पाँच पीरों की कड़ी में हर लोकदेवता के साथ एक पहचान-वस्तु जुड़ी है — कोई ऊँट से, कोई बैलगाड़ी से, कोई घोड़े से पहचाना जाता है — और प्रश्न अक्सर यही पहचान पूछते हैं। इस भाग में पाबूजी, हड़बूजी और मेहाजी मांगलिया की जीवनी के बाद तेजाजी का परिचय, उनकी कथा और मेले तक पहुँचा गया है। पिछली परीक्षाओं में जो तथ्य पूछे जा चुके हैं, उनके आगे परीक्षा का नाम दर्ज है।
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1. पाबूजी
- वंश ➜ राठौड़ (मारवाड़ के राव सीहा के वंशज)
- जन्म ➜ कोलू (फलौदी) — 1239 ई., चैत्र अमावस्या
- काल ➜ 1239 ई. से 1276 ई.
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परिवार
- पिता धांधल देव, राव आस्थान के पुत्र और राव धूहड़ के भाई थे।
- बहन सोहन बाई/पेमदे — जायल के शासक जींदराव खींची से विवाह।
- बड़े भाई बूढो जी — विवाह गिरनार (गुजरात) की केशर कँवर से; इनके पुत्र रूपनाथ/झरड़ा।
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प्रतीक व मंदिर
- प्रतीक ➜ भाला लिए अश्वारोही, पगड़ी बाईं ओर झुकी।
- मुख्य मंदिर: कोलूमण्ड (फलौदी), पूजा धांधल राठौड़ करते हैं। 1358 ई. में सोहड़ (धांधल सोम का बेटा) ने इसे बनवाया।
- मेला कोलूमण्ड में हर वर्ष चैत्र अमावस्या को।
फड़, पवाड़े, नृत्य
- पाबूजी की फड़ ➜ नायक जाति के भोपे रावणहत्था पर गाते हैं; यह राजस्थान की सबसे लोकप्रिय फड़ है (सभी लोकदेवताओं की फड़ों में सबसे छोटी मानी जाती है)। ऊँट के स्वस्थ होने पर फड़ का वाचन होता है। [परीक्षा: VDO 2021; REET 2021; वनरक्षक 2022 — राजस्थान के किस लोकदेवता को “ऊँटों का देवता” कहा जाता है? ➜ पाबूजी]
- पाबूजी के पवाड़े ➜ वीरता के गाथा-गीत, माठ वाद्य के साथ रेबारी/थोरी जाति गाती है।
- पाबूधणी री वाचना ➜ थोरी जाति सारंगी पर पाबूजी का यशोगान करती है।
किन्हें प्रिय
- रेबारी/रायका जाति इन्हें अपना आराध्य मानती है; मेहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजते हैं; हिन्दू इन्हें लक्ष्मण का अवतार कहते हैं।
- मारवाड़ में ऊँट पहली बार पाबूजी ही लाए — भतीजी केलम दे के दहेज के लिए।
- थोरी जाति के आराध्य: बलशाली शासक आना बघेला के भगोड़े सात थोरी भाइयों — चांदा, देवा, खापू, पेमा, खलमल, खंघार और चासल — को पाबूजी ने आश्रय देकर बचाया।
ध्यान दें: “ऊँट” वाला प्रश्न (VDO 2021, REET 2021, वनरक्षक 2022, पशु परिचर 2024 आदि) — उत्तर पाबूजी।
पाबूजी का बलिदान व साहित्य
1276 ई. की घटना
- पाबूजी का विवाह चल रहा था
- बहनोई जींदराव खींची देवल चारणी की गायें ले गया
- साढ़े तीन फेरों के बाद पाबूजी उठे
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- इस संघर्ष की गाथा नैणसी री ख्यात में दर्ज है। पाबूजी के वस्त्र लेकर उनकी पत्नी फूलमदे (सोढ़ी) सती हो गईं।
- पाबूजी की मौत का बदला उनके भतीजे रूपनाथ (झरड़ा) ने जींदराव खींची का वध करके चुकाया।
- जींदराव को देवल चारणी की काली केसर कालमी घोड़ी चाहिए थी, पर चारणी ने मना कर दिया। बाद में उसने वही घोड़ी पाबूजी को दी — इस शर्त पर कि वे उसकी गायों की रक्षा करेंगे। इसी कारण जींदराव दोनों से बैर रखने लगा।
पाबूजी पर साहित्य
| रचना | रचनाकार |
|---|---|
| पाबूजी रा छन्द | बीठू मेहा |
| पाबूजी रा दोहा | लघराज |
| पाबूप्रकाश (पाबूजी की जीवनी) | आशिया मोडजी |
| पाबूजी के गीत | बाँकीदास |
2. हड़बूजी
- वंश ➜ सांखला राजपूत (पँवार)
- उपनाम ➜ शकुन शास्त्र के ज्ञाता
- जन्म ➜ भूण्डेल गाँव (नागौर)
- पिता सांखला के छह पुत्र हुए, हड़बूजी उन्हीं में से एक; ऐसा इतिहास-ग्रंथों में आता है।
- पिता की मृत्यु के बाद भूण्डेल छोड़कर फलौदी के हरभम जाल में रहे — यहीं रामदेवजी तंवर से मिलन हुआ।
- शस्त्र त्यागकर बालीनाथ के शिष्य बने, दीक्षा लेकर समाज-सुधार किया और चाखू गाँव (फलौदी) में तपस्या की।
- रामदेवजी के मौसेरे भाई हड़बूजी थे; चौबीस बाणियाँ में रामदेवजी ने उनके लिए लिखा — “हड़बू जी सांखला हर दम हाजिर गाँव बेंगटी माही; दूजी देह म्हारी ही जाणों, हाँ मौसी जाया भाई”।
बेंगटी का मंदिर
- मुख्य स्थान बेंगटी (फलौदी) — मंदिर 1721 ई. में महाराजा अजीत सिंह ने बनवाया।
- यहाँ मूर्ति के साथ उनकी छकड़ा गाड़ी (बैलगाड़ी) भी पूजी जाती है; इसी में वे अपंग गायों के लिए चारा ढोकर लाया करते थे।
- पुजारी सांखला राजपूत (पँवार) होते हैं।
राव जोधा से नाता
- राव जोधा (शासन 1438–89 ई.) हड़बूजी के समकालीन थे।
- राव जोधा को मेवाड़ के कब्ज़े से मंडोर मुक्त कराने के लिए इन्होंने आशीर्वाद दिया और कटार व फेंटा भेंट किया।
- मंडोर जीतने पर आभार-स्वरूप जोधा ने बेंगटी गाँव हड़बूजी को सौंपा और साथ में बावनी जागीर (चाखू के निकट) भी दी।
व्यक्तित्व
- वे सिद्ध योगी थे और ऊँच-नीच देखे बिना सबका भला करते। ईश्वर-स्मरण व सत्संग की महिमा समझाकर उन्होंने निम्न समझी जाने वाली जातियों में आत्मिक चेतना जगाई।
- वचनसिद्ध, शकुन-शास्त्र के ज्ञाता और करामाती माने जाते हैं।
ट्रिक: तीन फलौदी के पीर और उनकी पहचान — पाबूजी = ऊँट, हड़बूजी = बैलगाड़ी, मेहाजी = किरड़ काबरा घोड़ा।
3. मेहाजी मांगलिया
- उपनाम ➜ मांगलियों के इष्टदेव · उज्ज्वल छत्री
- जन्म ➜ तापू गाँव (जोधपुर) — भाद्रपद कृष्ण अष्टमी
- पिता-माता ➜ कीतू जी/केलू जी और मायड़ दे
- माँ के साथ पुष्कर की तीर्थ-यात्रा के दौरान इन्होंने पाना गुजरी को अपनी धर्म-बहन बना लिया।
- बहन पाना की गायों को बचाने में भाटी राजपूतों से लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए।
- इतिहासकार कर्नल टॉड के अनुसार इनका जन्म गहलोत (गुहिल) वंश की मांगलिया शाखा में हुआ।
ट्रिक: मेहाजी का मेला जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) को ही — तिथि और जन्म-तिथि एक है।
4. तेजाजी · देवनारायण · देवबाबा
| लोकदेवता | वंश / जाति | मुख्य स्थान | ज़िला |
|---|---|---|---|
| तेजाजी | नागवंशीय जाट (धौल्या गोत्र) | परबतसर · सुरसरा | डीडवाना-कुचामन · अजमेर |
| देवनारायणजी | नागवंशीय बगड़ावत गुर्जर | आसींद | भीलवाड़ा |
| देवबाबा | गुर्जर-ग्वालों के देव | नगला जहाज | भरतपुर |
5. तेजाजी
- वंश ➜ नागवंशीय जाट, धौल्या गोत्र
- जन्म ➜ खरनाल/खड़नाल (नागौर) — 29 जनवरी 1073 ई., माघ शुक्ल चतुर्दशी
- काल ➜ 1073 ई. से 1103 ई.
प्रतीक और पूजा
- प्रतिमा में तेजाजी तलवार लिए घुड़सवार हैं और साँप उनकी जीभ पर डसता दिखाया जाता है।
- तेजाजी का चबूतरा थान कहलाता है; पुजारी घोड़ला (जो साँपों का ज़हर चूसते हैं)।
- अजमेर अंचल के लगभग हर गाँव में तेजाजी का थान है; जाट समुदाय इन्हें मुख्यतः मारवाड़, अजमेर, ब्यावर और किशनगढ़ में पूजता है।
- मान्यता: सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति दाहिने पैर में तेजाजी की ताँती (डोरी) बाँध ले तो विष नहीं चढ़ता।
तेजाटेर / तेजागीत
बुवाई के समय किसान तेजागीत गाते हैं और अच्छी उपज की आशा में तेजाजी को पूजते हैं। मारवाड़ में बारिश के दिनों में खेतिहर छाते की ओट में, कानों में उँगली डाले, घुँघरू बाँधकर नाचते हुए लम्बी टेर में तेजा गाते हैं — इसे तेजाटेर कहा जाता है।
रोचक तथ्य: 2011 में तेजाजी पर ₹5 का डाक टिकट निकला।
तेजाजी की कथा व मेले
कथा के पड़ाव
- बचपन में विवाह (पैमल दे से)
- भाभी के ताने पर लीलण पर ससुराल पनेर
- सास की गाली; पैमल दे ने पहचाना, लाछां गुजरी के घर रात
- मेर के मीणे लाछां की गायें ले गए
- बचपन में ही विवाह हो चुका था। हल चलाते समय देर से भोजन लाने पर भाभी ने कटाक्ष किया कि “तुम्हारी पत्नी तो पीहर में है”। तेजाजी उसी क्षण लीलण पर सवार होकर ससुराल पनेर चल दिए। निकलते ही अपशकुन हुआ; ज्योतिषी ने कहा, इस यात्रा में प्राण जाएँगे। माँ ने रोका, वे नहीं माने।
- पनेर में सास उस समय गाय दुह रही थीं। गाय की लात से बाल्टी उलट गई और सास ने बिना देखे दामाद को कोस दिया। रुष्ट तेजाजी लौटने लगे तो पत्नी पेमल ने पहचानकर सहेली लाछां गुजरी को रोकने भेजा; लाछां के आग्रह पर वे उसके घर ठहर गए।
- उसी रात मेर के मीणा लाछां की गायें हाँक ले गए। उसकी पुकार पर तेजाजी निकले; मंडावरिया (अजमेर) में घमासान हुआ और गायें लौट आईं। घर पहुँचकर पता चला कि एक बछड़ा (केरड़ा) रह गया है — वे फिर चल पड़े।
| घटना | स्थान |
|---|---|
| तेजाजी का जन्म | खरनाल (नागौर) |
| ससुराल | पनेर (अजमेर) |
| लाछां की गायों के लिए युद्ध | मंडावरिया (अजमेर) |
| साँप ने जीभ पर डसा | सैंदरिया (ब्यावर) |
- तेजाजी की मृत्यु का समाचार उनकी घोड़ी लीलण ने घर पहुँचाया। पत्नी पेमल सती हुई।
- नए तेजाजी-मंदिर की स्थापना पर जागती ज्योत सुरसरा से ही ले जाई जाती है।
मेला: परबतसर
- तेजादशमी ➜ भाद्रपद शुक्ल दशमी।
- परबतसर (डीडवाना-कुचामन) में भाद्रपद शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक तेजाजी का मेला लगता है, जिसके साथ बड़ा पशु मेला भी जुड़ा है।
- आरंभ में मुख्य देवली सुरसरा (अजमेर) में थी और मेला पनेर में लगता था। एक रात परबतसर का हाकिम पनेर से तेजाजी की प्रतिमा उखाड़ ले गया; तब से परबतसर प्रमुख स्थल हो गया। 1734 ई. में जोधपुर महाराजा अभयसिंह के काल में भंडारी विजयराज (प्रधान) ने वहाँ नई मूर्ति बनवाकर स्थापित कराई।
तेजाजी पर साहित्य
| रचना | रचनाकार |
|---|---|
| वीर तेजा (1931 ई.) | सूर्यराज व्यास शर्मा |
| जुंझार तेजा (1941 ई.) | लज्जाराम मेहता |
| तेज लीला | रामगोपाल शिवाराम राव |
6. रैपिड फायर तथ्य
- ऊँटों के देवता ➜ पाबूजी (मारवाड़ में ऊँट पहली बार वही लाए)
- पाबूजी का जन्म और मेला ➜ कोलू (फलौदी), 1239 ई.; मेला कोलूमण्ड में चैत्र अमावस्या को
- पाबूजी की फड़ ➜ नायक जाति के भोपे रावणहत्था पर गाते हैं
- पाबूजी का बलिदान ➜ 1276 ई., बहनोई जींदराव खींची से गायों के संघर्ष में; बदला भतीजे रूपनाथ (झरड़ा) ने लिया
- हड़बूजी ➜ सांखला राजपूत; मंदिर बेंगटी (फलौदी), 1721 ई. में महाराजा अजीत सिंह ने बनवाया; यहाँ बैलगाड़ी पूजी जाती है
- मेहाजी मांगलिया ➜ जन्म तापू गाँव (जोधपुर), भाद्रपद कृष्ण अष्टमी — मेला भी इसी तिथि को
- तेजाजी का जन्म ➜ खरनाल (नागौर), 29 जनवरी 1073 ई.; नागवंशीय जाट, धौल्या गोत्र
- तेजादशमी ➜ भाद्रपद शुक्ल दशमी; परबतसर में पूर्णिमा तक मेला
- तेजाजी पर साहित्य ➜ वीर तेजा (1931 ई.), जुंझार तेजा (1941 ई.)
अगले भाग में देवनारायणजी, देवबाबा और भूरिया बाबा, फिर गायों व गाँव की रक्षा में प्राण देने वाले कल्लाजी, बिग्गाजी, फत्ताजी, पनराजजी और झुंझारजी।
पिछला भाग: राजस्थान के लोकदेवता: पंचपीर (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान के लोकदेवता: तेजाजी · देवनारायण · देवबाबा (भाग 2) एवं वीर योद्धा व बलिदानी
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