राजस्थानी भाषा व बोलियाँ: प्रमुख बोलियाँ – Rajasthan Art and Culture Chapter 1

राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति, डिंगल-पिंगल का भेद, ग्रियर्सन का वर्गीकरण और सभी बोलियाँ-उपबोलियाँ, PYQ सहित।

13 min read Updated Notes in Hindi
In this chapter (22 sections)
  1. वीर रस की भाषा
  2. आँकड़े और तथ्य
  3. विकास का क्रम
  4. उत्पत्ति पर विद्वानों के मत
  5. नामकरण व मरुभाषा
  6. डिंगल बनाम पिंगल
  7. इतिहास और ख़ास बातें
  8. ग्रियर्सन के पाँच समूह
  9. अन्य वर्गीकरण व सर्वेक्षण
  10. बोलियों पर प्रमुख कृतियाँ
  11. मारवाड़ी
  12. मेवाड़ी
  13. वागड़ी
  14. दूँढ़ाड़ी
  15. हाड़ौती
  16. मेवाती
  17. मालवी (निमाड़ी, रांगड़ी)
  18. ब्रज, पंजाबी और सीमा की भाषाएँ
  19. मारवाड़ी की उपबोलियाँ
  20. दूँढ़ाड़ी की उपबोलियाँ
  21. अन्य उपबोलियाँ
  22. रैपिड फायर तथ्य

राजस्थानी की सबसे गहरी छाप उसके वीर रस के साहित्य पर है, और बोलियाँ इतनी बदलती हैं कि हर थोड़ी दूरी पर लहजा नया हो जाता है। इस भाग में भाषा की उत्पत्ति और नामकरण, डिंगल बनाम पिंगल, ग्रियर्सन के पाँच समूह, आठ प्रमुख बोलियाँ और फिर उनकी उपबोलियाँ क्रम से दी गई हैं। जिन तथ्यों पर पिछले वर्षों की परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम साथ में लिखा गया है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थानी भाषा व बोलियाँ, 7 चॉक-बोर्ड चित्र, 13 नक्शे, 25 फ्लैशकार्ड और 15 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
माइंड मैप खोलें ➜

1. वीर रस की भाषा

राजस्थानी राजस्थान की मातृभाषा है, और भारतीय साहित्य में वह अपनी खास छाप वीर रस के कारण छोड़ती है।

  • वीर रस की जैसी ऊँचे दर्जे की रचनाएँ राजस्थानी में मिलती हैं, वैसी दुनिया के किसी और साहित्य में नहीं।
  • कारण यह माना जाता है कि ये कविताएँ उन कवियों ने लिखीं जिन्होंने युद्धभूमि में वीरों को लड़ते अपनी आँखों से देखा था।
किसनेक्या कहा
रवीन्द्रनाथ ठाकुरभक्ति रस की कविता तो पूरे भारत के हर साहित्य में मिल जाती है, पर राजस्थान ने अपने रक्त से जो साहित्य रचा, वैसा कहीं और दुर्लभ है
पं. मदनमोहन मालवीयराजस्थानी वीरों की भाषा और वीर साहित्य है; दुनिया के साहित्य में इसकी अलग जगह है। वे चाहते थे कि हिन्दू विश्वविद्यालय में इसका पूरा विभाग बने

राजस्थानी साहित्य की ख़ास बातें

ट्रिक: टैगोर — खून से रचा साहित्य; मालवीय — वीरों की भाषा। दोनों कथन वीर रस पर टिके हैं, भक्ति रस पर नहीं।

2. आँकड़े और तथ्य

  • बोलने वाले ➜ 11–12 करोड़ से अधिक
  • जीवित बोलियाँ ➜ 1961 तक 73 · 2011 में 71
  • विश्व की भाषाओं में ➜ 16वाँ स्थान

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

दिवसतारीख़
हिन्दी दिवस14 सितम्बर
राजस्थानी भाषा दिवस21 फ़रवरी
अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस21 फ़रवरी
  • केन्द्रीय साहित्य अकादमी ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा की मान्यता दे दी है, पर संवैधानिक मान्यता अभी नहीं मिली।
  • लिपि महाजनी (मुड़िया) है; मुड़िया अक्षरों के आविष्कारक टोडरमल माने जाते हैं।
  • प्रचलित कहावत ➜ “चार कोस पर पाणी बदले, आठ कोस पर बाणी”: हर थोड़ी दूरी पर बोली का रंग बदल जाता है।

रोचक तथ्य: महात्मा गांधी का भाव — मातृभाषा में कितनी ही कमियाँ हों, उससे उसी तरह जुड़े रहना चाहिए जैसे बच्चा माँ से; जीवन देने वाला दूध वही दे सकती है।

ध्यान दें: 73 (1961) → 71 (2011): दो बोलियाँ घटीं। 16वाँ (विश्व) और 7वाँ (भारत) — उलटा नहीं पढ़ें।

ट्रिक: राजस्थानी भाषा दिवस और अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस — दोनों 21 फ़रवरी को; हिन्दी दिवस 14 सितम्बर को।

3. विकास का क्रम

भाषा-विज्ञान की नज़र में राजस्थानी भारोपीय (भारत-यूरोपीय) परिवार की सदस्य है। माना जाता है कि 12वीं शताब्दी के अंत में शौरसेनी प्राकृत से निकले गुर्जरी अपभ्रंश ने इसे जन्म दिया।

काल / क्रमघटनाविवरण
778 ई.कुवलयमालाउद्योतन सूरि का ग्रंथ — मरुभाषा का पहला उल्लेख
12वीं शताब्दीभरतेश्वर बाहुबली घोरराजस्थानी का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ (ब्रजसेन सूरि)
12वीं शताब्दी का अंतगुर्जरी अपभ्रंश से जन्मराजस्थानी की उत्पत्ति का काल

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • विकास के संदर्भ में तीन अपभ्रंशों के नाम आते हैं — शौरसेनी, नागर और मरुगुर्जरी।
  • इनमें मरुगुर्जरी अपभ्रंश वाला मत ज़्यादा उचित लगता है, क्योंकि उसी से मरुभाषा (राजस्थानी) और गुर्जरी से गुजराती निकली।

4. उत्पत्ति पर विद्वानों के मत

विद्वान इस पर एकमत नहीं हैं कि राजस्थानी किस अपभ्रंश से पैदा हुई। अलग-अलग राय —

विद्वानकौन-सा अपभ्रंश
जॉर्ज ग्रियर्सन व पुरुषोत्तम लाल मेनारियानागर अपभ्रंश
डॉ. मोतीलाल मेनारियागुर्जरी अपभ्रंश
डॉ. हीरालाल माहेश्वरीगुर्जरी अपभ्रंश
के. एम. मुंशीगुर्जरी अपभ्रंश

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

इस तरह राजस्थानी और गुजराती दोनों गुर्जरी अपभ्रंश की संतान ठहरती हैं, जबकि हिन्दी शौरसेनी अपभ्रंश की।

5. नामकरण व मरुभाषा

  • डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने ही लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के ज़रिए राजस्थान प्रांत की भाषा का नाम “राजस्थानी” रखा; इस नाम की प्रेरणा शायद कर्नल टॉड की रचना रही होगी।
  • अरावली के उत्तर-पश्चिम का वह भू-भाग — बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर और शेखावाटी का कुछ हिस्सा — मिलाकर मारवाड़ / मरु देश कहलाया; यहाँ की ज़बान मरुभाषा थी, यानी पश्चिमी राजस्थान की भाषा।
  • एक समय मरुभाषा पूरे प्रांत की प्रधान और साहित्यिक भाषा थी। बाद में ब्रज प्रदेश के पास के इलाक़ों पर ब्रजभाषा का और गुजरात के पास के इलाक़ों पर गुजराती का असर चढ़ा।

अलग-अलग ग्रंथों में नाम

रचनादिया गया नाम
रघुनाथ रूपकमरूभूमभाषा
रघुवरजस प्रकाशमरूधर भाखा
वंश भास्करमरूवाणी

6. डिंगल बनाम पिंगल

राजस्थानी का साहित्य दो शैलियों में मिलता है — डिंगल और पिंगल।

कसौटीडिंगलपिंगल
प्रयोग करने वालेचारण कविभाट जाति के कवि
भाषा का रंगमारवाड़ी मिली राजस्थानीब्रज मिली राजस्थानी
काव्य-रूपगीत रूप मेंछंद और पदों के रूप में

प्रमुख ग्रंथ

शैलीग्रंथ
डिंगलढोला मारू रा दूहा, अचलदास खींची री वचनिका, राजरूपक, राव जैतसी रो छंद, रुकमणि हरण, नागदमण
पिंगलपृथ्वीराज रासो, विजयपाल रासो, हम्मीर रासो, खुमाण रासो

7. इतिहास और ख़ास बातें

  • पिंगल के रचनाकार मूल रूप से भाट कवि थे, जबकि डिंगल का ज़्यादातर साहित्य चारण कवियों की देन है। राजस्थान में पिंगल का एक नाम “भाट-भायखा” (भाटों की ज़बान) भी है। [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक, 2024 — चारण कवि अपने तय साहित्य के लिए किस भाषा-शैली का प्रयोग करते थे? ➜ डिंगल]
  • चारण कवियों ने पिंगल में भी रचनाएँ कीं। पिंगल के प्रसिद्ध रचनाकारों में सूर्यमल्ल मिश्रण और गणेशपुरी गिने जाते हैं।
  • सूर्यमल्ल मिश्रण का वंश भास्कर लगभग तीन-चौथाई पिंगल में रचा गया है; विजयपाल रासो, रतन रासो और पृथ्वीराज रासो जैसे ग्रंथों में भी पिंगल बरती गई है।

पहले प्रयोग

क्यापहली बार कहाँ
“डिंगल” शब्दबाँकीदास आसिया की रचना कुकवि बत्तीसी (वि.सं. 1871) में
डिंगल शैलीपिंगल शिरोमणि (कवि कुशललाभ) में
  • “डिंगल” शब्द कभी भाषा के अर्थ में तो कभी शैली के अर्थ में चलता रहा है।
  • डिंगल मूलतः वीर रस प्रधान काव्य है; प्रसंग के अनुसार दूसरे रस भी आते हैं।
  • यमक सगाई डिंगल का प्रमुख शब्दालंकार है।

8. ग्रियर्सन के पाँच समूह

राजस्थानी बोलियों को सबसे पहले जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने वर्गीकृत किया और दुनिया के सामने रखा — ग्रंथ लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया (20 भाग, 1912 ई.) में। उनके 5 समूह —

समूहबोलियाँ
1. पश्चिमी राजस्थानीमारवाड़ी, मेवाड़ी, ढटकी, बीकानेरी, बाँगड़ी, शेखावाटी, देवड़ावाटी, गोड़वाड़ी, खैराड़ी [परीक्षा: वरिष्ठ अध्यापक, संस्कृत विभाग, 2024 — थली, ढटकी और देवड़ावाटी किसकी उपबोलियाँ हैं? ➜ मारवाड़ी]
2. दक्षिणी राजस्थानीनिमाड़ी
3. उत्तरी-पूर्वी राजस्थानीमेवाती, अहीरवाटी
  • इसी ग्रंथ (1912) में “राजस्थानी” शब्द पहली बार इस क्षेत्र की भाषा के नाम के रूप में आया।
  • ग्रियर्सन की एक और रचना ➜ मॉडर्न वर्नाकूलर लिटरेचर ऑफ नॉर्दर्न इंडिया।

9. अन्य वर्गीकरण व सर्वेक्षण

एल. पी. टेस्सीटोरी (इटली) — 2 भाग

इण्डियन ऐन्टिक्वेरी (1914–16) में इटली के विद्वान टेस्सीटोरी ने राजस्थानी के जन्म और विकास को समझाया तथा भाषा के दो भाग किए —

भागबोलियाँ
पूर्वी राजस्थानीखड़ी जयपुरी, तोरावाटी, अजमेरी, काठेड़ी, राजावाटी, नागरचोल, चौरासी, हाड़ौती
पश्चिमी राजस्थानीशेखावाटी, खड़ी जोधपुरी, ढटकी, बीकानेरी, थली, किशनगढ़ी, खैराड़ी, गोड़वाड़ी, देवड़ावाटी

प्रो. नरोत्तम दास स्वामी — 4 भाग

  1. पश्चिमी राजस्थानी ➜ यानी मारवाड़ी
  2. पूर्वी राजस्थानी ➜ यानी दूँढ़ाड़ी
  3. उत्तरी राजस्थानी

रेवरेण्ड मेकलिस्टर

मेकलिस्टर ने सबसे पहले सर्वे ऑफ डायलेक्ट्स स्पोकन इन द स्टेट ऑफ जयपुर के नाम से 1887 ई. में प्राचीन जयपुर राज्य की बोलियों का सर्वेक्षण किया; यह 1898 में इलाहाबाद मिशन प्रेस से छपा।

10. बोलियों पर प्रमुख कृतियाँ

कृति / शोधविद्वान
राजस्थानी साहित्य की गौरवपूर्ण परम्पराअगरचन्द नाहटा
राजस्थानी भाषा और साहित्यमोतीलाल मेनारिया
राजस्थानी भाषा और साहित्यडॉ. हीरालाल माहेश्वरी
निमाड़ी और उसका साहित्यकृष्णलाल हंस

11. मारवाड़ी

  • क्षेत्रफल में ➜ सबसे बड़ी बोली
  • बोलने वालों में ➜ सबसे अधिक
  • पुराना नाम ➜ मरुभाषा
  • इसका घर पश्चिमी राजस्थान है ➜ जोधपुर, फलौदी, बालोतरा, जैसलमेर, बीकानेर, पाली, नागौर, जालौर और सिरोही; आगे यह किशनगढ़, अजमेर-मेरवाड़ा और शेखावाटी तक फैली है।
  • साहित्य और विस्तार ➜ दोनों दृष्टि से राजस्थानी की सबसे महत्वपूर्ण बोली; औज (ओजस्वी) गुण प्रधान।
  • राजस्थानी का अधिकतर साहित्य इसी बोली में है; जैन साहित्य और मीरां के ज़्यादातर पद भी मारवाड़ी में ही रचे गए।

मारवाड़ी की उपबोलियाँ

12. मेवाड़ी

  • मेवाड़ में खासकर उदयपुर, सलूम्बर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ और भीलवाड़ा में बोली जाती है।
  • मारवाड़ी के बाद राजस्थान की दूसरी महत्वपूर्ण बोली; साहित्य-परम्परा में भी मारवाड़ी के बाद मेवाड़ में ही लेखन हुआ।
  • उदयपुर के जगत मंदिर में उत्कीर्ण शिलालेख में इस बोली के सबसे पहले साक्ष्य मिलते हैं; कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति में भी मेवाड़ी का प्राचीनतम रूप है।
नामकहाँ बोली जाती है
पर्वतीय मेवाड़ीमेवाड़ के पहाड़ी इलाक़ों में
मैदानी मेवाड़ीमेवाड़ के मैदानी इलाक़ों में

13. वागड़ी

  • भीलों की घनी आबादी के कारण इसे “भीलों की बोली” का उपनाम मिला; वागड़ क्षेत्र के नाम पर यह वागड़ी कहलाई।
  • मुख्य क्षेत्र ➜ बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही; इसका असर दक्षिणी मेवाड़, अरावली अंचल और मालवा तक पहुँचता है।
  • गुजरात के निकट होने से इस पर गुजराती का असर ज़्यादा है।
विद्वानभीली के बारे में राय
जॉर्ज ग्रियर्सनइसे “भीली” कहा और भीली को स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिया
डॉ. हीरालाल माहेश्वरीभीली को स्वतंत्र भाषा नहीं मानते

14. दूँढ़ाड़ी

  • पूर्वी राजस्थान में दौसा, अलवर, कोटपुतली-पावटा क्षेत्र और जयपुर के साथ किशनगढ़ व अजमेर के उत्तरी-पूर्वी भाग में चलती है; जयपुर का इलाक़ा इसका गढ़ है।
  • संत दादू और उनके शिष्यों की रचनाएँ दूँढ़ाड़ी में हैं।
  • सबसे बड़ी पहचान ➜ “छै” शब्द का प्रयोग।

मेकलिस्टर का सर्वेक्षण

रेवरेण्ड मेकलिस्टर ने 1887 ई. में प्राचीन जयपुर राज्य की बोलियों का पहला सर्वेक्षण किया (प्रकाशन 1898, इलाहाबाद मिशन प्रेस)।

15. हाड़ौती

  • क्षेत्र ➜ झालावाड़, कोटा, बूँदी (इन्द्रगढ़-नैनवा तहसीलें छोड़कर) और बाराँ (शाहबाद-किशनगंज तहसीलें छोड़कर)।
  • बनी है मारवाड़ी और गुजराती के मिश्रण से।
  • हाड़ौती की वर्तनी राजस्थानी की तमाम बोलियों में सबसे उलझी मानी जाती है।

16. मेवाती

  • अलवर, खैरथल (खैरथल-तिजारा), डीग और भरतपुर में बोली जाती है; विस्तार गुड़गाँव (हरियाणा) तक।
  • इस पर ब्रजभाषा का स्पष्ट प्रभाव है।
  • यह बोली पश्चिमी हिन्दी और राजस्थानी के बीच सेतु का काम करती है।

17. मालवी (निमाड़ी, रांगड़ी)

  • मुख्यतः मालवा की बोली; राजस्थान में प्रतापगढ़, झालावाड़ और कोटा में; मध्य प्रदेश के रतलाम, झाबुआ आदि इसके क्षेत्र हैं।
  • इस पर गुजराती और मराठी का भी असर है।
  • उपबोलियाँ ➜ निमाड़ी, रांगड़ी, सोंडवाड़ी, पाटवी, रतलामी, उमठवाटी।
बोलीब्योरा
निमाड़ीदक्षिणी राजस्थान की बोली; वास्तव में उपभाषा मालवी की एक बोली; मुख्यतः झालावाड़ के दक्षिणी भाग और चित्तौड़गढ़ के कुछ भाग में
रांगड़ीमालवा के राजपूतों की बोली; मारवाड़ी + मालवी के मिश्रण से बनी; कुछ कर्कश; मालवी की उपबोली

18. ब्रज, पंजाबी और सीमा की भाषाएँ

बोलीब्योरा
ब्रज बोलीमुख्यतः उत्तर प्रदेश की; सीमा पास होने से असर भरतपुर, डीग और धौलपुर में; सूरदास के पद ब्रजभाषा में हैं
पंजाबीपंजाब के निकट होने से असर हनुमानगढ़ और गंगानगर में
दिशाहावी भाषा
उत्तरपंजाबी
पूर्वोत्तरहरियाणवी
पूर्वब्रज

19. मारवाड़ी की उपबोलियाँ

छोटे दायरे की बोली उपबोली कहलाती है; कई उपबोलियाँ मिलकर एक बोली का रूप लेती हैं।

उपबोलीक्षेत्रखास बात
गोड़वाड़ीमुख्यतः पाली और जालौर की आहोर तहसीलअपनी उपबोलियाँ — सिरोही, बालवी, खणी, महाहड़ी
देवड़ावाटीसिरोही क्षेत्र
ढटकीमुख्यतः जैसलमेर; जोधपुर-बीकानेर के कुछ भागढाट का अर्थ रेगिस्तान
ढाटीबाड़मेर

थल / थळ क्या है

मारवाड़ राज्य में जोधपुर के उत्तर और पश्चिम की ओर फैला बहुत बड़ा रेतीला मैदान थल कहलाता है; थळ का अर्थ है रेतीली मरुभूमि। इसी से थली बोली का नाम बना।

20. दूँढ़ाड़ी की उपबोलियाँ

उपबोलीक्षेत्रखास बात
तोरावाटीझुंझुनूँ का दक्षिणी भाग, सीकर और विराटनगर (कोटपुतली-बहरोड़)केन्द्र — नीमकाथाना (सीकर) और कोटपुतली के बीच की पट्टी; तोमर राजपूतों के बसने से नाम
काठेड़ीसवाई माधोपुर और जयपुर का दक्षिणी भाग
चौरासीजयपुर का दक्षिण-पश्चिम और टोंक का पश्चिमी भाग

21. अन्य उपबोलियाँ

बोलीक्षेत्रखास बात
खैराड़ीजहाजपुर (भीलवाड़ा), टोंक का दक्षिणी भाग, बूँदी के कुछ इलाक़ेमेवाड़ी, दूँढ़ाड़ी और हाड़ौती का मिश्रण
अहीरवाटीकोटपुतली-बहरोड़, मुंडावर, किशनगढ़ बास (खैरथल-तिजारा)दूसरे नाम हीरवाटी / हीरवाल बोली / राठी; अहीर क्षेत्र यानी राठ
मालखेराड़ीमालपुरा (टोंक)
जगरौतीमुख्यतः करौली
  • अहीरवाटी में हम्मीर रासो (कवि जोधराज) और भीमविलास (शंकर राव) लिखे गए; अलीबक्शी ख्याल भी इसी बोली का है।
  • “सहरा” फ़ारसी में जंगल को कहते हैं; सहरा (जंगल) पर निर्भर लोग “सहरिया” कहलाने लगे — और उनकी भाषा सहरी।

22. रैपिड फायर तथ्य

  • राजस्थानी भाषा दिवस ➜ 21 फ़रवरी (अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस भी इसी दिन)
  • हिन्दी दिवस ➜ 14 सितम्बर
  • जीवित बोलियाँ ➜ 1961 तक 73, 2011 में 71
  • विश्व की भाषाओं में स्थान ➜ 16वाँ
  • मरुभाषा का पहला उल्लेख ➜ कुवलयमाला (778 ई.), उद्योतन सूरि
  • ग्रियर्सन का ग्रंथ ➜ लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया (1912 ई.), इसी में «राजस्थानी» नाम पहली बार आया
  • डिंगल और पिंगल ➜ डिंगल चारण कवियों की (मारवाड़ी मिली), पिंगल भाट कवियों की (ब्रज मिली)
  • सबसे बड़ी और सर्वाधिक बोली जाने वाली बोली ➜ मारवाड़ी
  • दूँढ़ाड़ी की सबसे बड़ी पहचान ➜ «छै» शब्द का प्रयोग

अगले भाग में राजस्थानी साहित्य के चार काल, साहित्य के प्रथम, अकादमी पुरस्कार और आरम्भ काल का जैन, लौकिक व चारण साहित्य।

अगला भाग: राजस्थानी साहित्यकार व कृतियाँ: आरम्भ काल एवं मध्यकाल (भाग 1)

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थानी साहित्यकार व कृतियाँ · राजस्थानी शब्दावली

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न राजस्थानी भाषा व बोलियाँ के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
इस विषय का माइंड मैप ➜Complete Rajasthan GK पास देखें

Useful for these exams