हस्तकला के सवाल अक्सर एक ही जोड़ी पर टिके होते हैं — कौन-सी कला किस शहर की है और उसकी पहचान क्या है। जयपुर अकेला पॉटरी, छपाई, मीनाकारी, कठपुतली और ज़री तक के लिए जाना जाता है, इसलिए नाम और केन्द्र आपस में उलझ जाते हैं। इस भाग में जयपुर संभाग की कलाओं के बाद अजमेर संभाग, शाहपुरा की फड़ कला और जोधपुर संभाग की कलाएँ क्रम से दी गई हैं।
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1. जयपुर संभाग
हस्तकलाओं का तीर्थ जयपुर है; यहाँ पॉटरी, छपाई, मीनाकारी, कुंदन, जवाहरात, मूर्तिकला, गलीचे, तबक-वर्क, ज़री और कठपुतली तक का बड़ा बाज़ार है।
2. पॉटरी के प्रकार
चीनी मिट्टी के बर्तनों पर आकर्षक चित्रकारी पॉटरी कहलाती है। इसका उद्गम फ़ारस (ईरान) माना जाता है; वहाँ से अफ़ग़ानिस्तान होती हुई भारत आई और अकबर के समय यहाँ प्रचलित हुई।
| पॉटरी | केन्द्र | पहचान |
|---|---|---|
| ब्ल्यू पॉटरी | जयपुर | आधार रंग नीला; पुराना नाम कामचीनी; GI 2009 (उत्पाद), 2017 (लोगो) |
| ब्लैक पॉटरी | कोटा (और सवाई माधोपुर) | आधार रंग काला; फूलदान, प्लेट, मटके |
| कागज़ी / डबलकट वर्क पॉटरी | अलवर | काग़ज़ जैसे पतले पात्र; रंगों का आकर्षक मेल |
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जयपुर में ब्ल्यू पॉटरी कैसे आई
- महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय (1835–1880) का काल
- दिल्ली के कलाकार भोला से चूड़ामन और कालू कुम्हार ने कला सीखी
- राजस्थान में शुरुआत; आगे कृपालसिंह शेखावत ने अंतरराष्ट्रीय पहचान दी
- प्रसिद्ध कलाकार ➜ कृपालसिंह शेखावत, नाथी बाई
- आज के कलाकार ➜ गोपाल सैनी (कृपालसिंह के शिष्य), त्रिलोक चन्द्र, भगवान सहाय, दुर्गालाल, हनुमान सहाय, गिरिराज, भैरू खारवाड़
- कृपालसिंह ➜ जन्म 1922 — मऊ गाँव (सीकर); पद्मश्री 1974; शिल्प गुरु सम्मान 2000; निधन 2008
ट्रिक: पॉटरी का रंग-शहर जोड़ा — नीली = जयपुर · काली = कोटा · काग़ज़ी = अलवर · सुनहरी = बीकानेर · पोकरण = जैसलमेर।
3. सांगानेरी व बगरू छपाई
| पहलू | सांगानेरी प्रिंट | बगरू प्रिंट |
|---|---|---|
| स्थान | सांगानेर (जयपुर) | बगरू (जयपुर) |
| कपड़ा / तरीक़ा | लट्ठे या मलमल के कपड़े पर लकड़ी के ठप्पों से | लकड़ी के ठप्पों से |
| रंग | ज़्यादातर काला और लाल | बगरू की मिट्टी और प्राकृतिक रंग; मटियाली ज़मीन पर लाल-काले |
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- सांगानेरी छपाई लगभग 200 वर्ष पुरानी है; पहले प्राकृतिक रंग चलते थे, अब कृत्रिम रंग भी। काम नामदेवी छींपा समाज करता है।
- 1903 में सर जॉर्ज वॉट ने इंडियन आर्ट ऐट देहली में सांगानेर को भारत के छपाई-उद्योग का प्रमुख केन्द्र बताया।
- सांगानेरी प्रिंट का सबसे अधिक विकास सवाई जयसिंह के समय में अपने शिखर पर पहुँची; इसे विश्व बाज़ार तक पहुँचाने का श्रेय मुन्नालाल गोयल (प्रबन्ध निदेशक, राजसीको) को।
ठप्पा, भांत, ब्लॉक
- कपड़े पर हाथ से छपाई = हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग; सांगानेर-बगरू में इसे ठप्पा छपाई भी कहते हैं।
- डिज़ाइन खुदा लकड़ी का चौकोर टुकड़ा = ठप्पा / भांत / ब्लॉक — शीशम, रोहिड़ा अथवा सागवान की लकड़ी से बनता है।
- भांत दो प्रकार की ➜ एक किनारे बनाने की, दूसरी बाक़ी डिज़ाइन छापने की।
ट्रिक: सांगानेरी = काला-लाल + 2010; बगरू = मिट्टी (दाबू) + स्याह बैगर + 2012।
4. मीनाकारी
सोने, चाँदी अथवा दूसरी धातुओं के गहनों पर चित्रकारी या रंग भरने की कला मीनाकारी है। रंग मुख्यतः लाल और हरा; जयपुर राजघराने ने इसे सबसे ज़्यादा प्रोत्साहन दिया।
मीनाकारी की यात्रा
- उद्भव — पर्शिया / ईरान
- मुग़ल इसे लाहौर लाए; वहाँ सिक्ख कलाकार यह काम करते थे
- आमेर के महाराजा मानसिंह प्रथम कलाकारों को लाहौर से आमेर लाए
| धातु / सतह | केन्द्र |
|---|---|
| पीतल पर | जयपुर (अलवर में भी) |
| चाँदी पर | नाथद्वारा (राजसमंद) |
| ताँबे पर | भीलवाड़ा |
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- सफ़ेद चलवाँ ➜ सबसे कठिन
- लाल ज़मीन
- बूँद तिला / शबनम / छटवाँ
- प्रसिद्ध कलाकार ➜ सरदार कुदरत सिंह (पद्मश्री 1988), मुन्नालाल (जयपुर), काशीनाथ, कैलाशचन्द्र, दुर्गासिंह
5. धातु-शिल्प व आभूषण
कोफ्तगिरी
- फ़ौलाद/लोहे/स्टील की वस्तुओं पर सोने के पतले तारों की जड़ाई।
- यह कला दमिश्क → पंजाब → गुजरात → राजस्थान पहुँची।
- सबसे ज़्यादा काम जयपुर व अलवर में; उदयपुर की कोफ्तगिरी को 2023 में GI मिला।
तहनिशा
- डिज़ाइन को गहरा खोदकर उसी खाँचे में बारीक तार भर देते हैं।
- सबसे ज़्यादा अलवर व उदयपुर में — अलवर के तलवारसाज़ और उदयपुर के सिकलीगर करते हैं।
- छुरी-कटार की मूठ, डिब्बे, पानदान, उगालदान, हुक्के, लैम्प आदि पर।
मुरादाबादी काम / पीतल पर नक्काशी — जयपुर
पीतल के पात्रों पर खुदाई द्वारा बनी कलाकृतियाँ मुरादाबादी काम कहलाती हैं। प्रकार — राजस्थानी चिकन, नेचुरल चिकन, नीली चिकन, चिड़िया चिकन, फ़रमा बिदर, ईरानी, दरम्यानी, मोर छींट, गुलाब छींट, मरोड़ीशाह कलम।
अन्य
| कला | क्या / कहाँ |
|---|---|
| कुंदन कला (जयपुर) | सोने-चाँदी के गहनों पर कीमती पत्थरों की जड़ाई |
| जवाहरात उद्योग (जयपुर) | विश्वभर में प्रसिद्ध; हीरों की कटाई-तराश और गहनों में जड़ाई |
| तबक / वर्क (जयपुर) | चाँदी के तार को कई परतों वाली हिरण की खाल के बीच घंटों पीटकर पतला पत्र; मिठाई पर लगता है; काम करने वाले पन्नीगर — जयपुर में उनका मोहल्ला भी; सवाई जयसिंह ने उन्हें बसाया |
6. मूर्तिकला
- जयपुर की संगमरमर की मूर्तियाँ विदेशों तक निर्यात होती हैं; मूर्तिकला के लिए राजस्थान का प्रसिद्ध शहर जयपुर है।
- लाल पत्थर की मूर्तियों के केन्द्र — थानागाजी (अलवर) तथा सिकंदरा (दौसा)।
- सजावटी कलाकृतियों और संगमरमर की मूर्तियों के लिए किशोरी गाँव (अलवर) भी प्रसिद्ध।
अर्जुनलाल प्रजापति (जयपुर)
- प्रसिद्ध मूर्तिकार ➜ पद्मश्री 2010; नवम्बर 2020 में कोरोना से निधन।
- मूर्तिकला व मिट्टी-शिल्प के कारण “क्लोनिंग के महारथी” कहलाए — बिल क्लिंटन (अमेरिकी राष्ट्रपति) का क्लोन उन्हीं के सामने सिर्फ़ 20 मिनट में बना दिखाया।
- 2008 में राजस्थान का पहला मूर्ति-शिल्प संग्रहालय “माटी मानस” जयपुर में बनाया।
अन्य मूर्तिकार
- संगमरमर पर पच्चीकारी के जादूगर ➜ भंवरलाल अंगीरा।
- मातुराम वर्मा (पिलानी, झुंझुनूं) — प्रसिद्ध मूर्तिकार।
7. कठपुतली कला
- कठपुतली का जन्मदाता राजस्थान को ही माना जाता है।
- कठपुतली कला जयपुर की मशहूर है, पर कठपुतलियाँ (निर्माण) उदयपुर की प्रसिद्ध हैं — मुख्यतः उदयपुर, और चित्तौड़गढ़ में भी।
- कठपुतली संग्रहालय ➜ बागोर हवेली (उदयपुर) में।
ध्यान दें: जयपुर = कला (नाच-प्रदर्शन) के लिए, उदयपुर = निर्माण के लिए — परीक्षा में यही फ़र्क पूछा जाता है।
8. अन्य — दरी, गलीचे, दौसा, सीकर
| कला | स्थान | ख़ास बात |
|---|---|---|
| गलीचा | जयपुर (टोंक व बीकानेर में भी) | राजस्थान में जयपुर मशहूर |
| पाव रजाई | जयपुर | 250 ग्राम रुई से बनने के कारण नाम |
| हस्तनिर्मित काग़ज़ | सांगानेर (जयपुर) | कुमारप्पा राष्ट्रीय हस्तशिल्प काग़ज़ संस्थान यहीं |
| ज़री का काम | जयपुर | सवाई जयसिंह इसे सूरत से लाए; फ़ारसी में “ज़रदौज़ी” |
9. अजमेर संभाग की कलाएँ
| कला | स्थान | ख़ास बात |
|---|---|---|
| सूंघनी नसवार | ब्यावर | — |
| तिल पापड़ी उद्योग | ब्यावर | — |
| वुडन पेन्टेड फ़र्नीचर | किशनगढ़ (अजमेर) | लकड़ी का रंग-चित्रित फ़र्नीचर |
| नमदा | टोंक | ऊन को कूटकर-जमाकर बनाया वस्त्र |
रोचक तथ्य: किशनगढ़ का फ़र्नीचर और किशनगढ़ की चित्रशैली दोनों अजमेर ज़िले से — एक ही शहर के दो नाम, दो कलाएँ।
10. फड़ कला — शाहपुरा
कपड़े या कैनवास पर मिट्टी (प्राकृतिक) रंगों से बनी कथा-चित्रकारी फड़ कहलाती है। “पट-चित्रण” शब्द राजस्थानी में बिगड़कर “फड़” हो गया। केन्द्र — शाहपुरा (भीलवाड़ा)।
फड़ कैसे बनती है
- मोटे हाथ-बुने दो सूती कपड़ों (रेजी/रेजा) को जोड़ा जाता है।
- गेहूँ या चावल की माँड में गोंद मिलाकर कलफ़ लगाते हैं; 5 या 7 परतें चढ़ने पर घोटकर चिकना करते हैं।
- रंग-नियम ➜ देवियाँ नीली, देवता लाल, राक्षस काले, साधु सफ़ेद या पीले; मुख्य रंग लाल और हरा।
- विषय ➜ किसी लोकदेवता या प्रसिद्ध व्यक्ति की कथा
- आकार ➜ लगभग 30 फ़ीट × 5 फ़ीट
- प्रदर्शन ➜ खुली जगह या चौक में बाँसों पर तान दी जाती है
प्रसिद्ध फड़ें
| फड़ | वाचक / वाद्य | ख़ासियत |
|---|---|---|
| पाबूजी की फड़ | रेबारी भोपे · रावणहत्था | सबसे लोकप्रिय; सबसे छोटी / कम चित्रांकन वाली |
| देवनारायण जी की फड़ | गुर्जर भोपे · जंतर | सबसे पुरानी व सबसे लम्बी; सबसे ज़्यादा चित्रांकन; डाक टिकट — 2 सितम्बर 1992 को |
| रामदेव जी की फड़ | नायक / कामड़ भोपे · रावणहत्था | निर्माता चौथमल जोशी |
- चातुर्मास में देवता सोते माने जाते हैं, इसलिए फड़ बनाना बंद रहता है; देवउठनी एकादशी से काम फिर शुरू होता है।
- फटी-पुरानी फड़ को पुष्कर झील में विसर्जित करते हैं — इस क्रिया को “फड़ ठंडी करना” कहा जाता है।
- हाड़ी रानी की घटना पर बनी फड़ राजस्थान की पहली ऐतिहासिक फड़ है।
प्रसिद्ध कलाकार
| कलाकार | पहचान |
|---|---|
| श्रीलाल जोशी (शाहपुरा) | पद्मश्री 2006; पश्चिमी जर्मनी के संग्रहालय में उनकी बनाई देवनारायण जी की एक फड़ रखी है |
| पार्वती जोशी | भारत की पहली महिला फड़ चित्रकार; भीलवाड़ा के कन्हैयालाल जोशी की धर्मपत्नी |
| गौतली देवी | अंतरराष्ट्रीय ख्याति की फड़ कलाकार |
| शांतिलाल जोशी | हल्दीघाटी, पद्मिनी जौहर, संयोगिता-हरण, हाड़ी रानी का त्याग, गोगाजी, डूँगजी और अमरसिंह राठौड़ की फड़ें; बार्सिलोना ओलम्पिक (1991) में प्रदर्शित |
11. जोधपुर संभाग की कलाएँ
| कला | स्थान | ख़ास बात |
|---|---|---|
| बादला | जोधपुर | ज़िंक का बना (या ज़िंक का लेप किया) जल-पात्र — पानी ठंडा रखता है |
| लकड़ी के झूले, जस्ते की मूर्तियाँ | जोधपुर | — |
| एल्यूमिनियम के खिलौने | जोधपुर | — |
| चुनरी | जोधपुर (जयपुर में भी) | रंग चमकीले, टिकाऊ, बंधेज बारीक |
12. रैपिड फायर तथ्य
- ब्ल्यू पॉटरी ➜ जयपुर (पुराना नाम कामचीनी)
- ब्लैक पॉटरी ➜ कोटा
- कागज़ी / डबलकट वर्क पॉटरी ➜ अलवर
- सांगानेरी व बगरू छपाई ➜ दोनों जयपुर की, लकड़ी के ठप्पों से हाथ की छपाई
- चाँदी पर मीनाकारी ➜ नाथद्वारा (राजसमंद); ताँबे पर भीलवाड़ा
- उदयपुर की कोफ्तगिरी ➜ 2023 में GI मिला
- कठपुतली ➜ कला जयपुर की मशहूर, निर्माण उदयपुर का प्रसिद्ध
- देवनारायण जी की फड़ ➜ सबसे पुरानी और सबसे लम्बी
- बादला ➜ जोधपुर; ज़िंक का जल-पात्र जो पानी ठंडा रखता है
अगले भाग में रंगाई-छपाई, लहरिया, बांधनी-चुनरी, गोटा-बादला-मुकेश और कढ़ाई-पेचवर्क-बातिक की शब्दावली, साथ में घर-आँगन के लोक शिल्प, मांडणा, पुरस्कार और खान-पान।
पिछला भाग: राजस्थान की हस्तकलाएँ: हस्तकला का परिचय एवं उदयपुर संभाग
अगला भाग: राजस्थान की हस्तकलाएँ: वस्त्र-कलाएँ एवं अन्य हस्तकलाएँ
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