को डाक टिकट निकला, जो किसी फड़ पर राजस्थान का पहला टिकट है।
- देवबाबा गुर्जर-ग्वालों के देव हैं; मुख्य मंदिर नगला जहाज (भरतपुर) में नीम के पेड़ के नीचे है।
- भूरिया बाबा (गौतमेश्वर) का मंदिर पीसलिया (सिरोही) में है; 13 से 15 अप्रैल का मेला गोड़वाड़ के मीणाओं का सबसे बड़ा मेला है।
- गौ-रक्षा में शहीद ➜ गोगाजी, तेजाजी, पाबूजी, पनराजजी, बिग्गाजी, देवनारायणजी; गाँव-रक्षा में शहीद ➜ फत्ताजी और झुंझारजी।
- कल्लाजी का जन्म 1544 ई. में सामियाना (मेड़ता) में हुआ; चित्तौड़ के तीसरे साके में जयमल को कंधे पर बिठाकर लड़े, इसीलिए «चार हाथ, दो सिर वाले देवता» कहलाए।
- कल्लाजी की मुख्य पीठ रूण्डेला (सलूम्बर) है, जहाँ आश्विन शुक्ल अष्टमी को मेला लगता है; सर्वाधिक मान्यता बाँसवाड़ा में है।
- बिग्गाजी रीड़ी (बीकानेर) के जाट थे और जाखड़ समाज के कुलदेवता हैं; 1393 ई. में गायें छुड़ाते हुए वे झुंझार हुए।
- फत्ताजी का मंदिर साँथू (जालौर) में है, मेला भाद्रपद शुक्ल नवमी को; पनराजजी का स्थान पनराजसर (जैसलमेर) और झुँझार जी का स्यालोदड़ा (सीकर), जहाँ मेला रामनवमी को भरता है।
अगले भाग में मल्लीनाथ, तल्लीनाथ और हरिरामजी जैसे साधक-रक्षक देवता, शेखावाटी के विद्रोही डूँगरजी-जवाहरजी व बलजी-भूरजी, स्थानीय देवता और सभी लोकदेवताओं का सारांश।
पिछला भाग: राजस्थान के लोकदेवता: पंचपीर (भाग 2) एवं तेजाजी · देवनारायण · देवबाबा (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान के लोकदेवता: साधक, रोग-निवारक, रक्षक एवं विद्रोही व स्थानीय देवता
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