किशनगढ़ की बात हो तो बणी-ठणी, और हाड़ौती की बात हो तो भित्ति चित्रण — ये दो पहचान इस भाग की रीढ़ हैं। मारवाड़ स्कूल की बची हुई शैलियों में किशनगढ़, जैसलमेर, अजमेर, नागौर और घाणेराव आते हैं, जबकि हाड़ौती स्कूल में बूँदी, कोटा और झालावाड़ की शैलियाँ। हर शैली का स्वर्णकाल, उसके प्रमुख चित्रकार और ख़ास पहचान साथ-साथ याद रखें।
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1. किशनगढ़ शैली
- स्वर्णकाल ➜ सावंतसिंह (1748–64)
- प्रमुख चित्र ➜ बणी-ठणी — “भारत की मोनालिसा”
- कागज़ी शैली ➜ चित्र वसली (काग़ज़) पर; भित्ति चित्र नहीं
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रियासत व सावंतसिंह
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1609 | रियासत की स्थापना | किशनसिंह — जोधपुर नरेश उदयसिंह राठौड़ के आठवें बेटे — ने रियासत बसाई। |
| रूपसिंह | रूपनगर राजधानी | रूपसिंह ने रूपनगर को राजधानी बनाया; सावंतसिंह के काल तक यही राजधानी बनी रही। |
| 1658–1706 | राजा मानसिंह | इन्हीं के दौर में दिल्ली से मोरध्वज मूलराज आए और दीवान बने; उनके वंश में आगे चलकर महान चित्रकार मोरध्वज निहालचंद हुआ। |
- राजपरिवार पर वल्लभ सम्प्रदाय का असर था, इसलिए चित्रों में राधा-कृष्ण की लीलाएँ साकार रूप में खूब बनीं।
- सावंतसिंह स्वयं कवि-साहित्यकार थे और विद्वानों-कवियों के आश्रयदाता। वे “नागरीदास” नाम से कविता लिखते थे और इसी उपनाम से प्रसिद्ध हुए।
- लगभग 75 ग्रंथ लिखे; रचनाओं का संकलन — नागर समुच्चय। वे कृष्ण-भक्त थे; बाद में राज-पाट छोड़कर वृन्दावन चले गए और वहीं उनकी मृत्यु हुई।
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ध्यान दें: शैली में भित्ति चित्र और राग-रागिनी चित्र नहीं मिलते; ज़्यादातर चित्र वसली (आटे की लेही से कई पतले काग़ज़ चिपकाकर बनाया मोटा काग़ज़) पर हैं — इसीलिए इसे “कागज़ी शैली” भी कहते हैं।
बणी-ठणी
बणी-ठणी की कहानी
- नागरीदास (सावंतसिंह) के मन में एक मधुर गायिका बणी-ठणी बसी थी
- उसे उनकी विमाता दिल्ली के अन्तःपुर से दासी बनाकर लाई थीं
- रूप पर रीझकर सावंतसिंह ने कोयल-सी आवाज़ वाली उस गायिका को अपनी पासवान बना लिया
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- चित्र में बणी-ठणी कमल का फूल थामे दिखती है।
- वह स्वयं भी “रसिक बिहारी” नाम से काव्य रचती थी।
- एरिक डिक्सन ने ही इसे “भारत की मोनालिसा” कहा।
याद रखें: चित्र में बणी-ठणी = राधा; सावंतसिंह को कृष्ण के रूप में दिखाने की परम्परा भी यहीं से शुरू हुई।
चित्र, विषय व पहचान
प्रसिद्ध चित्र
- अमरचंद की मशहूर कृति — चाँदनी रात की संगोष्ठी।
- विषय ➜ दूर तक पसरी झील, उसमें अठखेलियाँ करते हंस, सारस और बतख, कमल, भँवरे, तैरती नौकाएँ, केले के झुरमुट, रंगीन उपवन, सुबह-शाम के सिन्दूरी बादल और चाँदनी रात की राधा-कृष्ण क्रीड़ाएँ।
| पहचान | |
|---|---|
| पुरुष | लम्बा इकहरा नीलाभ शरीर, सिर पर मोतियों वाली सफ़ेद या मूँगिया पगड़ी, ऊँचा माथा, खंजन-आकार कान तक खिंचे अरुणाभ बड़े नयन |
| स्त्री | सुराहीदार गर्दन, नुकीली ठोड़ी, तोते-सी नाक, पतली कमर, गोरा रंग, दुबली-लम्बी देह और कमल-पंखुड़ी जैसी लम्बी आँखें |
- पशु-पक्षी ➜ भ्रमर व मोर
- वृक्ष ➜ केला
- मुख्य रंग ➜ श्वेत, गुलाबी, सलेटी, सिन्दूरी
याद रखें: वसली — आटे की लेई से कई पतले काग़ज़ चिपकाने पर बनने वाला मोटा, चित्रण-योग्य काग़ज़। किशनगढ़ में ज़्यादातर चित्र इसी पर बने।
चित्रकार
ध्यान दें: नानकराम, रामनाथ और सवाईराम — तीनों किशनगढ़ के हैं; अलवर कला-विद्यालय से इनमें नानकराम नहीं जुड़े (अलवर — बलदेव, डालूराम, जमनादास)।
2. जैसलमेर शैली
- मुख्य विकास महारावल हरराज, अखैसिंह और मूलराज के संरक्षण में हुआ।
- स्वर्णकाल ➜ मूलराज द्वितीय का शासन।
- इस शैली पर कभी मुग़ल या जोधपुर शैली का असर नहीं पड़ा — दूसरी शैलियों का असर इस पर सबसे हल्का रहा; यह एकदम स्थानीय शैली है।
3. अजमेर शैली
अजमेर शैली पर दरबारी और सामन्ती संस्कृति का असर ज़्यादा रहा; गाँवों में लोक संस्कृति झलकी, और ठिकानों के चित्रों में राजपूती संस्कृति ज़्यादा उभरी।
| ठिकाना | चित्रकार |
|---|---|
| जूनियाँ (अजमेर) | चाँद |
| सावर (अजमेर) | तैय्यब |
| नाँद (अजमेर) | रामसिंह भाटी |
- भिणाय (अजमेर), सावर, मसूदा (ब्यावर) और जूनियाँ ठिकानों की चित्र-परम्परा ने शैली को बढ़ाया।
- जूनियाँ के चाँद का बनाया “राजा पाबूजी” (1698) व्यक्ति-चित्र इस शैली का बढ़िया नमूना है।
- यह ऐसी कलम थी जिसने हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई — तीनों धर्मों के विषयों को सम्मान से आश्रय दिया।
4. नागौर व घाणेराव
नागौर शैली
- लकड़ी के किवाड़ों और क़िले की दीवारों पर बने भित्ति चित्रों में मारवाड़ शैली का असर दिखता है।
- वृद्धावस्था के चित्र नागौर के कलाकारों ने बड़ी कुशलता से बनाए।
- बुझे हुए, हल्के रंग इस्तेमाल हुए।
घाणेराव (पाली)
- घाणेराव जोधपुर रियासत का ठिकाना था।
- यहाँ के चित्रकार नारायण, छज्जू और कृपाराम ने नई चित्रशैली बनाई — इसलिए घाणेराव को मारवाड़ की उप-शैली माना जा सकता है।
5. हाड़ौती स्कूल
राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से — कोटा, बूँदी, झालावाड़ — में हाड़ा चौहान शासक रहे, इसी से यह इलाक़ा हाड़ौती कहलाया। बूँदी, कोटा और झालावाड़ शैलियाँ इसी स्कूल की हैं।
- दीवार-चित्रण में कोटा-बूँदी क्षेत्र सब रियासतों से आगे रहा।
- चित्रकला में सोने-चाँदी का प्रयोग सबसे पहले हाड़ौती शैली में हुआ।
- सबसे पुराने गुहा चित्र (शैलाश्रय) भी हाड़ौती क्षेत्र में मिलते हैं।
6. बूँदी शैली
- उत्पत्ति ➜ मेवाड़ + मुग़ल शैली के मेल से
- स्वर्णकाल ➜ महाराव उम्मेदसिंह (1748–70)
- उपनाम ➜ पक्षी शैली
- पशु-पक्षी ➜ शेर, हिरण, बतख (पक्षियों में कबूतर व बतख सबसे ज़्यादा)
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1554–85 | राव सुर्जनसिंह | शैली का विकास शुरू; सबसे ज़्यादा चित्र भी इन्हीं के काल में। |
| राव छत्रसाल (शत्रुशाल) | विशेष विकास | छत्रसाल द्वारा बनवाए छत्र महल के भित्ति चित्र विश्व-प्रसिद्ध। |
| भावसिंह व अनिरुद्ध | दक्षिण असर | ये दोनों मुग़लों की ओर से दक्कन के युद्धों में लड़े, जिससे दक्कनी शैली का रंग भी चढ़ा। |
दो विश्व-प्रसिद्ध चित्र
| चित्र | कहाँ रखा है |
|---|---|
| रागिनी भैरवी | नगर परिषद संग्रहालय, इलाहाबाद (प्रयागराज) |
| राग दीपक | भारत कला भवन, बनारस |
- उम्मेदसिंह ने बूँदी के तारागढ़ में “रंगविलास” नामक चित्रशाला बनवाई, जिसमें शैली के सर्वश्रेष्ठ चित्र हैं — इसीलिए इसे “भित्ति चित्रों का स्वर्ग” कहते हैं।
- उम्मेदसिंह का जंगली सूअर का शिकार करते (1750) चित्र प्रसिद्ध है।
- विष्णुसिंह के काल में भी छत्र महल में श्रीनाथजी और कृष्ण-लीला के चित्र बनवाए गए।
चित्रों के विषय
- रागिनियाँ, नायिका-भेद, ऋतुएँ, बारहमासा, कृष्ण-लीला, दरबार, शिकार, हाथियों की भिड़ंत, उत्सव, प्रकृति, पशु-पक्षी, और पियानो बजाता अंग्रेज़ जोड़ा।
- मुख्यतः भित्ति चित्र — फ़्रेस्को तकनीक के ये चित्र स्थानीय भाषा में “अरेशिया” कहलाते हैं।
- ख़ासियतें ➜ आकाश में उमड़ते काले बादल, घनघोर वर्षा, नदी की लहरें, हरे पेड़ों पर चहकते पंछी, वर्षा में नाचते मोर, कलाबाज़ी करते बंदर, पहाड़ की तलहटी के वन्य जीव।
चित्रकार
7. कोटा शैली
- स्वतंत्र पहचान ➜ महाराव रामसिंह (1696–1707)
- वल्लभ सम्प्रदाय का असर ➜ महाराव भीमसिंह (1707–20), कृष्ण भक्त
- स्वर्णकाल ➜ महाराव उम्मेदसिंह प्रथम (1771–1819)
- कोटा के मुसव्विरख़ाने (मुसव्विर = चित्रकार) के कलाकारों ने दीवारों पर बड़े चित्र बनाए और बड़ी वसलियों पर शिकार के समूह-चित्र बनाकर शैली को विशेष पहचान दी — इनमें रानियाँ व स्त्रियाँ भी शिकार करती दिखाई गई हैं।
- 1768 ई. में चित्रकार डालू ने रागमाला का सबसे बड़ा सैट बनाया।
- झाला हवेली (कोटा) में भित्ति चित्र प्रमुख हैं; यह अपने आखेट (शिकार) चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
चित्रकार
8. झालावाड़ शैली
- कोटा से अलग होकर 1838 ई. में अपनी रियासत बनी; उसके बाद यहाँ के मंदिरों-महलों में भित्ति चित्र बने।
- झालावाड़ के महलों में राधा-कृष्ण की लीला, श्रीनाथजी, रामलीला और राजसी ठाठ के दीवार-चित्र मिलते हैं।
रिवीजन पॉइंटर्स
- किशनगढ़ का स्वर्णकाल सावंतसिंह (1748–64) का है; वे «नागरीदास» उपनाम से कविता लिखते थे।
- बणी-ठणी को «भारत की मोनालिसा» कहा जाता है; किशनगढ़ की इस कृति में बणी-ठणी राधा है और सावंतसिंह कृष्ण।
- किशनगढ़ की चित्रकारी वसली (काग़ज़) पर बनी, इसलिए इसे «कागज़ी शैली» भी कहते हैं; भित्ति चित्रण और राग-रागिनी इसमें नहीं मिलते।
- जैसलमेर शैली पर मुग़ल या जोधपुर शैली का असर कभी नहीं पड़ा — यह एकदम स्थानीय शैली है; स्वर्णकाल मूलराज द्वितीय का।
- अजमेर में जूनियाँ के चाँद, सावर के तैय्यब और नाँद के रामसिंह भाटी चित्रकार हैं; चाँद की कृति «राजा पाबूजी» (1698) है।
- घाणेराव (पाली) जोधपुर रियासत का ठिकाना था; नारायण, छज्जू और कृपाराम के कारण इसे मारवाड़ की उप-शैली माना जाता है।
- चित्रकला में सोने-चाँदी का प्रयोग सबसे पहले हाड़ौती शैली में हुआ, और दीवार-चित्रण में कोटा-बूँदी सब रियासतों से आगे रहे।
- बूँदी शैली का उपनाम पक्षी शैली है; स्वर्णकाल महाराव उम्मेदसिंह (1748–70) का; तारागढ़ की «रंगविलास» चित्रशाला के कारण इसे «भित्ति चित्रण का स्वर्ग» कहा जाता है।
- कोटा शैली का स्वर्णकाल महाराव उम्मेदसिंह प्रथम (1771–1819) का है; झालावाड़ की रियासत 1838 ई. में कोटा से अलग हुई।
अगले भाग में ढूँढाड़ स्कूल — आमेर, जयपुर, अलवर, उणियारा और शेखावाटी शैलियाँ — और फिर सभी शैलियों के स्वर्णकाल, चित्रकार, तुलना, आधुनिक चित्रकार व संस्थाएँ।
पिछला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: मेवाड़ स्कूल (भाग 2) एवं मारवाड़ स्कूल (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: ढूँढाड़ स्कूल एवं चित्रकार, चित्र व संस्थाएँ
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