लोकदेवताओं को समझने की कुंजी तीन शब्द हैं — समन्वय, वीरता और पशुधन की रक्षा। यही तीन बातें उत्तर में बार-बार काम आती हैं। इस भाग में पहले यह बताया गया है कि लोकदेवता किसे कहते हैं और क्यों उभरे। फिर शब्दावली और रिश्तेदार जोड़ियाँ आती हैं, और अंत में पंचपीर के साथ रामदेवजी व गोगाजी की जीवनी, स्थान और मेले दिए गए हैं।
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1. लोकदेवता कौन और क्यों
लोकदेवता वे महापुरुष हैं जिन्होंने अपने साहस और आत्मबल से समाज के मूल्यों व धर्म को बचाया और लोकहित में सब कुछ न्योछावर कर दिया। चमत्कारी शक्ति और जनकल्याण के कारण लोग इन्हें दुःखहर्त्ता व मंगलकर्त्ता मानकर पूजने लगे।
ये उभरे क्यों
- 11वीं से 14वीं सदी में राजस्थान में इस्लाम का प्रसार हुआ — लोगों का अपने धर्म से भरोसा डगमगाया, पशुधन घटा, मंदिर-मूर्तियाँ टूटीं।
- समाज में कुछ जातियों को नीची नज़र से देखा जाता था और कर्मकांड दिशाहीन हो चुका था।
- इन हालात में समन्वय की संस्कृति से लोकदेवताओं का उदय हुआ — इसीलिए ये साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रेरक रहे।
पहचान
- सभी लोकदेवता छुआछूत व जाति-पाँति के विरोधी और गौ-रक्षक रहे।
- कुछ को असाध्य रोगों का इलाज करने वाला भी माना गया।
- पूजा-स्थल: देवल, देवरे, थान, चबूतरे — यहाँ गाने-नाचने की परम्पराएँ भी चलती हैं।
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ट्रिक: लोकदेवता = समन्वय + वीरता + पशुधन-रक्षा। यही तीन बातें उत्तर में बार-बार काम आती हैं।
2. शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| परचा | अलौकिक शिक्षा या शक्ति से कोई काम करना/करवाना — चमत्कार। रामदेवजी के परचे विशेष प्रसिद्ध हैं। |
| चिरजा | देवी की आराधना के पद-गीत-मंत्र, जो महिलाएँ विशेषकर रात्रि-जागरण में गाती हैं। दो प्रकार — सिंघाऊ और घड़ाऊ। |
| चारण चिरजा | चारण समाज द्वारा गाई जाने वाली करणी माता की वंदना। |
| नाभा | भक्त गले में अपने इष्टदेव की धातु (सोना, चाँदी, पीतल, ताँबा) की लघु मूर्ति पहनते हैं; इसे नाभा कहा जाता है। |
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ट्रिक: पंचपीर का दोहा: “पाबू, हड़भू, रामदे, मांगलिया मेहा, पाँचो पीर पधारज्यो, गोगाजी जेहा“।
3. रिश्तेदार जोड़ियाँ
| रिश्ता | जोड़ी |
|---|---|
| पिता–पुत्र | गोगाजी – केसरिया कुँवर · सवाईभोज – देवनारायण जी |
| भाई–बहन | हर्षनाथ – जीणमाता |
| पति–पत्नी | मल्लीनाथ जी – रूपादे |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
रोचक तथ्य: जीणमाता लोकदेवी हैं और उनके भाई हर्ष (हर्षनाथ) लोकदेवता — लोकदेव-देवियों में भाई-बहन की यही एकमात्र जोड़ी है।
4. पंचपीर
| पीर | मुख्य स्थान | ज़िला | मेला |
|---|---|---|---|
| रामदेवजी | रामदेवरा (रूणीचा) | जैसलमेर | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी |
| गोगाजी | गोगामेड़ी · ददरेवा | हनुमानगढ़ · चूरू | भाद्रपद कृष्ण नवमी |
| पाबूजी | कोलूमण्ड (कोलू) | फलोदी | चैत्र अमावस्या |
5. रामदेवजी
- वंश ➜ तंवर राजपूत
- जन्म ➜ उँडूकासमेर (शिव तहसील, बाड़मेर) — भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (“बाबे री बीज”)
- समय ➜ जन्म-वर्ष पर विद्वान एकमत नहीं, पर इतना तय है कि 14वीं सदी
परिवार
- भाई वीरमदेव — बलराम का अवतार माने जाते हैं।
- बहनें लाछां बाई और सुगना बाई; सुगना की शादी परिहार राजपूत राव किशनसिंह (पूंगलगढ़) के साथ हुई।
- डालीबाई ➜ मुँहबोली बहन, मेघवाल जाति की।
गुरु, पंथ और प्रतीक
- गुरु बालीनाथ (समाधि: मसूरिया पहाड़ी, जोधपुर — वहाँ कुष्ठ रोग का निवारण माना जाता है)।
- इन्होंने कामड़िया पंथ चलाया।
- मंदिर को देवरा कहते हैं; ध्वजा नेजा (सफ़ेद, या पाँच रंगों की)।
- रात्रि-जागरण जम्मा कहलाता है; मेघवाल भक्त रिखिया; रामदेवरा जाने वाले यात्री जातरू।
चमत्कार और कथाएँ
- सातलमेर में बचपन में ही भैरव नाम के क्रूर राक्षस का अंत किया, जो गायों-पशुओं का सफ़ाया करता था।
- पंच पीपली (मक्का से आए 5 पीर): परीक्षा लेने आए पीरों को रामदेवजी ने मक्का में भूले हुए उनके कटोरों में ही भोजन करा दिया — तब उन्होंने इन्हें “पीरों का पीर” कहा।
- रामदेवजी के परचों की गाथा पर्चा/परबा में गाई जाती है — सबसे पहले रानी रूपा ने गाया।
फड़, गीत और नृत्य
- फड़-वाचन का सबसे ज़्यादा चलन जैसलमेर और बीकानेर में है; रावणहत्था बजाते हुए नायक व कामड़ जाति के भोपे इसे गाते हैं।
- ब्यावले ➜ भक्तों के गाए जाने वाले गीत।
- तेरहताली नृत्य ➜ रामदेवजी के मेले में कामड़ समुदाय की स्त्रियाँ बैठे-बैठे करती हैं; यह राजस्थान का इकलौता बैठकर किया जाने वाला नृत्य है, जिसकी शुरुआत पादरला (पाली) से मानी जाती है।
रामदेवजी — मेला व मंदिर
- मेला: द्वितीया से एकादशी (भाद्रपद शुक्ल) तक रूणेचा (रामदेवरा) में भरता है — सद्भाव का मेला।
- मंदिर: रामदेवरा (जैसलमेर) का वर्तमान मंदिर महाराजा गंगासिंह ने 1931 ई. में बनवाया।
- चढ़ावे में भक्त कपड़े का घोड़ा अर्पित करते हैं; पूजा-कार्य तंवर राजपूत करते हैं।
- समाधि: भाद्रपद शुक्ल एकादशी, 1458 ई., रूणिचा में रामसरोवर की पाल पर; इससे एक दिन पहले डालीबाई ने जल-समाधि ली।
अन्य पूजा-स्थल
| स्थान | ज़िला |
|---|---|
| बिराठिया | ब्यावर |
| उँडूकासमेर | बाड़मेर |
| कोटड़ा | बाड़मेर |
| खुण्डियास — “राजस्थान का छोटा रामदेवरा” | डीडवाना-कुचामन |
ध्यान दें: गुजरात में भी एक छोटा रामदेवरा है। खुण्डियास को द्वितीय रामदेवरा भी कहते हैं।
समाज-सुधारक रामदेवजी
- लोकदेवताओं में ये एक प्रमुख अवतारी पुरुष माने गए।
- इन्होंने मूर्ति-पूजा, तीर्थ-यात्रा और जाति-व्यवस्था का कड़ा विरोध किया।
- गुरु की महिमा बताई और कहा कि कर्म की शुद्धता से ही भाग्य बनता है।
6. गोगाजी
- वंश ➜ नागवंशीय चौहान
- जन्म ➜ ददरेवा (चूरू) — वि.सं. 1003 (946 ई.), भाद्रपद कृष्ण नवमी
- काल ➜ 946 ई. से 1024 ई.
परिवार
- मौसी आछल दे। संतानहीन बाछल को पुत्र का वरदान गुरु गोरखनाथ से मिला; प्रसाद में गुगल (सुगंधित द्रव्य) दिया गया।
- पत्नी केलमदे — कोलूमण्ड के बूडोजी राठौड़ की पुत्री।
- पुत्र केसरिया कुँवर (वे भी लोकदेव रूप में पूजित); पौत्र सामंत चौहान।
थान, प्रतीक और पूजा
- थान प्रायः गाँव में खेजड़ी के नीचे; वहाँ पत्थर पर सर्प की मूर्ति उत्कीर्ण रहती है। मंदिर को मेड़ी कहते हैं।
- हिन्दुओं के लिए ये नागराज हैं, मुसलमानों के लिए गोगापीर।
- प्रतीक ➜ भाला लिए घुड़सवार और सर्प; ध्वजा को निशान कहते हैं।
- सर्पदंश के उपचार में पूजा होती है; गुरु गोरखनाथ ने इन्हें सर्पों की सिद्धि दी थी।
गोगाजी के स्थान व मेले
| स्थान | ज़िला | विशेष |
|---|---|---|
| ददरेवा (शीर्षमेड़ी) | चूरू | लड़ते समय गोगाजी का सिर यहीं गिरा; यह जन्मस्थान भी है; मेला भाद्रपद कृष्ण नवमी को |
| गोगामेड़ी (धुरमेड़ी) | हनुमानगढ़ | यहाँ धड़ गिरा। निर्माण फ़िरोज़शाह तुग़लक ने कराया; वर्तमान रूप बीकानेर महाराजा गंगासिंह का |
| ओल्डी | जालौर (साँचौर) | गोगाजी की ओल्डी |
- गोगामेड़ी की बनावट मकबरेनुमा है; प्रवेश की ड्योढ़ी पर “बिस्मिल्लाह” अंकित है। यहीं गोरख तालाब है।
- सेवा-पूजा दो पुजारी करते हैं ➜ एक हिन्दू, एक मुस्लिम (चायल मुसलमान); इसी से यह मेला दोनों धर्मों की एकता का प्रतीक बन गया है।
- राजस्थान के बाद गोगाजी के सबसे ज़्यादा अनुयायी उत्तर प्रदेश से आते हैं; वे पीले कपड़े पहनकर आते हैं और “पूर्बिया” कहलाते हैं।
गोगाराखड़ी
- हल जोतने से पहले हल और हाली (हलवाहे) के 9 गाँठों वाली गोगाराखड़ी बाँधी जाती है और बार-बार कहा जाता है — “हाली बालदी गोगो रखवालो”।
- रक्षाबंधन के दिन बाँधी राखियाँ गोगानवमी के दिन खोली जाती हैं।
गोगाजी की कथा व साहित्य
- गोगाजी महमूद ग़ज़नवी के समकालीन थे; 1024 ई. में उससे युद्ध किया। महमूद ने इन्हें “जाहरपीर” (साक्षात देवता-सा प्रकट होने वाला) कहा।
- इस लड़ाई का ब्योरा कायम खाँ रासो (रचयिता कवि जान) में मिलता है।
- एक मत: चचेरे भाइयों अर्जन और सुर्जन ने भूमि-बँटवारे से नाराज़ होकर गोगाजी के इलाके की गायें घेरकर ग़ज़नवी को दे दीं। गोगाजी 47 पुत्रों, 60 भतीजों और 1100 सैनिकों के साथ सतलज पार कर ग़ज़नवी से लड़े और गायें छुड़ाईं; लौटने पर चचेरे भाइयों से हुई लड़ाई में वीरगति पाई।
विवाह के समय की घटना
- पत्नी केलमदे को साँप ने डसा
- क्रोधित गोगाजी ने कड़ाही में तेल उबाला
- मंत्रों से संसार के साँप खिंचे आने लगे
गोगाजी पर रचनाएँ
| रचना | रचनाकार |
|---|---|
| गोगाजी रसावला | बिद्दू मेहा |
| गोगाजी चौहान की राजस्थानी गाथा | चन्द्रदान चारण |
| गोगाजी पेड़ी | कवि आसा |
रिवीजन पॉइंटर्स
- पंचपीर हैं — रामदेवजी, गोगाजी, पाबूजी, हड़बूजी और मेहाजी मांगलिया।
- सभी लोकदेवता छुआछूत व जाति-पाँति के विरोधी और गौ-रक्षक माने गए हैं।
- जीणमाता और हर्षनाथ लोकदेव-देवियों में भाई-बहन की एकमात्र जोड़ी हैं; मल्लीनाथ जी और रूपादे पति-पत्नी हैं।
- रामदेवजी तंवर राजपूत थे; जन्म उँडूकासमेर (बाड़मेर) में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को; मेला द्वितीया से एकादशी तक रामदेवरा में भरता है।
- रामदेवजी के गुरु बालीनाथ थे; उनके मंदिर को देवरा और ध्वजा को नेजा कहते हैं।
- तेरहताली राजस्थान का इकलौता बैठकर किया जाने वाला नृत्य है, जो रामदेवजी के मेले में कामड़ समुदाय की स्त्रियाँ करती हैं।
- रामदेवरा का वर्तमान मंदिर महाराजा गंगासिंह ने 1931 ई. में बनवाया; रामदेवजी की समाधि 1458 ई. की है।
- गोगाजी नागवंशीय चौहान थे; जन्म ददरेवा (चूरू) में; मेला भाद्रपद कृष्ण नवमी को; सिर ददरेवा में और धड़ गोगामेड़ी में गिरा।
- गोगामेड़ी में सेवा-पूजा दो पुजारी करते हैं — एक हिन्दू और एक मुस्लिम (चायल)।
अगले भाग में पंचपीर के बाकी तीन पीर — पाबूजी, हड़बूजी और मेहाजी मांगलिया — तथा तेजाजी, देवनारायणजी, देवबाबा और भूरिया बाबा।
पिछला भाग: राजस्थान के लोकसंत
अगला भाग: राजस्थान के लोकदेवता: पंचपीर (भाग 2) एवं तेजाजी · देवनारायण · देवबाबा (भाग 1)
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