थार की देवियों की कथाएँ अक्सर किसी लड़ाई, किसी वचन या किसी वरदान से जुड़ी होती हैं, इसलिए कथा के साथ स्थान याद करना ज़्यादा टिकाऊ रहता है। यह भाग बाड़मेर-बालोतरा, पाली, जालौर और सिरोही की देवियों से चलकर जैसलमेर की सात कल्याणी देवियों और हिंगलाज तक जाता है। अंत में करणी माता और हनुमानगढ़-बीकानेर की अन्य देवियाँ हैं।
माइंड मैप खोलें ➜
1. बाड़मेर-बालोतरा की देवियाँ
नागणेची माता — नगाणा (बालोतरा)
- मारवाड़ के राठौड़ों की कुलदेवी; लोकदेवता कल्ला जी की भी कुलदेवी हैं।
- कन्नौज के सारस्वत ब्राह्मण लुम्ब ऋषि ने यह मूर्ति कर्नाटक से लाकर नगाणा में स्थापित की — राव धूहड़ (आसनाथ के पुत्र, राठौड़ों के आदि पुरुष राव सीहा के पोते) के समय। इसी से नाम नागणेची पड़ा।
- पुजारी राठौड़ होता है। थान नीम वृक्ष के नीचे; मूर्ति लकड़ी की और 18 भुजाओं वाली, शस्त्र-सज्जित है।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| विरात्रा माता | चौहटन (बाड़मेर) | भोपों की कुलदेवी; गर्दन झुकी होने से “वांकल माता” भी कहलाती हैं; कथा है कि एक रात वीर विक्रमादित्य यहाँ ठहरे, इसलिए वीरातरा; एक ओर पथरीली चट्टानें, दूसरी ओर रेत के बड़े टीले |
| राणी भटियाणी माता | जसोल (बालोतरा) | लोक में “भुआ-सा”; जोगीदास गाँव (जैसलमेर) में जन्मीं; पिता जोगीदास/जोगराज सिंह; बेटा लालसिंह (लाल बन्ना); बचपन का नाम स्वरूप कँवर; मंदिर प्रायः ढोली जाति की आस्था का केन्द्र; जसोल के महारावल कल्याणसिंह से विवाह — पहली पत्नी देवड़ी जी से संतान न होने पर उन्होंने दूसरा विवाह स्वरूप कँवर (भटियाणी) से किया |
| लवणीय माता | पचपदरा (बालोतरा) | इन्हें “साँभर माता” भी कहते हैं |
ट्रिक: राठौड़ों के प्रतीक — नागणेची (कुलदेवी), नीम (पूज्य वृक्ष, लकड़ी वर्जित), चील (राजचिह्न)। तीनों साथ याद करें।
2. पाली की देवियाँ
आशापुरा माता — नाडोल (पाली)
- आशापुरा माता की कृपा से शाकम्भरी के शासक वाक्पतिराज प्रथम के पुत्र लक्ष्मण (लाखनसी) ने नाडोल पर अधिकार किया।
- उन्होंने नाडोल में देवी का मंदिर बनवाया; यहीं महाराव लाखणसी की बावड़ी है।
- देवी का निवास माना जाने वाला आशापाला वृक्ष चौहानों का पूज्य पेड़ है; वे न इसे काटते हैं, न जलाते हैं।
सुगाली माता — आउवा (पाली)
- ठाकुर कुशालसिंह चम्पावत की कुलदेवी।
- प्रतिमा दस सिर और चौवन हाथ वाली है।
- 1857 में अंग्रेज़ों ने यह प्रतिमा खण्डित कर दी और मूर्ति को आबू ले गए; वहाँ से 1908 में राजपूताना म्यूज़ियम, अजमेर में रखी गई; अब यह प्रतिमा पाली संग्रहालय (बाँगड़ म्यूज़ियम) में है।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
3. जालौर की देवियाँ
सुन्धा माता — भीनमाल (जालौर)
- मंदिर का निर्माण चाचिगदेव ने करवाया।
- मूल रूप से चामुण्डा माता का मंदिर है, पर सुन्धा (सुगन्धाद्रि) पर्वत पर होने से सुन्धा माता कहलाया।
- कहते हैं सती (राजा दक्ष की पुत्री, शिव की पहली पत्नी) का सिर सुन्धा पर्वत पर गिरा था, इसलिए देवी अघटेश्वरी भी कहलाती हैं।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| आशापुरी / आशापुरा माता | मोदरां (जालौर) | सोनगरा चौहानों (जालौर) की कुलदेवी; महोदरी माता / बड़े उदर वाली भी कही जाती हैं; मूर्ति खेराळू (गुजरात) से आई; नवरात्र में मेला और गरबा |
| क्षेमंकरी माता / खीमज माता | भीनमाल (जालौर) | भीनमाल की आदि देवी |
ट्रिक: आशापुरा/आशापुरी के तीन स्थान — नाडोल (पाली; चौहानों की आराध्य), मोदरां (जालौर; सोनगरा चौहानों की कुलदेवी), पोकरण (जैसलमेर; बिस्सा जाति की)।
4. सिरोही की देवियाँ
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| अर्बुदा / अधर देवी | आबू पर्वत (सिरोही) | लोक में “राजस्थान की वैष्णो देवी” कहलाती हैं |
| अम्बा माता | आबू रोड (सिरोही) | मंदिर आबू रोड में |
| खीमल माता | बसन्तगढ़ (सिरोही) | चावड़ा शासक वर्मलात के काल (625 ई.) में बना |
5. जैसलमेर की 7 कल्याणी देवियाँ
फतेहगढ़ तहसील (जैसलमेर) के मामड़िया चारण के कोई संतान नहीं थी। उसने हिंगलाज माता की सात बार यात्रा की, और माता की कृपा से उसके घर सात बेटियाँ जन्मीं; सबसे बड़ी का नाम आवड़ रखा गया।
- कन्याओं के नाम ➜ आवड़, आशी, सेसी, गेहली, हुली, रूपा, लांगदे। जन्म वि.सं. 808।
- चारणों के पूर्वज सड़वा शाखा के थे, जो मांड प्रदेश में पशुपालन और घोड़ों-घी का व्यापार करते थे; चेला नामक चारण चेलक गाँव में बसा और उसी वंश में मामड़िया हुआ।
- मांड में दुर्भिक्ष पड़ा तो सातों बहनें माता-पिता सहित सिन्ध में हाकड़ा नदी के तट पर जा बसीं।
| क्र. | मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|---|
| 1 | स्वांगिया माता / आवड़ माता | जैसलमेर — गजरूप सागर के पास | जैसलमेर के भाटी वंश की कुलदेवी; “उत्तर की ढाल”; राजचिह्न के शीर्ष पर पालम/शकुन चिड़िया और देवी के हाथ में मुड़ा स्वांग (भाला) दर्शाया गया है |
| 2 | घटियाली राय का मंदिर | तनोट के पास (जैसलमेर) | 1965 की लड़ाई में पाकिस्तानी सैनिकों ने मूर्तियाँ तोड़ीं तो उनके मुँह से रक्त बहने लगा और वे मर गए; वे खण्डित प्रतिमाएँ आज भी परिसर में रखी हैं |
| 3 | काला डूँगराय का मंदिर | आईता गाँव (जैसलमेर) | निर्माण महारावल जवाहरसिंह ने कराया; सिन्ध में अकाल पर देवियाँ माता-पिता के साथ मांड लौटीं — जिस गाँव में रुकीं वहाँ के लोगों ने स्वागत किया, गाँव का नाम आईता रखा |
| 4 | भादरियाराय का मंदिर | भादरिया (जैसलमेर) | लाठी गाँव के पास टीले पर बना; महारावल गजसिंह ने बनवाया; वि.सं. 1885 में वासनपी में बीकानेर और जैसलमेर की सेनाएँ भिड़ीं — माता के अदृश्य चक्रों से बीकानेरी सेना बिखर गई; संत हरवंशसिंह निर्मल ने यहाँ तप किया और विशाल भूमिगत पुस्तकालय बनवाया |
स्वांगिया नाम कैसे पड़ा
- यादव वंश जरासंध से युद्ध हारा
- कृष्ण ने कारण पूछा — जरासंध के पास देवी का दिया भाला है
- यादवों ने तप से देवी को प्रसन्न कर वही भाला माँगा
तनोट की दूसरी कथा: जैसलमेर के भाटी राजा केहर की रानी झाली को देवी ने सपने में दर्शन देकर कहा — तुम्हें पुत्र होगा, उसका नाम तनु रखना और मेरे नाम पर एक नगर बसाना। रानी के बेटे तनुराव हुए और तनोट नगर बसाकर वहाँ मंदिर बनवाया गया।
6. हिंगलाज व अन्य देवियाँ
हिंगलाज माता — लोद्रवा (जैसलमेर)
- आदि शक्तिपीठ का प्रधान मंदिर बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में है।
- लोद्रवा (जैसलमेर), नारलोई (जयपुर), बीदासर (चूरू), फतेहपुर (सीकर) समेत कई जगह हिंगलाज के मंदिर हैं; पर सबसे प्रसिद्ध लोद्रवा वाला है।
- लोद्रवा का मंदिर अब भूमिगत हो गया है — दर्शन के लिए सीढ़ियाँ उतरकर नीचे जाना पड़ता है।
याद रखें: ब्रह्मरन्ध्र = सिर के ऊपर का वह छिद्र, जो जन्म के समय बच्चे के सिर में नरम जगह के रूप में रहता है।
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| लटियाला माता | लोद्रवा (जैसलमेर) व फलौदी | कल्ला ब्राह्मणों की कुलदेवी; मंदिर के सामने खेजड़ी का पेड़ होने से “खेजड़बेरी राय भवानी”; अखण्ड ज्योति जलती है; फलौदी तथा बीकानेर के नया शहर में भी मंदिर |
| खोड़ियार माता | खोड़ाल, लोंगेवाला (जैसलमेर) | मंदिर खोड़ाल व लोंगेवाला में |
| आशापुरा माता | पोकरण (जैसलमेर) | बिस्सा जाति की कुलदेवी; उपासक मेहंदी नहीं रचाते, बिस्सा वधुएँ मंदिर घूँघट में जाती हैं; मूर्ति भुज (गुजरात) से “लूण भाणजी” लाए थे |
7. करणी माता
- उपनाम ➜ चारणों की कुलदेवी · बीकानेर के राठौड़ राजपरिवार की इष्टदेवी · चूहों की देवी
- जन्म ➜ सुआप गाँव (फलौदी) — 1387 ई.
- काल ➜ 1387 से 1538 ई. (151 वर्ष)
- 29 वर्ष की उम्र में साठीका (बीकानेर) के देपाजी बीठू से ब्याही गईं।
- भोग-विलास और गृहस्थी से विरक्त होकर इन्होंने पति को समझाया और उनका विवाह अपनी दूसरी बहन गुलाब कँवरी से करवा दिया; स्वयं देशनोक के पास नेहड़ी नामक स्थान पर रहने लगीं, जहाँ बैठकर दही मथती थीं। बाद में देशनोक को अपना कार्य-स्थल बनाया।
- मेहरानगढ़ (जोधपुर) की नींव करणी माता के हाथों रखी गई थी।
- देशनोक के मंदिर में रहने वाले चूहे “काबा” कहलाते हैं; सफ़ेद चील देवी का एक रूप है।
चूहों की कथा
- लोक-कथा: पाँच बहनों के बाद करणी जन्मीं; बुआ ने तिरस्कार में सिर पर हाथ रखा तो उनकी टेढ़ी अँगुलियाँ सीधी हो गईं। तब बुआ ने इस बालिका को होनहार मानकर “करणी” नाम दिया। छह वर्ष की उम्र में इन्होंने पिता का सर्प-विष उतारकर उन्हें जीवन दिया।
- लाखन ➜ छोटी बहन गुलाब कँवरी का बेटा, जिसे करणी ने गोद लिया था; वह कपिल सरोवर में डूब गया तो उन्होंने अपनी शक्ति से उसे फिर जीवित कर दिया।
यमराज और चूहे
- लाखन कपिल सरोवर में डूबा
- करणी माता ने उसे पुनर्जीवित किया
- यमराज: यह प्रकृति के विरुद्ध — उसे फिर मृत करें
यही कारण है कि देशनोक के सारे चूहे करणी जी के वंशज गिने जाते हैं; और देवी की कृपा से इतने चूहों के बावजूद प्लेग नहीं फैलता।
मंदिर और निर्माण
- मुख्य मंदिर ➜ देशनोक (बीकानेर); यह चूहों का मंदिर (टैम्पल ऑफ़ रैट्स) भी कहलाता है।
- आरम्भ में मंदिर का निर्माण चांदमल ढड्ढा ने करवाया; फिर महाराजा कर्णसिंह और उसके बाद महाराजा सूरतसिंह ने मंदिर को वर्तमान स्वरूप दिया।
- संगमरमर की कलात्मक नक्काशी वाला मुख्य द्वार महाराजा गंगासिंह जी ने बनवाया।
चैत्र शुक्ल नवमी — 23 मार्च 1538 ई. (वि.सं. 1595) — को बीकानेर की धनेरू की तलाई पर करणी जी ने महाप्रयाण किया; कुल 151 वर्ष की आयु। न समाधि ली, न दाह-संस्कार हुआ; भक्तों के सामने ही ज्योति में विलीन हो गईं।
रोचक तथ्य: द्वार के निकट दशरथ मेघवाल का देवरा है — वे करणी माता के ग्वाले थे; उसके पास सावन-भादवा नामक दो विशाल कड़ाहियाँ रखी हैं।
8. हनुमानगढ़-बीकानेर की अन्य देवियाँ
| देवी | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| भद्रकाली मंदिर | अमरपुरा थेहड़ी (हनुमानगढ़) | मंदिर हनुमानगढ़ ज़िले में |
| ब्रह्माणी माता व कालका माता | पल्लू (हनुमानगढ़) | सुनार जाति की कुलदेवी कालका माता (पल्लू) |
| सुसवाणी माता | मोरखाणा (नोखा, बीकानेर) | कुलदेवी — सुराणा और दुग्गड़ जातियों की |
रिवीजन पॉइंटर्स
- नागणेची माता (नगाणा, बालोतरा) मारवाड़ के राठौड़ों की कुलदेवी हैं; थान नीम के नीचे होता है और मूर्ति लकड़ी की, 18 भुजाओं वाली है।
- राठौड़ों के तीन प्रतीक ➜ नागणेची (कुलदेवी), नीम (पूज्य वृक्ष), चील (राजचिह्न)।
- सुगाली माता (आउवा, पाली) की प्रतिमा दस सिर और चौवन हाथ वाली है; 1857 में अंग्रेज़ों ने उसे खण्डित किया, अब वह पाली संग्रहालय में है।
- आशापुरा माता के तीन स्थान ➜ नाडोल (पाली), मोदरां (जालौर) और पोकरण (जैसलमेर); पोकरण वाली बिस्सा जाति की कुलदेवी हैं।
- सुन्धा माता भीनमाल (जालौर) में सुन्धा पर्वत पर हैं; आबू पर्वत की अर्बुदा देवी लोक में «राजस्थान की वैष्णो देवी» कहलाती हैं।
- जैसलमेर की सात कल्याणी देवियाँ ➜ आवड़, आशी, सेसी, गेहली, हुली, रूपा और लांगदे; सबसे बड़ी बहन आवड़ थीं।
- स्वांगिया माता (आवड़ माता) जैसलमेर के भाटी वंश की कुलदेवी हैं; घटियाली राय का मंदिर तनोट के पास है और उसके साथ 1965 की लड़ाई की कथा जुड़ी है।
- हिंगलाज का प्रधान मंदिर बलूचिस्तान में है; राजस्थान में लोद्रवा (जैसलमेर) वाला सबसे प्रसिद्ध है, जो अब भूमिगत है; लटियाला माता कल्ला ब्राह्मणों की कुलदेवी हैं।
- करणी माता (1387 से 1538 ई., कुल 151 वर्ष) देशनोक में पूजित हैं; वहाँ के चूहे «काबा» कहलाते हैं और मेहरानगढ़ की नींव उन्हीं के हाथों रखी गई।
अगले भाग में राजस्थान के लोकनृत्यों की शुरुआत — लोकनृत्य क्या है, उसके चार प्रकार, देवीलाल सामर के तीन वर्ग और नृत्य-स्थानों की सूची।
पिछला भाग: राजस्थान की लोकदेवियाँ: जयपुर, अलवर व शेखावाटी (भाग 2) एवं जोधपुर संभाग (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान के लोक नृत्य: क्षेत्रीय लोकनृत्य एवं धार्मिक लोकनृत्य
इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के लोकदेवता · राजस्थान के त्योहार व मेले
पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय
इस विषय का माइंड मैप ➜Complete Rajasthan GK पास देखें



