राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: मेवाड़ स्कूल (भाग 2) एवं मारवाड़ स्कूल (भाग 1) – Rajasthan Art and Culture Chapter 13

मेवाड़ की नाथद्वारा, चावंड, देवगढ़, शाहपुरा शैलियाँ और मारवाड़ स्कूल की जोधपुर-बीकानेर शैली, PYQ सहित।

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In this chapter (10 sections)
  1. महाराणाओं का काल-क्रम
  2. कलीला दमना और पंचतंत्र
  3. नाथद्वारा शैली
  4. चावंड शैली
  5. देवगढ़ उप-शैली
  6. शाहपुरा उप-शैली
  7. मारवाड़ स्कूल
  8. जोधपुर शैली
  9. बीकानेर शैली
  10. रैपिड फायर तथ्य

हर शैली को तीन बातों से पहचानिए — किस राजा या महाराणा के समय की है, उसका स्वर्णकाल कौन-सा रहा और प्रमुख चित्रकार कौन थे। मेवाड़ के महाराणाओं का काल-क्रम समझ लें तो आगे की शैलियाँ अपनी जगह बैठ जाती हैं। इस भाग में कलीला दमना व पंचतंत्र, नाथद्वारा, चावंड, देवगढ़ और शाहपुरा के बाद मारवाड़ स्कूल की जोधपुर और बीकानेर शैलियाँ आई हैं। परीक्षा का नाम उन्हीं तथ्यों के साथ लगा है जो पहले पूछे जा चुके हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ, 8 चॉक-बोर्ड चित्र, 20 नक्शे, 25 फ्लैशकार्ड और 15 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. महाराणाओं का काल-क्रम

महाराणाशासनचित्र-कार्य
जगतसिंह प्रथम1628–1652लघुचित्र शैली का स्वर्णिम युग — रागमाला (1628), रसिक प्रिया (1628–30), गीतगोविन्द (1629), भागवत पुराण (1648, साहिबदीन), रामायण (1649, मनोहर), आर्ष रामायण (1649–53, साहिबदीन)
जयसिंह1680–1698लघुचित्रों का निर्माण अधिक हुआ
अमरसिंह द्वितीय1698–1710रसिक प्रिया के 40 लघुचित्र उल्लेखनीय
  • जगतसिंह प्रथम के समय के प्रमुख चित्रकार — नसीरुद्दीन, साहबदीन, मनोहर।
  • इसी काल में मेवाड़ शैली पर पहली बार मुग़ल शैली का प्रभाव पड़ा।
  • उदयपुर के राजमहल में जगतसिंह प्रथम ने चित्रकला का विद्यालय बनवाया — “चितेरों की ओवरी” (तस्वीरां रो कारखानो)।

ट्रिक: तीन “रामायण-भागवत” वर्ष एक साथ — 1648 भागवत, 1649 रामायण, 1649–53 आर्ष रामायण; भागवत व आर्ष रामायण में साहिबदीन, रामायण में मनोहर।

2. कलीला दमना और पंचतंत्र

पंचतंत्र से कलीला दमना तक

  1. विष्णु शर्मा — पंचतंत्र के रचयिता
  2. फ़ारसी अनुवाद — अन्वारे सुहैली (मुल्ला हुसैन वाइज़ काशिफ़ी) और अयारे दानिश (अबुल फ़ज़ल)
  3. पंचतंत्र का एक रूप — कलीला दमना
  • कलीला दमना एक रूपात्मक कहानी है, जिसके दो पात्र दो गीदड़ हैं — कलीला सरल स्वभाव का और दमना बुरे स्वभाव का।
  • मेवाड़ चित्रों में इसे नुरुद्दीन ने बनाया (संग्रामसिंह द्वितीय के समय)।
  • अलबरूनी ने सबसे पहले पता लगाया कि कलीला दमना असल में पंचतंत्र का अनुवाद है।

ट्रिक: दो गीदड़ों के नाम से पहचानें — कलीला = कोमल (सरल), दमना = दुष्ट।

3. नाथद्वारा शैली

  • उद्भव ➜ 1672 ई. — महाराणा राजसिंह के समय
  • कारण ➜ सिहाड़ गाँव (नाथद्वारा) में श्रीनाथजी की मूर्ति की स्थापना
  • पीठ ➜ पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय का देश भर में जाना-माना मुख्य केन्द्र

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

  • इस शैली की अपनी मौलिक देन हैं श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे शोभा के लिए टाँगे जाने वाले विशाल कपड़ा-चित्र; इन्हें पिछवाई नाम मिला।
  • चित्रों में दिखते हैं ➜ कृष्ण की बाल-लीलाएँ, यशोदा-नंद, ग्वाल-बाल और गोपियाँ, गोवर्धन पर्वत, गायों के झुंड, श्रीनाथजी का स्वरूप, ऊपर आसमान में देवता, पीछे घना वन व केले के पेड़; वल्लभ सम्प्रदाय के संतों के चित्र भी ख़ास तौर पर बने।

चित्रकार

ध्यान दें: महिला चित्रकार — कमला और इलायची (नाथद्वारा उप-शैली)। परीक्षा में यही जोड़ी पूछी गई है।

4. चावंड शैली

काल / क्रमघटनाविवरण
प्रताप का कालशैली का आरम्भचावंड शैली की शुरुआत महाराणा प्रताप के समय हुई।
1592 ई.ढोला-मारू चित्रप्रताप के काल का यह चित्र आज राष्ट्रीय संग्रहालय (दिल्ली) की निधि है।
1605 ई.रागमालाचित्रकार निसारदीन ने महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में चावंड में रागमाला बनाई — यही इस शैली का स्वर्णकाल।
  • प्रमुख चित्र ➜ रागमाला, ढोला-मारू
  • प्रमुख चित्रकार ➜ निसारदीन
  • स्वर्णकाल ➜ अमरसिंह प्रथम

5. देवगढ़ उप-शैली

  • स्थापना ➜ 1680 ई. — महाराणा जयसिंह के समय रावत द्वारिकादास चूंडावत ने देवगढ़ ठिकाना बसाया
  • उद्भव का कारण ➜ द्वारिकादास की चित्रकला में रुचि
  • स्वरूप ➜ मारवाड़ + मेवाड़ + जयपुर शैलियों का मेल

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

प्रमुख चित्रकार

  • अमेरिका में चोखा-बख्ता के चित्रों पर अध्ययन हो चुका है।
  • चित्र-विषय ➜ हाथियों की भिड़ंत, शिकार, कृष्णलीला, अन्तःपुर, शृंगार, सवारी, राजसी ठाठ और प्रकृति के दृश्य।
  • भित्ति चित्र देवगढ़ की “अजारा की ओवरी” और “मोती महल” में मिलते हैं।

6. शाहपुरा उप-शैली

  • यह शैली शाहपुरा (भीलवाड़ा) में पनपी; यहाँ की प्रसिद्ध फड़ चित्रकारी में इसी का प्रयोग हुआ है।
  • मेवाड़ की परम्परा की नींव पर यहाँ आम जन-जीवन से जुड़ी फड़-चित्रण की अपनी शैली पनपी।
  • मंदिरों-भवनों में भित्ति चित्र और फड़ की परम्परा बढ़ाने में योगदान — श्रीलाल जोशी, पार्वती जोशी, शान्तिलाल जोशी, दुर्गालाल जोशी।

याद रखें: फड़ के बारे में विस्तार से हस्तकला वाले अध्याय में पढ़ें; यहाँ बस इतना याद रखें — शाहपुरा = फड़ + जोशी परिवार।

7. मारवाड़ स्कूल

मारवाड़ की चित्रकला का वैभव मूल रूप से जोधपुर की दरबारी शैली में दिखता है; जैसलमेर, नागौर और अजमेर के कुछ हिस्सों में भी इसका असर पड़ा। 7वीं सदी में तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ ने मारू देश के चित्रकार श्रृंगधर का ज़िक्र किया; यक्ष शैली को पश्चिमी भारत में पहली बार इसी चित्रकार ने जन्म दिया।

8. जोधपुर शैली

  • आरम्भ ➜ 16वीं सदी का उत्तरार्द्ध
  • पहला प्रभाव ➜ अजंता चित्रशैली
  • स्वर्णकाल ➜ महाराजा मानसिंह (1803–43)

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

आरम्भ से अभयसिंह तक

काल / क्रमघटनाविवरण
1591उत्तराध्ययन सूत्रजोधपुर शैली का प्रमुख चित्र; बड़ौदा संग्रहालय में सुरक्षित। [परीक्षा: स्कूल व्याख्याता, 2024 — मतिराम के “रसराज” पर आधारित 63 चित्र किस शैली से जुड़े हैं? ➜ जोधपुर]
1595–1619सूरसिंहउत्कृष्ट चित्र भागवत पुराण और ढोला-मारू। इसी काल में मुग़ल प्रभाव शुरू।
1610भागवत पुराण (मुग़ल असर का पहला दर्शन)कृष्ण-अर्जुन की आकृतियाँ स्थानीय शैली की हैं, पर उनका पहनावा मुग़लों जैसा।
1623रागमाला चित्रावलीकलाकार वीरजी ने पाली के वीर विट्ठलदास चाँपावत के लिए बनाया; इकहरी वसली पर छोटे आकार का यह सैट शुद्ध राजस्थानी शैली का है और ख़ूब प्रसिद्ध हुआ। [परीक्षा: स्टेनोग्राफर, 2024 — पाली के विट्ठलदास चाँपावत के लिए “रागमाला चित्रावली” किसने बनाई? ➜ वीरजी]

मानसिंह का स्वर्णकाल

  • महाराजा मानसिंह (1803–43) के समय जोधपुर शैली चरम पर थी।
  • वे नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी थे — नाथों से जुड़े असंख्य चित्र बनवाए।
  • चित्रित ग्रंथ ➜ शिव पुराण, शिव रहस्य, देवी महात्म्य, सिद्ध-सिद्धान्त, कामसूत्र, पंचतंत्र।

मानसिंह के समय के चित्रकार

जोधपुर शैली की पहचान

प्रेम-कथाओं के प्रमुख चित्र

  • अन्य दृश्य ➜ रेत के ऊँचे टीले, जंगल में पड़ाव, झाड़ियाँ, आम के पेड़, ऊँट-घोड़े-कुत्ते और दरबारी जीवन।
  • पुरुष ➜ लम्बे-चौड़े गठीले बदन, गलमुच्छ, ऊँची पगड़ी और राजसी वस्त्र-आभूषण।
  • स्त्रियाँ ➜ ठेठ राजस्थानी पोशाक में, लहँगा-ओढ़नी पहने और लाल फूँदनों से सजी।

इस शैली पर किताब/फ़िल्म

  • रामावतार अग्रवाल ने मारवाड़ म्यूरल्स में मारवाड़ चित्रकला का परिचय दिया।
  • अनु मल्होत्रा ने जोधपुर के महाराजा गजसिंह द्वितीय (“बापजी”) पर वृत्तचित्र बनाया — द महाराजा ऑफ जोधपुर: द लेगेसी लिव्स ऑन।

9. बीकानेर शैली

  • आरम्भ ➜ 16वीं सदी का अंत
  • सबसे पुराना चित्र ➜ भागवत पुराण — महाराजा रायसिंह के समय
  • स्वर्णकाल ➜ महाराजा अनूपसिंह (1669–98)

उद्भव, उस्ता व मथेरण

शैली कैसे बनी

  1. रायसिंह मुग़ल कारीगरों की निपुणता पर मुग्ध हुए और 7 उस्ता कलाकार अपने साथ ले आए
  2. इनमें अली राजा उस्ता और हामिद रूकनुद्दीन उस्ता प्रमुख
  3. इन्हीं की कृतियों से बीकानेर शैली बनी
परिवारपहचानकलाकार
मथेरणजैन परम्परा से मिली-जुली राजस्थानी चित्रकारी में माहिरमुन्नालाल, मुकुंद, चंदुलाल, जयकिशन, रामकिशन
उस्तामुग़ल दरबार से आया परिवार; मुग़ल शैली में कुशल; सोने के काम से सजी ऊँट-खाल की चित्रकारी (मनोती / मुनव्वती कला) — बीकानेर की निजी विशेषतारूकनुद्दीन उस्ता, हिसामुद्दीन उस्ता (दुलमेरा), साहिबदीन, कायम उस्ता
  • अनूपसिंह के समय के कलाकार ➜ रामलाल, अली राजा, हसन आदि; उस्ता परिवार ने हिन्दू कथाओं और संस्कृत-हिन्दी-राजस्थानी काव्यों पर सैकड़ों चित्र बनाए — यही चरमोत्कर्ष था।
  • महाराजा गजसिंह ने लाहौर के नामी चित्रकार शाह मोहम्मद को अपना दरबारी चित्रकार बना लिया।
  • शैली पर मुग़ल, जैन और उत्तर शैली का असर रहा।

पहचान व चित्रकार

  • मुख्य चित्र-विषय ➜ रागमाला, बारहमासा, सामंती शान और शिकार की महफ़िल।
  • इकहरी तन्वंगी कोमल नायिकाएँ; नीला, हरा, लाल, बैंगनी, जामुनी और सलेटी रंग।
  • शाहजहाँ व औरंगज़ेब शैली की पगड़ियाँ और साथ में ऊँची मारवाड़ी पगड़ियाँ; ऊँट, हिरण और राजपूती संस्कृति।

संरक्षण व आधुनिक योगदान

  • कला-समीक्षक हरमन गोइट्ज की कृति आर्ट एंड आर्किटेक्चर ऑफ़ बीकानेर ने बीकानेर के चित्रों को सँजोने में बड़ी भूमिका निभाई।
  • यथार्थवादी शैली के जर्मन मूल के चित्रकार ए. एच. मूलर की कृतियाँ बीकानेर के गंगा गोल्डन जुबली संग्रहालय में रखी हैं।
  • मूलर का प्रसिद्ध चित्र ➜ “पृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर) महाराणा प्रताप को पत्र लिखते हुए” — बीकानेर संग्रहालय में सुरक्षित।

10. रैपिड फायर तथ्य

  • जगतसिंह प्रथम (1628–1652) ➜ मेवाड़ शैली का स्वर्णिम युग; इसी काल में पहली बार मुग़ल शैली का असर पड़ा
  • नाथद्वारा शैली ➜ 1672 ई., महाराणा राजसिंह; मौलिक देन पिछवाई; महिला चित्रकार कमला और इलायची
  • चावंड शैली ➜ प्रताप के काल में शुरू; 1605 ई. में निसारदीन की रागमाला — स्वर्णकाल अमरसिंह प्रथम
  • देवगढ़ उप-शैली ➜ 1680 ई., रावत द्वारिकादास चूंडावत; मारवाड़, मेवाड़ और जयपुर शैलियों का मेल
  • शाहपुरा उप-शैली ➜ फड़ चित्रकारी; जोशी परिवार के कलाकार
  • कलीला दमना ➜ पंचतंत्र का एक रूप; दो गीदड़ पात्र; मेवाड़ में नुरुद्दीन ने बनाया; अलबरूनी ने इसका पंचतंत्र-अनुवाद होना पहचाना
  • जोधपुर शैली ➜ 16वीं सदी के उत्तरार्द्ध में आरम्भ; स्वर्णकाल महाराजा मानसिंह (1803–43)
  • वीरजी ➜ 1623 में पाली के वीर विट्ठलदास चाँपावत के लिए रागमाला बनाई (स्टेनोग्राफर 2024 में पूछा गया)
  • बीकानेर शैली ➜ रायसिंह के समय भागवत पुराण सबसे पुराना; स्वर्णकाल अनूपसिंह (1669–98); 7 उस्ता कलाकार साथ आए

अगले भाग में मारवाड़ की किशनगढ़, जैसलमेर, अजमेर और नागौर-घाणेराव शैलियाँ, फिर हाड़ौती स्कूल की बूँदी, कोटा और झालावाड़ शैलियाँ।

पिछला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: चित्रकला का परिचय एवं मेवाड़ स्कूल (भाग 1)

अगला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: मारवाड़ स्कूल (भाग 2) एवं हाड़ौती स्कूल

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान की हस्तकलाएँ · आमेर का कछवाहा राजवंश

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
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