हर शैली को तीन बातों से पहचानिए — किस राजा या महाराणा के समय की है, उसका स्वर्णकाल कौन-सा रहा और प्रमुख चित्रकार कौन थे। मेवाड़ के महाराणाओं का काल-क्रम समझ लें तो आगे की शैलियाँ अपनी जगह बैठ जाती हैं। इस भाग में कलीला दमना व पंचतंत्र, नाथद्वारा, चावंड, देवगढ़ और शाहपुरा के बाद मारवाड़ स्कूल की जोधपुर और बीकानेर शैलियाँ आई हैं। परीक्षा का नाम उन्हीं तथ्यों के साथ लगा है जो पहले पूछे जा चुके हैं।
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1. महाराणाओं का काल-क्रम
| महाराणा | शासन | चित्र-कार्य |
|---|---|---|
| जगतसिंह प्रथम | 1628–1652 | लघुचित्र शैली का स्वर्णिम युग — रागमाला (1628), रसिक प्रिया (1628–30), गीतगोविन्द (1629), भागवत पुराण (1648, साहिबदीन), रामायण (1649, मनोहर), आर्ष रामायण (1649–53, साहिबदीन) |
| जयसिंह | 1680–1698 | लघुचित्रों का निर्माण अधिक हुआ |
| अमरसिंह द्वितीय | 1698–1710 | रसिक प्रिया के 40 लघुचित्र उल्लेखनीय |
- जगतसिंह प्रथम के समय के प्रमुख चित्रकार — नसीरुद्दीन, साहबदीन, मनोहर।
- इसी काल में मेवाड़ शैली पर पहली बार मुग़ल शैली का प्रभाव पड़ा।
- उदयपुर के राजमहल में जगतसिंह प्रथम ने चित्रकला का विद्यालय बनवाया — “चितेरों की ओवरी” (तस्वीरां रो कारखानो)।
ट्रिक: तीन “रामायण-भागवत” वर्ष एक साथ — 1648 भागवत, 1649 रामायण, 1649–53 आर्ष रामायण; भागवत व आर्ष रामायण में साहिबदीन, रामायण में मनोहर।
2. कलीला दमना और पंचतंत्र
पंचतंत्र से कलीला दमना तक
- विष्णु शर्मा — पंचतंत्र के रचयिता
- फ़ारसी अनुवाद — अन्वारे सुहैली (मुल्ला हुसैन वाइज़ काशिफ़ी) और अयारे दानिश (अबुल फ़ज़ल)
- पंचतंत्र का एक रूप — कलीला दमना
- कलीला दमना एक रूपात्मक कहानी है, जिसके दो पात्र दो गीदड़ हैं — कलीला सरल स्वभाव का और दमना बुरे स्वभाव का।
- मेवाड़ चित्रों में इसे नुरुद्दीन ने बनाया (संग्रामसिंह द्वितीय के समय)।
- अलबरूनी ने सबसे पहले पता लगाया कि कलीला दमना असल में पंचतंत्र का अनुवाद है।
ट्रिक: दो गीदड़ों के नाम से पहचानें — कलीला = कोमल (सरल), दमना = दुष्ट।
3. नाथद्वारा शैली
- उद्भव ➜ 1672 ई. — महाराणा राजसिंह के समय
- कारण ➜ सिहाड़ गाँव (नाथद्वारा) में श्रीनाथजी की मूर्ति की स्थापना
- पीठ ➜ पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय का देश भर में जाना-माना मुख्य केन्द्र
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- इस शैली की अपनी मौलिक देन हैं श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे शोभा के लिए टाँगे जाने वाले विशाल कपड़ा-चित्र; इन्हें पिछवाई नाम मिला।
- चित्रों में दिखते हैं ➜ कृष्ण की बाल-लीलाएँ, यशोदा-नंद, ग्वाल-बाल और गोपियाँ, गोवर्धन पर्वत, गायों के झुंड, श्रीनाथजी का स्वरूप, ऊपर आसमान में देवता, पीछे घना वन व केले के पेड़; वल्लभ सम्प्रदाय के संतों के चित्र भी ख़ास तौर पर बने।
चित्रकार
ध्यान दें: महिला चित्रकार — कमला और इलायची (नाथद्वारा उप-शैली)। परीक्षा में यही जोड़ी पूछी गई है।
4. चावंड शैली
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| प्रताप का काल | शैली का आरम्भ | चावंड शैली की शुरुआत महाराणा प्रताप के समय हुई। |
| 1592 ई. | ढोला-मारू चित्र | प्रताप के काल का यह चित्र आज राष्ट्रीय संग्रहालय (दिल्ली) की निधि है। |
| 1605 ई. | रागमाला | चित्रकार निसारदीन ने महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में चावंड में रागमाला बनाई — यही इस शैली का स्वर्णकाल। |
- प्रमुख चित्र ➜ रागमाला, ढोला-मारू
- प्रमुख चित्रकार ➜ निसारदीन
- स्वर्णकाल ➜ अमरसिंह प्रथम
5. देवगढ़ उप-शैली
- स्थापना ➜ 1680 ई. — महाराणा जयसिंह के समय रावत द्वारिकादास चूंडावत ने देवगढ़ ठिकाना बसाया
- उद्भव का कारण ➜ द्वारिकादास की चित्रकला में रुचि
- स्वरूप ➜ मारवाड़ + मेवाड़ + जयपुर शैलियों का मेल
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
प्रमुख चित्रकार
- अमेरिका में चोखा-बख्ता के चित्रों पर अध्ययन हो चुका है।
- चित्र-विषय ➜ हाथियों की भिड़ंत, शिकार, कृष्णलीला, अन्तःपुर, शृंगार, सवारी, राजसी ठाठ और प्रकृति के दृश्य।
- भित्ति चित्र देवगढ़ की “अजारा की ओवरी” और “मोती महल” में मिलते हैं।
6. शाहपुरा उप-शैली
- यह शैली शाहपुरा (भीलवाड़ा) में पनपी; यहाँ की प्रसिद्ध फड़ चित्रकारी में इसी का प्रयोग हुआ है।
- मेवाड़ की परम्परा की नींव पर यहाँ आम जन-जीवन से जुड़ी फड़-चित्रण की अपनी शैली पनपी।
- मंदिरों-भवनों में भित्ति चित्र और फड़ की परम्परा बढ़ाने में योगदान — श्रीलाल जोशी, पार्वती जोशी, शान्तिलाल जोशी, दुर्गालाल जोशी।
याद रखें: फड़ के बारे में विस्तार से हस्तकला वाले अध्याय में पढ़ें; यहाँ बस इतना याद रखें — शाहपुरा = फड़ + जोशी परिवार।
7. मारवाड़ स्कूल
मारवाड़ की चित्रकला का वैभव मूल रूप से जोधपुर की दरबारी शैली में दिखता है; जैसलमेर, नागौर और अजमेर के कुछ हिस्सों में भी इसका असर पड़ा। 7वीं सदी में तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ ने मारू देश के चित्रकार श्रृंगधर का ज़िक्र किया; यक्ष शैली को पश्चिमी भारत में पहली बार इसी चित्रकार ने जन्म दिया।
8. जोधपुर शैली
- आरम्भ ➜ 16वीं सदी का उत्तरार्द्ध
- पहला प्रभाव ➜ अजंता चित्रशैली
- स्वर्णकाल ➜ महाराजा मानसिंह (1803–43)
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
आरम्भ से अभयसिंह तक
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1591 | उत्तराध्ययन सूत्र | जोधपुर शैली का प्रमुख चित्र; बड़ौदा संग्रहालय में सुरक्षित। [परीक्षा: स्कूल व्याख्याता, 2024 — मतिराम के “रसराज” पर आधारित 63 चित्र किस शैली से जुड़े हैं? ➜ जोधपुर] |
| 1595–1619 | सूरसिंह | उत्कृष्ट चित्र भागवत पुराण और ढोला-मारू। इसी काल में मुग़ल प्रभाव शुरू। |
| 1610 | भागवत पुराण (मुग़ल असर का पहला दर्शन) | कृष्ण-अर्जुन की आकृतियाँ स्थानीय शैली की हैं, पर उनका पहनावा मुग़लों जैसा। |
| 1623 | रागमाला चित्रावली | कलाकार वीरजी ने पाली के वीर विट्ठलदास चाँपावत के लिए बनाया; इकहरी वसली पर छोटे आकार का यह सैट शुद्ध राजस्थानी शैली का है और ख़ूब प्रसिद्ध हुआ। [परीक्षा: स्टेनोग्राफर, 2024 — पाली के विट्ठलदास चाँपावत के लिए “रागमाला चित्रावली” किसने बनाई? ➜ वीरजी] |
मानसिंह का स्वर्णकाल
- महाराजा मानसिंह (1803–43) के समय जोधपुर शैली चरम पर थी।
- वे नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी थे — नाथों से जुड़े असंख्य चित्र बनवाए।
- चित्रित ग्रंथ ➜ शिव पुराण, शिव रहस्य, देवी महात्म्य, सिद्ध-सिद्धान्त, कामसूत्र, पंचतंत्र।
मानसिंह के समय के चित्रकार
जोधपुर शैली की पहचान
प्रेम-कथाओं के प्रमुख चित्र
- अन्य दृश्य ➜ रेत के ऊँचे टीले, जंगल में पड़ाव, झाड़ियाँ, आम के पेड़, ऊँट-घोड़े-कुत्ते और दरबारी जीवन।
- पुरुष ➜ लम्बे-चौड़े गठीले बदन, गलमुच्छ, ऊँची पगड़ी और राजसी वस्त्र-आभूषण।
- स्त्रियाँ ➜ ठेठ राजस्थानी पोशाक में, लहँगा-ओढ़नी पहने और लाल फूँदनों से सजी।
इस शैली पर किताब/फ़िल्म
- रामावतार अग्रवाल ने मारवाड़ म्यूरल्स में मारवाड़ चित्रकला का परिचय दिया।
- अनु मल्होत्रा ने जोधपुर के महाराजा गजसिंह द्वितीय (“बापजी”) पर वृत्तचित्र बनाया — द महाराजा ऑफ जोधपुर: द लेगेसी लिव्स ऑन।
9. बीकानेर शैली
- आरम्भ ➜ 16वीं सदी का अंत
- सबसे पुराना चित्र ➜ भागवत पुराण — महाराजा रायसिंह के समय
- स्वर्णकाल ➜ महाराजा अनूपसिंह (1669–98)
उद्भव, उस्ता व मथेरण
शैली कैसे बनी
- रायसिंह मुग़ल कारीगरों की निपुणता पर मुग्ध हुए और 7 उस्ता कलाकार अपने साथ ले आए
- इनमें अली राजा उस्ता और हामिद रूकनुद्दीन उस्ता प्रमुख
- इन्हीं की कृतियों से बीकानेर शैली बनी
| परिवार | पहचान | कलाकार |
|---|---|---|
| मथेरण | जैन परम्परा से मिली-जुली राजस्थानी चित्रकारी में माहिर | मुन्नालाल, मुकुंद, चंदुलाल, जयकिशन, रामकिशन |
| उस्ता | मुग़ल दरबार से आया परिवार; मुग़ल शैली में कुशल; सोने के काम से सजी ऊँट-खाल की चित्रकारी (मनोती / मुनव्वती कला) — बीकानेर की निजी विशेषता | रूकनुद्दीन उस्ता, हिसामुद्दीन उस्ता (दुलमेरा), साहिबदीन, कायम उस्ता |
- अनूपसिंह के समय के कलाकार ➜ रामलाल, अली राजा, हसन आदि; उस्ता परिवार ने हिन्दू कथाओं और संस्कृत-हिन्दी-राजस्थानी काव्यों पर सैकड़ों चित्र बनाए — यही चरमोत्कर्ष था।
- महाराजा गजसिंह ने लाहौर के नामी चित्रकार शाह मोहम्मद को अपना दरबारी चित्रकार बना लिया।
- शैली पर मुग़ल, जैन और उत्तर शैली का असर रहा।
पहचान व चित्रकार
- मुख्य चित्र-विषय ➜ रागमाला, बारहमासा, सामंती शान और शिकार की महफ़िल।
- इकहरी तन्वंगी कोमल नायिकाएँ; नीला, हरा, लाल, बैंगनी, जामुनी और सलेटी रंग।
- शाहजहाँ व औरंगज़ेब शैली की पगड़ियाँ और साथ में ऊँची मारवाड़ी पगड़ियाँ; ऊँट, हिरण और राजपूती संस्कृति।
संरक्षण व आधुनिक योगदान
- कला-समीक्षक हरमन गोइट्ज की कृति आर्ट एंड आर्किटेक्चर ऑफ़ बीकानेर ने बीकानेर के चित्रों को सँजोने में बड़ी भूमिका निभाई।
- यथार्थवादी शैली के जर्मन मूल के चित्रकार ए. एच. मूलर की कृतियाँ बीकानेर के गंगा गोल्डन जुबली संग्रहालय में रखी हैं।
- मूलर का प्रसिद्ध चित्र ➜ “पृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर) महाराणा प्रताप को पत्र लिखते हुए” — बीकानेर संग्रहालय में सुरक्षित।
10. रैपिड फायर तथ्य
- जगतसिंह प्रथम (1628–1652) ➜ मेवाड़ शैली का स्वर्णिम युग; इसी काल में पहली बार मुग़ल शैली का असर पड़ा
- नाथद्वारा शैली ➜ 1672 ई., महाराणा राजसिंह; मौलिक देन पिछवाई; महिला चित्रकार कमला और इलायची
- चावंड शैली ➜ प्रताप के काल में शुरू; 1605 ई. में निसारदीन की रागमाला — स्वर्णकाल अमरसिंह प्रथम
- देवगढ़ उप-शैली ➜ 1680 ई., रावत द्वारिकादास चूंडावत; मारवाड़, मेवाड़ और जयपुर शैलियों का मेल
- शाहपुरा उप-शैली ➜ फड़ चित्रकारी; जोशी परिवार के कलाकार
- कलीला दमना ➜ पंचतंत्र का एक रूप; दो गीदड़ पात्र; मेवाड़ में नुरुद्दीन ने बनाया; अलबरूनी ने इसका पंचतंत्र-अनुवाद होना पहचाना
- जोधपुर शैली ➜ 16वीं सदी के उत्तरार्द्ध में आरम्भ; स्वर्णकाल महाराजा मानसिंह (1803–43)
- वीरजी ➜ 1623 में पाली के वीर विट्ठलदास चाँपावत के लिए रागमाला बनाई (स्टेनोग्राफर 2024 में पूछा गया)
- बीकानेर शैली ➜ रायसिंह के समय भागवत पुराण सबसे पुराना; स्वर्णकाल अनूपसिंह (1669–98); 7 उस्ता कलाकार साथ आए
अगले भाग में मारवाड़ की किशनगढ़, जैसलमेर, अजमेर और नागौर-घाणेराव शैलियाँ, फिर हाड़ौती स्कूल की बूँदी, कोटा और झालावाड़ शैलियाँ।
पिछला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: चित्रकला का परिचय एवं मेवाड़ स्कूल (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: मारवाड़ स्कूल (भाग 2) एवं हाड़ौती स्कूल
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