नृत्य का नाम सुनते ही सोचिए कि वह किस इलाके, किस अवसर और किस वाद्य के साथ जुड़ा है — आधे प्रश्न इसी जोड़ी से हल हो जाते हैं। इस भाग में लोकनृत्य और उसके प्रकार, कौन-सा नृत्य कहाँ, फिर मेवाड़, शेखावाटी, जालौर-मारवाड़ और भरतपुर के क्षेत्रीय नृत्य हैं। अंत में डांग, गोगा, थाली, लागुरिया, अग्नि और तेरहताली जैसे धार्मिक नृत्य रखे गए हैं। जिन तथ्यों पर पहले प्रश्न आ चुके हैं, उनके साथ परीक्षा का नाम और वर्ष लिखा है।
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1. लोकनृत्य और उसके प्रकार
आम लोग जब उमंग और आनंद में भरकर अकेले या सब मिलकर नाचते हैं, तो उसे लोकनृत्य कहते हैं। नृत्य जीवन से अलग नहीं, उसका ही हिस्सा है — और भारत के दूसरे राज्यों की तुलना में राजस्थान में लोकनृत्य कहीं ज़्यादा प्रचलित हैं।
देवीलाल सामर का तीन भागों में बँटवारा
- किसने बाँटा ➜ देवीलाल सामर — कलाविद्, जिन्होंने उदयपुर में लोक कला मण्डल खड़ा किया
- आधार ➜ जिस इलाके में नृत्य चलता है उसकी भौगोलिक विशेषताएँ
- तीन वर्ग ➜ पहाड़ी · राजस्थानी · पूर्वी मैदानी
ट्रिक: चार आधार याद रखने की तरकीब — क्षे-धा-व्या-जा (क्षेत्रीय, धार्मिक, व्यावसायिक, जातीय)।
2. कौन-सा नृत्य कहाँ
| स्थान | नृत्य |
|---|---|
| उदयपुर संभाग | भवाई · गवरी (भील) · तलवारों की गैर (मेनार) · गरासियों के गरवा-वालर |
| भीलवाड़ा | घूमर गैर · मांडल का नाहर नृत्य |
| बालोतरा | कनाणा की गैर · लाखेटा की आंगी-बांगी गैर |
| बाड़मेर | कानूड़ा (चौहटन) · मछली नृत्य (बणजारे) |
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3. क्षेत्रीय लोकनृत्य
- मेवाड़ ➜ गैर
- शेखावाटी ➜ गींदड़, चंग/ढप
- जालौर ➜ ढोल
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ट्रिक: ज़्यादातर क्षेत्रीय नृत्य होली के आसपास होते हैं — गैर, गींदड़, चंग, डांडिया, बम, हुरंगा सब फाल्गुन-चैत्र के नृत्य हैं।
4. मेवाड़ के नृत्य
गैर नृत्य
- मेवाड़ और बाड़मेर का प्रसिद्ध नृत्य; होली के अगले दिन से 15 दिन तक चलता है।
- पुरुष हाथ में लकड़ी की छड़ी (खांडा) लेकर गोल घेरे में नाचते हैं — घेरे (गेर) के कारण ही नाम पड़ा और नाचने वाले गैरिये कहलाए।
- वाद्य ➜ ढोल, मांदल, बांकिया, थाली। यह पुरुष-प्रधान नृत्य है।
| प्रसिद्ध गैर | कहाँ की |
|---|---|
| गैर (प्रसिद्ध) | कनाणा गाँव, बालोतरा |
| आंगी-बांगी गैर | लाखेटा, बालोतरा |
| घूमर गैर | भीलवाड़ा — निहाल अजमेरा ने 1970 में शुरू की |
रण नृत्य
मेवाड़ में सरगड़ा जाति के पुरुषों का वीर रस वाला नृत्य — दो आदमी हाथ में तलवार लेकर युद्ध-कौशल दिखाते हुए नाचते हैं।
हरणी / लोवड़ी
दीपावली पर लड़कों की टोली घर-घर घूमकर हरणी (लोवड़ी) गीत गाती है; उस समय जो नृत्य होता है, वह भी इसी नाम से जाना जाता है।
भवाई
उदयपुर क्षेत्र में भवाई जाति का पेशेवर नृत्य — शंकरिया, सूरदास, बोरी/बोटी, ढोकरी, बीकाजी और ढोलामारू जैसे रूपों में प्रसिद्ध। पूरा ब्योरा व्यावसायिक नृत्य शाखा में है।
5. शेखावाटी के नृत्य
| नृत्य | कैसे होता है |
|---|---|
| गींदड़ | होली से पहले एक सप्ताह (डांडा रोपण/प्रह्लाद की स्थापना से होली दहन तक); केवल पुरुष। हाथों में डंडे लेकर आपस में टकराते हैं; नगाड़ा मुख्य वाद्य, साथ में ढोल, डफ, चंग। होली के गीत गाए जाते हैं। |
| चंग / ढप | होली पर पुरुष चंग बजाते हुए पहले गोल चक्कर काटते हैं, फिर घेरे के मध्य में जमा हो धमाल नामक होली-गीतों की तान छेड़ते हैं; धमाल की एक पंक्ति पूरी होते ही नाच फिर शुरू। वेशभूषा — धोती या चूड़ीदार पायजामा, कमीज़; कमर में कमरबंध, पैरों में घुँघरू। |
| ल्हूर | “ल्हूर” का मतलब मीठी खुजली। एक कलाकार अभिनेता और दूसरा अभिनेत्री बनकर अभिनय के साथ नाचते हैं। |
गींदड़ के स्वांग
गींदड़ में कुछ पुरुष महिलाओं की पोशाक पहनकर नाचते हैं — इन्हें गणगौर या मेहरी कहा जाता है। साथ में तरह-तरह के स्वांग भरे जाते हैं।
कच्छीघोड़ी
शेखावाटी का एक और प्रसिद्ध नृत्य — पर यह पेशेवर भी है, इसलिए पूरा विवरण व्यावसायिक नृत्य शाखा में दिया है।
6. जालौर व मारवाड़ के नृत्य
जालौर के नृत्य
| नृत्य | ब्योरा |
|---|---|
| ढोल नृत्य | शुरुआत जालौर से। सरगड़ा, ढोली, माली, भील जाति के पुरुष विवाह पर करते हैं। टोली का मुखिया “थाकना शैली” में ढोल बजाता है; थाकना ख़त्म होते ही कोई मुँह में तलवार दबाकर, कोई हाथ में डंडे लेकर, कोई बाँहों में रूमाल लटकाकर लय में नाचने लगता है। इस नृत्य को जनता तक पहुँचाने में जयनारायण व्यास की भूमिका मानी जाती है। [परीक्षा: वरिष्ठ अध्यापक, 2024 — “थाकना शैली” में कौन-सा नृत्य किया जाता है? ➜ ढोल नृत्य] |
| लूंबर | जालौर का महिला-प्रधान नृत्य, होली पर; पैर की हर चाल के साथ ताली बजती है। |
मारवाड़ के नृत्य
| नृत्य | ब्योरा |
|---|---|
| घुड़ला | जोधपुर का नृत्य, केवल महिलाएँ, चैत्र कृष्ण अष्टमी को, प्रायः रात में। सजी-धजी युवतियाँ सिर पर छेद वाला मटका रखती हैं जिसमें दीपक जलता है। कोमल कोठारी (रूपायन संस्थान, बोरुंदा) ने इसे सबसे ज़्यादा संरक्षण दिया। |
| डांडिया | मारवाड़ में होली के बाद; 20-25 पुरुषों की मंडली हर हाथ में डांडिया थामे गोल चक्कर लगाती है। चौक के केंद्र में शहनाई-नगाड़ा बजाने वाले और गायक बैठे रहते हैं। होली-गीत और लोक-ख्याल गाए जाते हैं — प्रायः बड़ली के भैरूजी का गुणगान। कुछ कलाकार राजा, रानी, साधु, शिव, राम, सीता की वेशभूषा पहनते हैं। |
| झांझी | मारवाड़ की महिलाओं का नृत्य। |
7. भरतपुर के नृत्य
बम (बमरसिया)
- फाल्गुन में नई फसल की ख़ुशी में गाँव की चौपाल पर होता है।
- एक विशाल नगाड़ा (बम) को खड़े होकर दो मोटे डंडों से बजाया जाता है; साथ में थाली, चिमटा, ढोलक।
- बम के साथ रसिया गीत गाए जाते हैं — इसी से नाम बमरसिया। डीग, भरतपुर व अलवर क्षेत्र में, मुख्यतः भरतपुर का नृत्य। [परीक्षा: पशु परिचर, 2024 — नगाड़े के साथ रसिया गायन किस नृत्य से जुड़ा है? ➜ बमरसिया]
चरकुला
भरतपुर इलाके में मुख्यतः स्त्रियाँ करती हैं — सिर पर बैलगाड़ी का पहिया टिकाया जाता है, उस पर दीपक जलते रहते हैं और नर्तकी उसे साधते हुए नाचती है।
हुरंगा
ग्रामीण भरतपुर का स्वांग-नृत्य नाटक — होली के बाद चैत्र कृष्ण पंचमी से अष्टमी तक। स्त्री-पुरुष स्वांग भरकर बम, ढोल और मांट पर सामूहिक नृत्य करते हैं।
8. अन्य ज़िलों के प्रमुख नृत्य
| ज़िला / क्षेत्र | नृत्य | ख़ास बात |
|---|---|---|
| जैसलमेर | हिंडोला | स्त्री-पुरुष मिलकर नाचते हुए पूर्वजों का आह्वान करते हैं |
| बाड़मेर (चौहटन) | कानूड़ा | कृष्ण जन्माष्टमी पर होने वाला युगल नृत्य |
| मेवाड़ व बाड़मेर | गर | दोनों इलाकों का प्रसिद्ध लोकनृत्य |
| झालावाड़ | बिन्दौरी | वीर रस से भरा, युद्ध-कौशल वाला; अब विवाह पर गैर की तरह |
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गरबा — गुजरात और राजस्थान का मेल
डूंगरपुर और बाँसवाड़ा में ज़्यादा चलता है; नवरात्र में माँ दुर्गा की आराधना का सामूहिक नृत्य। तीन रूप —
- शक्ति की आराधना ➜ स्त्रियाँ छेद वाले मिट्टी के घड़े में दीपक जलाकर सिर पर रखती हैं और गोल घूमकर नाचती हैं।
- रास ➜ राधा-कृष्ण और गोप-गोपियों के प्रेम का चित्रण।
- लोक-जीवन के चित्र ➜ पणिहारी, नववधू की भावुकता, घर के काम में लगी स्त्रियाँ।
दो और परम्पराएँ — मेवाड़ में समृद्धि की कामना से स्त्री-पुरुषों का सामूहिक नृत्य; और बाँसवाड़ा तथा आसपास के आदिवासी अंचल का परंपरागत नृत्य, जिसमें महिलाएँ पारंपरिक पोशाक पहनकर हाथों में झांझरी लेती हैं और पुरुष ढोल बजाते हैं।
9. डांग, गोगा, थाली, लागुरिया, अग्नि
| नृत्य | स्थान | ब्योरा |
|---|---|---|
| डांग | नाथद्वारा (राजसमंद) | वल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी करते हैं। नर्तक देवर-भाभी बनकर एक-दूसरे पर रंग डालते हुए नाचते हैं। |
| सांकल / गोगा | गोगामेड़ी, ददरेवा | भक्त गोगाजी के आवेश में आकर अपनी पीठ पर सांकल की मार सहते हैं और ज़ख़्मी भी होते हैं। डेरू वाद्य के साथ; कई बार गले में साँप भी रखते हैं। इसका सबसे चर्चित रूप शेखावाटी में दिखता है। |
| थाली | कोलूमंड (फलोदी) | पाबूजी के भक्त रावणहत्था के साथ करते हैं। फलोदी में सबसे ज़्यादा चलता है। नर्तक अपनी अंगुली की नोक पर थाली नचाते हैं। |
ध्यान दें: गोगा नृत्य के दो रूप याद रखें — सांकल से पीठ पर वार और गले में साँप; वाद्य डेरू।
अग्नि नृत्य
- जसनाथी सम्प्रदाय के जाट सिद्ध रात्रि-जागरण में नगाड़े पर करते हैं; केवल पुरुष।
- उद्गम ➜ कतरियासर गाँव (बीकानेर)।
- अंगारों के ढेर को “धूणा” कहते हैं। नर्तक गुरु के सामने नाचते हुए “फते-फते” और सिद्ध रूस्तमजी का नाम पुकारते हैं।
ध्यान दें: गोगामेड़ी हनुमानगढ़ में और ददरेवा चूरू में है — इसीलिए नक्शे में दोनों हल्के रंग में हैं।
10. तेरहताली
- किसका ➜ कामड़ जाति की बहुएँ
- कब / कहाँ ➜ लोकदेवता रामदेवजी के मेले-उत्सव; पाली, रामदेवरा
- जन्म-स्थान ➜ पादरला गाँव (पाली)
मंजीरों का हिसाब
- दाहिना पाँव — 9
- दोनों कोहनी — 2
- दोनों हाथ — 1+1
प्रमुख कलाकार
1954 में चित्तौड़गढ़ के गाड़िया लुहार सम्मेलन में मांगीबाई ने नेहरू के सामने यह नृत्य प्रस्तुत किया।
11. रैपिड फायर तथ्य
- तीन भौगोलिक वर्ग ➜ पहाड़ी, राजस्थानी, पूर्वी मैदानी (देवीलाल सामर का बँटवारा)
- चार आधार ➜ क्षेत्रीय, धार्मिक, व्यावसायिक, जातीय
- मेवाड़ व बाड़मेर का प्रसिद्ध नृत्य ➜ गैर; पुरुष छड़ी लेकर गोल घेरे में नाचते हैं
- शेखावाटी ➜ गींदड़ (नगाड़ा मुख्य वाद्य) और चंग/ढप
- थाकना शैली ➜ जालौर का ढोल नृत्य (वरिष्ठ अध्यापक 2024)
- केवल महिलाओं का, चैत्र कृष्ण अष्टमी को ➜ घुड़ला (जोधपुर)
- नगाड़े के साथ रसिया गायन ➜ बमरसिया, भरतपुर (पशु परिचर 2024)
- अग्नि नृत्य ➜ जसनाथी सम्प्रदाय के जाट सिद्ध करते हैं; उद्गम कतरियासर (बीकानेर)
- तेरहताली ➜ कामड़ जाति की बहुएँ, रामदेवजी के मेले में; दाहिने पाँव पर 9 मंजीरे
अगले भाग में भील, गरासिया, कालबेलिया जैसी जातियों के अपने नृत्य, पेशेवर नृत्य भवाई व कच्छीघोड़ी, राज्य नृत्य घूमर, कथक और पद्मश्री सम्मान।
पिछला भाग: राजस्थान की लोकदेवियाँ: जोधपुर संभाग (भाग 2) एवं जैसलमेर व बीकानेर
अगला भाग: राजस्थान के लोक नृत्य: जातीय लोकनृत्य
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