राजस्थान की जनजातियाँ: सहरिया जनजाति एवं डामोर, कथौड़ी, सांसी, कंजर – Rajasthan Art and Culture Chapter 55

सहरिया जनजाति का दूसरा भाग तथा डामोर, कथौड़ी, सांसी और कंजर की पहचान, शब्द और संस्थाएँ।

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In this chapter (11 sections)
  1. मृत्यु के चार संस्कार
  2. बस्ती, पंचायत और विकास
  3. मेले, त्योहार और गीत
  4. डामोर
  5. कथौड़ी
  6. सांसी
  7. कंजर
  8. एक बात, अलग नाम
  9. आदिवासी क्षेत्रों के साझा शब्द
  10. विकास की संस्थाएँ
  11. रैपिड फायर तथ्य

छोटी जनजातियों के प्रश्न प्रायः किसी एक पहचान-चिह्न पर टिके होते हैं — कथौड़ी का कत्था, कंजर के घरों में किवाड़ न होना, डामोर की सीमलवाड़ा पंचायत समिति। इस भाग में सहरिया के मृत्यु-संस्कार, बस्ती, पंचायत, विकास कार्यक्रम और मेले हैं, फिर डामोर, कथौड़ी, सांसी और कंजर, पाँच जनजातियों के शब्दों की तुलना, साझा शब्द और विकास की संस्थाएँ। सांसी और कंजर जनजाति नहीं, अनुसूचित जाति वर्ग में आती हैं, यह भेद अलग से याद रखें।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान की जनजातियाँ, 8 चॉक-बोर्ड चित्र, 14 नक्शे, 5 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 15 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. मृत्यु के चार संस्कार

संस्कारक्या होता है
1. दाह क्रियाशव का दाह अपने खेत या बाड़े में होता है और स्मृति में वहीं चबूतरा बना देते हैं। शव जिस अर्थी (ठठरी / बैकुण्ठी) पर रखा जाए, उसका नाम सणिति है
2. बेलपत्ती / धारी संस्कारअस्थियाँ-राख उठाने की रस्म — “छारी उठाना”। अस्थियाँ और राख तीसरे दिन की रात आँगन में रख दी जाती हैं; माना जाता है कि राख में जिस जीव के पद-चिह्न बनें, मृतक उसी योनि में जन्म लेता है। फिर अस्थि-राख को कपिलधारा में बहा दिया जाता है
3. नवमी की रस्ममरण के नौवें दिन परिजनों का मुंडन (बाल उतारना) होता है

ध्यान दें: पुरुष → 12वाँ, स्त्री → 11वाँ (खर्च)। पद-चिह्न वाली मान्यता तीसरे दिन की रात की है।

2. बस्ती, पंचायत और विकास

शब्दमतलब
टापरीघास-फूस और बाँस से बना घर
सहरानासहरियों की बस्ती
सहरोलसहरिया जनजाति के गाँव
गोफना / कोरूआ / टोपावनों में रहने वाले सहरिया पेड़ों और बल्लियों पर मचान जैसी झोपड़ी बनाते हैं

… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

पंचायत के तीन स्तर

  • पंचताई ➜ 5 गाँवों की; एकादसिया — 11 गाँवों की; चौरासिया — 84 गाँवों की।
  • झगड़ा न सुलझे तो चौरासिया पंचायत जो तय करे, वही अंतिम माना जाता है।

पहनावा

  • पुरुष ➜ पंछा (धोती), सलूका (अंगरखी) और सिर पर खपटा (साफ़ा)।
  • महिलाएँ ➜ साड़ी और लूगड़ा।

सहरिया विकास कार्यक्रम

यह कार्यक्रम 1977-78 में बाराँ की शाहबाद और किशनगंज पंचायत समितियों के 445 गाँवों में सहरियों के हर तरह के विकास के लिए चलाया गया।

ट्रिक: पंचायत — 5 → 11 → 84: पंचताई, एकादसिया, चौरासिया। मीणाओं की चौरासी भी 84 गाँवों की है।

3. मेले, त्योहार और गीत

मेलास्थानब्योरा
सीताबाड़ी मेलाकेलवाड़ा, बाराँज्येष्ठ अमावस्या को; “सहरिया जनजाति का कुम्भ”। यहाँ वाल्मीकि आश्रम और वाल्मीकि मन्दिर सहरियों का तीर्थ है
कपिलधारा मेलाबाराँकार्तिक पूर्णिमा को भरता है
तेजाजी का मेला—सहरियों के मेलों में दूसरे क्रम का
अवसरक्या होता है
मकर संक्रांतिलकड़ी के डंडों से लेंगी खेली जाती है
दीपावलीहीड़ गाए जाते हैं
वर्षा ऋतुलेहंगी और आल्हा गीत गाए जाते हैं

4. डामोर

  • असल में गुजरात से आई जनजाति है, इसलिए बोली में गुजराती की छाप दिखती है।
  • राज्य में कुल डामोर 91,463; इन्हें “डामोरिया” भी कहते हैं।
  • सबसे ज़्यादा डूँगरपुर की सीमलवाड़ा पंचायत समिति में बसे हैं।

रीति-रिवाज़

  • पुरुष भी स्त्रियों की तरह गहने पहनते हैं।
  • नाता प्रथा, नातरा (विधवा विवाह), बहुविवाह, तलाक और दापा (वधू-मूल्य) — सब चलते हैं।
  • मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन; अंधविश्वासी होने से जादू-टोने और भूत-प्रेत में विश्वास।
शब्दमतलब
फलागाँव की छोटी इकाई
मुखीगाँव का मुखिया
मेलास्थान
ग्यारस की रेवाड़ीडूँगरपुर
छैला बावजी का मेलापंचमहल (गुजरात)

ध्यान दें: डामोर = सीमलवाड़ा (डूँगरपुर); मेले रेवाड़ी और छैला बावजी। परीक्षा में इन दोनों मेलों का जवाब “डामोर” होता है।

5. कथौड़ी

  • मूल रूप से महाराष्ट्र से आई जनजाति।
  • कत्था बनाने में निपुण होने से नाम पड़ा कथौड़ी।
  • आज खैर वृक्ष की कटाई पर रोक है, इसलिए ये अपना मूल काम छोड़कर दूसरी छोटी वन-उपज बेचकर गुज़ारा करते हैं।

उदयपुर ज़िले में भी सबसे ज़्यादा कथौड़ी झाड़ोल, कोटड़ा और सलूम्बर ज़िले की सराड़ा पंचायत समिति में हैं।

ख़ास शब्द और चलन

शब्दमतलब
खोलराघास-फूस और बाँस से बनी झोंपड़ी
नायककथौड़ी समाज का मुखिया
फड़काकथौड़ी स्त्रियों की मराठी अंदाज़ की साड़ी
  • माँसाहारी जनजाति — बंदर का माँस पसंद करते हैं।
  • स्त्री-पुरुष दोनों शराब पीते हैं; सामान्यतः दूध नहीं लेते।
  • प्रमुख नृत्य मावलिया और होली नृत्य।

6. सांसी

  • मान्यता है कि यह वंश सांसमल नाम के पूर्वज से चला।
  • राज्य में सबसे ज़्यादा भरतपुर, डीग और झुंझुनूँ में बसे हैं।
  • अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में आती है — जनजाति नहीं।

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

विवाह के चलन

चलनमतलब
नारियल की गिरीरिश्ता पक्का करने के लिए नारियल की गिरी दी जाती है
कुकड़ी की रस्मशादी के समय लड़की की चारित्रिक पवित्रता की परीक्षा लेना
अन्तर्गोत्र विवाहनहीं होता

ध्यान दें: सांसी में कुकड़ी की रस्म और नारियल की गिरी — दोनों विवाह से जुड़ी हैं; कंजर में रस्म पाती माँगना अपराध से जुड़ी है।

7. कंजर

  • यह जाति भी अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में आती है।
  • 2011 में राज्य में कुल कंजर केवल 53,816।
  • नाम “काननचार” शब्द से आया माना जाता है, यानी वन में घूमने-फिरने वाला।

रीति-रिवाज़

चलन / शब्दमतलब
किवाड़ नहींअपराध के लिए बदनाम होने से ये घरों के दरवाज़े-खिड़की में किवाड़ नहीं लगाते
पाती माँगनाअपराध के लिए निकलने से पहले ईश्वर का आशीर्वाद लेना
हाकम राजा का प्यालाइसे पीने के बाद कंजर कभी झूठ नहीं बोलते

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • कंजरों को मोर का माँस ख़ास पसंद है।
  • मृतक को दफ़नाते हैं; पहले उसके मुँह में शराब की कुछ बूँदें टपकाई जाती हैं।

आराध्य देवी-देवता

देवतास्थानविशेष
जोगनिया माता—आराध्य देवी
चौथ माताचौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुरकुलदेवी
रक्तंदजी मातासंथूर, बूँदीआराध्य देवी

8. एक बात, अलग नाम

बातभीलगरासियासहरियाडामोरकथौड़ी
घरकू / टापराघेरटापरी—खोलरा
मुखियापालवी (गाँव), गमेती (गाँव-समूह)सहलोतकोतवालमुखीनायक
गाँव / बस्तीफला → पालफालिया → पालसहराना / सहरोलफला—
वधू-मूल्यदापादापादापादापा—

मीणाओं में यही बातें — मुखिया पटेल, मृत्युभोज मौसर, संयुक्त परिवार और नाता।

9. आदिवासी क्षेत्रों के साझा शब्द

शब्दमतलब
महाराज / भगतआदिवासी अपने धर्मगुरु को इस नाम से पुकारते हैं
गोटनमित्रों और सहेलियों का समूह
मेलणीकिसी परिवार में विवाह हो तो उसके पूरे गोत्र के लोग 10-10 किलो मक्का उसके घर पहुँचाते हैं
हलमा / हांडा / हींडाघर बनाना हो, खेती का काम हो या कोई और सहायता — समुदाय के सब लोग मिलकर सहयोग करते हैं

10. विकास की संस्थाएँ

काल / क्रमघटनाविवरण
2 जनवरी 1964माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थानउदयपुर — आदिवासी समाज को आगे बढ़ाने हेतु
1975जनजाति क्षेत्रीय विकास विभागराज्य सरकार द्वारा; अनुसूचित जनजातियों के समेकित सामाजिक-आर्थिक विकास और अनुसूचित क्षेत्र के सर्वांगीण विकास की योजनाएँ बनाना
1976राजस संघ (राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ)उदयपुर — आदिवासियों को कृषि-उपज का उचित मूल्य दिलाना और शोषण से मुक्ति

हमेलो आदिवासियों का लोकानुरंजन मेला है, जिसे माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान आयोजित कराता है; इसका मक़सद आदिवासी कला-संस्कृति को बचाए रखना है।

11. रैपिड फायर तथ्य

  • सहरिया पंचायत के तीन स्तर ➜ पंचताई (5 गाँव), एकादसिया (11 गाँव), चौरासिया (84 गाँव)
  • सहरिया जनजाति का कुम्भ ➜ सीताबाड़ी मेला (केलवाड़ा, बाराँ)
  • सहरिया विकास कार्यक्रम ➜ 1977-78 में शाहबाद और किशनगंज के 445 गाँवों में
  • डामोर ➜ गुजरात से आई जनजाति; कुल 91,463; सबसे ज़्यादा डूँगरपुर की सीमलवाड़ा पंचायत समिति में
  • कथौड़ी ➜ महाराष्ट्र से आई जनजाति; कत्था बनाने से नाम पड़ा; मुखिया को नायक कहते हैं
  • सांसी और कंजर ➜ अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में, जनजाति में नहीं
  • कंजरों की कुलदेवी ➜ चौथ माता (चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर)
  • माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान ➜ 2 जनवरी 1964, उदयपुर
  • राजस संघ ➜ 1976 में उदयपुर में बना

अगले भाग में कुप्रथाओं पर पहली रोक — किस वर्ष, किस रियासत में, किसके प्रयास से — और जौहर, सती तथा स्त्री-प्रथाएँ।

पिछला भाग: राजस्थान की जनजातियाँ: भील जनजाति (भाग 2) एवं गरासिया जनजाति

अगला भाग: राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज: जौहर, सती और स्त्री-प्रथाएँ

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान में जनजातियाँ · राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज

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