राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज: जौहर, सती और स्त्री-प्रथाएँ – Rajasthan Art and Culture Chapter 56

कुप्रथाओं पर पहली रोक, जौहर-साका, सती, विवाह-मृत्यु की रस्में और सोलह संस्कारों की सूची।

13 min read Updated Notes in Hindi
In this chapter (19 sections)
  1. पहली रोक — तालिका
  2. केसरिया, जौहर और साका
  3. सती प्रथा
  4. रूपकँवर सती प्रकरण
  5. कन्यावध, डाकन, पर्दा, कुकड़ी
  6. विधवा विवाह और बाल विवाह
  7. विवाह-सम्बन्धी प्रथाएँ
  8. दास, मानव व्यापार, बेगार, सागड़ी
  9. मौताणा, संथारा, समाधि, रियाण
  10. सोलह संस्कारों की सूची
  11. विवाह से पहले की रस्में
  12. बारात और तोरण
  13. फेरे और कन्यादान
  14. विवाह के बाद की रस्में
  15. शव-यात्रा और अंतिम संस्कार
  16. शोक के दिन — सांतरवाड़ा से बरसी
  17. अन्य रीतियाँ
  18. पुष्करणा सामूहिक विवाह
  19. रिवीजन पॉइंटर्स

प्रथाओं वाले अध्याय का सबसे पसंदीदा सवाल है — पहली रोक किस प्रथा पर, किस वर्ष, किस रियासत में और किसने लगाई। इस भाग में पहले रोक की तालिका, केसरिया-जौहर-साका, सती प्रथा और रूपकँवर प्रकरण, फिर कन्यावध, डाकन, पर्दा, विधवा और बाल विवाह, दास प्रथा, मानव व्यापार और मौताणा-संथारा-समाधि आते हैं। अंत में सोलह संस्कार, विवाह और मृत्यु की रस्में तथा बीकानेर का पुष्करणा सामूहिक विवाह दिया गया है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज, 5 चॉक-बोर्ड चित्र, 11 नक्शे, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
माइंड मैप खोलें ➜

1. पहली रोक — तालिका

प्रथारोक का वर्षरियासतशासक / अधिकारी
सती प्रथा1822बूँदीमहाराव विष्णुसिंह
दास प्रथा1832कोटा—
कन्यावध1833कोटामहाराव रामसिंह द्वितीय
त्याग प्रथा1841जोधपुरमहाराजा मानसिंह

… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: याद करें: बूँदी — सती; कोटा — दास व कन्यावध; जोधपुर — त्याग व बाल विवाह; जयपुर — समाधि व मानव व्यापार; उदयपुर — डाकन।

2. केसरिया, जौहर और साका

रीतिक्या होता था
केसरियापराजय सामने दिखे तो राजपूत वीर किले के फाटक खोल, केसरिया साफा सजाकर दुश्मन पर टूट पड़ते और वतन के नाम पर प्राण दे देते — यही केसरिया करना है
जौहरजब योद्धाओं के लौटने की आशा न रहे और दुर्ग शत्रु के हाथ जाने वाला हो, तब किले की स्त्रियाँ धर्म और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से अग्निदाह करती थीं
साकापुरुषों का केसरिया + स्त्रियों का जौहर व्रत, दोनों मिलकर
  • रणथम्भौर किले में 1301 ई. में जलजौहर भी हुआ था।

हार की स्थिति में क्रम

  1. जौहर (स्त्रियाँ)
  2. केसरिया (योद्धा)
  3. = साका

3. सती प्रथा

पति के देहान्त पर पत्नी का उसकी चिता में जीवित प्रवेश कर जल मरना सती होना है; इसी के दूसरे नाम सहमरण, सहगमन और अन्वारोहण हैं।

शब्दअर्थ
अनुमरणपति की मृत्यु और अन्तिम संस्कार कहीं और हो जाने पर पत्नी का उसके किसी चिह्न के साथ चिता पर बैठना; ऐसी सती महासती कहलाती है
माँ सतीबेटे की चिता पर सती होने वाली माताओं को यह नाम मिला
काल / क्रमघटनाविवरण
तुगलक कालपहला रोक-आदेशरोक का पहला फ़रमान मुस्लिम शासक मुहम्मद तुगलक का बताया जाता है
510 ई.एरण अभिलेख (सागर, म.प्र.)भारत में सती का पहला प्रमाण — हूणों से लड़ते मारे गए सेनापति गोपराज की पत्नी
861 ई.घटियाला शिलालेख (फलौदी)राजस्थान में सती का पहला प्रमाण — सेनापति राणूका की पत्नी संपत देवी
1822बूँदीराजस्थान में पहली रोक — शासक विष्णुसिंह

… शेष 5 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • राजस्थान में सती का सबसे ज़्यादा चलन राजपूत जाति में था।

ट्रिक: क्रम याद करें — बूँदी 1822 → अलवर 1830 → जयपुर 1844 → जोधपुर/कोटा 1848 → उदयपुर 1861; भारत में कानून 1829 (बैंटिक)।

4. रूपकँवर सती प्रकरण

  • घटना ➜ 4 सितम्बर 1987, देवराला गाँव (नीमकाथाना, सीकर)
  • सती हुई ➜ रूपकँवर — पति का नाम माल सिंह
  • महत्त्व ➜ इन्हें राजस्थान की आख़िरी सती गिना जाता है
  • हर ओर निन्दा होने पर राज्य के तब के गृहमंत्री गुलाब सिंह शक्तावत के नेतृत्व में एक समिति गठित हुई।
  • अक्टूबर 1987 में सती प्रथा रोकने के लिए अध्यादेश आया — तब मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी थे।
  • अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने वाले राज्यपाल — बसन्त दादा पाटील।

5. कन्यावध, डाकन, पर्दा, कुकड़ी

प्रथापहचान
कन्यावधरियासती काल में बेटी के जन्म पर उसे भूखा रखकर या गला घोंटकर मार देना
डाकन प्रथागाँव में बच्चा/महिला बिना इलाज के ठीक न हो तो किसी स्त्री पर जादू-टोने का शक करके उसे डायन/डाकन घोषित करना; फिर पंचायत या राजा के सामने दबाव से कबूल करवाना; उसे सताया या मार दिया जाता था — भीलों में सर्वाधिक
पर्दा प्रथामध्यकाल में हमलावरों की बुरी नज़र से बचाने के लिए शुरू; राजपूत जाति और मुस्लिम धर्म में विशेष; 19वीं सदी के सुधारकों के विरोध और बढ़ती शिक्षा से घट रही है

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • राजस्थान में कन्यावध पर पहली पाबन्दी कोटा ने 1833 में लगाई — महाराव रामसिंह द्वितीय का दौर और अंग्रेज़ पॉलिटिकल एजेंट विल्किंसन की कोशिश।
  • डाकन प्रथा ➜ मेवाड़ भील कोर के एक सैनिक ने (1853) डायन होने के संदेह में एक औरत को मार डाला; अजमेर के एजीजी ने इसे रुकवाने को भारत सरकार से लिखा-पढ़ी की, और कमाण्डेंट जे.सी. बुक की सलाह पर उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह ने उसी 1853 में पाबन्दी लगा दी।
  • राजस्थान डाकन प्रताड़ना निवारण अधिनियम (2015) ➜ 26 जनवरी 2016 से लागू; डाकन घोषित करना गैरकानूनी।

6. विधवा विवाह और बाल विवाह

विधवा विवाह

  • प्राचीन समय में स्त्री दोबारा ब्याह नहीं कर सकती थी, इसलिए विधवा का जीवन बहुत यातनापूर्ण होता था।
  • ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और लॉर्ड डलहौज़ी की पहल पर विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 में बना, जिसे लॉर्ड कैनिंग के काल में लागू किया गया।
  • भारत में पहला विधवा विवाह कोलकाता में 7 दिसम्बर 1856 को हुआ।

बाल विवाह

  • वयस्क होने से पहले विवाह बाल विवाह कहलाता है; राजस्थान में सबसे ज़्यादा बाल विवाह आखातीज (वैशाख शुक्ल तृतीया) को होते हैं।
  • राजस्थान में पहली रोक 1885 ई. में जोधपुर में प्रधानमंत्री सर प्रताप ने लगाई।
  • बाल विवाह निरोधक कानून 1929 ➜ इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने 28 सितम्बर 1929 को पास किया और यह 1 अप्रैल 1930 से पूरे देश में चला; न्यूनतम आयु लड़की के लिए 14, लड़के के लिए 18 तय हुई।

7. विवाह-सम्बन्धी प्रथाएँ

प्रथापहचान
डावरियारियासती काल में राजा-जागीरदार बेटी के दहेज के साथ कुछ कुँवारी कन्याएँ भी देते थे — डावरी / डावरिया; वे ज़नाने महल में सेविका का जीवन बिताती थीं
नातादोबारा विवाह का ही रूप — स्त्री पहले पति से अलग होकर किसी और को अपना पति चुन लेती है; गाँवों की जनजातियों में चलन
झगड़ास्त्री के दूसरे पति द्वारा पहले पति को दी जाने वाली राशि
चारीखैराड़ अंचल (टोंक, भीलवाड़ा) की रीति: कन्या-पक्ष वर-पक्ष से दहेज जैसी नकद रकम लेता है; इस रकम के लोभ में वे विवाह निभने नहीं देते और चारी लेकर बेटी को कहीं और ब्याह देते हैं; कमज़ोर-पिछड़े तबके में ज़्यादा
  • त्याग प्रथा को कन्यावध का ज़िम्मेदार माना जाता है; इस पर सबसे पहली रोक 1841 में जोधपुर में महाराजा मानसिंह ने लगाई; बाद में वाल्टर द्वारा बनाई राजपूत हितकारिणी सभा ने भी इसे मिटाने का प्रयास किया।
  • दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 ➜ 1 जुलाई 1961 से लागू; दहेज गैरकानूनी।
  • राजपूतों में एक दौर में बेटी की शादी पर दहेज के साथ ख़रीदे हुए लड़के-लड़कियाँ भी भेजे जाते थे।

8. दास, मानव व्यापार, बेगार, सागड़ी

प्रथापहचान
मानव व्यापारऔरतों और लड़कियों को खरीदना-बेचना; 19वीं सदी तक सामान्य बात; कोटा में इस क्रय-विक्रय पर “चौयान” नाम का कर वसूला जाता था
दास प्रथायुद्ध में बन्दी बनाए लोगों/स्त्रियों को दास, दासी, गोला आदि कहा जाता था; उनसे कई बार घृणित काम करवाए जाते
पड़दायतराजा द्वारा उपपत्नी बनाई गई दासी
  • दास प्रथा की पहली जानकारी कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलती है; भारत में इस पर सबसे पहली रोक अकबर ने लगाई थी।
  • राजस्थान में दास प्रथा पर पहली रोक कोटा रियासत में 1832 में लगी।
  • मानव व्यापार पर राजस्थान में सबसे पहले रोक जयपुर में 1847 में, जॉन लुडलो द्वारा।

9. मौताणा, संथारा, समाधि, रियाण

प्रथापहचान
मौताणाजनजातियों में किसी पुरुष/महिला की अप्राकृतिक मृत्यु (किसी की लापरवाही या दुर्घटना) पर आरोपी से माँगी जाने वाली धनराशि; मौताणा मिलने के बाद ही आदिवासी शव को घटना-स्थल से उठाते हैं
संथारा / सल्लेखनाजैन शास्त्रों में बताई विधि; अन्न-जल का त्याग कर शान्त भाव से अपनी इच्छा से देह छोड़ना; श्रवणबेलगोला में चन्द्रगुप्त मौर्य का संथारा प्रसिद्ध
समाधि प्रथापुरुष या संत महात्मा स्वेच्छा से मृत्यु वरण करते हैं; दो प्रकार — जल समाधि (जलाशय में बैठकर) और भू-समाधि (ज़मीन में गड्ढा खोदकर बैठना और भर देना)
  • समाधि प्रथा पर सबसे पहली रोक 1844 ई. में जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट लुडलो के प्रयास से रामसिंह द्वितीय ने लगाई।

10. सोलह संस्कारों की सूची

क्र.संस्कारकब / क्या
1गर्भाधानहिन्दुओं का पहला संस्कार; शिशु के गर्भ में आने पर
2पुंसवनगर्भ के तीसरे-चौथे माह में, पुत्र-प्राप्ति की कामना से
3सीमन्तोनयनगर्भ के छठे-सातवें माह में होने वाला संस्कार, ताकि माता बुरी शक्तियों के असर से बची रहे
4जातकर्मजन्म लेते ही; नवजात को घर का कोई सदस्य पेय पदार्थ / घूँटी पिलाता है

11. विवाह से पहले की रस्में

रस्मपहचान
सगाई / सगपणलड़के-लड़की को विवाह के लिए रोकने की रस्म; रुपया और नारियल दिया जाता है
सावोपंडित से विवाह का मुहूर्त निकलवाना
टीकाकन्या के घर से लड़के को कपड़े, गहने व नकद की भेंट
गोद भराईलड़के के घर से बहू के लिए वस्त्र, गहने, रुपये और मिठाई

याद रखें: भात (मायरा) = ननिहाल की ओर से सामान; बान = गणेश पूजन + हल्दी; बंदौला = खाने का न्योता।

12. बारात और तोरण

रस्मपहचान
निकासी / घुड़चढ़ीबारात चलने से पहले दूल्हे को घोड़ी पर बिठाकर जुलूस निकाला जाता है; वह पास के किसी ठिकाने तक जाकर आता है
सामेला / मधुपर्कबारात के कन्या-गाँव पहुँचते ही वहाँ के प्रतिष्ठित लोग आगवानी को आते हैं; इसे अगवानी भी कहते हैं
ढुकावदूल्हा घोड़ी पर सवार, बैंड-बाजे के संग वधू के द्वार तक आता है

बारात का क्रम

  1. निकासी / घुड़चढ़ी
  2. सामेला
  3. ढुकाव

13. फेरे और कन्यादान

रस्मपहचान
हथलेवाभाँवर से पहले वधू का हाथ वर के हाथ में थमाया जाता है
गठजोड़एक कपड़े से दूल्हा-दुल्हन का गठजोड़ा कराया जाता है
फेरेपुरोहित मंत्र पढ़ते हुए अग्नि के सामने वर-वधू की परिक्रमा कराता है
पगधोईभाँवर के उपरान्त कन्या के माता-पिता दूल्हे के चरण दूध से पखारते हैं

विवाह-विधि

  1. हथलेवा
  2. गठजोड़
  3. फेरे

14. विवाह के बाद की रस्में

रस्मपहचान
पहरावणी / रंगबरीवधू पक्ष द्वारा बारात को यथाशक्ति उपहार-राशि; जान झंवारी भी कहते हैं
दायजो / ऊझणोलड़की का पिता लड़के वालों को जो सामान, गहने, बर्तन और नकद दे — दहेज
गौना / मुकलावानाबालिग लड़की की शादी हो जाए तो बालिग होने पर पहली बार उपहारों के साथ ससुराल भेजने की रस्म
जुआ जुईशादी के बाद नवदम्पती का आपस में खेला जाने वाला खेल

15. शव-यात्रा और अंतिम संस्कार

रस्मपहचान
अर्थीवह शैया जिस पर लिटाकर मृतक को दाह के लिए ले चलते हैं
बैकुंठीकुछ जगह मृतक को बैकुण्ठी में बिठाकर श्मशान पहुँचाया जाता है
पानीवाड़ामौत पर जुटे लोग नहाकर शोक-संतप्त परिवार को ढाढ़स देते हैं — वही सामूहिक स्नान
भदरबुज़ुर्ग की मृत्यु पर परिवार के सदस्यों के सिर-दाढ़ी के बाल कटते हैं — “भदर होना”

राजस्थानी भाषा में मृत शरीर को “लाश” भी कहते हैं।

अंतिम यात्रा का क्रम

  1. अर्थी / बैकुंठी
  2. बिखेर, दंडोत
  3. आधेटा

16. शोक के दिन — सांतरवाड़ा से बरसी

रस्मपहचान
सांतरवाड़ामृत्यु के बाद 12 दिनों तक शोक वाले घर में लोगों का पहुँचकर दिलासा देना
मोकाणसगे-सम्बन्धी शोक-संतप्त परिजनों को तसल्ली देने पहुँचते हैं
फूल चूननामृत्यु के तीसरे दिन दाह-स्थल से हड्डियाँ, दाँत आदि इकट्ठे करना; पवित्र नदी/सरोवर (हरिद्वार/पुष्कर) में प्रवाहित
मौसर / खर्चपुरुष की मृत्यु पर 12वें दिन और स्त्री के निधन पर 13वें दिन वारिस अपनी हैसियत के हिसाब से जाति और गाँव के लोगों को खाना खिलाते हैं — मृत्युभोज

17. अन्य रीतियाँ

रीतिपहचान
जात देनानवजात को पहली बार अपने कुलदेव/कुलदेवी के मन्दिर या थान पर पूजा के लिए ले जाना
ल्हासदेहात में बिना दाम लिए मिल-जुलकर एक-दूसरे के खेत का काम निपटाने की रीत
नांगळनए बने मकान में प्रवेश की रस्म और दावत
उजमणौकिसी व्रत का उद्यापन

18. पुष्करणा सामूहिक विवाह

  • कहाँ ➜ बीकानेर
  • किसका ➜ पुष्करणा ब्राह्मण समाज
  • कितने अन्तराल पर ➜ हर 2 वर्ष

राज्य सरकार परकोटे को एक छत मानते हुए इस सामूहिक विवाह पर नियमित अनुदान देती है।

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. पहली रोक — सती पर बूँदी में 1822 (महाराव विष्णुसिंह), दास प्रथा पर कोटा में 1832, कन्यावध पर कोटा में 1833 (महाराव रामसिंह द्वितीय), त्याग प्रथा पर जोधपुर में 1841 (महाराजा मानसिंह)।
  2. सती पर रोक का क्रम — बूँदी 1822, अलवर 1830, जयपुर 1844, जोधपुर / कोटा 1848, उदयपुर 1861; भारत में कानून 1829 (बैंटिक)।
  3. साका पुरुषों के केसरिया और स्त्रियों के जौहर को मिलाकर बनता है; रणथम्भौर में 1301 ई. में जलजौहर भी हुआ था।
  4. राजस्थान में सती का पहला प्रमाण 861 ई. का घटियाला शिलालेख (फलौदी) है, जबकि भारत में पहला प्रमाण 510 ई. का एरण अभिलेख।
  5. रूपकँवर सती 4 सितम्बर 1987 को देवराला गाँव में हुई, जिन्हें राजस्थान की आख़िरी सती गिना जाता है; अक्टूबर 1987 में अध्यादेश आया, तब मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी थे।
  6. डाकन प्रथा पर उदयपुर के महाराणा स्वरूपसिंह ने 1853 में पाबन्दी लगाई; राजस्थान डाकन प्रताड़ना निवारण अधिनियम (2015) 26 जनवरी 2016 से लागू हुआ।
  7. राजस्थान में बाल विवाह पर पहली रोक 1885 में जोधपुर में लगी; कानून 1929 में पास हुआ और 1 अप्रैल 1930 से चला, न्यूनतम आयु लड़की के लिए 14 और लड़के के लिए 18।
  8. मानव व्यापार पर सबसे पहली रोक जयपुर में 1847 में जॉन लुडलो ने लगाई, और समाधि प्रथा पर जयपुर में 1844 में।
  9. सोलह संस्कारों में पहला गर्भाधान है; पुष्करणा ब्राह्मण समाज का सामूहिक विवाह बीकानेर में हर 2 वर्ष पर होता है।

अगले भाग में विक्रम संवत्, ईस्वी, शक (राष्ट्रीय पंचांग) और हिजरी जैसी कालगणना, फिर बारह महीनों के क्रम से हिन्दू मास-वार त्योहार और उनके मेले।

पिछला भाग: राजस्थान की जनजातियाँ: सहरिया जनजाति एवं डामोर, कथौड़ी, सांसी, कंजर

अगला भाग: राजस्थान के त्योहार व मेले: कालगणना व संवत् एवं हिन्दू मास-वार त्योहार (भाग 1)

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के त्योहार व मेले · राजस्थान की जनजातियाँ

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
इस विषय का माइंड मैप ➜Complete Rajasthan GK पास देखें

Useful for these exams