मेवाड़ के मंदिर इतिहास और आस्था दोनों से जुड़े हैं, इसलिए उपनाम, निर्माता और वर्ष एक साथ याद रखने पड़ते हैं। इस भाग में उदयपुर संभाग के चार धाम, एकलिंगजी-नागदा-जगत, धुलैव का ऋषभदेव मंदिर और जगदीश मंदिर आते हैं। उनके बाद चित्तौड़ दुर्ग के मंदिर, चित्तौड़गढ़ ज़िले के मंदिर और राजसमंद के मंदिर क्रम से दिए गए हैं।
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1. उदयपुर संभाग
चारों धाम
- कैलाशपुरी (एकलिंगजी)
- केसरिया जी (धुलैव)
- नाथद्वारा (श्रीनाथजी)
ट्रिक: चार धामों में दो उदयपुर के (कैलाशपुरी, धुलैव) और दो राजसमंद के (नाथद्वारा, गढ़बोर)।
2. एकलिंगजी, नागदा, जगत
एकलिंगनाथ मंदिर — कैलाशपुरी
- निर्माण ➜ बप्पा रावल ने 734 ई. में
- किसके देव ➜ गुहिल वंश के कुलदेव और महाराणाओं के इष्टदेव
- सम्प्रदाय ➜ पाशुपत / लकुलीश सम्प्रदाय का मंदिर
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- पहले महाराणा मोकल ने जीर्णोद्धार करवाया; आज का रूप महाराणा रायमल ने दिया।
- अहाते में कुम्भा का बनवाया विष्णु मंदिर है, जिसे लोग “मीराबाई का मंदिर” भी कहते हैं; पूरे परिसर पर विशाल परकोटा है।
- यहाँ अनेक शिलालेख हैं; सबसे पुराना वि.सं. 1028 का।
सहस्रबाहु (सास-बहू) मंदिर — नागदा
- दूसरे नाम ➜ अदबद जी का मंदिर और खुमाण रावल का देवरा।
- 1026 ई. में गुहिल शासक श्रीधर ने मंदिर बनवाए; यहाँ दो जुड़वाँ वैष्णव मंदिर हैं।
- बड़ा मंदिर दस सहायक देवालयों से घिरा है — यह “सास का मंदिर”; छोटा, पंचायतन शैली वाला — “बहू का मंदिर”।
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अम्बिका माता मंदिर — जगत
- उपनाम “मेवाड़ का खजुराहो”; मातृदेवियों को समर्पित होने से शक्तिपीठ कहलाता है।
- शिखर नागर शैली का; 10वीं सदी, मेवाड़ के राजा अल्लट का ज़माना।
- तीन शिलालेख हैं ➜ एक वि.सं. 1017 का। निर्माण प्रतिहार काल का, पर शैली प्रतिहार शैली से भिन्न।
जावर का विष्णु मंदिर
जावर माइंस के क्षेत्र में पंचायतन शैली का विष्णु मंदिर और रमाकुण्ड हैं। इन्हें महाराणा कुम्भा की पुत्री रमाबाई ने बनवाया; शिल्पी “ईश्वर” थे।
ट्रिक: जगत = “मेवाड़ का खजुराहो”, जबकि भण्डदेवरा (बारां) = “हाड़ौती का खजुराहो” और किराडू = “राजस्थान का खजुराहो”।
3. ऋषभदेव मंदिर, धुलैव
- स्थान ➜ धुलैव कस्बा, कोयल नदी के किनारे (उदयपुर)
- खंभे ➜ 1100 खंभे — निर्माण में चूने का प्रयोग नहीं
- प्रतिमा ➜ 3 फुट ऊँची, पद्मासन, चमकीली काली
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
तीन नाम, तीन कारण
| नाम | क्यों |
|---|---|
| केसरियानाथ जी | विश्व में केसर की सबसे बड़ी भेंट यहीं चढ़ती है |
| कालाजी | प्रतिमा चमकीली काली है; आदिवासी इसी नाम से पूजते हैं |
| धूलैव देव / धुलैव के धनी | मूर्ति धूला भील लेकर आए थे |
- एक और नाम काला-बाव जी है। वैष्णव परम्परा में ऋषभदेव विष्णु के अवतार गिने जाते हैं।
- भील “कालाजी की आण” (शपथ) को सबसे ऊपर मानते हैं — यह कसम खाने के बाद झूठ नहीं बोलते।
- यह भारत का एकमात्र मंदिर बताया जाता है जहाँ जैन, आदिवासी, वैष्णव और शैव — चारों बराबरी से पूजा करते हैं।
4. जगदीश मंदिर व अन्य
जगदीश मंदिर
- निर्माण ➜ महाराणा जगतसिंह प्रथम, 1651 ई.
- स्थान ➜ ऊँचे चबूतरे पर, जगदीश चौक में — सिटी पैलेस की चारदीवारी के बाहर
- मूर्ति ➜ काले पत्थर की 5 फुट की जगन्नाथ राय प्रतिमा
सपनों का मंदिर
गर्भगृह की मूर्ति किसी शिल्पकार ने नहीं गढ़ी। कथा है कि भगवान जगन्नाथ ने महाराणा को स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि उनकी प्रतिमा डूँगरपुर के निकट गर्वा गाँव में एक पीपल के नीचे 11 हाथ गहरी खुदाई पर निकलेगी। इसीलिए इसे “सपनों से बना मंदिर” कहते हैं।
बीस माचा तोड़
1680 ई. में औरंगजेब के हमले के समय मंदिर बचाने के लिए नारू जी बारहट ने अपने बीस साथियों के साथ मुकाबला किया और प्राण दे दिए; इतिहास में यह “बीस माचा तोड़” कहलाता है।
उदयपुर के अन्य मंदिर
| मंदिर | ख़ास बात |
|---|---|
| मछन्दर नाथ मंदिर | साँझियों के लिए प्रसिद्ध, इसलिए “संझ्या मंदिर” |
| गुप्तेश्वर महादेव | हाड़ा पर्वत पर, तीतरड़ी और एकलिंगपुरा के बीच; “गिरवा का अमरनाथ / मेवाड़ का अमरनाथ” |
| आहड़ के जैन मंदिर | 10वीं सदी का मंदिर-समूह; तपागच्छ की उद्भव-स्थली |
आहड़ में आचार्य जगच्चंद सूरि ने 12 वर्ष कठोर तप किया तो महाराणा जैत्रसिंह ने उन्हें “तपा” की उपाधि दी; उनकी शिष्य-परम्परा इसी से तपागच्छ कहलाई।
5. चित्तौड़ दुर्ग के मंदिर
| मंदिर | किसने / कब | ख़ास बात |
|---|---|---|
| कालिका माता | मूलतः सूर्य मंदिर — 7वीं सदी के अंत में राजा मानभंग (मतभेद है) | प्रतिहारकालीन महामारू शैली; प्रतिमा नष्ट होने पर महाराणा सज्जनसिंह ने जीर्णोद्धार कर कालिका मूर्ति रखवाई; गुहिल वंश की आराध्य देवी |
| तुलजा भवानी | दासी-पुत्र बनवीर | रामपोल के पास; अपने तुलादान के धन से बनवाया |
| समीधेश्वर (त्रिभुवननारायण / मोकल जी का मंदिर) | परमार राजा भोज, 1011–1055 ई. | गोमुख कुण्ड के किनारे, नागर शैली; शिव की त्रिमुखी मूर्ति; 1150 ई. का कुमारपाल का शिलालेख; 1428 ई. में महाराणा मोकल ने शिल्पी जैता से पुनर्निर्माण करवाया |
| कुम्भश्याम | 8वीं सदी; मूल निर्माता का प्रमाण नहीं (ढाकी: राजा मानभंग) | मूलतः शिव मंदिर, बाद में वैष्णव; तोड़े जाने पर कुम्भा ने 1449 ई. में जीर्णोद्धार कर वराह अवतार की मूर्ति रखवाई; प्रतिहारकालीन महामारू शैली |
ध्यान दें: समीधेश्वर के तीन नाम — त्रिभुवननारायण, मोकल जी का मंदिर, और बनवाने वाला परमार भोज; कुमारपाल का शिलालेख 1150 का है।
6. चित्तौड़गढ़ ज़िले के मंदिर
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| सांवलिया जी | मंडफिया | काले पत्थर की श्रीकृष्ण-प्रतिमा; “अफीम तस्करों का मंदिर” भी कहा जाता है; राजस्थान का सबसे अधिक चढ़ावे वाला मंदिर; जलझूलनी एकादशी को चाँदी के बेवाण में भव्य सवारी और बड़ा मेला |
| मंगलेश्वर महादेव | मातृकुंडिया (राश्मी) | “मेवाड़ का हरिद्वार”; यहीं लक्ष्मण झूला; आमेट (राजसमंद) से आती चन्द्रभागा नदी यहाँ बनास में मिलती है |
| महानालेश्वर | मेनाल | 12वीं–13वीं सदी, चौहान शासकों का; सफेद पत्थर का सबसे आकर्षक और श्रेष्ठ मंदिर; मेनाल लकुलीश शैव सम्प्रदाय का बड़ा केन्द्र; यहीं सुहवेश्वर मंदिर (पृथ्वीराज द्वितीय, भूमिज शैली) |
बाड़ोली के शिव मंदिर — भैंसरोड़गढ़ (रावतभाटा)
- क्या है ➜ छोटे-बड़े 9 मंदिरों का गुच्छा
- सबसे प्रमुख ➜ घाटेश्वर महादेव
- काल ➜ 9वीं–11वीं सदी का, प्रतिहार काल; शैली प्रतिहार शैली से अलग
- नटराज की प्रतिमा यहीं से चोरी हुई थी — चोर था बदनाम तस्कर वामन नारायण घीया।
- कलामर्मज्ञ फर्ग्यूसन ने बाड़ोली को शिल्प और स्थापत्य में अद्वितीय माना; शेषशायी विष्णु की मूर्ति को अपनी देखी हिन्दू मूर्तियों में सर्वोत्कृष्ट बताया। आज वह मूर्ति कोटा के राजकीय संग्रहालय की धरोहर है।
7. राजसमंद के मंदिर
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| द्वारकाधीश | कांकरोली | राजसमंद झील के निकट; वल्लभ-सम्प्रदाय की सात पीठों में गिना जाता है; निर्माता महाराणा राजसिंह। मूर्ति मथुरा से लाई गई — 1670 ई. में आसोतिया ग्राम में स्थापित, 1719 ई. में कांकरोली के वर्तमान मंदिर में |
| चारभुजा | गढ़बोर | मेवाड़ के चार धामों में एक; “मेवाड़ का बद्रीनाथ”; महाराणा मोकल का बनवाया; होली और देवझूलनी एकादशी पर मेला |
| कुंतेश्वर महादेव | फरारा | महाभारतकालीन मान्यता — पाण्डवों की माता कुन्ती ने स्थापना की |
परशुराम गुफा — “राजस्थान का अमरनाथ”
- राजसमंद और पाली की सीमा पर है; मुख्य गुफा राजसमंद की सीमा में, उससे थोड़ा नीचे कुण्ड धाम पाली ज़िले में।
- कुंभलगढ़ अभयारण्य में, अरावली की पश्चिमी ढाल पर; यहाँ परशुराम की गुफा और प्राकृतिक शिवलिंग है।
- मेले ➜ शिवरात्रि और श्रावण शुक्ल षष्ठी-सप्तमी; श्रावण के शुक्ल पक्ष में ही फूटा देवल मेला।
रिवीजन पॉइंटर्स
- एकलिंगनाथ मंदिर (कैलाशपुरी) बप्पा रावल ने 734 ई. में बनवाया; यह गुहिल वंश के कुलदेव का मंदिर है।
- नागदा का सहस्रबाहु मंदिर «सास-बहू मंदिर» कहलाता है — बड़ा मंदिर सास का, छोटा पंचायतन वाला बहू का।
- जगत का अम्बिका माता मंदिर «मेवाड़ का खजुराहो» है; भण्डदेवरा «हाड़ौती का खजुराहो» और किराडू «राजस्थान का खजुराहो» है।
- ऋषभदेव (धुलैव) में 1100 खंभे हैं पर चूने का प्रयोग नहीं हुआ; इसे केसरियानाथ जी और कालाजी भी कहते हैं।
- जगदीश मंदिर 1651 में महाराणा जगतसिंह प्रथम ने बनवाया; इसे «सपनों से बना मंदिर» कहते हैं।
- समीधेश्वर मंदिर परमार राजा भोज (1011–1055) का बनवाया है; 1428 में मोकल ने इसका पुनर्निर्माण करवाया।
- कुम्भश्याम का जीर्णोद्धार 1449 में कुम्भा ने करवाया और वराह अवतार की मूर्ति रखवाई।
- सांवलिया जी (मंडफिया) राजस्थान का सबसे अधिक चढ़ावे वाला मंदिर है; मंगलेश्वर महादेव «मेवाड़ का हरिद्वार» है।
- राजसमंद में गढ़बोर का चारभुजा «मेवाड़ का बद्रीनाथ» है और परशुराम गुफा «राजस्थान का अमरनाथ»।
अगले भाग में बाँसवाड़ा, डूँगरपुर और प्रतापगढ़ के मंदिर, फिर हाड़ौती (कोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़) और पूर्वी राजस्थान के प्रमुख मंदिर।
पिछला भाग: राजस्थान के मंदिर: स्थापत्य: शैलियाँ व काल
अगला भाग: राजस्थान के मंदिर: उदयपुर संभाग (भाग 2) एवं हाड़ौती व पूर्वी राजस्थान
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