इन छोटे-छोटे पंथों में एक ही कसौटी काम आती है: संस्थापक कौन, जन्म-स्थान कहाँ और पीठ किस ज़िले में। नामों की समानता से भ्रम होता है, इसलिए हर पंथ को उसके स्थान से जोड़कर पढ़ें। इस भाग में दादू के शिष्य गरीबदास, सुन्दरदास और रज्जबजी से शुरुआत है। फिर लालदासी, चरणदासी, निरंजनी, रामस्नेही की चार पीठ, गुदड़, परनामी, अलखिया आदि और सिक्ख सम्प्रदाय आते हैं।
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1. दादू के प्रमुख शिष्य
गरीबदास और मिस्किनदास
- गरीबदास दादू के पुत्र; दादू के बाद गद्दी पर बैठे, फिर स्वयं को असमर्थ बताकर गद्दी छोड़ दी। पंथ में खालसा वर्ग शुरू किया। रचनाएँ — साखी पद, आध्यात्म बोध, अनभै प्रबोध।
- मिस्किनदास भी दादू के पुत्र थे; गरीबदास के गद्दी छोड़ने पर पीठ पर बैठे।
संत सुन्दरदास
- माता-पिता ➜ परमानन्द · सती
- जाति ➜ खण्डेलवाल
- जन्म ➜ दौसा, 1596 ई.
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- दादू पंथ में नागा साधु वर्ग शुरू किया।
- पिंगल भाषा में उन्होंने 42 ग्रन्थ लिखे।
- प्रमुख ➜ ज्ञान समुद्र, ज्ञान सवैया, सुन्दर विलास, सर्वांगयोगप्रदीपिका, सुन्दर सार, सुन्दर ग्रन्थावली।
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संत रज्जबजी
- जाति ➜ पठान
- पिता ➜ आमेर की फ़ौज के प्रधान सेनापति
- गुरु ➜ दादू दयाल
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- विवाह के लिए बारात लेकर जाते समय दादू के उपदेश सुने और उनके शिष्य बन गए; फिर आजीवन दूल्हे के वेश में रहे।
- दादू का कथन ➜ “रज्जब तैं गज्जब किया, सिर पर बाँधा मौड़। आया था हरि भजन कूँ, करे नरक की ठौर।”
- दादू के देहान्त वाले दिन से ही उन्होंने नेत्रों पर पट्टी चढ़ा ली, फिर कभी नहीं उतारी; कहते थे — “देखने योग्य जो था देख लिया, अब देखने को क्या है।”
ध्यान दें: दादू-परिवार में गरीबदास = खालसा; सुन्दरदास = नागा। दोनों की पहचान उलझाएँ नहीं।
2. लालदासी सम्प्रदाय
- प्रवर्तक ➜ लालदासजी — मेव जाति के मुस्लिम लकड़हारे (दुलोत गोत्र)
- माता-पिता ➜ चाँदमल · समदा
- जन्म ➜ धोलीदूब (अलवर), 1540 ई., श्रावण कृष्ण पंचमी
- निधन ➜ नगला जहाज (भरतपुर), 1648 ई.
- दीक्षा गद्दन चिश्ती (तिजारा) से ली; उन्हीं की प्रेरणा से धोलीदूब छोड़कर बांधोली गाँव की सिंह शिला पहाड़ी पर कुटिया बनाई।
- हिन्दू-मुस्लिम एकता और नैतिक शुद्धता पर ज़ोर; अलवर-भरतपुर के मेव इनके अनुयायी हैं।
- हर व्यक्ति को स्वयं कमाकर खाना अनिवार्य।
दीक्षा-क्रम
- मुँह काला किया जाता है
- गधे पर उल्टा बैठाया जाता है
- गाँव का चक्कर लगवाया जाता है
दारा शिकोह की भविष्यवाणी
दारा शिकोह ने पूछा कि दिल्ली का अगला शासक कौन होगा। लालदासजी बोले — “दिल्ली के तख़्त पर वही बैठेगा जो अपने भाइयों की हत्या करेगा।” आगे चलकर औरंगज़ेब ने दारा शिकोह, शुजा और मुराद को मारकर तख़्त हथिया लिया।
ट्रिक: तीन जगहें — धोलीदूब (जन्म, अलवर) · नगला जहाज (पीठ व निधन, भरतपुर) · शेरपुर (समाधि)।
3. चरणदासी सम्प्रदाय
- प्रवर्तक ➜ चरणदासजी; बचपन का नाम रणजीत; जाति बनिया
- माता-पिता ➜ मुरलीधर · कुंजा देवी
- जन्म ➜ डेहरा (अलवर), 1703 ई.
- निधन ➜ 1782 ई. — विक्रम संवत 1839, मार्गशीर्ष कृष्ण सप्तमी, दिल्ली में
- मुख्य पीठ दिल्ली में है, जबकि संस्थापक राजस्थान में जन्मे एकमात्र ऐसे संत हैं जिनका चलाया पंथ दिल्ली में केन्द्रित है।
- समाधि पर बसन्त पंचमी को मेला लगता है।
- जन्म-स्थान डेहरा में उनकी छतरी है, जहाँ टोपी, माला, गुदड़ी और चोला सुरक्षित हैं।
दो प्रमुख शिष्याएँ
| शिष्या | जन्म | रचनाएँ |
|---|---|---|
| दयाबाई | डेहरा (अलवर) | दया बोध, विनय मालिका |
| सहजोबाई | डेहरा (अलवर) | सहजप्रकाश, सात वार निर्णय, 16 तिथि निर्णय |
दोनों ने अपना लेखन मेवाती बोली में किया।
ध्यान दें: 42 नियम और 52 शिष्य — “चरणदास = 42 और 52“; दादू के भी 52 प्रमुख शिष्य (बावन स्तम्भ) थे, उलझाएँ नहीं।
4. निरंजनी सम्प्रदाय
- प्रवर्तक ➜ संत हरिदासजी — “कलियुग के वाल्मीकि”
- मूल नाम ➜ हरिसिंह साँखला
- जन्म ➜ कापड़ोद (डीडवाना-कुचामन), 1455 ई.
संत बनने से पहले हरिसिंह डकैती से जीवन चलाते थे। एक महात्मा ने समझाया कि हत्या-लूट का पाप वही उठाता है जो उसे करता है, खाने वाले परिजन नहीं। यह सुनकर उन्होंने डकैती छोड़ दी, कापड़ोद के पास तीखी डूँगरी पर तप किया और निरंजनी सम्प्रदाय चलाया। उन्होंने 1513 में ज्ञान-प्राप्ति की।
- निर्गुण भक्ति पर ज़ोर और कुरीतियों का विरोध; परमात्मा को “अलख निरंजन” या “हरि निरंजन” कहा जाता है।
- उपदेश ➜ मंत्र राजप्रकाश, हरिपुरुषजी की वाणी।
- और ग्रन्थ ➜ साखी, भक्त विरदावली, श्री हरिपुरुष भर्तृहरि संवाद।
| अनुयायी का प्रकार | जीवन |
|---|---|
| निहंग | वैरागी जीवन |
| घरबारी | गृहस्थ जीवन |
5. रामस्नेही — चार पीठ व शाहपुरा
रामस्नेही पंथ राम-नाम की रामधुन से भक्ति करता है। प्रार्थना-स्थल रामद्वारा कहलाता है, वहाँ सामने गुरु की तस्वीर टिकाई जाती है, क्योंकि इस पंथ में गुरु की महिमा सबसे अधिक है।
| पीठ | ज़िला | संस्थापक संत |
|---|---|---|
| शाहपुरा (मुख्य पीठ) | भीलवाड़ा | रामचरणजी |
| रैण | नागौर | दरियावजी |
| सिंथल | बीकानेर | हरिरामदासजी |
रामचरणजी (शाहपुरा)
- मूल परिचय ➜ बचपन का नाम रामकिशन; वीजावर्गी वैश्य परिवार; पिता बख्ताराम, माँ देउजी, पत्नी गुलाब कँवर
- जीवनकाल ➜ 1719 – 1798 ई.
- जन्म ➜ सोडा गाँव (अब मालपुरा, टोंक), 1719
- निधन ➜ शाहपुरा, 1798
- 1758 ई. ➜ गलताजी के मेले में साधुओं का आचरण पंथ-मर्यादा के विरुद्ध लगा, तो मन उचट गया और उन्होंने संन्यास ले लिया।
- शाहपुरा नरेश रणसिंह ने उनके लिए छतरी बनवाई और मठ भी स्थापित कराया।
- फूलडोल ➜ होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण एकम) से पंचमी तक चलने वाला मेला।
ट्रिक: चार पीठ का सूत्र — शा-रै-सिं-खे (शाहपुरा, रैण, सिंथल, खेड़ापा) = भीलवाड़ा, नागौर, बीकानेर, जोधपुर।
6. रैण · सिंथल · खेड़ापा शाखाएँ
रैण शाखा (नागौर) — संत दरियावजी
- जीवनकाल ➜ 1676 – 1758 ई.
- माता-पिता ➜ मानजी (मानसा) धुनिया · गीगा — पठान धुनिया मुसलमान
- जन्म ➜ जैतारण (ब्यावर)
दरियावजी ने योग-मार्ग का उपदेश दिया। उन्होंने “राम” में “रा” को राम का और “म” को मुहम्मद का प्रतीक बताकर हिन्दू-मुस्लिम एकता की भावना बढ़ाई।
सिंथल शाखा (बीकानेर) — हरिरामदासजी
- माता-पिता ➜ भागचन्द जोशी · रामी (जोशी ब्राह्मण)
- गुरु ➜ जैमलदास
- प्रमुख कृति ➜ निशानी
खेड़ापा शाखा (जोधपुर) — रामदासजी
- जन्म ➜ भीकमकोर (जोधपुर)
- माता-पिता ➜ शार्दुल · अणभी
- जाति ➜ मेघवाल
7. गुदड़ · परनामी · अलखिया · नवल · राजाराम · उंदरिया
| पंथ | प्रवर्तक | पीठ | विशेष |
|---|---|---|---|
| गुदड़ | संतदासजी | दाँतड़ा (भीलवाड़ा) | निर्गुण भक्ति; गुदड़ी से बने कपड़े पहनते थे |
| परनामी | प्राणनाथजी (जामनगर, गुजरात) | पन्ना (म.प्र.); राजस्थान में आदर्श नगर (जयपुर) | ग्रन्थ कुलजम स्वरूप की पूजा; कृष्ण-उपासना; राजस्थान में अनुयायी सबसे अधिक जयपुर में; “कृष्ण को प्रणाम” मूल दर्शन |
| अलखिया | लालगिरी (जन्म सुलखनिया, चूरू) | बीकानेर | ग्रन्थ अलख स्तुति प्रकाश, कुण्डलियाँ; ज़्यादातर अनुयायी मोची जाति के |
ख़ास बातें
- लालगिरी वर्षों तक बीकानेर किले के सामने बैठे; वहाँ उनकी याद में लाल पत्थर लगा है। उनकी समाधि जयपुर के गलता जी में बनी है।
- नवलदासजी ने बाल विवाह, पर्दा-प्रथा, छुआछूत, सती-प्रथा, टोना-टोटका, आडम्बर और रूढ़िवादी सोच के विरुद्ध लोगों को जगाया।
8. सिक्ख सम्प्रदाय
- गुरु नानकदेव
- गुरु अंगददेव
- गुरु अमरदास
- गुरु रामदास
- गुरु अर्जनदेव
- गुरु नानकदेव ➜ सिक्ख धर्म के प्रवर्तक
- जन्म ➜ ननकाणा साहिब (तलवंडी), अब पाकिस्तान में — 15 अप्रैल 1469 ई.
- स्वर्गवास ➜ 1539 ई.
खालसा पंथ की शुरुआत गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म पटना, 1666 ई.) ने की। उन्होंने देहधारी गुरुओं की परम्परा रोककर ग्रन्थ साहिब को ही स्थायी गुरु माना। उपदेश-ग्रन्थ — गुरु ग्रन्थ साहिब।
राजस्थान में सिक्ख धर्म के अनुयायी सबसे अधिक श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में हैं।
रिवीजन पॉइंटर्स
- दादू-परिवार में गरीबदास ने खालसा वर्ग शुरू किया और सुन्दरदास ने नागा साधु वर्ग — दोनों को अलग-अलग याद रखें।
- लालदासजी मेव जाति के थे; जन्म धोलीदूब (अलवर) में 1540 ई., निधन नगला जहाज (भरतपुर) में 1648 ई.
- चरणदासजी का जन्म डेहरा (अलवर) में 1703 ई. में हुआ; मुख्य पीठ दिल्ली में है; शिष्याएँ दयाबाई और सहजोबाई।
- निरंजनी सम्प्रदाय के प्रवर्तक संत हरिदासजी (हरिसिंह साँखला) हैं, जन्म कापड़ोद में 1455 ई.; उन्हें «कलियुग के वाल्मीकि» कहा जाता है।
- रामस्नेही की चार पीठ — शाहपुरा (रामचरणजी), रैण (दरियावजी), सिंथल (हरिरामदासजी) और खेड़ापा (रामदासजी); मुख्य पीठ शाहपुरा है।
- शाहपुरा का फूलडोल मेला होली के अगले दिन से पंचमी तक चलता है।
- परनामी सम्प्रदाय के प्रवर्तक प्राणनाथजी हैं, ग्रन्थ कुलजम स्वरूप; राजस्थान में अनुयायी सबसे अधिक जयपुर में हैं।
- अलखिया पंथ के लालगिरी का जन्म चूरू के सुलखनिया में हुआ; पीठ बीकानेर में है।
- सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानकदेव (जन्म 15 अप्रैल 1469 ई.); राजस्थान में अनुयायी सबसे अधिक श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में हैं।
अगले भाग में संत पीपा, धन्नाजी, रैदास, मीरां बाई, वागड़ के संतों और अन्य महिला संतों के जीवन तथा जैन धर्म, तीर्थंकर व तेरापंथ के आचार्य।
पिछला भाग: राजस्थान के सम्प्रदाय व संत: वैष्णव सम्प्रदाय (भाग 2) एवं जसनाथी · विश्नोई · दादू
अगला भाग: राजस्थान के लोकसंत
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