आदिवासी समाज की पहचान उसके देवताओं, विवाह के ढंग, पहनावे और मेलों से होती है, और परीक्षा इन्हीं छोटी-छोटी जोड़ियों से सवाल बनाती है। इस भाग में भील जनजाति की आस्था, विवाह के प्रकार, वेशभूषा, त्योहार, ढोल और मेले हैं, फिर गरासिया की संख्या, वर्ग, परम्पराएँ, शब्दावली, विवाह के सात प्रकार और मेले, और अंत में सहरिया का नाम, दर्जा और परम्पराएँ। जहाँ पिछली परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम साथ में लिखा गया है।
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1. आस्था, टोटम और रस्में
| देवी-देवता / मान्यता | विशेष |
|---|---|
| केसरियानाथ (ऋषभदेव) | भील इन्हें कालाजी / काला बावजी कहते हैं |
| होवण माता | प्राकृतिक आपदा से बचाव के लिए पूजी जाती हैं |
| खोडियाल माता | अपंग और विकलांग भीलों की मान्य देवी |
| भराड़ी | भीलों की लोकदेवी — विवाह के समय दीवार पर इसका चित्र बनता है |
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धार्मिक-सामाजिक पद और रस्में
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| भगत | भीलों के धार्मिक संस्कार कराने वाला व्यक्ति |
| वील / विला | भीलों का पुजारी |
| गांसड़े / जोगी | मृत्यु-संस्कार पूरे कराके दान-दक्षिणा पाने वाला व्यक्ति |
| डाम | भीलों की रोगोपचार पद्धति |
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ट्रिक: होवण = प्रकोप से बचाने वाली; खोडियाल = अपंगों की माता; भराड़ी = दीवार पर बनने वाली विवाह की देवी।
2. विवाह के प्रकार
| विवाह का रूप | कैसे होता है |
|---|---|
| हरण विवाह | लड़का लड़की को भगा / अपहरण कर विवाह करता है; इस हाल में उसे दापा चुकाना पड़ता है |
| परीवीक्षा विवाह | लड़का वीरता और साहस दिखाकर लड़की के पिता को प्रसन्न करता है, तब विवाह होता है |
| सेवा विवाह | लड़का होने वाले सास-ससुर के घर रहकर सेवा-टहल करता है |
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ट्रिक: पाँच रूप — हरण, परीवीक्षा, सेवा, हठ, हाथीवैडो → “ह-प-से-ह-हा“।
विवाह से जुड़े शब्द
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| दापा | भगाकर लाई गई लड़की के बदले लड़के द्वारा लड़की के पिता को दी जाने वाली रकम (वधू-मूल्य) |
| नतारा प्रथा | विधवा स्त्री का पुनर्विवाह |
| छेड़ा फाड़ना | तलाक देने का तरीका; प्रायः गाँव के मुखिया की मौजूदगी में |
ध्यान दें: छेड़ा फाड़ना मीणा और भील दोनों में है — दोनों जगह गमछे / कपड़े का टुकड़ा फाड़ना अलगाव का प्रतीक है।
3. वस्त्र व वेशभूषा
पुरुषों के वस्त्र
| वस्त्र | क्या है |
|---|---|
| खोयतु | लंगोटिया भील पुरुषों की कमर की लंगोटी |
| ठेपाड़ा / ढेपाड़ा | तंग धोती |
| फेंटा | सिर पर लपेटा जाने वाला लाल / पीला / केसरिया साफ़ा |
स्त्रियों के वस्त्र और गहने
| वस्त्र | क्या है |
|---|---|
| सिन्दूरी | लाल रंग की साड़ी |
| पिरिया | विवाह के समय दुल्हन का पीला लहँगा |
| कछाबू | घुटनों तक का घाघरा |
ध्यान दें: पुरुष — फेंटा (रंगीन) और पोत्या (सफ़ेद) दोनों सिर के साफ़े हैं; स्त्री — सिन्दूरी साड़ी, पिरिया दुल्हन का पीला लहँगा।
4. त्योहार, नृत्य, ढोल व मेले
- मुख्य त्योहार होली है; होली पर गैर नृत्य होता है।
- हाथीमना नृत्य ➜ विवाह पर भील पुरुष घुटने टेककर तलवार घुमाते हुए नाचते हैं।
- लोकनाट्य गवरी / राई भीलों की पहचान है; कनजारा-खाड़लिया का भूत भी इनके प्रसिद्ध लोकनाट्य-प्रसंग हैं।
ढोल — हर थाप का संदेश
| ढोल | कब बजता है |
|---|---|
| वेवाल ढोल | रोग या महामारी की चेतावनी देने के लिए |
| गारिया और बारी ढोल | दुर्घटना या हमले की चेतावनी देने के लिए |
| नाचनिया ढोल | शादी और अन्य मांगलिक कामों में |
दो मेले
| मेला | स्थान | ब्योरा |
|---|---|---|
| बेणेश्वर मेला | नवाटापरा, साबला तहसील, डूँगरपुर | माघ पूर्णिमा को माही, सोम और जाखम के मिलन-स्थल पर; “आदिवासियों का कुम्भ” [परीक्षा: CET Graduation, 2024 — राजस्थान का कौन-सा मेला आदिवासियों (जनजातियों) का “कुम्भ” कहलाता है? ➜ बेणेश्वर मेला] |
| घोटिया अम्बा मेला | बाँसवाड़ा | घोटिया अम्बा नामक स्थान पर भरता है |
5. संख्या, क्षेत्र और वर्ग
- राज्य में स्थान ➜ तीसरा
- कुल आबादी ➜ 3,14,194
- जनजातियों में हिस्सा ➜ लगभग 3.4%
| ज़िला | गरासिया | मुख्य इलाक़े |
|---|---|---|
| सिरोही | 1,52,575 — सबसे ज़्यादा | आबू और पिण्डवाड़ा |
| उदयपुर | 1,03,847 | कोटड़ा और गोगुन्दा |
| पाली | 49,465 | बाली क्षेत्र |
कर्नल टॉड ने “गरासिया” शब्द को गवास (सर्वेन्ट, यानी सेवक) से निकला माना है।
समुदाय के दो वर्ग
| वर्ग | पहचान |
|---|---|
| भील गरासिया | गरासिया पुरुष ने किसी भील स्त्री से विवाह किया हो |
| गमेती गरासिया | भील पुरुष ने गरासिया स्त्री से विवाह किया हो |
सामाजिक हैसियत के तीन वर्ग
| वर्ग | दर्जा |
|---|---|
| मोटी नियात | सबसे ऊँचा |
| नेनकी नियात | मध्यम |
| निचली नियात | निम्न |
6. सामाजिक परम्पराएँ
परिवार और विवाह-संबंधी चलन
- बहुत पत्नियाँ रखना सम्पन्नता की निशानी माना जाता है।
- जीवनसाथी मेले में चुना जाता है; प्रेम विवाह का चलन बहुत है।
- परिवार प्रायः एकल होते हैं — शादी के बाद बेटा अपना अलग घर बसा लेता है।
आस्था और रस्में
- नक्की झील को पवित्र मानकर उसी में पूर्वजों की अस्थियाँ प्रवाहित करते हैं।
- मोर आदर्श पक्षी है और सफ़ेद पशु पवित्र।
- अन्तिम संस्कार मृत्यु के 12वें दिन होता है।
जीविका, त्योहार और पहनावा
- मुख्य व्यवसाय पशुपालन और खेती।
- प्रमुख त्योहार गणगौर और होली।
- अविवाहित कन्याएँ लाख की चूड़ियाँ और ब्याहता स्त्रियाँ हाथीदाँत की चूड़ियाँ पहनती हैं।
7. शब्दावली व नृत्य
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| घेर | गरासिया का घर |
| मेरी | घेर के सामने लकड़ी के खम्भों पर बना मकान |
| मांड | मेरी के ऊपर बना अतिथिगृह |
| फालिया | गाँव की सबसे छोटी इकाई — एक गोत्र के लोग यहाँ रहते हैं |
प्रमुख नृत्य
8. विवाह के सात प्रकार
| विवाह | कैसे होता है |
|---|---|
| मोरबंधिया | दूल्हा-दुल्हन के मौड़ (सिर का मुकुट) बाँधकर फेरे लिए जाते हैं |
| पहरावणा | नाममात्र के फेरे; ब्राह्मण की ज़रूरत नहीं पड़ती |
| ताणना | न सगाई, न फेरे — वर पक्ष पंचों द्वारा तय रकम चुकाकर वधू को ले जाता है |
| मेलेबो | विवाह का ख़र्च बचाने के लिए दुल्हन को दूल्हे के घर छोड़ दिया जाता है |
9. प्रमुख मेले
| मेला | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| सियावा का गौर मेला | सिरोही | गरासियों का सबसे बड़ा मेला; इसे मनखारो मेला भी कहते हैं |
| कोटेश्वर मेला | अम्बाजी (गुजरात) | यह गुजरात में लगता है |
| चैत्र-विचित्र मेला | देलवाड़ा के पास (सिरोही) | — |
10. नाम, दर्जा और संख्या
- कुछ विद्वान “सहरिया” को फ़ारसी शब्द “सहर” से बना मानते हैं, जिसका अर्थ जंगल है।
- भारत सरकार की आदिम जनजाति समूह (PTG) सूची में राजस्थान की इकलौती जनजाति सहरिया है।
- इनके गोत्र चौहान, डोडिया आदि हैं।
| ज़िला | सहरिया | ब्योरा |
|---|---|---|
| बाराँ | 1,08,520 | सबसे ज़्यादा — शाहबाद और किशनगंज तहसीलों में |
| कोटा | 1,447 | थोड़ी संख्या |
| झालावाड़ | 551 | थोड़ी संख्या |
11. सामाजिक व धार्मिक परम्पराएँ
- कुलदेवी ➜ कोडिया माता
- प्रिय लोकदेवता ➜ तेजाजी
- आदि गुरु ➜ वाल्मीकि
समाज और विवाह
- सहरिया कभी भीख नहीं माँगते।
- परिवार का मुखिया पुरुष; बहुपत्नी और विधवा पुनर्विवाह का चलन।
- मुख्य पेशा वन-उपज इकट्ठी करके बेचना और शिकार — शिकार में ये माहिर होते हैं।
- विवाह पर दापा (वधू-मूल्य) चलता है और नाता करते समय झगड़ा राशि दी जाती है।
आस्था
- तंत्र-मंत्र के साथ देवी-देवताओं (मेरू भवानी) को मानते हैं और भेंट चढ़ाते हैं।
- दुर्गा माता के भक्त हैं; मृतक का श्राद्ध करने की परम्परा नहीं।
- हर सहराने के बाहर तेजाजी का थान होता है; उनका मेला सहरियों के मेलों में दूसरे नंबर पर आता है।
रिवीजन पॉइंटर्स
- भराड़ी भीलों की लोकदेवी है, जिसे विवाह के समय दीवार पर उकेरा जाता है।
- भील केसरियानाथ (ऋषभदेव) को कालाजी / काला बावजी कहते हैं; खोडियाल माता अपंगों की और होवण माता प्राकृतिक आपदा से बचाव की देवी हैं।
- भीलों में विवाह के पाँच रूप हैं — हरण, परीवीक्षा, सेवा, हठ और हाथीवैडो; भगाकर विवाह करने पर लड़के को दापा चुकाना पड़ता है।
- बेणेश्वर मेला (नवाटापरा, डूँगरपुर) माघ पूर्णिमा को माही, सोम और जाखम के संगम पर भरता है और «आदिवासियों का कुम्भ» कहलाता है।
- गरासिया संख्या में तीसरी जनजाति हैं (3,14,194), और सबसे ज़्यादा गरासिया सिरोही में (1,52,575) बसे हैं।
- भील गरासिया वे हैं जहाँ गरासिया पुरुष ने भील स्त्री से विवाह किया; भील पुरुष और गरासिया स्त्री की संतान गमेती गरासिया कहलाती है।
- गरासिया नक्की झील में पूर्वजों की अस्थियाँ प्रवाहित करते हैं; उनका आदर्श पक्षी मोर और प्रमुख त्योहार गणगौर व होली हैं।
- सियावा का गौर मेला (सिरोही) गरासियों का सबसे बड़ा मेला है, जिसे मनखारो मेला भी कहते हैं।
- सहरिया भारत सरकार की PTG सूची में राजस्थान की इकलौती जनजाति हैं; कुलदेवी कोडिया माता और आदि गुरु वाल्मीकि हैं।
अगले भाग में बाराँ की सहरिया जनजाति के मृत्यु के संस्कार, बस्ती-पंचायत और मेले, फिर डामोर, कथौड़ी, सांसी और कंजर का परिचय।
पिछला भाग: राजस्थान की जनजातियाँ: मीणा जनजाति एवं भील जनजाति (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान की जनजातियाँ: सहरिया जनजाति एवं डामोर, कथौड़ी, सांसी, कंजर
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