प्रथाओं वाले अध्याय का सबसे पसंदीदा सवाल है — पहली रोक किस प्रथा पर, किस वर्ष, किस रियासत में और किसने लगाई। इस भाग में पहले रोक की तालिका, केसरिया-जौहर-साका, सती प्रथा और रूपकँवर प्रकरण, फिर कन्यावध, डाकन, पर्दा, विधवा और बाल विवाह, दास प्रथा, मानव व्यापार और मौताणा-संथारा-समाधि आते हैं। अंत में सोलह संस्कार, विवाह और मृत्यु की रस्में तथा बीकानेर का पुष्करणा सामूहिक विवाह दिया गया है।
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1. पहली रोक — तालिका
| प्रथा | रोक का वर्ष | रियासत | शासक / अधिकारी |
|---|---|---|---|
| सती प्रथा | 1822 | बूँदी | महाराव विष्णुसिंह |
| दास प्रथा | 1832 | कोटा | — |
| कन्यावध | 1833 | कोटा | महाराव रामसिंह द्वितीय |
| त्याग प्रथा | 1841 | जोधपुर | महाराजा मानसिंह |
… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: याद करें: बूँदी — सती; कोटा — दास व कन्यावध; जोधपुर — त्याग व बाल विवाह; जयपुर — समाधि व मानव व्यापार; उदयपुर — डाकन।
2. केसरिया, जौहर और साका
| रीति | क्या होता था |
|---|---|
| केसरिया | पराजय सामने दिखे तो राजपूत वीर किले के फाटक खोल, केसरिया साफा सजाकर दुश्मन पर टूट पड़ते और वतन के नाम पर प्राण दे देते — यही केसरिया करना है |
| जौहर | जब योद्धाओं के लौटने की आशा न रहे और दुर्ग शत्रु के हाथ जाने वाला हो, तब किले की स्त्रियाँ धर्म और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से अग्निदाह करती थीं |
| साका | पुरुषों का केसरिया + स्त्रियों का जौहर व्रत, दोनों मिलकर |
- रणथम्भौर किले में 1301 ई. में जलजौहर भी हुआ था।
हार की स्थिति में क्रम
- जौहर (स्त्रियाँ)
- केसरिया (योद्धा)
- = साका
3. सती प्रथा
पति के देहान्त पर पत्नी का उसकी चिता में जीवित प्रवेश कर जल मरना सती होना है; इसी के दूसरे नाम सहमरण, सहगमन और अन्वारोहण हैं।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अनुमरण | पति की मृत्यु और अन्तिम संस्कार कहीं और हो जाने पर पत्नी का उसके किसी चिह्न के साथ चिता पर बैठना; ऐसी सती महासती कहलाती है |
| माँ सती | बेटे की चिता पर सती होने वाली माताओं को यह नाम मिला |
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| तुगलक काल | पहला रोक-आदेश | रोक का पहला फ़रमान मुस्लिम शासक मुहम्मद तुगलक का बताया जाता है |
| 510 ई. | एरण अभिलेख (सागर, म.प्र.) | भारत में सती का पहला प्रमाण — हूणों से लड़ते मारे गए सेनापति गोपराज की पत्नी |
| 861 ई. | घटियाला शिलालेख (फलौदी) | राजस्थान में सती का पहला प्रमाण — सेनापति राणूका की पत्नी संपत देवी |
| 1822 | बूँदी | राजस्थान में पहली रोक — शासक विष्णुसिंह |
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- राजस्थान में सती का सबसे ज़्यादा चलन राजपूत जाति में था।
ट्रिक: क्रम याद करें — बूँदी 1822 → अलवर 1830 → जयपुर 1844 → जोधपुर/कोटा 1848 → उदयपुर 1861; भारत में कानून 1829 (बैंटिक)।
4. रूपकँवर सती प्रकरण
- घटना ➜ 4 सितम्बर 1987, देवराला गाँव (नीमकाथाना, सीकर)
- सती हुई ➜ रूपकँवर — पति का नाम माल सिंह
- महत्त्व ➜ इन्हें राजस्थान की आख़िरी सती गिना जाता है
- हर ओर निन्दा होने पर राज्य के तब के गृहमंत्री गुलाब सिंह शक्तावत के नेतृत्व में एक समिति गठित हुई।
- अक्टूबर 1987 में सती प्रथा रोकने के लिए अध्यादेश आया — तब मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी थे।
- अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने वाले राज्यपाल — बसन्त दादा पाटील।
5. कन्यावध, डाकन, पर्दा, कुकड़ी
| प्रथा | पहचान |
|---|---|
| कन्यावध | रियासती काल में बेटी के जन्म पर उसे भूखा रखकर या गला घोंटकर मार देना |
| डाकन प्रथा | गाँव में बच्चा/महिला बिना इलाज के ठीक न हो तो किसी स्त्री पर जादू-टोने का शक करके उसे डायन/डाकन घोषित करना; फिर पंचायत या राजा के सामने दबाव से कबूल करवाना; उसे सताया या मार दिया जाता था — भीलों में सर्वाधिक |
| पर्दा प्रथा | मध्यकाल में हमलावरों की बुरी नज़र से बचाने के लिए शुरू; राजपूत जाति और मुस्लिम धर्म में विशेष; 19वीं सदी के सुधारकों के विरोध और बढ़ती शिक्षा से घट रही है |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- राजस्थान में कन्यावध पर पहली पाबन्दी कोटा ने 1833 में लगाई — महाराव रामसिंह द्वितीय का दौर और अंग्रेज़ पॉलिटिकल एजेंट विल्किंसन की कोशिश।
- डाकन प्रथा ➜ मेवाड़ भील कोर के एक सैनिक ने (1853) डायन होने के संदेह में एक औरत को मार डाला; अजमेर के एजीजी ने इसे रुकवाने को भारत सरकार से लिखा-पढ़ी की, और कमाण्डेंट जे.सी. बुक की सलाह पर उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह ने उसी 1853 में पाबन्दी लगा दी।
- राजस्थान डाकन प्रताड़ना निवारण अधिनियम (2015) ➜ 26 जनवरी 2016 से लागू; डाकन घोषित करना गैरकानूनी।
6. विधवा विवाह और बाल विवाह
विधवा विवाह
- प्राचीन समय में स्त्री दोबारा ब्याह नहीं कर सकती थी, इसलिए विधवा का जीवन बहुत यातनापूर्ण होता था।
- ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और लॉर्ड डलहौज़ी की पहल पर विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 में बना, जिसे लॉर्ड कैनिंग के काल में लागू किया गया।
- भारत में पहला विधवा विवाह कोलकाता में 7 दिसम्बर 1856 को हुआ।
बाल विवाह
- वयस्क होने से पहले विवाह बाल विवाह कहलाता है; राजस्थान में सबसे ज़्यादा बाल विवाह आखातीज (वैशाख शुक्ल तृतीया) को होते हैं।
- राजस्थान में पहली रोक 1885 ई. में जोधपुर में प्रधानमंत्री सर प्रताप ने लगाई।
- बाल विवाह निरोधक कानून 1929 ➜ इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने 28 सितम्बर 1929 को पास किया और यह 1 अप्रैल 1930 से पूरे देश में चला; न्यूनतम आयु लड़की के लिए 14, लड़के के लिए 18 तय हुई।
7. विवाह-सम्बन्धी प्रथाएँ
| प्रथा | पहचान |
|---|---|
| डावरिया | रियासती काल में राजा-जागीरदार बेटी के दहेज के साथ कुछ कुँवारी कन्याएँ भी देते थे — डावरी / डावरिया; वे ज़नाने महल में सेविका का जीवन बिताती थीं |
| नाता | दोबारा विवाह का ही रूप — स्त्री पहले पति से अलग होकर किसी और को अपना पति चुन लेती है; गाँवों की जनजातियों में चलन |
| झगड़ा | स्त्री के दूसरे पति द्वारा पहले पति को दी जाने वाली राशि |
| चारी | खैराड़ अंचल (टोंक, भीलवाड़ा) की रीति: कन्या-पक्ष वर-पक्ष से दहेज जैसी नकद रकम लेता है; इस रकम के लोभ में वे विवाह निभने नहीं देते और चारी लेकर बेटी को कहीं और ब्याह देते हैं; कमज़ोर-पिछड़े तबके में ज़्यादा |
- त्याग प्रथा को कन्यावध का ज़िम्मेदार माना जाता है; इस पर सबसे पहली रोक 1841 में जोधपुर में महाराजा मानसिंह ने लगाई; बाद में वाल्टर द्वारा बनाई राजपूत हितकारिणी सभा ने भी इसे मिटाने का प्रयास किया।
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 ➜ 1 जुलाई 1961 से लागू; दहेज गैरकानूनी।
- राजपूतों में एक दौर में बेटी की शादी पर दहेज के साथ ख़रीदे हुए लड़के-लड़कियाँ भी भेजे जाते थे।
8. दास, मानव व्यापार, बेगार, सागड़ी
| प्रथा | पहचान |
|---|---|
| मानव व्यापार | औरतों और लड़कियों को खरीदना-बेचना; 19वीं सदी तक सामान्य बात; कोटा में इस क्रय-विक्रय पर “चौयान” नाम का कर वसूला जाता था |
| दास प्रथा | युद्ध में बन्दी बनाए लोगों/स्त्रियों को दास, दासी, गोला आदि कहा जाता था; उनसे कई बार घृणित काम करवाए जाते |
| पड़दायत | राजा द्वारा उपपत्नी बनाई गई दासी |
- दास प्रथा की पहली जानकारी कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलती है; भारत में इस पर सबसे पहली रोक अकबर ने लगाई थी।
- राजस्थान में दास प्रथा पर पहली रोक कोटा रियासत में 1832 में लगी।
- मानव व्यापार पर राजस्थान में सबसे पहले रोक जयपुर में 1847 में, जॉन लुडलो द्वारा।
9. मौताणा, संथारा, समाधि, रियाण
| प्रथा | पहचान |
|---|---|
| मौताणा | जनजातियों में किसी पुरुष/महिला की अप्राकृतिक मृत्यु (किसी की लापरवाही या दुर्घटना) पर आरोपी से माँगी जाने वाली धनराशि; मौताणा मिलने के बाद ही आदिवासी शव को घटना-स्थल से उठाते हैं |
| संथारा / सल्लेखना | जैन शास्त्रों में बताई विधि; अन्न-जल का त्याग कर शान्त भाव से अपनी इच्छा से देह छोड़ना; श्रवणबेलगोला में चन्द्रगुप्त मौर्य का संथारा प्रसिद्ध |
| समाधि प्रथा | पुरुष या संत महात्मा स्वेच्छा से मृत्यु वरण करते हैं; दो प्रकार — जल समाधि (जलाशय में बैठकर) और भू-समाधि (ज़मीन में गड्ढा खोदकर बैठना और भर देना) |
- समाधि प्रथा पर सबसे पहली रोक 1844 ई. में जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट लुडलो के प्रयास से रामसिंह द्वितीय ने लगाई।
10. सोलह संस्कारों की सूची
| क्र. | संस्कार | कब / क्या |
|---|---|---|
| 1 | गर्भाधान | हिन्दुओं का पहला संस्कार; शिशु के गर्भ में आने पर |
| 2 | पुंसवन | गर्भ के तीसरे-चौथे माह में, पुत्र-प्राप्ति की कामना से |
| 3 | सीमन्तोनयन | गर्भ के छठे-सातवें माह में होने वाला संस्कार, ताकि माता बुरी शक्तियों के असर से बची रहे |
| 4 | जातकर्म | जन्म लेते ही; नवजात को घर का कोई सदस्य पेय पदार्थ / घूँटी पिलाता है |
11. विवाह से पहले की रस्में
| रस्म | पहचान |
|---|---|
| सगाई / सगपण | लड़के-लड़की को विवाह के लिए रोकने की रस्म; रुपया और नारियल दिया जाता है |
| सावो | पंडित से विवाह का मुहूर्त निकलवाना |
| टीका | कन्या के घर से लड़के को कपड़े, गहने व नकद की भेंट |
| गोद भराई | लड़के के घर से बहू के लिए वस्त्र, गहने, रुपये और मिठाई |
याद रखें: भात (मायरा) = ननिहाल की ओर से सामान; बान = गणेश पूजन + हल्दी; बंदौला = खाने का न्योता।
12. बारात और तोरण
| रस्म | पहचान |
|---|---|
| निकासी / घुड़चढ़ी | बारात चलने से पहले दूल्हे को घोड़ी पर बिठाकर जुलूस निकाला जाता है; वह पास के किसी ठिकाने तक जाकर आता है |
| सामेला / मधुपर्क | बारात के कन्या-गाँव पहुँचते ही वहाँ के प्रतिष्ठित लोग आगवानी को आते हैं; इसे अगवानी भी कहते हैं |
| ढुकाव | दूल्हा घोड़ी पर सवार, बैंड-बाजे के संग वधू के द्वार तक आता है |
बारात का क्रम
- निकासी / घुड़चढ़ी
- सामेला
- ढुकाव
13. फेरे और कन्यादान
| रस्म | पहचान |
|---|---|
| हथलेवा | भाँवर से पहले वधू का हाथ वर के हाथ में थमाया जाता है |
| गठजोड़ | एक कपड़े से दूल्हा-दुल्हन का गठजोड़ा कराया जाता है |
| फेरे | पुरोहित मंत्र पढ़ते हुए अग्नि के सामने वर-वधू की परिक्रमा कराता है |
| पगधोई | भाँवर के उपरान्त कन्या के माता-पिता दूल्हे के चरण दूध से पखारते हैं |
विवाह-विधि
- हथलेवा
- गठजोड़
- फेरे
14. विवाह के बाद की रस्में
| रस्म | पहचान |
|---|---|
| पहरावणी / रंगबरी | वधू पक्ष द्वारा बारात को यथाशक्ति उपहार-राशि; जान झंवारी भी कहते हैं |
| दायजो / ऊझणो | लड़की का पिता लड़के वालों को जो सामान, गहने, बर्तन और नकद दे — दहेज |
| गौना / मुकलावा | नाबालिग लड़की की शादी हो जाए तो बालिग होने पर पहली बार उपहारों के साथ ससुराल भेजने की रस्म |
| जुआ जुई | शादी के बाद नवदम्पती का आपस में खेला जाने वाला खेल |
15. शव-यात्रा और अंतिम संस्कार
| रस्म | पहचान |
|---|---|
| अर्थी | वह शैया जिस पर लिटाकर मृतक को दाह के लिए ले चलते हैं |
| बैकुंठी | कुछ जगह मृतक को बैकुण्ठी में बिठाकर श्मशान पहुँचाया जाता है |
| पानीवाड़ा | मौत पर जुटे लोग नहाकर शोक-संतप्त परिवार को ढाढ़स देते हैं — वही सामूहिक स्नान |
| भदर | बुज़ुर्ग की मृत्यु पर परिवार के सदस्यों के सिर-दाढ़ी के बाल कटते हैं — “भदर होना” |
राजस्थानी भाषा में मृत शरीर को “लाश” भी कहते हैं।
अंतिम यात्रा का क्रम
- अर्थी / बैकुंठी
- बिखेर, दंडोत
- आधेटा
16. शोक के दिन — सांतरवाड़ा से बरसी
| रस्म | पहचान |
|---|---|
| सांतरवाड़ा | मृत्यु के बाद 12 दिनों तक शोक वाले घर में लोगों का पहुँचकर दिलासा देना |
| मोकाण | सगे-सम्बन्धी शोक-संतप्त परिजनों को तसल्ली देने पहुँचते हैं |
| फूल चूनना | मृत्यु के तीसरे दिन दाह-स्थल से हड्डियाँ, दाँत आदि इकट्ठे करना; पवित्र नदी/सरोवर (हरिद्वार/पुष्कर) में प्रवाहित |
| मौसर / खर्च | पुरुष की मृत्यु पर 12वें दिन और स्त्री के निधन पर 13वें दिन वारिस अपनी हैसियत के हिसाब से जाति और गाँव के लोगों को खाना खिलाते हैं — मृत्युभोज |
17. अन्य रीतियाँ
| रीति | पहचान |
|---|---|
| जात देना | नवजात को पहली बार अपने कुलदेव/कुलदेवी के मन्दिर या थान पर पूजा के लिए ले जाना |
| ल्हास | देहात में बिना दाम लिए मिल-जुलकर एक-दूसरे के खेत का काम निपटाने की रीत |
| नांगळ | नए बने मकान में प्रवेश की रस्म और दावत |
| उजमणौ | किसी व्रत का उद्यापन |
18. पुष्करणा सामूहिक विवाह
- कहाँ ➜ बीकानेर
- किसका ➜ पुष्करणा ब्राह्मण समाज
- कितने अन्तराल पर ➜ हर 2 वर्ष
राज्य सरकार परकोटे को एक छत मानते हुए इस सामूहिक विवाह पर नियमित अनुदान देती है।
रिवीजन पॉइंटर्स
- पहली रोक — सती पर बूँदी में 1822 (महाराव विष्णुसिंह), दास प्रथा पर कोटा में 1832, कन्यावध पर कोटा में 1833 (महाराव रामसिंह द्वितीय), त्याग प्रथा पर जोधपुर में 1841 (महाराजा मानसिंह)।
- सती पर रोक का क्रम — बूँदी 1822, अलवर 1830, जयपुर 1844, जोधपुर / कोटा 1848, उदयपुर 1861; भारत में कानून 1829 (बैंटिक)।
- साका पुरुषों के केसरिया और स्त्रियों के जौहर को मिलाकर बनता है; रणथम्भौर में 1301 ई. में जलजौहर भी हुआ था।
- राजस्थान में सती का पहला प्रमाण 861 ई. का घटियाला शिलालेख (फलौदी) है, जबकि भारत में पहला प्रमाण 510 ई. का एरण अभिलेख।
- रूपकँवर सती 4 सितम्बर 1987 को देवराला गाँव में हुई, जिन्हें राजस्थान की आख़िरी सती गिना जाता है; अक्टूबर 1987 में अध्यादेश आया, तब मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी थे।
- डाकन प्रथा पर उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह ने 1853 में पाबन्दी लगाई; राजस्थान डाकन प्रताड़ना निवारण अधिनियम (2015) 26 जनवरी 2016 से लागू हुआ।
- राजस्थान में बाल विवाह पर पहली रोक 1885 में जोधपुर में लगी; कानून 1929 में पास हुआ और 1 अप्रैल 1930 से चला, न्यूनतम आयु लड़की के लिए 14 और लड़के के लिए 18।
- मानव व्यापार पर सबसे पहली रोक जयपुर में 1847 में जॉन लुडलो ने लगाई, और समाधि प्रथा पर जयपुर में 1844 में।
- सोलह संस्कारों में पहला गर्भाधान है; पुष्करणा ब्राह्मण समाज का सामूहिक विवाह बीकानेर में हर 2 वर्ष पर होता है।
अगले भाग में विक्रम संवत्, ईस्वी, शक (राष्ट्रीय पंचांग) और हिजरी जैसी कालगणना, फिर बारह महीनों के क्रम से हिन्दू मास-वार त्योहार और उनके मेले।
पिछला भाग: राजस्थान की जनजातियाँ: सहरिया जनजाति एवं डामोर, कथौड़ी, सांसी, कंजर
अगला भाग: राजस्थान के त्योहार व मेले: कालगणना व संवत् एवं हिन्दू मास-वार त्योहार (भाग 1)
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