छोटी जनजातियों के प्रश्न प्रायः किसी एक पहचान-चिह्न पर टिके होते हैं — कथौड़ी का कत्था, कंजर के घरों में किवाड़ न होना, डामोर की सीमलवाड़ा पंचायत समिति। इस भाग में सहरिया के मृत्यु-संस्कार, बस्ती, पंचायत, विकास कार्यक्रम और मेले हैं, फिर डामोर, कथौड़ी, सांसी और कंजर, पाँच जनजातियों के शब्दों की तुलना, साझा शब्द और विकास की संस्थाएँ। सांसी और कंजर जनजाति नहीं, अनुसूचित जाति वर्ग में आती हैं, यह भेद अलग से याद रखें।
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1. मृत्यु के चार संस्कार
| संस्कार | क्या होता है |
|---|---|
| 1. दाह क्रिया | शव का दाह अपने खेत या बाड़े में होता है और स्मृति में वहीं चबूतरा बना देते हैं। शव जिस अर्थी (ठठरी / बैकुण्ठी) पर रखा जाए, उसका नाम सणिति है |
| 2. बेलपत्ती / धारी संस्कार | अस्थियाँ-राख उठाने की रस्म — “छारी उठाना”। अस्थियाँ और राख तीसरे दिन की रात आँगन में रख दी जाती हैं; माना जाता है कि राख में जिस जीव के पद-चिह्न बनें, मृतक उसी योनि में जन्म लेता है। फिर अस्थि-राख को कपिलधारा में बहा दिया जाता है |
| 3. नवमी की रस्म | मरण के नौवें दिन परिजनों का मुंडन (बाल उतारना) होता है |
ध्यान दें: पुरुष → 12वाँ, स्त्री → 11वाँ (खर्च)। पद-चिह्न वाली मान्यता तीसरे दिन की रात की है।
2. बस्ती, पंचायत और विकास
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| टापरी | घास-फूस और बाँस से बना घर |
| सहराना | सहरियों की बस्ती |
| सहरोल | सहरिया जनजाति के गाँव |
| गोफना / कोरूआ / टोपा | वनों में रहने वाले सहरिया पेड़ों और बल्लियों पर मचान जैसी झोपड़ी बनाते हैं |
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पंचायत के तीन स्तर
- पंचताई ➜ 5 गाँवों की; एकादसिया — 11 गाँवों की; चौरासिया — 84 गाँवों की।
- झगड़ा न सुलझे तो चौरासिया पंचायत जो तय करे, वही अंतिम माना जाता है।
पहनावा
- पुरुष ➜ पंछा (धोती), सलूका (अंगरखी) और सिर पर खपटा (साफ़ा)।
- महिलाएँ ➜ साड़ी और लूगड़ा।
सहरिया विकास कार्यक्रम
यह कार्यक्रम 1977-78 में बाराँ की शाहबाद और किशनगंज पंचायत समितियों के 445 गाँवों में सहरियों के हर तरह के विकास के लिए चलाया गया।
ट्रिक: पंचायत — 5 → 11 → 84: पंचताई, एकादसिया, चौरासिया। मीणाओं की चौरासी भी 84 गाँवों की है।
3. मेले, त्योहार और गीत
| मेला | स्थान | ब्योरा |
|---|---|---|
| सीताबाड़ी मेला | केलवाड़ा, बाराँ | ज्येष्ठ अमावस्या को; “सहरिया जनजाति का कुम्भ”। यहाँ वाल्मीकि आश्रम और वाल्मीकि मन्दिर सहरियों का तीर्थ है |
| कपिलधारा मेला | बाराँ | कार्तिक पूर्णिमा को भरता है |
| तेजाजी का मेला | — | सहरियों के मेलों में दूसरे क्रम का |
| अवसर | क्या होता है |
|---|---|
| मकर संक्रांति | लकड़ी के डंडों से लेंगी खेली जाती है |
| दीपावली | हीड़ गाए जाते हैं |
| वर्षा ऋतु | लेहंगी और आल्हा गीत गाए जाते हैं |
4. डामोर
- असल में गुजरात से आई जनजाति है, इसलिए बोली में गुजराती की छाप दिखती है।
- राज्य में कुल डामोर 91,463; इन्हें “डामोरिया” भी कहते हैं।
- सबसे ज़्यादा डूँगरपुर की सीमलवाड़ा पंचायत समिति में बसे हैं।
रीति-रिवाज़
- पुरुष भी स्त्रियों की तरह गहने पहनते हैं।
- नाता प्रथा, नातरा (विधवा विवाह), बहुविवाह, तलाक और दापा (वधू-मूल्य) — सब चलते हैं।
- मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन; अंधविश्वासी होने से जादू-टोने और भूत-प्रेत में विश्वास।
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| फला | गाँव की छोटी इकाई |
| मुखी | गाँव का मुखिया |
| मेला | स्थान |
|---|---|
| ग्यारस की रेवाड़ी | डूँगरपुर |
| छैला बावजी का मेला | पंचमहल (गुजरात) |
ध्यान दें: डामोर = सीमलवाड़ा (डूँगरपुर); मेले रेवाड़ी और छैला बावजी। परीक्षा में इन दोनों मेलों का जवाब “डामोर” होता है।
5. कथौड़ी
- मूल रूप से महाराष्ट्र से आई जनजाति।
- कत्था बनाने में निपुण होने से नाम पड़ा कथौड़ी।
- आज खैर वृक्ष की कटाई पर रोक है, इसलिए ये अपना मूल काम छोड़कर दूसरी छोटी वन-उपज बेचकर गुज़ारा करते हैं।
उदयपुर ज़िले में भी सबसे ज़्यादा कथौड़ी झाड़ोल, कोटड़ा और सलूम्बर ज़िले की सराड़ा पंचायत समिति में हैं।
ख़ास शब्द और चलन
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| खोलरा | घास-फूस और बाँस से बनी झोंपड़ी |
| नायक | कथौड़ी समाज का मुखिया |
| फड़का | कथौड़ी स्त्रियों की मराठी अंदाज़ की साड़ी |
- माँसाहारी जनजाति — बंदर का माँस पसंद करते हैं।
- स्त्री-पुरुष दोनों शराब पीते हैं; सामान्यतः दूध नहीं लेते।
- प्रमुख नृत्य मावलिया और होली नृत्य।
6. सांसी
- मान्यता है कि यह वंश सांसमल नाम के पूर्वज से चला।
- राज्य में सबसे ज़्यादा भरतपुर, डीग और झुंझुनूँ में बसे हैं।
- अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में आती है — जनजाति नहीं।
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विवाह के चलन
| चलन | मतलब |
|---|---|
| नारियल की गिरी | रिश्ता पक्का करने के लिए नारियल की गिरी दी जाती है |
| कुकड़ी की रस्म | शादी के समय लड़की की चारित्रिक पवित्रता की परीक्षा लेना |
| अन्तर्गोत्र विवाह | नहीं होता |
ध्यान दें: सांसी में कुकड़ी की रस्म और नारियल की गिरी — दोनों विवाह से जुड़ी हैं; कंजर में रस्म पाती माँगना अपराध से जुड़ी है।
7. कंजर
- यह जाति भी अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में आती है।
- 2011 में राज्य में कुल कंजर केवल 53,816।
- नाम “काननचार” शब्द से आया माना जाता है, यानी वन में घूमने-फिरने वाला।
रीति-रिवाज़
| चलन / शब्द | मतलब |
|---|---|
| किवाड़ नहीं | अपराध के लिए बदनाम होने से ये घरों के दरवाज़े-खिड़की में किवाड़ नहीं लगाते |
| पाती माँगना | अपराध के लिए निकलने से पहले ईश्वर का आशीर्वाद लेना |
| हाकम राजा का प्याला | इसे पीने के बाद कंजर कभी झूठ नहीं बोलते |
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- कंजरों को मोर का माँस ख़ास पसंद है।
- मृतक को दफ़नाते हैं; पहले उसके मुँह में शराब की कुछ बूँदें टपकाई जाती हैं।
आराध्य देवी-देवता
| देवता | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| जोगनिया माता | — | आराध्य देवी |
| चौथ माता | चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर | कुलदेवी |
| रक्तंदजी माता | संथूर, बूँदी | आराध्य देवी |
8. एक बात, अलग नाम
| बात | भील | गरासिया | सहरिया | डामोर | कथौड़ी |
|---|---|---|---|---|---|
| घर | कू / टापरा | घेर | टापरी | — | खोलरा |
| मुखिया | पालवी (गाँव), गमेती (गाँव-समूह) | सहलोत | कोतवाल | मुखी | नायक |
| गाँव / बस्ती | फला → पाल | फालिया → पाल | सहराना / सहरोल | फला | — |
| वधू-मूल्य | दापा | दापा | दापा | दापा | — |
मीणाओं में यही बातें — मुखिया पटेल, मृत्युभोज मौसर, संयुक्त परिवार और नाता।
9. आदिवासी क्षेत्रों के साझा शब्द
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| महाराज / भगत | आदिवासी अपने धर्मगुरु को इस नाम से पुकारते हैं |
| गोटन | मित्रों और सहेलियों का समूह |
| मेलणी | किसी परिवार में विवाह हो तो उसके पूरे गोत्र के लोग 10-10 किलो मक्का उसके घर पहुँचाते हैं |
| हलमा / हांडा / हींडा | घर बनाना हो, खेती का काम हो या कोई और सहायता — समुदाय के सब लोग मिलकर सहयोग करते हैं |
10. विकास की संस्थाएँ
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 2 जनवरी 1964 | माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान | उदयपुर — आदिवासी समाज को आगे बढ़ाने हेतु |
| 1975 | जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग | राज्य सरकार द्वारा; अनुसूचित जनजातियों के समेकित सामाजिक-आर्थिक विकास और अनुसूचित क्षेत्र के सर्वांगीण विकास की योजनाएँ बनाना |
| 1976 | राजस संघ (राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ) | उदयपुर — आदिवासियों को कृषि-उपज का उचित मूल्य दिलाना और शोषण से मुक्ति |
हमेलो आदिवासियों का लोकानुरंजन मेला है, जिसे माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान आयोजित कराता है; इसका मक़सद आदिवासी कला-संस्कृति को बचाए रखना है।
11. रैपिड फायर तथ्य
- सहरिया पंचायत के तीन स्तर ➜ पंचताई (5 गाँव), एकादसिया (11 गाँव), चौरासिया (84 गाँव)
- सहरिया जनजाति का कुम्भ ➜ सीताबाड़ी मेला (केलवाड़ा, बाराँ)
- सहरिया विकास कार्यक्रम ➜ 1977-78 में शाहबाद और किशनगंज के 445 गाँवों में
- डामोर ➜ गुजरात से आई जनजाति; कुल 91,463; सबसे ज़्यादा डूँगरपुर की सीमलवाड़ा पंचायत समिति में
- कथौड़ी ➜ महाराष्ट्र से आई जनजाति; कत्था बनाने से नाम पड़ा; मुखिया को नायक कहते हैं
- सांसी और कंजर ➜ अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में, जनजाति में नहीं
- कंजरों की कुलदेवी ➜ चौथ माता (चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर)
- माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान ➜ 2 जनवरी 1964, उदयपुर
- राजस संघ ➜ 1976 में उदयपुर में बना
अगले भाग में कुप्रथाओं पर पहली रोक — किस वर्ष, किस रियासत में, किसके प्रयास से — और जौहर, सती तथा स्त्री-प्रथाएँ।
पिछला भाग: राजस्थान की जनजातियाँ: भील जनजाति (भाग 2) एवं गरासिया जनजाति
अगला भाग: राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज: जौहर, सती और स्त्री-प्रथाएँ
इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान में जनजातियाँ · राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज
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