मध्यकाल के राजस्थानी साहित्य को समझने का आसान तरीका है उसे तीन धाराओं में बाँट लेना — संतों की वाणी, दोहों-सोरठों में लिखी प्रेम-कथाएँ और जन-जन का लोक साहित्य। सबसे ज़रूरी जोड़ी है सम्प्रदाय, उसका प्रवर्तक और उसका ग्रन्थ। इस भाग में सम्प्रदाय-वार संत काव्य, मीराबाई व अन्य संत कवि, लौकिक काव्य के प्रेमाख्यान और लोक साहित्य के रूप क्रम से दिए गए हैं। जहाँ-जहाँ पिछले वर्षों की परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम साथ में लिखा गया है।
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1. एक नज़र में
राजस्थान के जनजीवन में संतों का मान हमेशा रहा है, और इसी कारण राजस्थानी साहित्य खूब समृद्ध हुआ। मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन चला तो संत-महात्माओं का उदय हुआ; जनता के हित में उन्होंने अपनी बात लोकभाषा में कही। अधिकतर संतों की रचनाएँ पद्य में मिलती हैं।
याद रखें: संत-काव्य और लौकिक-काव्य, मध्यकाल की पाँच प्रवृत्तियों (चारण, आख्यान, संत, लौकिक, जैन) में से तीसरी और चौथी हैं — इसीलिए पिछले अध्याय के साथ जोड़कर पढ़ें।
2. सम्प्रदाय-वार संत काव्य
| सम्प्रदाय | प्रवर्तक | प्रमुख रचना / ग्रन्थ |
|---|---|---|
| नाथ | गुरु गोरखनाथ की परम्परा (लगभग 11वीं सदी) | बनानाथ — अनुभव प्रकास, परवाना; पृथ्वीनाथ — 29 रचनाएँ |
| विश्नोई | जाम्भोजी | 120 शब्द वाणियाँ · जम्भसागर · जम्भसंहिता · विश्नोई धर्म प्रकाश |
| जसनाथी | जसनाथजी | सिंभूधड़ा · कोंडा ग्रन्थ · गोरख छंदो [परीक्षा: JEN 2020 — सिंभूधड़ा और कोंडा ग्रन्थों में किस सम्प्रदाय के उपदेश हैं? ➜ जसनाथी] |
| निरंजनी | हरिदास महाराज | मंत्र राजप्रकाश · हरिपुरुष जी की वाणी |
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ज़्यादातर संतों की भाषा राजस्थानी है; कहीं-कहीं ब्रज और खड़ी बोली के शब्द घुल जाते हैं।
ट्रिक: जोड़ियाँ — विश्नोई = जाम्भोजी, जसनाथी = जसनाथजी, निरंजनी = हरिदास, दादूपंथ = दादू, लालदासी = लालदास, चरणदासी = चरणदास: अधिकतर पंथों का नाम प्रवर्तक के नाम पर ही है; नाथ में गुरु गोरखनाथ की परम्परा है।
3. नाथ सम्प्रदाय
- मूल ➜ गुरु गोरखनाथ (लगभग 11वीं सदी)
- परम्परा ➜ 9 नाथ और 12 पंथ
- पृथ्वीनाथ (प्रिथीनाथ) ➜ 17वीं सदी के नामी संत; 29 रचनाएँ
- इस सम्प्रदाय के प्रसिद्ध कवि ➜ बनानाथ, नवलनाथ, उत्तमनाथ।
- बनानाथ की प्रमुख रचनाएँ — अनुभव प्रकास और परवाना।
ट्रिक: नाथ = 9 + 12 (नाथ और पंथ); बनानाथ = अनुभव प्रकास + परवाना।
4. विश्नोई सम्प्रदाय
यह निर्गुण सम्प्रदाय है; इसके प्रवर्तक जाम्भोजी थे।
- प्रमुख कवि ➜ उदोजी नैण, विल्होजी, केसौजी, सुरजनजी, परमानन्दजी, हरखचन्दजी।
- जाम्भोजी के ग्रन्थ ➜ जम्भसागर, जम्भसंहिता (अनुयायी इसे पाँचवाँ वेद कहते हैं), विश्नोई धर्म प्रकाश और 120 शब्द वाणियाँ।
ध्यान दें: विश्नोई समाज जम्भसंहिता को 5वाँ वेद कहता है — ग्रन्थ-नाम और संख्या 120 साथ याद रखें।
5. जसनाथी सम्प्रदाय
प्रवर्तक — जसनाथजी।
- प्रसिद्ध कवि ➜ करमदास, देवोजी, लालनाथ, चौखनाथ।
- जसनाथजी की रचनाएँ ➜ सिंभूधड़ा, कोंडा ग्रन्थ, गोरख छंदो।
- सिद्ध रामनाथ की रचना — यशोनाथ पुराण।
6. निरंजनी सम्प्रदाय
इस पंथ की शुरुआत हरिदास महाराज ने की। उनकी वाणी में राजस्थानी के साथ ब्रज भाषा के शब्द भी आते हैं।
- उनकी शिक्षाएँ दो ग्रन्थों में सहेजी गईं — मंत्र राजप्रकाश और हरिपुरुष जी की वाणी।
7. दादूपंथ
पंथ की स्थापना संत दादू दयाल ने की; उनकी काव्य-भाषा राजस्थानी है।
संकलन
| संकलन | पद | किसने संकलित किया |
|---|---|---|
| हरड़ेवाणी | 189 पद | संतदास और जगन्नाथदास |
| अंगवधू | 276 पद | रज्जब जी |
दादूपंथ के अन्य कवि — बखना जी, रज्जब जी, सुन्दरदास जी (छोटा), संतदास बारह हजारी, भीखणजी, वाजिन्द।
दादूपंथी कवि और उनकी रचनाएँ
| कवि | रचनाएँ |
|---|---|
| सुन्दरदास | ज्ञान समुद्र · ज्ञान सवैया · सुन्दर विलास · सुन्दरसार · सुन्दर ग्रन्थावली · सर्वांगयोग प्रदीपिका — सुन्दर विलास इनकी महत्त्वपूर्ण रचना |
| रज्जब जी | रजब वाणी · सर्वंगी (सब्बंगी) |
| गरीबदास | साखी · अणभैप्रबोध · आध्यात्म बोध |
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8. लालदासी व चरणदासी
लालदासी सम्प्रदाय
- पंथ-प्रवर्तक लालदास जी; उनकी वाणी में कुल 125 दोहे और 60 पद हैं।
- अन्य कवि ➜ हरिदास, डूँगरजी साध, प्राणी साध, भीखन जी साध।
- रचना ➜ लालदास जी री चेतावण्या।
चरणदासी पंथ
प्रवर्तक चरणदास जी। दया बाई और सहजो बाई की रचनाएँ भक्ति-परम्परा में अपना बड़ा स्थान रखती हैं। पदों की भाषा राजस्थानी है, कहीं-कहीं ब्रज और खड़ी बोली का असर दिखता है।
- अन्य कवि ➜ जोगजीत जी, रामरूप जी।
- चरणदास जी की रचनाएँ — ब्रज चरित्र, अमरलोक खंड धाम वर्णन, धर्म जहाज, अष्टांग योग, संदेह सागर, ज्ञान स्वरोदय, पंच उपनिषद, भक्ति पदारथ, मन विरक्त करण गुटका सार, ब्रह्मज्ञान सागर, सबद, नासकेत लीला।
| कवयित्री | रचनाएँ |
|---|---|
| दया बाई | दयाबोध · विनय मालिका |
| सहजो बाई | सहज प्रकाश · सात वार निर्णय · सोलह तिथि निर्णय |
9. रामस्नेही सम्प्रदाय
| शाखा | प्रवर्तक | अन्य कवि | ख़ास |
|---|---|---|---|
| शाहपुरा | रामचरण जी महाराज | रामजन जी · भगवानदास जी · रामप्रताप जी · दूल्हेराय जी · जगन्नाथ जी | वाणी में 36000 श्लोक — निर्गुण भक्ति का विश्वकोश; रचना: अर्णभवाणी / आणाभाई वेणि |
| रैण | दरियाव जी | पूर्णदास · किशनदास · नानकदास · मनसाराम · हरखाराम | 412 साखियाँ और 30 पद |
| सिंथल | हरिराम जी | हरिदेव दास जी · नारायण दास जी · पीराराम जी | हरिराम जी की घाघर निसाणी में उनके अनुभव |
10. अन्य संत कवि
| संत | ख़ास बात | रचना |
|---|---|---|
| संत पीपा | 25 पद और साखियाँ; भाषा कुछ पंजाबी-मिश्रित राजस्थानी | चिन्तावणी |
| संत धन्ना | राजस्थान में धर्म-आन्दोलन की पहली लहर इन्हीं के नाम | पद — धन्ना जी की आरती |
| काजी महमूद | 35 पद; भाषा राजस्थानी-मिश्रित खड़ी बोली | — |
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11. पीपा, धन्ना, काजी महमूद
- संत पीपा ➜ साखियाँ और 25 पद; भाषा में कुछ पंजाबी का पुट; रचना चिन्तावणी।
- संत धन्ना ➜ राजस्थान में धर्म-आन्दोलन की शुरुआत का श्रेय इन्हें दिया जाता है; उनके पद “धन्ना जी की आरती” नामक संकलन में हैं।
- काजी महमूद ➜ 35 पद; भाषा राजस्थानी मिली खड़ी बोली।
12. मीराबाई
मीराबाई की लिखी रचनाएँ कुल 11 गिनी जाती हैं —
- गीत गोविन्द री टीका
- राग सोरठ के पद
- सत्यभामा नु रूसणं
- मीरां की गरबी
- रुक्मणी मंगल
- “नरसी जी रो माहेरो” को कुछ विद्वान मीरा की नहीं, खाती की कृति बताते हैं।
- विद्वानों के मत में मीरा के सच्चे पद केवल फुटकर पद हैं।
- भाषा राजस्थानी है, कहीं-कहीं ब्रज के शब्द; पदों पर हठ योग का असर भी दिखता है।
13. समान बाई व कवयित्रियाँ
समान बाई (1825–1885 ई.)
- उपनाम ➜ “मत्स्य की मीरां”
- जन्म ➜ सियाली गाँव (तिजारा क्षेत्र)
- पिता ➜ नामी राजस्थानी कवि रामनाथ कविया
रचनाएँ — ईश महिमा, राधिका शरीरोपमा, श्रीकृष्णोपमा, पतित पत्रोपमा, पति शतक।
कृष्णदास पयहारी
रचनाएँ — ब्रह्म गीता, प्रेम सत्व निरूप, जुगलमैन चरित।
प्रताप कुँवरी बाई
प्रमुख रचनाएँ — ज्ञान सागर, ज्ञान प्रकाश, प्रताप पच्चीसी, हरिजस, रामचन्द्र नाममहिमा, श्री रामचन्द्र विनय।
14. संतों की अन्य रचनाएँ
| रचना | रचनाकार |
|---|---|
| कीर्तन माला ग्रन्थ | गवरी बाई (डूँगरपुर) |
| प्रेम विनोद | छत्र कुँवरी [परीक्षा: कृषि अधिकारी 2021 — “प्रेम विनोद” ग्रन्थ किसकी रचना है? ➜ छत्र कुँवरी] |
| परशुराम सागर | आचार्य परशुराम देव |
| ध्यान मंजरी / रामध्यान मंजरी | अग्रदास |
15. लौकिक काव्य — प्रेमाख्यान
मध्यकाल की प्रेम-कथाओं में से ज़्यादातर के कवि अज्ञात हैं; थोड़ी-सी रचनाओं पर कवि का नाम मिल जाता है। सभी दोहों और सोरठों के रूप में कही गई हैं।
| कृति | रचनाकार | दोहे / ख़ास |
|---|---|---|
| माधवानल कामकंदला प्रबन्ध | गणपति | 2500 दोहे |
| बुद्धि रासो (16वीं सदी) | देखें — अन्य साहित्यकार अध्याय | चम्पावती के राजकुमार और वेश्या-पुत्री की प्रेम-कथा |
| माधवानल कामकंदला चउपई | कुशललाभ | — |
| माधवानल कथा (17वीं सदी) | दामोदर | — |
16. माधवानल व बुद्धि रासो
- माधवानल कामकंदला प्रबन्ध ➜ रचयिता गणपति; माधव-कामकंदला की प्रेम-कथा काव्य-शैली में 2500 दोहों में कही गई है, और विरह बारहमासा के रूप में दिखाया गया है।
- बुद्धि रासो (16वीं सदी) — रचनाकार का नाम अन्य साहित्यकार अध्याय की सूची में; चम्पावती के राजकुमार और वेश्या की पुत्री की प्रेम-कथा; भाषा अपभ्रंश मिली राजस्थानी।
- माधवानल कामकंदला चउपई ➜ कवि कुशललाभ।
17. ढोला मारू रा दूहा
- रचनाकार और रचनाकाल को लेकर विद्वानों में मतभेद है।
- वि.सं. 1617 में जैन कवि कुशललाभ ने इसके इधर-उधर बिखरे दोहे समेटे और उन्हें “ढोला मरवण री चौपई” के रूप में पेश किया।
- विशुद्ध प्रेमाख्यान ➜ दोहों में ढोला-मारवणी की प्रेम-कहानी; इसे जातीय काव्य तथा लोकभाषा काव्य की पदवी भी दी जाती है।
लोक में कहावत चलती है —
ढोला–मारवणी का विवाह
- पूगल का राजा पिंगल और नरवर का राजा नल
- पूगल में अकाल पड़ा
- पिंगल का परिवार पुष्कर में नल से मिला
18. जेठवा, नागजी, सेणी, सोरठ, जलाल
| प्रेमाख्यान | कथा-वस्तु | दोहे |
|---|---|---|
| जेठवा रा सोरठा | उजळी और जेठवा की प्रेमकथा; जातीय बंधन के कारण विवाह न हो सका, उजळी का सच्चा वियोग सोरठों में प्रकट | — |
| नागजी नागमती | नागजी और नागमती का प्रेमाख्यान | 50 |
| सेणी बीजानंद | लोक में प्रचलित प्रेमाख्यान | 81 |
सार — मध्यकाल के प्रेमाख्यान दोहों और सोरठों में ही लिखे मिलते हैं; जेठवा रा सोरठा में सोरठों के माध्यम से उजळी का वियोग चित्रित है।
19. लोक साहित्य
लोक साहित्य का भंडार असीमित है और उसकी परम्परा मौखिक रही। इसे किसी एक व्यक्ति ने नहीं रचा — पूरा समाज और लोक ही इसका रचनाकार है।
- लोकगीत
- पवाड़ा
- लोक कथाएँ
20. लोकगीत
लोकगीतों में लोक-भावनाएँ स्वाभाविक रूप में दिखती हैं। इन्हें दो भागों में बाँटा जाता है।
| वर्ग | क्या आता है |
|---|---|
| धार्मिक गीत | संस्कारों के गीत, देवी-देवताओं के गीत, व्रत के गीत; साथ ही लोकवाणी के रूप में हरजस और सबद |
| मनोरंजनात्मक गीत | त्योहार, खेल, ऋतु और मानव-जीवन के सरस प्रसंग; गणगौर, तीज, दीपावली, होली के गीत भी |
21. पवाड़ा (लोकगाथा)
- पवाड़ा शब्द संस्कृत के “प्रवाद” से बना है; विद्वान इसे लोकगाथा भी कहते हैं, और कथानक लम्बा होने से कुछ लोग झीड़ा भी।
- विशेषताएँ ➜ रचयिता अज्ञात, कोई प्रामाणिक मूल पाठ नहीं, कथा के साथ संगीत-नृत्य जुड़े, मौखिक चलन, बहुत लम्बी कथा।
| पवाड़ा | ख़ास बात |
|---|---|
| पाबूजी रा पवाड़ा | पवाड़ों की संख्या 52 मानी जाती है |
| बगड़ावत | बगड़ावतों के पवाड़ों का रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत ने सम्पादन किया — शीर्षक “देवनारायण की गाथा” |
| निहालदे–सुल्तान रा बावन पवाड़ा | जोगी सारंगी पर गाते हैं; डॉ. कन्हैयालाल सहल ने एक जोगी से सुनकर इस लोक-महाकाव्य को ग्रन्थ-रूप में लिखा |
22. लोक कथाएँ (बात)
- राजस्थानी में लोककथा का नाम “बात” है।
- इनमें वीरता, प्रेम, हास्य, नीति आदि का असरदार चित्र है।
- वीरता-प्रधान लोककथाएँ सबसे ज़्यादा मिलती हैं।
23. ख्याल (लोक नाटक)
- ख्याल चार कलाओं का संगम है — काव्य, अभिनय, संगीत और नृत्य।
- प्रस्तुति मुख्यतः गायन से होती है; बीच के संवाद गद्य में बोले जाते हैं।
- अगरचंद नाहटा का अनुमान है कि राजस्थान में लिखे हुए ख्याल 19वीं सदी के बीच या 20वीं के शुरू में फैले।
24. लोकोक्ति व पहेलियाँ
- बोलचाल और लिखाई में पहेलियाँ बराबर काम आती हैं।
- राजस्थानी कहावतों का संग्रह और सम्पादन — प्रो. नरोत्तमदास स्वामी और डॉ. कन्हैयालाल सहल ने किया।
- इस विषय का पहला व अहम शोध-प्रबन्ध डॉ. सहल का “राजस्थानी कहावतें : एक अध्ययन” है।
25. रैपिड फायर तथ्य
- जम्भसंहिता ➜ जाम्भोजी की रचना; विश्नोई समाज इसे पाँचवाँ वेद कहता है
- सिंभूधड़ा व कोंडा ग्रन्थ ➜ जसनाथी सम्प्रदाय के उपदेश (JEN 2020 में पूछा गया)
- निरंजनी सम्प्रदाय ➜ प्रवर्तक हरिदास महाराज; ग्रन्थ मंत्र राजप्रकाश और हरिपुरुष जी की वाणी
- बनानाथ ➜ नाथ सम्प्रदाय के कवि; रचनाएँ अनुभव प्रकास और परवाना
- दादूपंथ के संकलन ➜ हरड़ेवाणी में 189 पद, अंगवधू में 276 पद
- चरणदासी पंथ ➜ दया बाई की रचना दयाबोध, सहजो बाई की सहज प्रकाश
- प्रेम विनोद ➜ छत्र कुँवरी की रचना (कृषि अधिकारी 2021 में पूछा गया)
- माधवानल कामकंदला प्रबन्ध ➜ रचयिता गणपति; 2500 दोहे
- समान बाई ➜ उपनाम «मत्स्य की मीरां»; पिता रामनाथ कविया
अगले भाग में राजस्थानी शब्दावली — खेती के काम, औज़ार और सिंचाई से लेकर रसोई, पशुओं के साज़, विवाह की रस्मों और पारम्परिक खेलों तक के शब्द।
पिछला भाग: अन्य साहित्यकार व कृतियाँ: ग्रन्थ-वर्ग — राजस्थान पर लिखे
अगला भाग: राजस्थानी शब्दावली: खेत व खेती
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