कुलदेवी और इष्टदेवी का फ़र्क़ समझ लेने से देवियों वाला बड़ा हिस्सा आसान हो जाता है — कुलदेवी वंश की होती है, इष्टदेवी व्यक्ति की। इस भाग में शक्ति-पूजा का आरम्भ, रियासतों व जातियों की कुलदेवियाँ, फिर उदयपुर संभाग, कोटा संभाग, कैला देवी, चौथ माता, शीला देवी और शीतला माता आते हैं। जिन तथ्यों पर पिछली परीक्षाओं में प्रश्न बन चुका है, उनके साथ परीक्षा का नाम जोड़ा गया है।
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1. शक्ति-पूजा का आरम्भ
पुरातत्व और अभिलेखों के आधार पर माना जाता है कि राजस्थान में शक्ति-पूजा ईसा की पहली सदी के आरम्भ से चल पड़ी थी।
- सबसे प्रारम्भिक पुरातात्त्विक उदाहरण नगर (टोंक) से मिला पकी मिट्टी का एक ठीकरा है, जो अब आमेर संग्रहालय में सुरक्षित है।
- अर्धचित्र की देवी महिष-असुर को घुटने (जानु) पर टिकाए उसका संहार करती दिखती हैं।
कुलदेवी और इष्टदेवी
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कुलदेवी | वंश-परिवार की रक्षा करने वाली वह देवी, जिसकी मेहरबानी से कुल फला-फूला माना जाए। पूरे कुल की एक ही होती है। |
| इष्टदेवी | व्यक्ति की जन्म-तिथि, राशि अथवा कुण्डली के लग्न से तय होती है; या किसी देवी का चमत्कार देखकर श्रद्धा से अपना ली जाती है। |
ट्रिक: कुलदेवी = वंश की (एक, पीढ़ियों से); इष्टदेवी = व्यक्ति की (चुनी हुई, बदल भी सकती है)।
2. रियासतों की कुलदेवियाँ
| रियासत | कुलदेवी |
|---|---|
| बीकानेर | करणी माता |
| जोधपुर | नागणेची माता |
| उदयपुर | बाणमाता |
| जैसलमेर | स्वांगिया माता |
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3. जातियों की कुलदेवियाँ
| जाति | कुलदेवी |
|---|---|
| सिरवी | आईजी माता |
| कल्ला | लटियाली माता |
| खण्डेलवाल | सकराय माता |
| ओसवाल | सच्चियाय माता |
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ध्यान दें: कंजर जाति की देवी दो हैं — चौथ माता (चौथ का बरवाड़ा) और रक्तदंजी माता (संथूर, बूँदी)। बिस्सा जाति की देवी आशापुरा पोकरण वाली।
4. उदयपुर संभाग
| ज़िला | देवियाँ |
|---|---|
| उदयपुर | महामाया (मावली) · ऊँटाला · हिचकी · जावर · बाणमाता (नागदा) |
| सलूम्बर | इडाणा माता (बम्बोरा) |
| चित्तौड़गढ़ | बाणमाता · तुलजा भवानी · आवरी · बड़ली · जोगनिया · बिरवड़ी |
| राजसमंद | घेवर · आमजा · पिपला · चारभुजा · जलदेवी · बाणमाता (केलवाड़ा) |
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5. उदयपुर व सलूम्बर की देवियाँ
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| महामाया / मावली माता | उदयपुर | शिशु-रक्षक लोकदेवी |
| ऊँटाला माता | वल्लभनगर (उदयपुर) | मंदिर वल्लभनगर में |
| हिचकी माता | सनवाड़ (उदयपुर) | हिचकी (रोग) दूर करने वाली देवी मानी जाती हैं |
इडाणा माता — बम्बोरा (सलूम्बर)
- उपनाम ➜ “मेवल की महारानी” और “अग्नि-स्नान करने वाली देवी”।
- मंदिर बिना छत का है ➜ खुले चौक के चबूतरे पर देवी विराजमान हैं।
- महीने में 2–3 बार यहाँ अपने-आप अग्नि प्रकट होती है — देवी का श्रृंगार, चुनरी आदि जलकर राख हो जाते हैं।
6. चित्तौड़गढ़ की देवियाँ
बाणमाता — चित्तौड़ दुर्ग
- सिसोदिया राजवंश की कुलदेवी यही हैं।
- इनके मंदिर केलवाड़ा (राजसमंद) और नागदा (उदयपुर) में भी हैं।
- गुहिल वंश की राजधानी जैसे-जैसे बदलती गई, बाणमाता के मंदिर भी बदलते रहे।
तुलजा भवानी — चित्तौड़गढ़
- मंदिर किले के अन्दर रामपोल के निकट है; छत्रपति शिवाजी इन्हीं की उपासना करते थे।
- बनवीर ने अपने भार के बराबर स्वर्णाभूषण दान किए; इस तुलादान के धन से मंदिर बनने के कारण “तुलजा” नाम चला।
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| आवरी / असावरी माता | निकुम्भ (चित्तौड़गढ़) | लकवाग्रस्त, लूले और लंगड़े लोगों को लाभ मिलता है |
| बड़ली माता | आकोला (चित्तौड़गढ़) | बेड़च नदी के तट पर; मंदिर की तिबारी (छोटे मेहराबदार द्वार) में से बीमार बच्चों को निकालने से रोग दूर होने की आस्था; मनौती सफल होने पर लोहे का त्रिशूल अर्पित किया जाता है |
| जोगनिया माता | बेगूँ (चित्तौड़गढ़) | मनोकामना पूरी होने पर मुर्गे छोड़ने की प्रथा; एक मंदिर चित्तौड़ दुर्ग में भी |
- एक किमी की दूरी पर बम्बावदागढ़ का किला है। वहाँ के राजा देवा हाड़ा ने पुत्री के विवाह पर अन्नपूर्णा माता को आमंत्रित किया, तो माता जोगन का वेश धरकर पधारीं।
ध्यान दें: अन्नपूर्णा नाम बिरवड़ी माता (चित्तौड़ दुर्ग) को दिया गया; जमुवाय माता को भी “अन्नपूर्णा” कहते हैं — स्थान साथ याद करें।
7. राजसमंद की देवियाँ
घेवर माता — राजसमंद झील की पाल
- मंदिर राजसमंद झील की पाल पर है; यह एक सती मंदिर है।
- लोक-विश्वास है कि झील की पाल में पहली शिला इन्होंने ही रखी थी।
- महाराणा राजसिंह जो पाल दिन में बनवाते, वह रात को ढह जाती। राजपुरोहित की सलाह पर पतिव्रता और धर्मनिष्ठ घेवर बाई (महाराणा के एक प्रबन्धक दयालशाह की पत्नी) से नींव रखवाई गई।
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| आमजा देवी / आमज माता | रिछेड़ (राजसमंद) | भीलों की देवी; मंदिर की सेवा में एक भील भोपा और एक ब्राह्मण पुजारी रहते हैं; मेला निपटने के बाद भील भोपा बारिश, मौसम व अकाल का पूर्वानुमान सुनाता है; पूजा-विधि श्रीनाथ जी वाली; मेला ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी |
| पिपला माता | उनवास (हल्दीघाटी, राजसमंद) | मंदिर गुहिल शासक अल्लट ने बनवाया; थम्ब परिक्रमा की रीत; स्थापत्य की दृष्टि से जगत के अम्बिका माता मंदिर के समय का है, सम्भव है दोनों के शिल्पी भी वही हों |
| चारभुजा देवी | खमनोर (हल्दीघाटी, राजसमंद) | मंदिर खमनोर में |
8. बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, प्रतापगढ़
त्रिपुरा सुंदरी — उमराई (तलवाड़ा, बाँसवाड़ा)
- पांचाल जाति की कुलदेवी।
- काले पत्थर की अठारह भुजाओं वाली देवी सिंह पर आरूढ़; पीठिका के बीच श्रीयंत्र खुदा है
- अन्य नाम ➜ तुरताई माता / त्रिपुरा महालक्ष्मी; प्राचीन शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध।
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| छींछ माता | छींछ (बाँसवाड़ा) | मंदिर छींछ गाँव में |
| आसपुरी माता | आसपुर (डूँगरपुर) | मंदिर आसपुर में |
| दिवाक माता | जोलर (प्रतापगढ़) | कैद में बंद अपनों की रिहाई की मनौती पर हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ चढ़ाई जाती हैं |
9. कोटा संभाग की देवियाँ
| देवी | स्थान | ज़िला | विशेष |
|---|---|---|---|
| भदाणा माता | कोटा | कोटा | मूठ पीड़ित व्यक्तियों का इलाज होता है; कोटा शासकों की कुलदेवी |
| डाढ़ देवी | कोटा | कोटा | मंदिर के चारों तरफ़ घना जंगल है |
| कोडिया देवी | बाराँ | बाराँ | सहरिया जनजाति की कुलदेवी |
रोचक तथ्य: पीठ की पूजा: ब्रह्माणी माता (सौरसेन, बाराँ) में देवी के पीठ भाग की पूजा होती है — सामने की मूर्ति की नहीं।
10. कैला देवी व चौथ माता
- स्थान ➜ करौली — त्रिकूट पर्वत की घाटी
- कुलदेवी ➜ यादव वंश तथा करौली राजवंश की
- मेला ➜ चैत्र शुक्ल अष्टमी — लक्खी मेला
- वस्तुतः यह अंजना माता का मंदिर रहा है।
- माना जाता है कि देवी ने नरकासुर राक्षस का वध किया।
- सामने बोहराजी की छतरी खड़ी है और परिसर में हनुमान जी का मंदिर भी है।
- लांगुरिया गीत ➜ हनुमान जी को लंगूर मानकर कैला देवी की आराधना में गाया जाता है; इन्हें गाते हुए जोगनिया नृत्य होता है। [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक 2025; CET 10+2 2024 — लांगुरिया गीत किस लोकदेवी से सम्बन्धित है? ➜ कैला देवी]
लोक-आख्यान: अंजना माता ने भविष्यवाणी की थी कि कलियुग में जनकल्याण के लिए वे प्रकट होंगी और “केलेश्वरी” नाम से पुकारी जाएँगी। एक और जनश्रुति के अनुसार कैला देवी देवकी की पुत्री (योगमाया) हैं — कंस जिन्हें मारना चाहता था; धरती पर अवतरित होकर वही कैलादेवी कहलाईं।
चौथ माता — चौथ का बरवाड़ा
- कंजर जाति की कुलदेवी; मंदिर सवाई माधोपुर ज़िले के चौथ का बरवाड़ा में।
11. शीला देवी व छींक माता
- स्थान ➜ आमेर किले का जलेब चौक (जयपुर)
- निर्माता ➜ आमेर शासक मानसिंह प्रथम
- मूर्ति ➜ काले पत्थर की अष्टभुजी महिषासुरमर्दिनी
- प्रतिमा के ऊपरी भाग में पंचदेव उकेरे गए हैं।
- प्रसाद-चरणामृत के रूप में मदिरा और जल दिया जाता है।
- राजपरिवार की पहली पूजा के बाद ही मंदिर के द्वार आम जनता के लिए खुलते हैं।
मूर्ति की दो मान्यताएँ
- पहली ➜ मूर्ति जहाँ पूजित होगी वहाँ का राजा अजेय रहेगा; यह सोचकर मानसिंह ने केदार की पूजा में विघ्न डालकर उसे हराया और मूर्ति अपने साथ ले आए।
- दूसरी ➜ यह प्रतिमा समुद्र में पड़ी शिला थी; मानसिंह ने उसे निकलवाकर आमेर लाए और कलाकारों से तराशवाकर प्रतिष्ठित किया।
छींक माता — जयपुर
- मंदिर जयपुर में गोपाल जी के मार्ग पर है; माघ शुक्ल सप्तमी को मेला भरता है।
12. शीतला माता
- उपनाम ➜ चेचक व कोढ़ से रक्षा करने वाली देवी · शिशुओं की रक्षक · मातृरक्षिका
- वाहन ➜ गधा
- पुजारी ➜ कुम्हार
- शील की डूँगरी पर मंदिर सवाई माधोसिंह प्रथम ने बनवाया; माधोसिंह द्वितीय ने उसका नवनिर्माण कराया।
- पूजा खण्डित मूर्ति की होती है — मूर्ति के पास रखे पत्थर के टुकड़ों को ही देवी का रूप मानकर पूजते हैं।
- मेला “बैलगाड़ी मेले” के नाम से मशहूर है: दूर-दूर के ग्रामीण रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर सजी बैलगाड़ियों में आते हैं; उन्हीं दिनों गधों का मेला भी भरता है।
बास्योड़ा — ठंडा खाने का दिन
- चैत्र कृष्ण सप्तमी को घरों में तरह-तरह के खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं।
- चैत्र कृष्ण अष्टमी की सुबह माता को ठंडे पकवान का भोग लगाकर पूजा होती है — इसे बास्योड़ा कहते हैं।
रिवीजन पॉइंटर्स
- राजस्थान में शक्ति-पूजा ईसा की पहली सदी के आरम्भ से मानी जाती है; सबसे प्रारम्भिक पुरातात्त्विक उदाहरण नगर (टोंक) का मिट्टी का ठीकरा है, जो आमेर संग्रहालय में रखा है।
- कुलदेवी पूरे वंश की एक ही होती है; इष्टदेवी व्यक्ति की जन्म-तिथि, राशि या कुण्डली से तय होती है और बदल भी सकती है।
- रियासतों की कुलदेवियाँ ➜ बीकानेर की करणी माता, जोधपुर की नागणेची, उदयपुर की बाणमाता और जैसलमेर की स्वांगिया माता।
- कंजर जाति की देवी दो हैं — चौथ माता (चौथ का बरवाड़ा) और रक्तदंजी माता (संथूर, बूँदी); बिस्सा जाति की देवी आशापुरा पोकरण वाली हैं।
- इडाणा माता (बम्बोरा, सलूम्बर) «अग्नि-स्नान करने वाली देवी» कहलाती हैं और उनका मंदिर बिना छत का है।
- बाणमाता सिसोदिया राजवंश की कुलदेवी हैं; तुलजा भवानी का मंदिर चित्तौड़ किले में रामपोल के पास है, जहाँ शिवाजी उपासना करते थे।
- घेवर माता का मंदिर राजसमंद झील की पाल पर है, और त्रिपुरा सुंदरी (उमराई, बाँसवाड़ा) पांचाल जाति की कुलदेवी हैं।
- कैला देवी (करौली) का लक्खी मेला चैत्र शुक्ल अष्टमी को भरता है; लांगुरिया गीत इन्हीं से जुड़ा है — यह प्रश्न कनिष्ठ अनुदेशक 2025 और CET 10+2 2024 में आया।
- शीला देवी (आमेर) की मूर्ति मानसिंह प्रथम लाए; शीतला माता का वाहन गधा और पुजारी कुम्हार होता है, तथा चैत्र कृष्ण अष्टमी को ठंडे पकवान का भोग लगता है (बास्योड़ा)।
अगले भाग में जयपुर, अलवर और शेखावाटी की देवियाँ, फिर अजमेर संभाग और जोधपुर संभाग की प्रमुख लोकदेवियाँ।
पिछला भाग: राजस्थान के लोकदेवता: साधक, रोग-निवारक, रक्षक एवं विद्रोही व स्थानीय देवता
अगला भाग: राजस्थान की लोकदेवियाँ: जयपुर, अलवर व शेखावाटी (भाग 2) एवं जोधपुर संभाग (भाग 1)
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