इस हिस्से में लगभग हर पंथ के साथ एक तिथि, एक पीठ और एक मेला जुड़ा है, और परीक्षा में अक्सर यही तीनों पूछे जाते हैं। इसलिए इन्हें अलग-अलग नहीं, साथ-साथ याद करना ठीक रहता है। यहाँ श्रीनाथजी की यात्रा और सात स्वरूप, नाथद्वारा और गौड़ीय सम्प्रदाय दिए गए हैं। उसके बाद जसनाथी, विश्नोई और दादू पंथ का जीवन-क्रम, ग्रन्थ और परम्पराएँ आती हैं।
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1. श्रीनाथजी की यात्रा व सात स्वरूप
1669 ई. में औरंगज़ेब ने हिन्दू मंदिर तुड़वाने के आदेश दिए। तब विट्ठलनाथ के पौत्र गोस्वामी दामोदरजी और उनके चाचा गोविन्दजी श्रीनाथजी की प्रतिमा लेकर आश्विन पूर्णिमा (शुक्रवार) को वृन्दावन से निकले।
यात्रा-मार्ग
- कोटा
- पुष्कर
- कृष्णगढ़ (किशनगढ़)
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- गोविन्दजी ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह से बात की और प्रतिमा मेवाड़ लाई गई।
- सिहाड़ में 1671 ई. की फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन पाटोत्सव (प्रतिमा के पधारने का उत्सव) मनाया गया।
- फरवरी 1672 ई. में राजसिंह की अनुमति से सिहाड़ (आज का नाथद्वारा) में प्रतिमा स्थापित कर मंदिर बना।
श्रीनाथजी के सात स्वरूप
विट्ठलनाथजी के 7 पुत्र थे। उनकी पूजा के लिए श्रीनाथजी की अलग-अलग मूर्तियाँ बनीं और 7 मंदिर स्थापित हुए। इन्हें सात स्वरूप कहते हैं।
| क्र. | मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|---|
| 1 | मथुरेश / मथुराधीश | कोटा | वल्लभ सम्प्रदाय की प्रथम पीठ; मूर्ति पहले 1670 में बूँदी, फिर 1744 में दुर्जनशाल के समय कोटा आई |
| 2 | श्रीनाथजी | नाथद्वारा (राजसमंद) | प्रधान पीठ |
| 3 | द्वारकेश / द्वारकाधीश | काँकरोली (राजसमंद) | |
| 4 | गोकुलचन्द्रजी | गोकुल (उत्तर प्रदेश) |
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ट्रिक: राजस्थान में 5 में से — कोटा (1), राजसमंद (2: नाथद्वारा + काँकरोली), डीग (2: कामां)। बाहर के दो — गोकुल और सूरत।
2. नाथद्वारा
- स्थान ➜ नाथद्वारा (राजसमंद) — प्रधान पीठ
- मंदिर बनवाया ➜ महाराणा राजसिंह — 1671–72 ई.
- उपनाम ➜ श्रीनाथजी — सात ध्वजा के स्वामी
अन्नकूट महोत्सव
इसमें 125 मन पके चावलों का विशाल ढेर (पिंड) बनता है, जिसे कूट कहते हैं। बाद में इस कूट को भील लूट ले जाते हैं।
पिछवाई कला
कृष्ण-मंदिरों में प्रतिमा के पीछे की दीवार पर जो चित्रित वस्त्र लगाया जाता है, उसी को पिछवाई कहते हैं। इस पर कृष्ण-लीला के प्रसंग उकेरे जाते हैं। नाथद्वारा की पिछवाई प्रसिद्ध है।
अन्य परम्पराएँ
| नाम | क्या है |
|---|---|
| पाना | श्रीनाथजी का पाना — 24 शृंगारों सहित, सभी पानों में सबसे कलात्मक |
| केले के पत्तों की साँझी | श्राद्ध पक्ष में कमल चौक में बनती है |
| बादशाह की सवारी | धुलण्डी के दिन निकलती है; मार्ग — नाथद्वारा के गुर्जर मोहल्ले में स्थित बादशाह गली |
मान्यता है कि ठोड़ी का हीरा औरंगज़ेब की भेंट था। उसी की याद में एक व्यक्ति नकली दाढ़ी-मूँछ, मुग़ल पोशाक और काजल के साथ पालकी में बैठाया जाता है। हाथ में श्रीनाथजी का चित्र होता है; आगे मंदिर-मंडल का बैण्ड चलता है। ब्रजवासी इस “बादशाह” को गालियाँ देते हैं, और अन्त में वह दाढ़ी से सूरजपोल की सीढ़ियाँ साफ़ करता है।
ट्रिक: तीन कला-शब्द — पिछवाई = मूर्ति के पीछे का चित्रित वस्त्र, पाना = शृंगार दर्शाने वाला चित्र-पट, साँझी = केले के पत्तों की आकृति।
3. गौड़ीय सम्प्रदाय
चैतन्य महाप्रभु (गौरांग), जिनका काल 1485–1533 ई. है, इस पंथ के प्रवर्तक हैं। उन्होंने बंगाल में कृष्ण-भक्ति को आन्दोलन बना दिया, जो आगे सम्प्रदाय बना — बंगाल में इसे चैतन्य सम्प्रदाय कहा गया। इसका दर्शन अचिन्त्य भेदाभेद है। इस धारा की जड़ें माध्वाचार्य (पूर्णप्रज्ञ भाष्य) की परम्परा में हैं; माध्वाचार्य के शिष्य गौड़ स्वामी इसके सबसे बड़े प्रचारक रहे, इसी से नाम गौड़ीय पड़ा।
पंथ का सफ़र
- बंगाल
- वृन्दावन
- जयपुर
- मुख्य पीठ वृन्दावन में है। रूप गोस्वामी से प्रेरित होकर आमेर के मानसिंह प्रथम ने वृन्दावन में गोविन्द देव का मंदिर भी बनवाया, जिसका काम 1593 ई. में पूरा हुआ।
- राजस्थान की प्रमुख पीठ ➜ गोविन्द देवजी मंदिर (सिटी पैलेस, जयपुर); निर्माता सवाई जयसिंह, जिन्होंने इस सम्प्रदाय को सबसे अधिक आश्रय दिया।
कृष्ण के तीन विग्रह
श्रीकृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने माता से सुने कृष्ण-रूप को आधार बनाकर तीन मूर्तियाँ गढ़वाईं। हर विग्रह में कृष्ण के शरीर का एक हिस्सा उनके जैसा माना जाता है।
| मंदिर | स्थान | किसके समान |
|---|---|---|
| गोविन्द देवजी | सिटी पैलेस (चन्द्रमहल के पास), जयपुर | मुख — बिना शिखर का मंदिर |
| गोपीनाथजी | ब्रह्मपुरी (जयपुर) | वक्ष |
| मदनमोहनजी | करौली | चरण |
तीनों में पूजा राधा-कृष्ण के युगल रूप की होती है।
4. जसनाथी सम्प्रदाय
- प्रवर्तक ➜ जसनाथजी (गोरखनाथ के शिष्य)
- जन्म ➜ 1482 ई., देवउठनी ग्यारस (कार्तिक शुक्ल 11)
- माता-पिता ➜ पौष्य पुत्र — हम्मीरजी व रूपादे के; कहा जाता है हम्मीर को डाबला तालाब (बीकानेर) में मिले
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| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1482 | जन्म | देवउठनी ग्यारस; डाबला तालाब से हम्मीरजी को मिले |
| 1500 | जसनाथ-जाम्भोजी भेंट | गोरख मालिया (बीकानेर) में |
| 1504 | सम्प्रदाय की स्थापना | कतरियासर में |
जीवन की बातें
- वे आजीवन ब्रह्मचारी रहे; गोरख मालिया (बीकानेर) में 12 वर्ष तप किया।
- सिकन्दर लोदी ने उन्हें कतरियासर में 500 बीघा भूमि दी और नगाड़ा बजाने की छूट भी।
- उन्होंने ब्रह्म की निर्गुण उपासना पर बल दिया और तांत्रिक लोह पांगल का घमण्ड तोड़ा।
सम्प्रदाय की पहचान
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| नियम | 36 नियम |
| अनुयायी | अधिकतर जाट |
| पवित्र वस्तुएँ | जाल वृक्ष और मोर पंख |
| गले में | काली ऊन का धागा |
अग्नि नृत्य
इस पंथ के कुछ पुरुष अनुयायी दहकते अंगारों पर नृत्य करते हैं और “फतेह-फतेह” तथा “सिद्ध रुस्तमजी” बोलते जाते हैं। इसे सबसे अधिक संरक्षण बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने दिया; आज भी अग्नि नृत्य सबसे ज़्यादा बीकानेर ज़िले में होता है।
मेले और उप-पीठें
कतरियासर में साल में तीन बार मेला लगता है — आश्विन शुक्ल सप्तमी, माघ शुक्ल सप्तमी, चैत्र शुक्ल सप्तमी।
| पाँच उप-पीठ | ज़िला | किसने स्थापित की |
|---|---|---|
| मालासर | बीकानेर | टोडरजी |
| लिखमादेसर | बीकानेर | हाँसोजी |
| पुनरासर | बीकानेर | पालोजी |
5. विश्नोई सम्प्रदाय
- प्रवर्तक ➜ जाम्भोजी / जम्भेश्वर — पँवार (परमार) राजपूत
- जीवनकाल ➜ 1451 – 1536 ई.
- जन्म ➜ पीपासर (नागौर), भाद्रपद कृष्ण अष्टमी
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1451 | जन्म | पीपासर (नागौर) |
| 1483 | गृह-त्याग | माँ-बाप के निधन पर सारी सम्पत्ति दान कर समराथल में सत्संग |
| 1485 | विश्नोई पंथ की स्थापना | समराथल (धोक धोरा), बीकानेर |
शिक्षा और विचार
- वे गोरखनाथ के शिष्य थे; उन्होंने विष्णु को निराकार, गुणों से परे मानकर पूजने पर ज़ोर दिया।
- संसार को गोवलवास (अस्थायी निवास) बताया।
- उनका सूत्र ➜ मन में विष्णु का स्मरण, हाथों से कर्म।
- बनाए 29 नियम और स्वयं पालन किया; 29वाँ नियम — नीले वस्त्र का त्याग।
- भेड़ पालना पसन्द नहीं ➜ भेड़ नए उगे पौधे चर जाती है।
ग्रन्थ
| ग्रन्थ | टिप्पणी |
|---|---|
| शब्दवाणी (जम्भवाणी) | 120 शब्द; उच्चारण-स्थल सांथरी |
| जम्भसागर | |
| जम्भसंहिता | राजस्थानी भाषा में; विश्नोई इसे पाँचवाँ वेद मानते हैं |
तीर्थ और परम्पराएँ
| स्थल | ज़िला | महत्त्व |
|---|---|---|
| समराथल (धोक धोरा) | बीकानेर | पंथ की स्थापना व प्रवचन-स्थल |
| मुकाम | बीकानेर | समाधि-स्थल — प्रमुख धाम; फाल्गुन व आश्विन अमावस्या को मेला — “विश्नोइयों का कुम्भ” |
| जाम्भा गाँव | फलौदी | जम्भेश्वर की प्रेरणा से जैसलमेर नरेश जैतसिंह ने तालाब बनवाया; विश्नोइयों के लिए पुष्कर जैसा पावन तीर्थ |
- पाहल ➜ मंत्रोच्चार से पवित्र किया हुआ जल, जिसे पिलाकर जाम्भोजी लोगों को पंथ में दीक्षित करते थे।
- संत कवि वील्होजी (1532–1616) की रचना कथा जैसलमेर की में जाम्भोजी के छह समकालीन शासकों के उनकी शरण में आने का वर्णन है — सिकन्दर लोदी (दिल्ली), नवा मुहम्मद खाँ (नागौर), राव दूदा (मेड़ता), राव जैतसिंह (जैतसी), सातलदेव राठौड़ (जोधपुर), महाराणा सांगा (मेवाड़)। वील्होजी जोधपुर के रामड़ावास के निवासी और जाम्भोजी के शिष्य थे।
6. दादू पंथ
दादू दयाल को “राजस्थान का कबीर” कहा जाता है (यह उपमा मोतीलाल मेनारिया ने दी)। उनका सम्प्रदाय पहले ब्रह्म सम्प्रदाय, फिर परब्रह्म सम्प्रदाय और अन्त में दादू पंथ कहलाया।
- जन्म ➜ 1544 ई., अहमदाबाद — फाल्गुन शुक्ल अष्टमी
- किंवदन्ती ➜ सारस्वत ब्राह्मण लोदीराम को साबरमती में बहते हुए सन्दूक में मिले
- गुरु ➜ बुढ़धन / वृद्धानन्दजी (कबीर के शिष्य)
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1544 | जन्म | अहमदाबाद |
| 1555 | दीक्षा व गृह-त्याग | 11 वर्ष की आयु में |
| 1563 | राजस्थान में प्रवेश | 19 वर्ष की उम्र; सिरोही, कल्याणपुर, साँभर होकर (साँभर में पहला उपदेश — 1568) |
| 1574 | ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना | आगे चलकर परब्रह्म सम्प्रदाय |
अकबर से संवाद
अकबर ने पूछा — “ख़ुदा की जात क्या है?” दादू का उत्तर: “इसक अल्लाह की जाति है, इसक अल्लाह को रंग; इसक अल्लाह मौजूद है, इसक अल्लाह को अंग।” यानी ईश्वर का रूप-जाति प्रेम (इश्क़) है। दादू ने जातिगत पक्षपात के विरुद्ध निपख आन्दोलन चलाया।
परिवार, रचनाएँ और परम्पराएँ
| विषय | विवरण |
|---|---|
| पुत्र | गरीबदास (जन्म 1575) और मिस्किनदास |
| पुत्रियाँ | शोभाकँवरी, रूपकँवरी |
| रचनाएँ | दादूजी री वाणी, दादू दयाल रा दुहा, कायाबेलि |
| भाषा | मुख्यतः ढूँढाड़ी; हिन्दी-मिश्रित सधुक्कड़ी का प्रभाव |
- दादूपंथी साधु विवाह नहीं करते; गृहस्थ परिवारों के बालकों को शिष्य बनाकर पंथ आगे बढ़ाते हैं और दादू द्वारों में रहते हैं।
- वे शव को न जलाते हैं, न दफ़नाते — जंगल में पशु-पक्षियों के लिए खुला छोड़ देते हैं (दादू का शव भी भैराणा पहाड़ी पर इसी तरह छोड़ा गया था)।
- दादू के बारे में जानकारी ➜ दादू जन्मलीला परची (जनगोपाल), संत गुणसागर (माधोदास), भक्तमाल (राघवदास), नाममाला (लालदास)।
दादूपंथ के पाँच प्रकार — “खा-खा-नाग-उत्तरे-वीर”
| प्रकार | पहचान |
|---|---|
| खालसा | आचार्य-परम्परा के साधु; शुरू किया गरीबदास ने; मुख्य स्थान नरायणा |
| खाकी | भस्म लगाने और जटाएँ बढ़ाने वाले साधु |
| नागा | शुरू किए बड़े सुन्दरदास ने; साधु हथियार भी रखते हैं। इन्होंने सवाई जयसिंह (जयपुर) और मानसिंह (जोधपुर) की सहायता की। पहली बार 1726 ई. में सवाई जयसिंह ने नागा साधुओं को फ़ौज में भर्ती करने का हुक्म दिया |
ध्यान दें: कल्याणपुर के सिवा सारे पंच तीर्थ जयपुर क्षेत्र में — आमेर, साँभर, नरायणा, भैराणा।
7. रैपिड फायर तथ्य
- श्रीनाथजी का नाथद्वारा में पदार्पण ➜ फरवरी 1672 ई., महाराणा राजसिंह की अनुमति से सिहाड़ में
- वल्लभ सम्प्रदाय की प्रथम पीठ ➜ मथुरेश / मथुराधीश, कोटा
- पिछवाई ➜ मूर्ति के पीछे लगने वाला चित्रित वस्त्र; नाथद्वारा की पिछवाई प्रसिद्ध है
- गौड़ीय सम्प्रदाय ➜ प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु, दर्शन अचिन्त्य भेदाभेद; राजस्थान की प्रमुख पीठ गोविन्द देवजी मंदिर, जयपुर
- जसनाथी ➜ जसनाथजी; 1504 में कतरियासर में स्थापना; 36 नियम; अग्नि नृत्य
- विश्नोई ➜ जाम्भोजी; 1485 में समराथल में पंथ की स्थापना; 29 नियम; मुकाम में मेला
- दादू पंथ ➜ दादू दयाल, «राजस्थान का कबीर»; जन्म 1544 ई.; 1574 में ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना
- दादूपंथी नागा ➜ शुरू करने वाले बड़े सुन्दरदास; 1726 ई. में सवाई जयसिंह ने उन्हें फ़ौज में भर्ती करने का हुक्म दिया
- पंच तीर्थ ➜ कल्याणपुर को छोड़कर सब जयपुर क्षेत्र में — आमेर, साँभर, नरायणा, भैराणा
अगले भाग में दादू के प्रमुख शिष्य, फिर लालदासी, चरणदासी, निरंजनी, रामस्नेही और सिक्ख सम्प्रदाय सहित अन्य पंथ।
पिछला भाग: राजस्थान के सम्प्रदाय व संत: शैव व नाथ सम्प्रदाय एवं वैष्णव सम्प्रदाय (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान के सम्प्रदाय व संत: लालदासी · चरणदासी · रामस्नेही…
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