राजस्थान के प्रमुख लोक नाट्य: ख्याल एवं रम्मत, तमाशा, नौटंकी, चारबैत – Rajasthan Art and Culture Chapter 49

लोक नाट्य के इलाक़ेवार रंग, ख्याल की सभी शैलियाँ और भीलों का गवरी (राई) नाट्य, PYQ सहित।

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In this chapter (31 sections)
  1. लोक नाट्य और इलाक़े का रंग
  2. कौन-सा नाट्य कहाँ
  3. ख्याल
  4. जयपुरी ख्याल
  5. कुचामनी ख्याल
  6. हेला ख्याल
  7. शेखावाटी (चिड़ावा) ख्याल
  8. अलीबक्शी ख्याल
  9. ढप्पाली व किशनगढ़ी ख्याल
  10. कन्हैया ख्याल
  11. तुर्रा-कलंगी ख्याल
  12. गवरी (राई) नाट्य
  13. रम्मत, तमाशा, नौटंकी, चारबैत
  14. रम्मत
  15. तमाशा
  16. नौटंकी
  17. चारबैत
  18. लीला नाट्य
  19. रामलीला
  20. रासलीला
  21. रावलों की रामत
  22. गरासियों की गोर लीलाएँ
  23. सनकादिकों की लीलाएँ
  24. स्वांग, कठपुतली, भवाई व अन्य
  25. स्वांग
  26. कठपुतली नाट्य
  27. भवाई नाट्य
  28. गन्धर्व नाटक
  29. दंगल, दुंटिया, रसिया दंगल
  30. रियासती रंगमंच व कलाकार
  31. रैपिड फायर तथ्य

लोक नाट्य याद रखने का सबसे आसान तरीक़ा इलाक़ा देखना है — पहाड़ों में जनजातीय रंग, रेगिस्तान में व्यंग्य-विनोद और पूर्व में ब्रज-हरियाणा की छाप। इस भाग में पहले लोक नाट्य और इलाक़े का रंग तथा कौन-सा नाट्य कहाँ का है, फिर ख्याल की एक-एक शैली और अंत में भील जनजाति का गवरी (राई) नाट्य क्रमवार दिया गया है। जहाँ-जहाँ पिछली परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम तथ्य के साथ लिखा गया है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान के प्रमुख लोक नाट्य, 6 चॉक-बोर्ड चित्र, 7 नक्शे, 24 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
माइंड मैप खोलें ➜

1. लोक नाट्य और इलाक़े का रंग

लोकमन में बसी कथाओं, संवादों और गीतों को लोगों की अपनी रुचि के हिसाब से मंच पर उतारना ही लोक नाट्य है; राजस्थान में यह परम्परा बहुत पुरानी है।

इलाक़ालोक नाट्य की प्रकृति
अरावली का पर्वतीय क्षेत्रजनजातियों की रंगीन संस्कृति झलकती है (जैसे भीलों की गवरी)
मरुस्थलीय क्षेत्रमनोरंजन करने वाली पेशेवर जातियाँ नाट्य प्रस्तुत करती हैं; ज़्यादातर व्यंग्य और विनोद प्रधान
अलवर-भरतपुरपड़ोसी हरियाणा और उत्तर प्रदेश का असर

ट्रिक: इलाक़ा देखकर नाट्य की प्रकृति का अंदाज़ा लगाइए — पहाड़ों में जनजातीय, रेगिस्तान में व्यंग्य-विनोद, पूर्व में ब्रज-हरियाणा का रंग।

2. कौन-सा नाट्य कहाँ

स्थाननाट्य
जयपुरजयपुरी ख्याल · तमाशा · रासलीला का फूलेरा · रामप्रकाश थियेटर
कुचामन (डीडवाना-कुचामन)कुचामनी ख्याल
सवाई माधोपुर / लालसोट (दौसा)हेला ख्याल · कन्हैया ख्याल · नौटंकी
झुंझुनूं (चिड़ावा)शेखावाटी (चिड़ावा) ख्याल · बिसाऊ की मूक रामलीला

… शेष 13 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

3. ख्याल

ख्याल का शुरू होना 18वीं सदी से माना जाता है। इसमें पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक वीर-गाथाओं को पद्य (छंद) में रचकर प्रस्तुत किया जाता है। यह संगीत-प्रधान लोक नाट्य है और राजस्थान की सबसे लोकप्रिय विधा है।

  • “ख्याल” का अर्थ ➜ खेल
  • प्रतियोगिता ➜ दंगल
  • सूत्रधार ➜ हलकारा

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

अलग-अलग इलाक़ों में ख्याल की भाषा के साथ-साथ शैली भी बदल जाती है — इसी से नौ प्रमुख ख्याल बने।

ट्रिक: नौ ख्याल — जय-कुचा-हेला-शेखा-अली-ढप्पा-किशन-तुर्रा-कन्हैया (जयपुरी, कुचामनी, हेला, शेखावाटी, अलीबक्शी, ढप्पाली, किशनगढ़ी, तुर्रा-कलंगी, कन्हैया)।

4. जयपुरी ख्याल

  • स्त्री पात्रों की भूमिका स्त्रियाँ ही निभाती हैं।
  • इसमें हिस्सा लेने वाले कलाकार जयपुर के गुणीजन खाने से आते थे।
  • लोकप्रिय ख्याल ➜ जोगी-जोगन, कान-गुजरी, मियाँ-बीबी, पठान, रसीली तम्बोलन।

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

ध्यान दें: जयपुरी ख्याल में स्त्री पात्र स्त्रियाँ निभाती हैं; कुचामनी और तुर्रा-कलंगी में वही भूमिका पुरुष करते हैं।

5. कुचामनी ख्याल

  • स्थान ➜ कुचामन सिटी (डीडवाना-कुचामन)
  • प्रवर्तक ➜ लच्छीराम — प्रसिद्ध लोक नाट्यकार [परीक्षा: स्टेनोग्राफ़र, 2024; सुप्रिटेंडेंट गार्डन, 2021 — कुचामनी ख्याल की शुरुआत किस लोक नाट्यकार ने की? ➜ लच्छी राम]
  • वर्तमान प्रसिद्ध खिलाड़ी ➜ उगमराज
  • रूप ओपेरा जैसा; लोकगीतों की प्रधानता रहती है।
  • प्रदर्शन खुले मंच पर होता है।
  • स्त्री पात्रों का अभिनय पुरुष कलाकार करते हैं।

6. हेला ख्याल

  • मुख्य प्रवर्तक ➜ हेला शायर; शुरू में कलाकार हेला जाति के थे, इसलिए नाम हेला ख्याल।
  • कई जानकार कहते हैं कि हेला देना (लम्बी टेर में आवाज़ लगाना) इसकी ख़ास अदा है, इसी से नाम पड़ा।
  • ख्याल शुरू होने से पहले बम वाद्य बजता है; मुख्य वाद्य नौबत।

7. शेखावाटी (चिड़ावा) ख्याल

  • प्रवर्तक ➜ नानूराम राणा, चिड़ावा (झुंझुनूं) निवासी — इसीलिए चिड़ावा ख्याल भी
  • लोकप्रिय करने वाले ➜ दुलिया राणा (नानूराम के शिष्य)
  • वाद्य ➜ शहनाई, ढोलक, सारंगी, हारमोनियम, नक्कारा, बाँसुरी

प्रमुख विशेषताएँ

  • इसमें पद-संचालन (पैरों की चाल) असरदार होता है।
  • गीतमय संवाद चलते हैं।
  • भाषा-शैली में संप्रेषणीयता यानी दर्शकों तक सीधी पहुँच है।

8. अलीबक्शी ख्याल

  • अलवर रियासत का एक ठिकाना था मुण्डावर; उसके शासक राव राजा अलीबक्श को इस ख्याल का प्रवर्तक माना जाता है।
  • उन्हें “अलवर का रसखान” कहा जाता है।
  • इस ख्याल का क्षेत्र ➜ मुण्डावर (खैरथल-तिजारा)।

9. ढप्पाली व किशनगढ़ी ख्याल

ख्यालक्षेत्रख़ास बात
ढप्पालीअलवर, भरतपुर, डीग, खैरथल-तिजाराएक अलग गायकी; संगीत-प्रेमियों में प्रतिस्पर्धा (मुक़ाबला) होती है
किशनगढ़ीकिशनगढ़ (अजमेर)मुख्य कलाकार बंशीधर शर्मा

10. कन्हैया ख्याल

  • इलाक़ा ➜ सवाई माधोपुर, भरतपुर, धौलपुर, दौसा, डीग और करौली।
  • मुख्य कथा का नाम “कहन” है; इसीलिए इसका दूसरा नाम कन्हैया दंगल पड़ा।
  • मुख्य पात्र “मेड़िया” कहलाता है।

11. तुर्रा-कलंगी ख्याल

पृष्ठभूमि

  • लगभग 400 साल पहले मेवाड़ के दो संत-पीर शाह अली और तुकनगीर ने इसकी रचना की।
  • दोनों के ज्ञान से प्रसन्न होकर चंदेरी नरेश ने मुकुट का तुर्रा तुकनगीर को और कलंगी शाह अली को उपहार में दी।
  • शाह अली = कलंगी के पक्षधर (पार्वती का प्रतीक); तुकनगीर = तुर्रा के पक्षधर (महादेव शिव का प्रतीक)।

कलाकार

कलाकारपहचान
स्व. जयदयाल सोनीप्रमुख कलाकार; इस ख्याल को नई पहचान दिलाई
सहेदू सिंह, चेतराम, हमीद बेग, ताराचंद, ठाकुर ओंकार सिंहअन्य कलाकार
नानालाल गंधर्ववर्तमान के प्रसिद्ध कलाकार

अलग क्या है

  • आम तौर पर लोक नाट्यों में मंच-सज्जा नहीं होती, पर यह अपवाद है — 15-20 फीट ऊँचे दो अलग मंच आमने-सामने बनते हैं और उन्हें राजस्थानी शैली में सजाया जाता है।
  • खेल रात भर चलता है; यह गैर-व्यावसायिक ख्याल है और दर्शक भी भाग ले सकते हैं।
  • काव्यात्मक संवाद “बोल” कहलाते हैं।

12. गवरी (राई) नाट्य

  • किसका ➜ भील जनजाति का धार्मिक लोक नाट्य
  • कब ➜ रक्षाबंधन के अगले दिन से 40 दिन (सवा महीना)
  • अनुमति ➜ भादवा कृष्ण प्रतिपदा को भोपा खेड़ा देवी से मंचन की आज्ञा लेता है

कथा और नाम

  • आधार ➜ शिव और भस्मासुर की कथा; मुख्य पात्र भगवान शिव।
  • गौरी (शिव की अर्धांगिनी) से ही गवरी नाम बना।
  • पार्वती का पात्र राई / रायां कहलाता है, इसीलिए इसे राई नाट्य भी कहते हैं।

पात्र

पात्रभूमिका
पुरिया / बुढ़ियामुख्य पात्र — शिव का रूप धरने वाला नर्तक
खेल्ये / खेलाअन्य सभी पात्र
झामट्यालोकभाषा में कविता बोलता है

नर्तक पुरिया को घेरकर थाली-मांदल की ताल पर नाचते हैं।

गवरी की घाई

  • इस नाट्य की कथा क्रमबद्ध नहीं होती; अलग-अलग प्रसंगों को जोड़ने वाला सामूहिक नृत्य ही “गवरी की घाई” कहलाता है।
  • स्त्री पात्र का अभिनय भी पुरुष ही करते हैं।
  • मंचन की अवधि में कलाकार शराब, माँस और हरी सब्ज़ी से परहेज़ करते हैं।

याद रखें: नृत्य शाखा में गवरी का नृत्य-रूप भी आया है; यहाँ नाट्य-रूप का पूरा ब्योरा है — दोनों एक ही चीज़ के दो पहलू हैं।

13. रम्मत, तमाशा, नौटंकी, चारबैत

नाट्यठिकानापहचान
रम्मतजैसलमेर → बीकानेरहोली पर, खुले चौक में, पाटों पर
तमाशाजयपुरध्रुपद + जयपुरी ख्याल, भट्ट परिवार
नौटंकीभरतपुर-डीग-करौलीहाथरस शैली, नौ वाद्य

14. रम्मत

उद्गम और अर्थ

  • रम्मत का जन्म जैसलमेर-बीकानेर की होली के काव्य-मुक़ाबलों (ख्यालों) से हुआ।
  • शब्द का अर्थ ➜ रमने वाला / खेलने वाला।
  • पौराणिक, ऐतिहासिक कथाओं पर रची गई काव्य-रचनाएँ जब खेली जाने लगीं तो उसे रम्मत कहा गया।

मंचन की बनावट

  • रंगभूमि है मोहल्ले या मंडी (बाज़ार) का खुला चौक। बीकानेर में होली पर काठ के पाटों का मंच बनता है और बीच के मुख्य मंच को दर्शक घेरकर बैठते हैं।
  • रम्मत खेलने वाले कलाकार “खेलार”; अधिकांश पुष्करणा ब्राह्मण; खेल रात 11 बजे से सुबह तक।
  • इसमें सभी जाति के लोग भाग लेते हैं।

प्रसिद्ध चौक और रम्मतें

रम्मत / चौकख़ास बात
आचार्यों का चौक (बीकानेर)रम्मतों के लिए प्रसिद्ध
फक्कड़ दाता की रम्मतबीकानेर में रम्मतों की शुरुआत इसी से होती है
हेड़ाऊ मेरी की रम्मत (जवाहरलाल पुरोहित)बारह गुवाड़, बीकानेर — राजस्थान की सबसे लोकप्रिय रम्मत
अमरसिंह राठौड़ री रम्मतआचार्यों के चौक में

रचनाकार और कलाकार

  • प्रमुख रचनाकार ➜ तेज कवि, सुआ महाराज, फागु महाराज, तुलसीराम, मनीराम व्यास।
  • जाने-माने खेलार ➜ गोडाजी, जीतमल, काना, सूरज, गंगादास सेवग, साँई सेवग और स्व. रामगोपाल मेहता।

तेज कवि (जैसलमेर)

जैसलमेर में रम्मत की मंडली (अखाड़ा) “श्री कृष्णा कम्पनी” नाम से तेज कवि ने खड़ी की। 1943 में उन्होंने “स्वतंत्र बावनी रम्मत” रचकर महात्मा गाँधी को भेंट की, जिससे उनके ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट निकला। वे ख़ुद पुलिस कमिश्नर के घर जा पहुँचे और बोले — “कमिश्नर, दरवाज़ा खोलो, हमें भी जेल जाना है; हिन्द न तेरा है न तेरे बाप का, हमारी मातृभूमि पर बंदीख़ाना बना दिया गया है।”

15. तमाशा

  • ठिकाना ➜ जयपुर
  • मूल ➜ मूलतः महाराष्ट्र का लोक नाट्य
  • शुरुआत ➜ महाराजा सवाई प्रतापसिंह के समय
  • भट्ट परिवार परम्परा से आज भी तमाशा का मंचन करता है; वर्तमान उस्ताद — गोपीकृष्ण भट्ट, फूलजी भट्ट, वासुदेव भट्ट।
  • तमाशा में जयपुर की मशहूर गौहर जान भी हिस्सा लेती थीं।
  • मंच खुला रहता है; संगीत, नृत्य और गायन — तीनों बराबर महत्त्व के हैं।

प्रसिद्ध तमाशे

वासुदेव भट्ट ने गोपीचन्द और हीर राँझा के तमाशे शुरू किए।

16. नौटंकी

  • एक पुरानी ख्याल शैली, जिसमें नौ प्रकार के वाद्य बजते हैं।
  • ब्रज की बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं के असली क़िस्सों पर टिकी संगीत-कला सदियों से लोगों के मन में रची-बसी है।
  • खेल ➜ भरतपुर, डीग, धौलपुर, करौली, गंगापुर (सवाई माधोपुर), सवाई माधोपुर, खैरथल-तिजारा और अलवर में।
  • प्रचलन शुरू करने वाले भूरीलाल (डीग); वे पहले हाथरस (उत्तर प्रदेश) में नौटंकी किया करते थे।

कलाकार

नामख़ास
गिरिराज प्रसाद (कामां)प्रमुख कलाकार
मास्टर नत्थाराम, मास्टर छज्जनसिंह, कृष्ण कुमारी, गुलाब बाई, श्यामसुंदरअन्य कलाकार
रामदयाल शर्मा (भरतपुर)प्रसिद्ध नौटंकी कलाकार; 2021 में पद्मश्री; “ब्रज कोकिल” और “ब्रज पपीहा” नाम से जाने जाते हैं

17. चारबैत

  • ठिकाना ➜ टोंक
  • मूल ➜ अफ़गानिस्तान की कला; शुरू में पश्तो भाषा में
  • शुरुआत ➜ नवाब फ़ैजुल्ला के समय

आम लोगों के लिए इसे स्थानीय भाषा में प्रस्तुत करने का काम राजस्थान के कलाकारों ने किया; आज यह टोंक की ख़ास पहचान है।

चारबैत की चार श्रेणियाँ

18. लीला नाट्य

लीला नाट्य राजस्थान में कई रूपों में मिलता है: रामलीला, रासलीला, रावलों की रामत, गवरी, समया, सनकादिकों की लीलाएँ तथा गरासियों की गोर लीलाएँ।

19. रामलीला

  • भारत का सबसे प्राचीन नाट्य माना जाता है; आधार — भगवान राम के जीवन-प्रसंग।
  • आरंभ गोस्वामी तुलसीदास ने काशी में किया।
रामलीलाख़ास बात
बिसाऊ (झुंझुनूं)मूक रामलीला — बिना संवाद के
जुरहरा, वेंकटेश (भरतपुर), पाटूँदा (कोटा)यहाँ की रामलीला भी प्रसिद्ध
मांगरोल (बारां)ढाई कड़ी (श्लोक) की रामलीला

20. रासलीला

  • श्रीकृष्ण के बचपन और किशोर दिनों के प्रसंग इसमें खेले जाते हैं।
  • उत्पत्ति वल्लभाचार्य द्वारा की गई मानी जाती है।
  • राजस्थान में मुख्य केन्द्र ➜ फूलेरा (जयपुर) और कामां (डीग)।

21. रावलों की रामत

  • मारवाड़ की रावल जाति की अपनी रामत है।
  • ढंग रामलीला जैसा है।
  • राम का पूरा जीवन नहीं दिखाया जाता — केवल मुख्य घटनाओं का मंचन होता है।

22. गरासियों की गोर लीलाएँ

  • कौन ➜ आबू क्षेत्र के गरासिया
  • कब ➜ वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को
  • नाम ➜ “भगवान की गणगौर” (गोर लीला)
  • गरासिया स्त्रियाँ सिर पर लकड़ी की गोर (गणगौर) और हँसर (ईसर) रखकर नाचती हैं।
  • बीच में एक पुरुष मुखौटा लगाकर तलवारबाज़ी करता है।

23. सनकादिकों की लीलाएँ

जगहक्या होता है
घोसुंडाराधा-कृष्ण का युगल स्वरूप और रासादि लीलाएँ; पात्रों के अनुरूप अवतारों के मुखौटे पहने जाते हैं
बस्सीब्रह्मा, गणेश, कालिका, हिरण्यकश्यप, नृसिंहावतार आदि की झाँकियाँ

इन दोनों जगहों पर सनकादिकों की लीलाओं के अखाड़े हैं।

24. स्वांग, कठपुतली, भवाई व अन्य

नाट्यपहचान
स्वांगनक़ल — बहरूपिया कलाकार [परीक्षा: पशु परिचर, 2024 — किस लोक नाट्य शैली में कलाकार को बहरूपिया कहा जाता है? ➜ स्वांग]
कठपुतलीभाट और नट — आडू की लकड़ी
भवाई नाट्यमूलतः गुजरात, व्यावसायिक

25. स्वांग

किसी ऐतिहासिक, पौराणिक या लोकप्रसिद्ध चरित्र या देवी-देवता की नक़ल में मेकअप और पोशाक पहनकर उसका अभिनय करना स्वांग कहलाता है। स्वांग रचने वाले को बहरूपिया कहते हैं; यह हास्य-प्रधान कला है।

कलाकार / जगहब्योरा
परशुराम (केलवा, राजसमंद)प्रसिद्ध कलाकार
जानकीलाल भांड (भीलवाड़ा)“मंकी मैन” कहलाते हैं; 2024 में पद्मश्री
घनरूप भांडजोधपुर नरेश भीमसिंह ने उन्हें “भांड” की उपाधि दी

26. कठपुतली नाट्य

  • कठपुतलियाँ मुख्यतः भाट और नट जाति के लोग नचाते हैं।
  • कठपुतली आडू की लकड़ी से बनती है।
  • प्रसिद्ध खेल ➜ सिंहासन बत्तीसी, पृथ्वीराज-संयोगिता, अमरसिंह राठौड़।

27. भवाई नाट्य

  • मूलतः गुजरात का लोक नाट्य; राजस्थान में गुजरात से सटे ज़िलों में लोकप्रिय।
  • भवाई जाति के लोग भी इसे प्रस्तुत करते हैं; व्यावसायिक लोक नाट्य है।
  • हर साल कलाकार अपने यजमान परिवारों के यहाँ पहुँचते हैं और उनका सत्कार होता है।

28. गन्धर्व नाटक

  • मारवाड़ में गन्धर्व जाति पेशेवर नृत्य और गायन करती है।
  • कथाएँ जैन धर्म से ली गई हैं।
  • संगीत नाट्य ➜ अंजना सुन्दरी और मैना सुन्दरी।

29. दंगल, दुंटिया, रसिया दंगल

दंगल (बाड़ी-बसेड़ी, धौलपुर)

  • सैकड़ों लोग दो पक्षों में आमने-सामने डट जाते हैं और बारी-बारी से नाचते-गाते हुए कोई कथा या ताज़ा घटना अपनी शैली में पेश करते हैं।
  • इसे संगीत दंगल भी कहते हैं।
  • मुख्य विषय ➜ रामायण, महाभारत।

दुंटिया

  • दूल्हे की बारात जब कन्या-पक्ष के घर चली जाती है, तो वर पक्ष की औरतें पीछे रहकर वर-वधू का नक़ली रूप धरती हैं और यह स्वांग रचती हैं — “दुंटिया / दूंटकी / खोइया”।
  • एक महिला वर और दूसरी वधू बनती है; उनका नक़ली विवाह रचाया जाता है।
  • इसमें सिर्फ़ स्त्रियाँ शामिल होती हैं; पुरुषों का आना मना है।

रसिया दंगल — डीग

रसिया दंगल का ठिकाना डीग है (रासलीला के साथ भी इसका ज़िक्र आता है)।

30. रियासती रंगमंच व कलाकार

रंगमंच / संस्थास्थानब्योरा
रामप्रकाश थियेटरजयपुरराजस्थान का पहला पारसी थियेटर; 1878 में महाराजा रामसिंह द्वितीय ने बनवाया
मारवाड़ नाटक संस्थाजोधपुरस्व. लक्ष्मणदास डांगी ने 1897 में स्थापित की; संस्था ने पारसी ढंग (पारसी रंगमंच प्रणाली) पर आधारित अनेक नाटक खेले
भवानी नाट्यशालाझालावाड़शासक भवानी सिंह ने 1921 में ऑपेरा शैली पर बनवाई

प्रसिद्ध नाट्य कलाकार

  • नाट्य जगत के प्रमुख नाम ➜ कन्हैयालाल पँवार, मास्टर नैनूराम, माणिक्यलाल डाँगी, गणपतलाल डाँगी।
  • राजस्थानी नाटकों के जनक और निर्देशक — कन्हैयालाल पँवार।

31. रैपिड फायर तथ्य

  • ख्याल का अर्थ ➜ खेल; सूत्रधार को हलकारा कहते हैं
  • कुचामनी ख्याल के प्रवर्तक ➜ लच्छीराम
  • शेखावाटी (चिड़ावा) ख्याल के प्रवर्तक ➜ नानूराम राणा; लोकप्रिय बनाने वाले दुलिया राणा
  • अलीबक्शी ख्याल ➜ मुण्डावर के राव राजा अलीबक्श; उन्हें «अलवर का रसखान» कहा जाता है
  • तुर्रा-कलंगी के दो पक्ष ➜ तुकनगीर तुर्रा (शिव) के और शाह अली कलंगी (पार्वती) के पक्षधर
  • कन्हैया ख्याल ➜ मुख्य कथा «कहन», मुख्य पात्र «मेड़िया»
  • जयपुरी ख्याल में स्त्री पात्रों की भूमिका स्त्रियाँ ही निभाती हैं, जबकि कुचामनी में पुरुष।
  • गवरी किसका नाट्य ➜ भील जनजाति का; रक्षाबंधन के अगले दिन से 40 दिन
  • गवरी में पार्वती का पात्र ➜ राई / रायां, इसीलिए इसे राई नाट्य भी कहते हैं

अगले भाग में राजस्थान की छह प्रमुख लोक गायन शैलियाँ — हर एक का क्षेत्र, कलाकार और वाद्य — और साथ में ध्रुपद गायन, संगीत घराने तथा संगीतज्ञ।

पिछला भाग: राजस्थान के लोक नृत्य: जातीय लोकनृत्य

अगला भाग: लोक गायन शैलियाँ एवं प्रमुख संगीतज्ञ व कलाकार

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के लोक नृत्य · लोक गायन शैलियाँ, संगीत घराने व संगीतज्ञ

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न राजस्थान के प्रमुख लोक नाट्य के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
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