राजस्थान के सम्प्रदाय व संत: शैव व नाथ सम्प्रदाय एवं वैष्णव सम्प्रदाय (भाग 1) – Rajasthan Art and Culture Chapter 36

सगुण-निर्गुण धारा, सम्प्रदायों के दर्शन, शैव-नाथ मत और वैष्णव के रामानन्दी, रसिक, निम्बार्क व वल्लभ पंथ।

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In this chapter (13 sections)
  1. सगुण और निर्गुण धारा
  2. प्रमुख सम्प्रदाय — सारांश तालिका
  3. दर्शन और प्रवर्तक
  4. शैव मत
  5. लकुलीश (पाशुपत)
  6. नाथ सम्प्रदाय
  7. राजस्थान में नाथ पीठ
  8. वैष्णव मत — परिचय
  9. रामानुज · रामानन्दी
  10. रसिक सम्प्रदाय
  11. निम्बार्क सम्प्रदाय
  12. वल्लभ सम्प्रदाय
  13. रिवीजन पॉइंटर्स

सम्प्रदायों के प्रश्नों में गड़बड़ अक्सर इसलिए होती है कि प्रवर्तक, दर्शन और पीठ आपस में उलझ जाते हैं। पहले यह तय कर लें कि कौन-सी धारा सगुण है और कौन-सी निर्गुण, फिर आगे का क्रम अपने-आप बैठने लगता है। इस भाग में दोनों धाराओं का अन्तर, सारांश तालिका और दार्शनिक सिद्धान्त हैं। इसके बाद शैव मत, लकुलीश, नाथ पंथ और वैष्णव के चार प्रमुख सम्प्रदाय क्रम से आते हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान के सम्प्रदाय व संत, 9 चॉक-बोर्ड चित्र, 30 नक्शे, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. सगुण और निर्गुण धारा

बिंदुसगुण भक्तिनिर्गुण भक्ति
ईश्वर का रूपसाकार — रूप, गुण वालानिराकार — बिना रूप-गुण का
पूजा-विधिमूर्ति पूजा होती हैमूर्ति पूजा नहीं
भक्ति के साधनमूर्ति, संगीत, भजन, नृत्य, कीर्तन, मालाध्यान, साधना और निराकार प्रभु के भजन

किस धारा में कौन

  • सगुण संत: यमुनाचार्य, रामानुजाचार्य, निम्बार्काचार्य, रामानन्द, माध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, नाथ सम्प्रदाय, मीरां बाई, गवरी बाई, भक्त कवि दुर्लभजी।
  • निर्गुण संत: जसनाथजी, जाम्भोजी, दादू दयाल, रज्जबजी, सुन्दरदास, लालदासजी, कबीर, रैदास, धन्नाजी, संत पीपा, नवलदासजी, लालगिरी।
  • दोनों का मेल: चरणदासजी, संत मावजी और हरिदासजी।

ध्यान दें: निर्गुण पीठों में प्रतिमा नहीं मिलेगी — वहाँ गुरु की मूर्ति या समाधि पूजी जाती है। इसी से सगुण-निर्गुण पहचानें।

2. प्रमुख सम्प्रदाय — सारांश तालिका

सम्प्रदायप्रवर्तकराजस्थान में पीठमेला
जसनाथीजसनाथजीकतरियासर (बीकानेर)आश्विन, माघ व चैत्र शुक्ल सप्तमी
विश्नोईजम्भेश्वर (जाम्भोजी)मुकाम (बीकानेर)फाल्गुन व आश्विन अमावस्या
दादू पंथदादू दयालनरायणा (जयपुर)फाल्गुन शुक्ल अष्टमी
लालदासीलालदासजीनगला जहाज (भरतपुर)—

… शेष 14 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: सबसे ज़्यादा पीठ बीकानेर (जसनाथी, विश्नोई, अलखिया) और जयपुर (दादू, रामानन्दी, परनामी, गौड़ीय) में हैं।

3. दर्शन और प्रवर्तक

आचार्यप्रतिपादित दर्शन
रामानुजाचार्यविशिष्टाद्वैत
निम्बार्काचार्यद्वैताद्वैत (भेदाभेद)
वल्लभाचार्यशुद्धाद्वैत

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ग्रन्थों से जोड़ें

आचार्यरचना
रामानुजाचार्यश्रीभाष्य
निम्बार्काचार्यवेदान्त पारिजात भाष्य
वल्लभाचार्यअणुभाष्य

ट्रिक: क्रम याद रखें — विशिष्टाद्वैत (रामानुज) · द्वैताद्वैत (निम्बार्क) · शुद्धाद्वैत (वल्लभ) · अचिन्त्य (चैतन्य) · द्वैत (माध्व)।

4. शैव मत

जो लोग शिव या उनके स्वरूपों की उपासना करते हैं, वे शैव कहलाते हैं। शैव साधक आजीवन बाल ब्रह्मचारी रहते और लिंग-पूजा में विश्वास रखते हैं। रामायण-महाभारत के समय इस मत का नाम माहेश्वर था।

चार मुख्य उप-सम्प्रदाय

  1. शैव
  2. पाशुपत (लकुलीश)
  3. कालदमन

अन्य रूप

  • राजस्थान का मेवाड़ राजघराना शैव मत को मानता है।
  • कालीबंगा और सिन्धु घाटी सभ्यता में भी शैव उपासना के प्रमाण मिले हैं।

5. लकुलीश (पाशुपत)

लकुलीश को शिव का 24वाँ अवतार माना जाता है और वे शैव धर्म की पाशुपत शाखा के प्रवर्तक थे। विद्वान भंडारकर ने शिलालेखों को आधार बनाकर उनका आविर्भाव दूसरी शताब्दी ई. में बड़ौदा (गुजरात) के कायावरोहण (कारवण) में तय किया।

राजस्थान में लकुलीश-पूजा के तीन केन्द्र

केन्द्रज़िला
एकलिंगजीउदयपुर
बाड़ोलीचित्तौड़गढ़
चन्द्रभागाझालावाड़ (झालरापाटन)
  • लकुलीश-मूर्ति का सबसे प्राचीन उदाहरण चन्द्रभागा के शीतलेश्वर महादेव मंदिर के प्रवेश-द्वार के ऊपर (ललाटबिंदु पर) उकेरी गई मूर्ति है।
  • 971 ई. की एकलिंग प्रशस्ति का आरम्भ ही “ॐ नमो लकुलीशाय” से होता है।
  • इस पंथ से जुड़े दो और मंदिर ➜ अर्थूणा (बाँसवाड़ा) का मंडलेश्वर महादेव और जालौर का सुंधा माता मंदिर, जहाँ लकुलीश-पंथ की शिव-मूर्ति है।

6. नाथ सम्प्रदाय

नाथ पंथ शैव मत का ही एक नया रूप है, जिसे सगुण सम्प्रदायों में गिना जाता है। इसके अनेक नाम हैं — योग सम्प्रदाय, अवधूत सम्प्रदाय (हजारीप्रसाद द्विवेदी का दिया नाम), सिद्धमत और सिद्धमार्ग।

  • प्रवर्तक ➜ मत्स्येन्द्रनाथ (नाथ मुनि)
  • सिद्धान्त ➜ योगिनी कौल
  • सहजयान-सिद्धि ➜ सम्प्रदाय के संस्थापक भी मत्स्येन्द्रनाथ

गोरखनाथ की 12 शाखाएँ

गुरु गोरखनाथ ने कुल 12 शाखाएँ चलाईं, जिनमें से 2 राजस्थान में हैं।

शाखाकेन्द्रविशेष
बैराग पंथरातडूँगा (नागौर)पहले प्रचारक भर्तृहरि माने जाते हैं
माननाथीमहामंदिर (जोधपुर)राजस्थान में नाथों का मुख्य केन्द्र

याद रखें: नौ नाथ क्रम से — आदिनाथ (शिव), मत्स्येन्द्र, गोरख, चर्पट, गाहिणी, ज्वालेन्द्र, चौरंगी, भृतहरि, गोपीचन्द।

7. राजस्थान में नाथ पीठ

महामंदिर (जोधपुर)

  • स्थान ➜ जोधपुर — राजस्थान में नाथ सम्प्रदाय की प्रधान पीठ (केन्द्रीय मठ)
  • निर्माता ➜ महाराजा मानसिंह (आयसदेवनाथ के शिष्य)
  • वर्ष ➜ 1805 ई.

अन्य नाथ मंदिर और आश्रम

स्थलज़िलाविशेष
उदय मंदिरजोधपुरनाथ सम्प्रदाय का मंदिर
सिरे मंदिरजालौरजालंधरनाथ की तपस्थली; मानसिंह ने बनवाया और संकट के दिनों में यहीं शरण ली
रातडूँगा (बैराग पंथ)नागौरभर्तृहरि से जुड़ी शाखा

8. वैष्णव मत — परिचय

भगवान विष्णु या उनके अवतारों की आराधना करने वाले वैष्णव कहलाते हैं। इस मत के दूसरे नाम भागवत मत और पांचरात्र मत हैं।

घोसुण्डी शिलालेख — सबसे पहला उल्लेख

  • स्थान ➜ चित्तौड़गढ़
  • काल ➜ दूसरी शताब्दी ई.पू.
  • लिपि-भाषा ➜ ब्राह्मी लिपि, संस्कृत भाषा

राजस्थान में वैष्णव धर्म का सबसे पहला उल्लेख इसी लेख में मिलता है।

पाँच प्रमुख उप-सम्प्रदाय

9. रामानुज · रामानन्दी

यह सम्प्रदाय तीन नामों से जाना जाता है। उपास्य देव राम होने से रामावत; सबसे ज़्यादा प्रचार रामानन्द ने किया, इसलिए रामानन्दी; और प्रवर्तक रामानुजाचार्य हैं, इसलिए रामानुज सम्प्रदाय। इसके अनुयायी भक्ति को ही मोक्ष का साधन मानते हैं।

राजस्थान में पीठ — गलता जी (जयपुर)

  • राजस्थान में इस परम्परा के आरम्भकर्ता कृष्णदास पयहारी (पयहारी स्वामी) थे; उन्होंने यहाँ नाथों का प्रभाव घटाकर रामानन्दी भक्ति चलाई।
  • रामानन्द के शिष्य कील्हदासजी (16वीं सदी) गलता में रहे और यहाँ के मंदिरों में इस मत को मज़बूत किया।
  • जयपुर के सवाई जयसिंह इस पंथ के संरक्षक थे; उन्होंने कृष्णभट्ट कलानिधि से रामरासा ग्रन्थ रचवाया।

रामानुजाचार्य

  • गुरु ➜ यमुनाचार्य
  • जन्म ➜ लगभग 1017 ई. — श्रीपेरुम्बदूर (तमिलनाडु)
  • कर्मभूमि ➜ श्रीरंगम (तमिलनाडु)

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

10. रसिक सम्प्रदाय

  • प्रमुख पीठ ➜ रैवासा (सीकर)
  • संस्थापक ➜ स्वामी अग्रदासजी — कृष्णदास पयहारी के शिष्य
  • प्रिय शिष्य ➜ नाभादास — भक्तमाल के रचयिता

यहाँ श्रृंगार-भाव से सीता-राम के युगल की उपासना होती है — राम को प्रियतम मानकर रसपूर्वक भजा जाता है, इसी से नाम रसिक पड़ा।

11. निम्बार्क सम्प्रदाय

इसे सनकादिक या हंस सम्प्रदाय भी कहते हैं। आदि उपदेशक के रूप में आचार्य हंस का नाम लिया जाता है। यहाँ राधा-कृष्ण की युगल सेवा होती है और राधा को कृष्ण की अर्धांगिनी समझा जाता है।

  • मुख्य पीठ ➜ वृन्दावन
  • राजस्थान की पीठ ➜ सलेमाबाद (अजमेर), रूपनगढ़ नदी के किनारे
  • पीठ के संस्थापक ➜ आचार्य परशुराम

आचार्य परशुराम

  • जन्म ठीकरिया (सीकर) में; 36वें निम्बार्काचार्य माने जाते हैं।
  • वृन्दावन में आचार्य हरिव्यास देव से मंत्र-दीक्षा ली।
  • परशुराम सागर ➜ ब्रजभाषा मिले राजस्थानी में काव्य-रचना।

निम्बार्काचार्य

  • जन्म ➜ 1162 ई. — वैलारी (दक्षिण भारत)
  • बचपन का नाम ➜ आरुणि
  • गुरु ➜ नारद मुनि

12. वल्लभ सम्प्रदाय

वल्लभ सम्प्रदाय को पुष्टिमार्ग भी कहते हैं। इसके प्रवर्तक वल्लभाचार्य (उत्तर प्रदेश) हैं। उन्हें गोवर्धन के जतीपुरा गाँव से श्रीनाथजी की मूर्ति मिली; इसलिए इस पंथ के आराध्य श्रीनाथजी हैं।

पुष्टिमार्ग की भाषा

सामान्य शब्दवल्लभ-मत में
मंदिरहवेली
दर्शनझाँकी
ईश्वर की कृपापुष्टि
  • मूल मंत्र ➜ “कृष्ण शरणं मम”।
  • पूजा कृष्ण के बालरूप की होती है; इस मार्ग में सेवा ही भक्ति है और बाल-लीलाओं पर ज़ोर रहता है।
  • मंदिरों में दिन में आठ बार सेवा-झाँकी — मंगला, शृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, आरती, शयन।

वल्लभाचार्य — जीवन-रेखा

  • जन्म ➜ 1478 ई. — चम्पारण्य (मध्य प्रदेश)
  • पिता-माता ➜ लक्ष्मण भट्ट (तेलंगाना) · यल्लमगारू
  • पत्नी-पुत्र ➜ महालक्ष्मी (देवभट्ट की पुत्री) · गोपीनाथ व विट्ठलनाथ

द्वारका से लौटते समय वे एक बार पुष्कर (अजमेर) आए; उनकी याद में प्रशंसकों ने पुष्कर झील पर वल्लभ घाट बनवाया। उनकी निर्धारित 84 बैठकों में पुष्कर भी एक स्थान है।

अष्टछाप कवि मंडली

इसे आचार्य विट्ठलनाथ ने स्थापित किया। इसमें 8 कवि थे, जिनके कारण वल्लभ मत लोकप्रिय हुआ। राजस्थान में अष्टछाप कवियों का मुख्य केन्द्र नाथद्वारा है।

वल्लभाचार्य के शिष्यविट्ठलनाथ के शिष्य
सूरदासनंददास
परमानन्ददासचतुर्भुजदास
कृष्णदासगोविन्ददास
  • विट्ठलनाथजी को “गुसाईं” की पदवी मिली; तभी से उनकी संतान गुसाईं कहलाती है।
  • किशनगढ़ के शासक सावंतसिंह (नागरीदास) इसी पंथ के परम भक्त थे; वे राजकाज छोड़कर वृन्दावन चले गए।

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. सगुण भक्ति में मूर्ति-पूजा होती है, निर्गुण में नहीं; जसनाथजी, जाम्भोजी और दादू दयाल निर्गुण धारा के संत हैं।
  2. दर्शन का मिलान: रामानुज ➜ विशिष्टाद्वैत, निम्बार्क ➜ द्वैताद्वैत, वल्लभ ➜ शुद्धाद्वैत।
  3. लकुलीश को शिव का 24वाँ अवतार माना जाता है; राजस्थान में उनकी पूजा के केन्द्र एकलिंगजी, बाड़ोली और चन्द्रभागा हैं।
  4. नाथ पंथ के प्रवर्तक मत्स्येन्द्रनाथ हैं; गोरखनाथ की 12 शाखाओं में से 2 राजस्थान में हैं — बैराग पंथ और माननाथी।
  5. जोधपुर का महामंदिर राजस्थान में नाथों की प्रधान पीठ है, जिसे महाराजा मानसिंह ने 1805 ई. में बनवाया।
  6. राजस्थान में वैष्णव धर्म का सबसे पहला उल्लेख दूसरी शताब्दी ई.पू. के घोसुण्डी शिलालेख (चित्तौड़गढ़) में मिलता है।
  7. रसिक सम्प्रदाय की पीठ रैवासा (सीकर) है, संस्थापक अग्रदासजी; निम्बार्क सम्प्रदाय की राजस्थान पीठ सलेमाबाद (अजमेर) है।
  8. वल्लभ सम्प्रदाय यानी पुष्टिमार्ग के आराध्य श्रीनाथजी हैं; अष्टछाप में 8 कवि थे और उनका मुख्य केन्द्र नाथद्वारा है।

अगले भाग में श्रीनाथजी की यात्रा और सात स्वरूप, नाथद्वारा, गौड़ीय सम्प्रदाय, तथा जसनाथी, विश्नोई व दादू पंथ।

पिछला भाग: मुस्लिम पीर, मस्जिदें, दरगाह, मीनार, मकबरे: ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती

अगला भाग: राजस्थान के सम्प्रदाय व संत: वैष्णव सम्प्रदाय (भाग 2) एवं जसनाथी · विश्नोई · दादू

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