राजस्थानी चित्रकला की जड़ें पाषाण काल के शैलाश्रयों से लेकर दीवार, कपड़े, लकड़ी और यहाँ तक कि शरीर तक फैली हैं, इसलिए कलाओं को माध्यम के हिसाब से याद करना सबसे आसान रहता है। इस भाग में उद्भव, नामकरण, प्रमुख विशेषताएँ, भित्ति चित्रण की विधियाँ और चार स्कूलों के बाद मेवाड़ स्कूल के शुरुआती ग्रंथ और उदयपुर शैली दी गई हैं। पिछली परीक्षाओं में पूछे गए तथ्यों के साथ परीक्षा का नाम भी लिखा गया है।
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1. उद्भव और विकास
राजस्थान में चित्र केवल काग़ज़ तक सीमित नहीं रहे — दीवार, कपड़ा, लकड़ी, महल, हवेली, मंदिर और यहाँ तक कि शरीर भी चित्रकारी का कैनवास बना। इसकी जड़ें पाषाण काल के शैलाश्रयों तक जाती हैं।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| पाषाण काल | अकारद चित्र | आदि मानव ने चट्टानी आश्रयों में चित्र उकेरे — दर्रा व आलनिया (कोटा), बैराठ (कोटपूतली-बहरोड़ क्षेत्र) और दर (भरतपुर) में। इन्हें अकारद चित्र कहते हैं। |
| 1953 | शैलाश्रयों की खोज | वी. एस. वाकणकर ने चम्बल घाटी व दर्रा (कोटा), कालीसिंध घाटी (झालावाड़), अरावली के माउंट आबू और ईडर (गुजरात) के चित्रित शैलाश्रय खोजे। |
| 7वीं सदी | पहला चित्रकार | श्रृंगधर (श्रीरंगधर) — यक्ष शैली का चित्रकार; मरु प्रदेश के राजा शील के दरबार में। तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ ने उसका उल्लेख किया। |
| 1060 ई. | सबसे पुराने उपलब्ध चित्रित ग्रंथ | ओघ निर्युक्ति वृत्ति और दस वैकालिका सूत्र चूर्णि — जैसलमेर में सुरक्षित; इन दोनों को “भारतीय कला का दीप स्तम्भ” कहा जाता है। |
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किन शैलियों का असर
- राजस्थानी चित्रकला की जन्मभूमि मेवाड़ है।
- शुरू में इस पर जैन, गुजरात और अपभ्रंश शैली का असर रहा; आगे चलकर मुग़ल शैली ने इसे प्रभावित किया।
- बड़ली (अजमेर) का वीर संवत 84 (लगभग 443 ई.पू.) वाला शिलालेख और मध्यमिका (चित्तौड़) के शिलालेख — दोनों की लिपि पर अजंता की चित्र-परम्परा का गहरा असर बताया जाता है।
2. नामकरण
| विद्वान | दिया गया नाम / योगदान |
|---|---|
| आनन्द कुमारस्वामी | ग्रंथ राजपूत पेंटिंग्स (1916 ई.) में इसका पहला वैज्ञानिक विभाजन किया [परीक्षा: VDO, 2021 — राजस्थानी चित्रकला का प्रथम वैज्ञानिक वर्गीकरण किसने प्रस्तुत किया? ➜ आनन्द कुमारस्वामी] |
| आनन्द कुमारस्वामी, ओ. सी. गांगुली, हैवेल | राजपूत चित्रकला |
| डब्ल्यू. एच. ब्राउन (इंडियन पेंटिंग्स) | राजपूत कला |
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ट्रिक: नाम और नामकर्ता जोड़ें — राजपूत = कुमारस्वामी · राजस्थानी = रायकृष्ण दास · हिन्दू = एन. सी. मेहता।
ध्यान दें: आम बोलचाल में इसे राजपूत चित्रकला शैली भी कहते हैं, क्योंकि चित्रों में राजपूती सभ्यता, संस्कृति और परिवेश दिखता है।
3. प्रमुख विशेषताएँ
- लोक जीवन से गहरा जुड़ाव; चित्रों में भाव को प्रधानता।
- विषयों की भरमार और प्राकृतिक परिवेश का बहुरंगी अंकन।
- मंदिर-तीर्थ जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों पर भक्ति और शृंगार — दोनों रस जीवंत रूप में उतरे।
- चटकीले, चमकदार रंग; विशेषकर पीला और लाल सबसे ज़्यादा।
- किलों, महलों, हवेलियों, मंदिरों और छतरियों की दीवारों पर भित्ति चित्र।
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याद रखें: डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों का सार — राजस्थानी चित्रशैली स्त्री-सुन्दरता का भंडार है, जिसमें भारतीय स्त्री के आदर्श रूप की पूरी छटा दिखती है।
4. दीवार व लकड़ी की चित्रकारी
दीवार पर
| कला | क्या है |
|---|---|
| भराड़ी | भीलों में शादी के मौक़े पर घर की दीवार पर रचा जाने वाला शुभ (मांगलिक) चित्र |
| साँझी | लोक चित्रकला की पूजा-आकृति, गोबर से बनती है; श्राद्ध पक्ष में कुँवारी कन्याएँ सफ़ेद पुती दीवार पर बनाती हैं; पार्वती माता मानकर अच्छे वर की कामना करती हैं |
| संझ्या कोट | साँझी का ही विशाल रूप, जो उत्सव के आख़िरी पाँच दिन बनता है |
लकड़ी पर
| कला | क्या है |
|---|---|
| कावड़ | मंदिर जैसी काष्ठ-आकृति, जिसमें कई द्वार होते हैं और हर द्वार पर देवताओं के चित्र; पूरी लाल रंग की |
| बेवाण | लकड़ी का छोटा मंदिरनुमा विमान — सामने से खुला, तीन ओर से बंद; जलझूलनी एकादशी और अनन्त चतुर्दशी के जुलूस में राम-कृष्ण-विष्णु की छोटी मूर्तियाँ इसी में विराजमान कराई जाती हैं |
ट्रिक: साँझी दीवार पर गोबर से; कावड़-बेवाण लकड़ी के; पाने काग़ज़ पर — माध्यम से कला पहचानें।
5. काग़ज़, कपड़ा व शरीर पर
काग़ज़ पर
पाने — काग़ज़ पर बने देवी-देवताओं के चित्र। इनमें श्रीनाथजी के पाने सबसे ज़्यादा कलात्मक हैं, जिनमें 24 शृंगारों का चित्रण मिलता है। रंग प्रायः गुलाबी, लाल और काला।
कपड़े पर
| कला | क्या है |
|---|---|
| वार्तिक / बातीक | मोम से कपड़े के कुछ हिस्से ढँककर रंगाई-चित्रण करने की कला |
| पिछवाई | श्रीकृष्ण के मंदिर में मूर्ति के पीछे की दीवार पर टँगे कपड़े पर कृष्ण-जीवन के चित्र; वल्लभ सम्प्रदाय के मंदिरों की ख़ास पहचान |
| कजली पेंटिंग | काजल से बनने के कारण यह नाम; ब्रश नहीं — हाथ और कपड़े से चित्र बनता है |
शरीर पर
| कला | क्या है |
|---|---|
| गोदना (टैटू) | तीखे औज़ार से ऊपरी चमड़ी खोदकर काला रंग भरना — स्थायी निशान; जनजातियों में सबसे ज़्यादा प्रचलित |
| मेहँदी | हरा रंग = कुशलता-समृद्धि, लाल = प्रेम; विवाह, सगाई, बच्चे के जन्म और शुभ अवसरों पर स्त्रियाँ लगाती हैं; सोजत (पाली) व मालवा की मेहँदी मारवाड़ में बहुत मशहूर |
6. भित्ति चित्रण की विधियाँ
| विधि | कैसे होती है | और नाम |
|---|---|---|
| फ्रेस्को बुनो | ताज़े पलस्तर की नम (गीली) दीवार पर चित्रण — चित्र बहुत लम्बे समय तक टिके रहते हैं | आरायश · आलागीला · मोराकसी; शेखावाटी में “पणा“ |
| फ्रेस्को सेको | पलस्तर पूरी तरह सूख जाने के बाद उस पर चित्रण | — |
| साधारण भित्ति चित्रण | बिना ख़ास तैयारी के सीधे किसी दीवार पर चित्र | — |
- आरायश पद्धति इटली से भारत आई — अकबर के काल में जहाँगीर इसे लाया।
- राजस्थान में इसका पहला प्रयोग आमेर (जयपुर) में हुआ।
- आरायश के लिए सबसे उम्दा चूना टोंक के राहोली का माना जाता है।
7. चार स्कूल
चित्रकला को इलाक़े के हिसाब से चार भागों में बाँटा गया है — इन्हें “स्कूल” कहते हैं। हर स्कूल में कुछ मुख्य शैलियाँ हैं, और छोटे ठिकानों की अपनी उप-शैलियाँ भी।
| स्कूल | मुख्य शैलियाँ | उप-शैली / ठिकाने |
|---|---|---|
| मेवाड़ | उदयपुर, नाथद्वारा, चावंड | देवगढ़, शाहपुरा, सावर उप-शैली; बनेड़ा (भीलवाड़ा), बागौर (भीलवाड़ा), बेगूँ (चित्तौड़गढ़), केलवा (राजसमंद) |
| मारवाड़ | जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, किशनगढ़, नागौर, अजमेर, सिरोही | घाणेराव (पाली), रियाँ (नागौर), भिणाय (अजमेर), जूनियाँ (अजमेर) |
| ढूँढाड़ | आमेर, जयपुर, शेखावाटी, अलवर | उणियारा उप-शैली; झिलाय, ईसरदा, शाहपुरा, सामोद ठिकाने |
8. मेवाड़ स्कूल
राजस्थानी चित्रकला का शुरुआती और मौलिक रूप मेवाड़ में मिलता है; यहाँ पोथी ग्रंथों का सबसे ज़्यादा चित्रण हुआ। इसी स्कूल का सबसे बड़ा ग्रंथ-भंडार भी है।
9. शुरुआती ग्रंथ-चित्र
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1260 ई. | श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि | मेवाड़ शैली का सबसे पुराना चित्र (सावग पडिकमण सुत चुन्नी); आहड़ में ताड़ पत्र पर, महाराणा तेजसिंह के काल में; चित्रकार कमलचन्द। आज यह बोस्टन संग्रहालय (अमेरिका) में है। |
| 1423 ई. | सुपासनाह चरियम | महाराणा मोकल के समय देवकुल पाटक (देलवाड़ा) में लिखा व चित्रित; चित्रकार हीरानन्द; अब सरस्वती संग्रहालय, उदयपुर में। इसे मेवाड़ शैली का दूसरा सबसे पुराना चित्र माना जाता है। |
| 1426 ई. | कल्पसूत्र | इसी शैली का उल्लेखनीय ग्रंथ; चित्रकार धनसार। |
कुम्भा और चित्रकला
महाराणा कुम्भा का काल राजस्थानी कलाओं का सबसे चमकदार स्वर्णिम दौर कहलाता है — इसी से उन्हें “राजस्थान में चित्रकला का जनक” कहा गया है।
10. उदयपुर शैली
- मुख्य विषय ➜ कृष्ण भक्ति
- पशु-पक्षी ➜ हाथी, चकोर
- वृक्ष ➜ कदंब
चित्रों की पहचान
- पुरुष ➜ गठीली मूँछों वाले भरे चेहरे, बड़ी आँखें, खुले होंठ, छोटी गर्दन और छोटा क़द; सिर पर उदयपुरी पगड़ी या लम्बा साफ़ा।
- स्त्री ➜ सरल भाव, कमल व मीन-आकार आँखें, सीधी लम्बी नाक, भरी दोहरी ठोड़ी, ठिगना क़द; लूगड़ी-घाघरा-कंचुकी और राजस्थानी गहने।
संग्रह
- चित्र-शैलियों में सबसे विशाल ग्रंथ-भंडार मेवाड़ का है; उदयपुर के राजकीय संग्रहालय में इसका बड़ा ज़ख़ीरा है।
- मेवाड़ का प्रमुख रागमाला चित्र दिल्ली के अजायबघर में सुरक्षित है।
रिवीजन पॉइंटर्स
- राजस्थानी चित्रकला की जन्मभूमि मेवाड़ है; शुरू में इस पर जैन, गुजरात और अपभ्रंश शैली का असर रहा, आगे चलकर मुग़ल शैली का।
- पाषाण काल की शैलाश्रय-चित्रकारी अकारद कहलाती है; 1953 में वी. एस. वाकणकर ने ऐसे शैलाश्रय खोजे।
- 7वीं सदी का श्रृंगधर (श्रीरंगधर) पहला चित्रकार माना जाता है; उसका उल्लेख लामा तारानाथ ने किया।
- राजपूत पेंटिंग्स (1916 ई.) में आनन्द कुमारस्वामी ने पहला वैज्ञानिक विभाजन किया (VDO 2021 में पूछा गया)।
- नाम और नामकर्ता जोड़ें — राजपूत = कुमारस्वामी, राजस्थानी = रायकृष्ण दास, हिन्दू = एन. सी. मेहता।
- माध्यम से कला पहचानें — साँझी दीवार पर गोबर से बनती है, कावड़ और बेवाण लकड़ी के हैं, पाने काग़ज़ पर।
- आरायश पद्धति नम पलस्तर पर होती है; राजस्थान में इसका पहला प्रयोग आमेर में हुआ और सबसे उम्दा चूना टोंक के राहोली का माना जाता है।
- मेवाड़ शैली का सबसे पुराना ग्रंथ 1260 ई. का श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (चित्रकार कमलचन्द) है; दूसरा सुपासनाह चरियम (1423 ई., चित्रकार हीरानन्द)।
- महाराणा कुम्भा का काल राजस्थानी कलाओं का स्वर्णिम दौर कहलाता है, इसीलिए उन्हें «राजस्थान में चित्रकला का जनक» कहा गया।
अगले भाग में मेवाड़ की बाक़ी शैलियाँ — नाथद्वारा, चावंड, देवगढ़ और शाहपुरा — पंचतंत्र से कलीला दमना की कथा, और फिर मारवाड़ स्कूल की जोधपुर व बीकानेर शैली।
पिछला भाग: साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएँ: संगीत, नृत्य व कला संस्थान
अगला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: मेवाड़ स्कूल (भाग 2) एवं मारवाड़ स्कूल (भाग 1)
इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान की हस्तकलाएँ · आमेर का कछवाहा राजवंश
पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय
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