प्रतिहार वंश को समझने की कुंजी उसका स्थान-क्रम है: मण्डोर से भीनमाल, फिर उज्जैन और अन्त में कन्नौज — शासक चाहे जितने हों, पूरी कहानी इसी रास्ते पर चलती है। इस भाग में नाम का अर्थ और उत्पत्ति के मत, तीनों शाखाओं का परिचय, नागभट्ट प्रथम से रामभद्र तक के शासक, मिहिरभोज, उसके उत्तराधिकारी, वंश के पतन का दौर और राजौरगढ़-आभानेरी जैसे स्थान क्रम से दिए गए हैं।
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1. एक नज़र में
गुर्जर–प्रतिहारों की सत्ता छठी से बारहवीं सदी तक चली; राजस्थान में उनका सबसे चमकदार दौर आठवीं से दसवीं सदी रहा। शुरुआती गढ़ मण्डोर और भीनमाल थे, आगे चलकर उज्जैन और कन्नौज भी सत्ता के केंद्र बने।
| शाखा | केंद्र | संस्थापक / आरंभ | पहचान |
|---|---|---|---|
| मण्डोर | मण्डोर (जोधपुर) | हरिश्चन्द्र; लिखित क्रम रज्जिल (c. 560 ई.) के साथ शुरू | सबसे प्राचीन शाखा |
| भड़ौच | नांदीपुरी | दद्द प्रथम | गुजरात के चालुक्यों के सामन्त |
| भीनमाल (जालौर) | भीनमाल → उज्जैन | नागभट्ट प्रथम (730 ई.) | रघुवंशी प्रतिहार शाखा |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| लगभग 560 ई. | रज्जिल | मण्डोर की क्रमबद्ध वंशावली यहीं से शुरू |
| 730 ई. | नागभट्ट प्रथम | चावड़ों से भीनमाल छीनकर राजधानी बनाई |
| 783 ई. | वत्सराज | कन्नौज पर दाँव — त्रिकोणीय संघर्ष की शुरुआत |
| 816 ई. | नागभट्ट द्वितीय | चक्रायुध को हटाकर कन्नौज पर कब्ज़ा |
… शेष 6 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: क्रम याद रखें — मण्डोर → भीनमाल → उज्जैन → कन्नौज। नैणसी ने प्रतिहारों की 26 शाखाएँ गिनाईं।
2. नाम, उत्पत्ति व मूल स्थान
इस वंश का नाम दो शब्दों से बना है — गुर्जर (भू-क्षेत्र का नाम) और प्रतिहार (पद या जाति का नाम)। उत्पत्ति पर इतिहासकार एकमत नहीं; नीचे तीनों शाखाओं में बँटा पूरा विवाद क्रम से खुलता है।
नाम बनने की कड़ी
- लक्ष्मण राम के द्वारपाल
- “प्रतिहार” पदनाम वंश का नाम बना
- गुर्जरात्र प्रदेश पर शासन
3. नाम का अर्थ
- गुर्जर ➜ मरुप्रदेश के एक हिस्से गुर्जरात्र का सूचक; प्रतिहार — किसी जाति या पद का।
- गोपीनाथ शर्मा ➜ छठी सदी के मध्य तक “राजस्थान” नाम की कोई इकाई थी ही नहीं; मरुप्रदेश का एक भाग गुर्जरात्र कहलाता था और वहाँ प्रतिहार राज करते थे, इसी से गुर्जर–प्रतिहार नाम चल पड़ा।
- आर.सी. मजूमदार ➜ मण्डोर के प्रतिहार खुद को लक्ष्मण का वंशज मानते थे; लक्ष्मण राम के प्रतिहार (द्वारपाल) थे, इसलिए वंश “प्रतिहार” कहलाया और गुर्जरात्र पर शासन से “गुर्जर–प्रतिहार”।
- ओझा ➜ प्रतिहार जाति नहीं, पद है: राजदरबार या महल के द्वार का रक्षक।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
याद रखें: “प्रतिहार” = द्वारपाल — ओझा के अनुसार पदनाम, मजूमदार के अनुसार लक्ष्मण से जुड़ी पहचान।
4. उत्पत्ति के मत
| स्रोत / विद्वान | क्या कहा |
|---|---|
| नीलकुण्ड, देवली, राधनपुर (गुजरात), कन्हाह के लेख | प्रतिहारों को “गुर्जर प्रतिहार” कहा |
| मिहिरभोज का ग्वालियर लेख | नागभट्ट को विशुद्ध क्षत्रिय बताया |
| अल-मसूदी (अरब) | वंश को “अल गुर्जर”, राजा को “बौरा” कहा |
| ए.एम.टी. जैक्सन (बम्बई गजेटियर) | गुर्जरों को विदेशी माना |
ट्रिक: विदेशी मत — जैक्सन · कैनेडी · भण्डारकर · कनिंघम · स्मिथ। क्षत्रिय मत — ओझा, ग्वालियर लेख और वंश की अपनी परंपरा।
5. मूल स्थान व शाखाएँ
- बाउक के मण्डोर लेख और कक्कुक के घटियाला लेख के आधार पर मूल स्थान गुर्जरात्र प्रदेश माना जाता है; कुछ विद्वान इसे मण्डोर (जोधपुर) बताते हैं।
- स्मिथ ने ह्वेनसांग के वर्णन से मूल स्थान श्रीमाल / भीनमाल (जालौर) माना — आबू पर्वत के उत्तर-पश्चिम में।
- मुहणोत नैणसी की गिनती में प्रतिहारों की 26 शाखाएँ थीं; इनमें मण्डोर, भीनमाल, उज्जैन, कन्नौज, राजौरगढ़ और भड़ौच की ख्याति सबसे ज़्यादा रही।
- प्रमुख शाखाएँ ➜ मण्डोर · भीनमाल · कन्नौज
- नैणसी की गिनती ➜ 26 शाखाएँ
- कुलदेवी ➜ चामुण्डा माता (मण्डोर)
6. मण्डोर व भड़ौच शाखा
सभी शाखाओं में मण्डोर शाखा सबसे पुरानी है। इसके आदिपुरुष हरिश्चन्द्र को रोहिलद्धि, “प्रतिहारों का गुरु” और “मूल पुरुष” भी कहा गया है।
7. हरिश्चन्द्र से भिल्लादित्य
- हरिश्चन्द्र ने बाहुबल से माण्ड्यपुर (मण्डोर) जीता और चारों ओर प्राचीर बनवाई। क्षत्रिय रानी भद्रा से चार पुत्र — भोगभट्ट, कक्क, रज्जिल, दह।
| शासक | संबंध | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| रज्जिल | हरिश्चन्द्र का तीसरा पुत्र | वंशावली का आरंभ (लगभग 560 ई.); मण्डोर को राजधानी बना राजसूय यज्ञ; रोहिंसकूप (घटियाला) में महामण्डलेश्वर महादेव मंदिर |
| नरभट्ट | रज्जिल का उत्तराधिकारी | उपाधि पिल्लीपणी (पेल्लोपल्लि); रोहिंसकूप में विष्णु मंदिर |
| नागभट्ट प्रथम | रज्जिल का पोता | उपनाम नाहड़; मेड़ता (मेड़न्तकपुर) जीतकर राजधानी बनाया; रानी जज्जिका के पुत्र तात व भोज — तात ने राज्य भाई भोज को सौंप मण्डोर के आश्रम में वैराग्य लिया |
| शीलूक | — | वल्लमण्डल (जैसलमेर क्षेत्र) के देवराज भाटी को हराया; त्रावण/तवन क्षेत्र (उत्तर-पश्चिमी राजस्थान) पर अधिकार |
याद रखें: नागभट्ट प्रथम नाम के दो शासक हैं — एक मण्डोर (नाहड़, मेड़ता) का, दूसरा भीनमाल (730 ई.) का। दोनों को आपस में न मिलाएँ।
8. बाउक, कक्कुक और अंत
| शासक | संबंध | क्या कराया / किया |
|---|---|---|
| बाउक (बालक) | कक्क का पुत्र (रानी पद्मिनी, भाटी वंश) | 837 ई. में मण्डोर के विष्णु मंदिर में प्रशस्ति लगवाई — इसमें मण्डोर प्रतिहारों की नामावली है; मण्डोर पर चढ़ आए राजा मयूर को हराया |
| कक्कुक | बाउक का सौतेला भाई (माता दुर्लभ देवी) | दो जय-स्तम्भ — एक मण्डोर में, दूसरा रोहिंसकूप (घटियाला) में; 861 ई. के दो शिलालेख (घटियाला शिलालेख) |
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 837 ई. | बाउक की प्रशस्ति | मण्डोर का विष्णु मंदिर |
| 861 ई. | कक्कुक के घटियाला लेख | दो लेख, दो जय-स्तम्भ |
| 1395 ई. | इन्दा शाखा का निर्णय | मालवा के सूबेदार से रक्षा के लिए मण्डोर चूंडा राठौड़ को दहेज में दिया |
- कक्कुक के बाद मण्डोर के प्रतिहारों के शासकों की कोई जानकारी नहीं मिलती।
- इन्दा शाखा ने 1395 ई. में मण्डोर का राज्य चूंडा राठौड़ के हवाले कर दिया; यहीं से मण्डोर के प्रतिहारों के फैलाव की कहानी ख़त्म मानी जाती है।
9. भड़ौच के प्रतिहार
सातवीं-आठवीं सदी के कुछ दानपत्र बताते हैं कि भड़ौच और आसपास गुर्जर प्रतिहारों का शासन था। गोपीनाथ शर्मा की राय में ये गुजरात के चालुक्यों के अधीनस्थ थे।
भड़ौच शाखा का क्रम
- दद्द प्रथम — संस्थापक
- दद्द द्वितीय — शक्तिशाली शासक
- वल्लभी का ध्रुवसेन द्वितीय हर्षवर्धन से हारकर इनकी शरण आया
- राजधानी ➜ नांदीपुरी
- संस्थापक ➜ दद्द प्रथम
- अंतिम शासक ➜ जयभट्ट चतुर्थ
10. भीनमाल व कन्नौज शाखा
भीनमाल (जालौर) की शाखा को रघुवंशी प्रतिहार शाखा भी कहते हैं। संस्थापक नागभट्ट प्रथम मण्डोर शाखा से ही निकला था। यहाँ से कन्नौज तक पहुँचने में चार पीढ़ियाँ लगीं।
11. नागभट्ट प्रथम
- शासन 730–760 ई.; भीनमाल (जालौर) शाखा का संस्थापक, मण्डोर शाखा से संबंधित।
- उपाधि नागावलोक, दरबार नागावलोक दरबार।
- उपनाम ➜ जालौर के प्रतिहारों का आदि-पुरुष, राम का द्वारपाल, इन्द्र का घमण्ड तोड़ने वाला, नारायण-प्रतिमा का प्रतीक।
विजय-क्रम
- चावड़ों से भीनमाल (730)
- आबू आदि पर विजय
- उज्जैन राजधानी
12. कक्कुक व देवराज
- मण्डोर में कक्कुक (नागभट्ट के भतीजे) ने जीत का स्तम्भ गड़वाया और उसके तले विष्णु-मंदिर बनाया; यह राजपूताने का दूसरा सबसे पुराना विजय-स्तम्भ गिना जाता है।
- आगे भाई देवराज गद्दी पर आया; उसे अवन्ति (उज्जैन) का शासक बताया गया है।
13. वत्सराज
- शासन 783–795 ई., देवराज का पुत्र; उपाधि रणहस्तिन; प्रतिहार सत्ता का नींव-निर्माता माना जाता है।
- औसियाँ और दौलतपुर अभिलेखों के अनुसार उसने भण्डी जाति को हराकर उसका राज्य छीन लिया।
- ग्वालियर लेख उसे इक्ष्वाकु कुल का उत्कर्ष करने वाला बताता है।
कन्नौज की छीना-झपटी — त्रिकोणीय संघर्ष
647 ई. में हर्षवर्धन के बाद कन्नौज की सत्ता लड़खड़ा गई थी। उत्तर भारत का केंद्र बनते कन्नौज पर तीन ताक़तों की आँख थी — पूर्व में पाल, दक्षिण में राष्ट्रकूट और पश्चिम से गुर्जर–प्रतिहार। संघर्ष का आरंभ वत्सराज ने किया।
वत्सराज का क्रम
- कन्नौज पर हमला — इन्द्रायुध हारा
- पाल धर्मपाल को यह नागवार — वत्सराज विजयी
- राष्ट्रकूट ध्रुव प्रथम ने बढ़ती ताक़त देख आक्रमण किया — वत्सराज की हार
| चीज़ | किससे जुड़ी | ब्योरा |
|---|---|---|
| कुवलयमाला | उद्योतन सूरि | वत्सराज के समय जालौर में रची गई |
| हरिवंश पुराण | जिनसेन सूरि | इसी काल की रचना |
| महावीर स्वामी मंदिर, सरोवर | ओसियाँ (जोधपुर) | वत्सराज की देन; पश्चिमी भारत के सबसे पुराने जैन मंदिरों में गिना जाता है |
14. नागभट्ट द्वितीय
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 806–808 ई. | गोविन्द तृतीय से युद्ध | राष्ट्रकूट गोविन्द तृतीय से हार |
| 816 ई. | चक्रायुध पराजित | गोविन्द तृतीय के घरेलू उलझनों में फँसने पर कन्नौज के शासक चक्रायुध को हराया; कन्नौज राजधानी — कन्नौज शाखा का आरंभ |
| मुंगेर | धर्मपाल से युद्ध | चक्रायुध धर्मपाल का आश्रित था; धर्मपाल चढ़ आया, मुंगेर में नागभट्ट जीता |
- मुंगेर-विजय के बाद उपाधि परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर।
- उसके समय प्रतिहार राज्य उत्तर भारत की एक बलशाली शक्ति बन चुका था।
- बुचकला (जोधपुर) में उसने विष्णु व शिव का मंदिर बनवाया, जो आज शिव–पार्वती मंदिर नाम से जाना जाता है।
15. रामभद्र
- काल 833–836 ई.; नागभट्ट द्वितीय का बेटा।
- उसके राज में मण्डोर वाले प्रतिहार अलग होकर स्वतंत्र हो गए।
- शत्रुओं के सामने हार झेलनी पड़ी; कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। इसका पुत्र मिहिरभोज था।
16. मिहिरभोज
- शासन ➜ 836–885 ई.
- पिता ➜ रामभद्र
- उपाधि ➜ आदिवराह
अपने काल में उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली शासक। अरब यात्री सुलेमान ने उसे भारत का सबसे ताक़तवर राजा बताया, जिसने अरबों का रास्ता रोक रखा था।
17. नाम व उपाधियाँ
- ग्वालियर अभिलेख में उपाधि आदिवराह का वर्णन है; दौलतपुर अभिलेख में उसे प्रभास कहा गया।
- उसके चाँदी व ताँबे के सिक्कों पर “श्रीमदादिवराह” खुदा मिलता है।
18. स्रोत व अभिलेख
| स्रोत | वर्ष / विशेषता | क्या मिलता है |
|---|---|---|
| वराह अभिलेख | 836 ई. | मिहिरभोज का पहला अभिलेख |
| ग्वालियर प्रशस्ति | तिथि अंकित नहीं; भाषा संस्कृत | उसके समय का सबसे प्रसिद्ध अभिलेख; आदिवराह उपाधि का वर्णन |
| दौलतपुर अभिलेख | — | उसे “प्रभास” कहा गया |
19. युद्ध व साम्राज्य
- पाल शासक देवपाल और फिर नारायणपाल से टकराया; अंततः कन्नौज पर स्थायी अधिकार जमाया।
- साम्राज्य ➜ उत्तर में हिमालय की तराई, दक्षिण में बुंदेलखण्ड, पश्चिम में राजपूताने का मरुप्रदेश और पूर्व में पाल साम्राज्य की सीमा तक।
20. महेन्द्रपाल प्रथम व राजशेखर
- शासन 893–909 ई., मिहिरभोज का पुत्र।
- उपनाम ➜ महेन्द्रायुध, रघुकुल चूड़ामणि, परमभागवत, परमउद्धारक, परमेश्वर, निरमेश्वर, तथा निर्भय नाम से जुड़े निर्भयराज, निर्भय नरेश और निर्भय नरेन्द्र।
- नाटिका विद्धशालभंजिका में कवि राजशेखर ने अपने संरक्षक को “रघुकुल तिलक” लिखा; बालभारत में वही राजा “रघुग्रामणी” (रघुवंशियों का अगुआ) है।
राजशेखर
संस्कृत का नामी विद्वान; महेन्द्रपाल प्रथम और फिर उसके बेटे महिपाल प्रथम के दरबार में रहा, और महेन्द्रपाल का गुरु भी था।
21. भोज द्वितीय व महिपाल प्रथम
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 910–913 ई. | भोज द्वितीय | महेन्द्रपाल की मृत्यु पर पुत्रों में उत्तराधिकार-युद्ध; चेदि सामन्त कोक्कलदेव प्रथम की मदद से जीतकर कन्नौज की गद्दी पर बैठा |
| 913 ई. | महिपाल प्रथम | सौतेले भाई भोज द्वितीय का राज्य चन्देल हर्षदेव की सहायता से छीना |
| राज्यारोहण के तुरंत बाद | इन्द्र तृतीय का हमला | राष्ट्रकूट इन्द्र तृतीय ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया; महिपाल भाग गया |
- महिपाल प्रथम (913–943 ई.) के उपनाम विनायकपाल और हेरम्भपाल।
- राजशेखर ने उसे “आर्यावर्त का महाराजाधिराज” और “रघुकुल मुक्तामणि” कहा (स्रोत — ओझा)।
22. पतन का दौर
| शासक | काल | ख़ास बात |
|---|---|---|
| महेन्द्रपाल द्वितीय | 945–948 | महिपाल प्रथम का पुत्र |
| देवपाल | 948–953 | अत्यंत निर्बल; चन्देलों ने स्वतंत्र राज्य बनाया, चन्देल यशोवर्मन ने कई क्षेत्र हड़पे; ओझा के अनुसार गुहिल सामन्त अल्लट के हाथों मृत्यु |
| विनायकपाल | 953–955 | 954 ई. के खजुराहो अभिलेख से नाम मिलता है; महेन्द्रपाल द्वितीय का पुत्र |
| महिपाल द्वितीय | 955–960 | 955 ई. का बयाना अभिलेख — “महाराजाधिराज महिपाल देव” |
- राज्यपाल की कायरता से नाराज़ भारतीय राजाओं ने — चन्देल गण्ड के पुत्र विद्याधर के नेतृत्व में — संघ बनाकर उस पर हमला किया और उसे मार डाला।
- गहड़वाल राजा चन्द्रदेव ने 1093 ई. में कन्नौज हथिया लिया — यहीं प्रतिहार साम्राज्य बिखर गया।
पतन की सीढ़ियाँ
- चन्देल स्वतंत्र (देवपाल)
- सोलंकी स्वतंत्र (विजयपाल)
- 1018 — ग़ज़नवी का हमला
23. राजौरगढ़, आभानेरी व शैली
| स्थान | आज का ज़िला | प्रतिहार संबंध |
|---|---|---|
| राजौरगढ़ | अलवर | 960 ई. के लेख से — प्रतिहार शासक मथनदेव बड़गुर्जर; ये रघुवंशी कन्नौज-शासकों के अधीन सरदार थे |
| आभानेरी | दौसा | भव्य, कलात्मक प्रतिमाएँ यहाँ के गुर्जर प्रतिहार शासकों ने 8वीं–9वीं सदी में बनवाईं |
| ओसियाँ | जोधपुर | वत्सराज का महावीर स्वामी मंदिर व सरोवर |
गुर्जर–प्रतिहार (महामारू) शैली
- उत्तर भारत में 8वीं–12वीं सदी के मंदिर-निर्माण की जो शैली विकसित हुई, वही महामारू / गुर्जर–प्रतिहार शैली है।
- इसका पूर्ण विकास 10वीं–11वीं सदी में दिखता है।
रिवीजन पॉइंटर्स
- गुर्जर–प्रतिहारों की सत्ता छठी से बारहवीं सदी तक रही, और राजस्थान में उनका सबसे चमकदार दौर आठवीं से दसवीं सदी का था।
- शाखाओं का क्रम याद रखें — मण्डोर ➜ भीनमाल ➜ उज्जैन ➜ कन्नौज; नैणसी ने कुल 26 शाखाएँ गिनाईं।
- मण्डोर शाखा सबसे पुरानी है, आदिपुरुष हरिश्चन्द्र; क्रमबद्ध वंशावली रज्जिल (लगभग 560 ई.) से शुरू होती है।
- बाउक ने 837 ई. में मण्डोर के विष्णु मंदिर में प्रशस्ति लगवाई, कक्कुक के घटियाला लेख 861 ई. के हैं, और 1395 ई. में इन्दा शाखा ने मण्डोर चूंडा राठौड़ को सौंप दिया।
- भीनमाल शाखा के संस्थापक नागभट्ट प्रथम (730 ई.) ने चावड़ों से भीनमाल छीना; उनकी उपाधि नागावलोक थी।
- कन्नौज के त्रिकोणीय संघर्ष की शुरुआत वत्सराज (783 ई.) ने की — तीन पक्ष थे पाल, राष्ट्रकूट और प्रतिहार।
- नागभट्ट द्वितीय ने 816 ई. में चक्रायुध को हटाकर कन्नौज को राजधानी बनाया और मुंगेर में धर्मपाल को हराया।
- मिहिरभोज (836–885 ई.) की उपाधि आदिवराह थी; अरब यात्री सुलेमान ने उसे भारत का सबसे ताक़तवर राजा कहा और ग्वालियर प्रशस्ति उसका सबसे प्रसिद्ध अभिलेख है।
- गहड़वाल राजा चन्द्रदेव ने 1093 ई. में कन्नौज हथिया लिया, और यहीं प्रतिहार साम्राज्य बिखर गया।
अगले भाग में चौहानों की आठ शाखाएँ, उत्पत्ति के सात मत, मूल स्थान सपादलक्ष और शाकम्भरी से अजमेर तक के शासकों का क्रम आएगा।
पिछला भाग: राजपूतों की उत्पत्ति: एक नज़र में
अगला भाग: चौहान राजवंश: शाकम्भरी व अजमेर के चौहान एवं पृथ्वीराज तृतीय (भाग 1)
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