लोकसंतों के प्रश्न अक्सर जीवन की एक-दो खास बातों से बनते हैं — बचपन का नाम, जन्म-स्थान, उपनाम और गुरु। हर संत के आगे इन्हीं चारों को लिख लें तो उलझन काफ़ी घट जाती है। इस भाग में पीपा, धन्नाजी, रैदास और मीरां बाई से शुरुआत होती है। फिर वागड़ के संत, बालानन्द, करमा बाई, भूरी बाई, अन्य महिला संत, जैन धर्म के तीर्थंकर, तेरापंथ के आचार्य और नानेश मुनि क्रम से आते हैं।
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1. संत पीपा
- बचपन का नाम ➜ प्रतापसिंह खींची
- जन्म ➜ 1425 ई., चैत्र पूर्णिमा — गागरोन (खींची राजपरिवार); वे गागरोन के शासक रहे
- माता-पिता ➜ पिता कड़ावाराव खींची · माता लक्ष्मीवती
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पीपा के निवेदन पर रामानन्द द्वारका जाते समय शिष्यों-सहित गागरोन आए। तब पीपा ने राज्य अपने भाई अचलदास को सौंप दिया और छोटी रानी सीता के कहने पर उन्हें साथ लेकर रामानन्द के संग द्वारका चल दिए। संत बनकर उन्होंने भीख नहीं माँगी — दर्ज़ी का काम करके गुज़ारा किया।
पीपा का मार्ग
- गागरोन
- द्वारका (हरि-दर्शन)
- टोडा (शासक शूरसेन शिष्य बना)
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- उन्हें द्वारकाधीश मंदिर (गुजरात) में साक्षात हरि-दर्शन हुए।
- टोडा में शासक शूरसेन ने अपनी दौलत संतों में बाँट दी तो पीपा ने उसे शिष्य बनाया।
- निधन गागरोन में; आहू और कालीसिंध के संगम की गुफा में अन्तिम समय बीता, वहीं मंदिर बना है।
विचार
- भक्ति ही मोक्ष का साधन; मूर्ति-पूजा का विरोध, निर्गुण ब्रह्म की उपासना।
- ईश्वर की नज़र में सभी प्राणी समान हैं।
मंदिर, मेले और अन्य
| स्थान | ज़िला | महत्त्व |
|---|---|---|
| समदड़ी | बालोतरा | लूणी नदी किनारे प्रमुख मंदिर; पीपापंथी चैत्र पूर्णिमा को यहाँ मेले में जुटते हैं |
| मसुरिया पहाड़ी | जोधपुर | पीपा का मेला |
| गागरोन | झालावाड़ | जन्म-निधन, छतरी, मेला |
- अचलदास खींची री वचनिका (शिवदास गाडण) के अनुसार पीपा ने फ़िरोज़शाह तुग़लक को हराया था।
- उनकी जीवनी गार्सा द तासी (फ्रांसीसी विद्वान) ने 1848 ई. में लिखी।
- संत पीपा शोध अध्ययन केन्द्र ➜ उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में बनना घोषित।
ध्यान दें: जन्म-वर्ष पर विद्वानों में मतभेद है; परीक्षाओं में 1425 ई. ही मान्य माना जाता है।
2. संत धन्नाजी
- जन्म ➜ 1415 ई., वैशाख कृष्ण अष्टमी — धुवन गाँव (टोंक), जाट परिवार
- पिता ➜ रामेश्वर
- गुरु ➜ रामानन्द (बनारस में दीक्षा)
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कहते हैं धन्ना ने घर का अनाज गरीबों-साधुओं में बाँट दिया और बिना बीज के ही खेत में हल चला दिया, फिर भी फ़सल हुई; उन्होंने मूर्ति को ज़बरदस्ती भोजन कराया। इसी पर कहावत बनी — “धन्ना जाट का हरिसो हेत, बिना बीज के निपजा खेत”।
- राजस्थान छोड़कर बनारस गए और रामानन्द के शिष्य बने; गुरु के प्रभाव से निर्गुण उपासक हुए।
- गुरु ने उन्हें गृहस्थी में रहते हुए ही उपासना करने को कहा — सो वे अपने पुश्तैनी पेशे खेती में लगे रहकर आत्मशुद्धि करते रहे।
- भक्तमाल-टीका व धन्ना-परची के संकेत से लगता है कि शुरू में वे मूर्तिपूजक थे; रामानन्द की प्रेरणा ने उन्हें निर्गुणी बनाया।
रोचक तथ्य: धुवन आने वालों में पंजाब के श्रद्धालु सबसे अधिक हैं — क्योंकि धन्ना की वाणी के तीन शब्द गुरु ग्रन्थ साहिब में दर्ज हैं।
3. संत रैदास
- जाति-गुरु ➜ चमार जाति; रामानन्द के शिष्य
- जन्म ➜ सीर गोवर्धनपुर, काशी — 1388 ई.
- माता-पिता ➜ संतोखदास · कलसा देवी
- चित्तौड़ की झाली रानी का न्योता पाकर वे दुर्ग में पधारे; उसी समय मीरां उनकी शिष्या बनीं। झाली रानी भी उनकी शिष्या थीं।
- रैदास की छतरी ➜ चित्तौड़ दुर्ग में मीरां मंदिर के सामने, 4 खम्भों की; मीरां ने उनके आगमन की स्मृति में बनवाई।
- पीपा परची में ज़िक्र है कि रैदास, रामानन्द और कबीर के संग गागरोन पधारे थे।
मीरां कहती थीं — “गुरु मिलिया रविदास जी, दीनी ज्ञान की गुटकी; चोट लगी निजनाम हरि की, म्हारे हिवड़े खटकी।”
ट्रिक: चित्तौड़ दुर्ग में रैदास (4 खम्भे) की छतरी मीरां मंदिर के सामने है — इसी से मीरां-रैदास का रिश्ता याद रखें।
4. मीरां बाई
- उपनाम ➜ “राजस्थान की राधा”
- जन्म ➜ 1498 ई., वैशाख शुक्ल तृतीया — कुड़की गाँव (अब ब्यावर ज़िला)
- बचपन का नाम ➜ पेमल
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1498 | जन्म | कुड़की; 3 वर्ष की उम्र में माँ का देहान्त, दादा मेड़ता ले आए |
| 1516 | विवाह | महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज से |
| — | भोजराज का निधन | खातोली युद्ध में घायल होने से; मीरां कृष्ण-भक्ति में लीन |
- राणा सांगा ने उनके लिए चित्तौड़ किले में कँवर पदे के महल बनवाए।
- उन्हें सताने वाला देवर विक्रमादित्य था (जिसकी हत्या बनवीर ने की)।
- उदयसिंह के सिंहासनारूढ़ होने पर सूरदास चम्पावत की अगुवाई में एक दल मीरां को लौटा लाने द्वारका भेजा गया, पर मीरां ने इनकार कर दिया।
मीरां के मंदिर
| मंदिर | स्थान | बनवाने वाले / विशेष |
|---|---|---|
| चारभुजानाथ व मीरां मंदिर | मेड़ता (नागौर) | दादा राव दूदा ने बनवाया |
| मीरां मंदिर | चित्तौड़ दुर्ग | ससुर सांगा ने भक्ति व साधु-संतों से मिलने के लिए बनवाया |
| मीरां मंदिर | वृन्दावन |
रचनाएँ
नरसीजी रो मायरो रतना खाती ने मीरां के निर्देशन में लिखा।
मीरां के गुरु
| चरण | गुरु |
|---|---|
| प्रारम्भिक | राजपुरोहित चम्पाजी |
| धार्मिक | गजाधर गुर्जर गौड़ |
| आध्यात्मिक | श्री परशुराम आचार्य |
सम्मान
- डाक टिकट पाने वाली राजस्थान की पहली ऐतिहासिक नारी मीरां हैं — टिकट 2 आना का, जारी 1 अक्टूबर 1952 को।
- उनकी 525वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डाक टिकट और ₹525 का सिक्का जारी किया (23 नवम्बर 2023, मथुरा)।
- मीरां महोत्सव ➜ चित्तौड़गढ़ में हर वर्ष आश्विन पूर्णिमा को।
ट्रिक: सांगा के साथ जोड़ें — मीरां का ससुर राणा सांगा, पति भोजराज, देवर विक्रमादित्य, दादा राव दूदा।
5. वागड़ के संत
भक्त कवि दुर्लभजी (सगुण)
- “राजस्थान के नृसिंह” कहलाते हैं।
- जन्म 1696 ई., वागड़ क्षेत्र में; कार्यक्षेत्र डूँगरपुर-बाँसवाड़ा।
- लोगों को कृष्ण-भक्ति (सगुण) का उपदेश दिया।
गवरी बाई (सगुण)
- “वागड़ की मीरां”; डूँगरपुर में ब्राह्मण परिवार में जन्म।
- कृष्ण को पति मानकर आराधना; रचना — कीर्तनमाला।
- डूँगरपुर महारावल शिवसिंह ने 1829 ई. में उनके लिए बालमुकुन्द मंदिर बनवाया।
संत मावजी (सगुण-निर्गुण मेल)
- उपनाम ➜ “वागड़ का धणी”
- जन्म ➜ साबला (डूँगरपुर), ब्राह्मण परिवार, 1714 ई., माघ शुक्ल पंचमी
- माता-पिता ➜ दालम ऋषि · केशर बाई
- तप-ज्ञान ➜ 12 वर्ष की उम्र में घर छोड़ा; माही-सोम संगम की गुफा में तप; 1727 ई. माघ शुक्ल एकादशी को ज्ञान
- अनुयायी उन्हें विष्णु का (कल्कि) निष्कलंक अवतार मानते हैं; उन्होंने निष्कलंक सम्प्रदाय की स्थापना की। इसका प्रभाव दक्षिणी राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश व गुजरात में भी है।
- वाणी ➜ चौपड़ा। पाँच बड़े ग्रन्थ — मेघसागर, प्रेमसागर, सामसागर, रतनसागर, अनन्तसागर — जिनके छन्द 72 लाख 96 हज़ार बताए जाते हैं। इन चौपड़ों को सिर्फ़ दीपावली पर ही बाहर निकालते हैं; भाषा हिन्दी-मिश्रित बागड़ी।
- मावजी के बाद पुत्र उदयानन्द मठाधीश बने; फिर उनकी पत्नी जनककुँवरी (जनपुरुष) — 1773 से 1855 ई. तक।
6. बालानन्द · करमा बाई · भूरी बाई
बालनन्दाचार्य (सगुण)
- जन्म ➜ 1635 ई., गढ़मुक्तेश्वर; बचपन का नाम बलवंत
- गुरु ➜ बिरजानन्द (बृजानन्द) — इनसे सैन्य गतिविधियाँ सीखीं
- साधु-दल ➜ साधुओं को सैन्य प्रशिक्षण देकर “लश्करी” दल बनाया
- उनके दल के नेतृत्व में औरंगज़ेब के काल में राजस्थान में लगभग 52 देवमूर्तियाँ स्थापित कराई गईं।
- हरिद्वार के धार्मिक विद्रोह (1675 ई.) में सशस्त्र साधुओं के नायक रहे।
करमा बाई (सगुण)
- जन्म ➜ कालवा गाँव (डीडवाना-कुचामन), जाट
- माता-पिता ➜ जीवनराम डूडी · रतनी देवी
- ससुराल ➜ गढ़ी सामोर (अलवर)
करमा बाई ने ज़िद करके कृष्ण की प्रतिमा को खिचड़ा खिलाया। उसी की याद में जगन्नाथजी को आज भी खिचड़े का नैवेद्य चढ़ता है। उनका लोकप्रिय गीत — “थाळी भरके लाई रे खीचड़ो, ऊपर घी की बाटकी; जीमो म्हारा श्याम धणी, जीमावे बेटी जाट की।”
भूरी बाई (सगुण)
- मेवाड़ की प्रसिद्ध कृष्ण-उपासिका।
- जन्म 1892 ई., सरदारगढ़ (राजसमंद), सुथार परिवार; विवाह नाथद्वारा के विधुर फतहलाल से।
- देवगढ़ की मुस्लिम साधिका नूराबाई के सम्पर्क से वैराग्य जागा और वे संत-जीवन में आईं।
7. महिला संत — राना बाई व अन्य
संत राना बाई (सगुण)
- उपनाम ➜ “राजस्थान की दूसरी मीरां”
- जन्म ➜ हरनावा गाँव (डीडवाना-कुचामन), जाट परिवार, 1504 ई.
- माता-पिता ➜ पिता रामगोपाल · माता गंगाबाई
अन्य महिला भक्त संत
| संत | स्थान | परिचय |
|---|---|---|
| फूली बाई | माँझवास (नागौर) | जसवंतसिंह की समकालीन; आजीवन वैराग्य; जाट परिवार — जसवंतसिंह ने धर्मबहिन बनाया |
| समान बाई चारण | माहुन्द (अलवर) | कृष्ण-उपासिका; “मत्स्य प्रदेश की मीरां”; आजीवन आँखों पर पट्टी |
| रानी रत्नावली | अलवर | कृष्ण की प्रसिद्ध भक्त; भानगढ़ के माधोसिंह की रानी |
| भोली गुजरी | करौली | बुगडार गाँव; मदनमोहन रूप की कृष्ण-उपासना |
8. जैन धर्म और तीर्थंकर
जैन धर्म के संस्थापक आदिनाथ (ऋषभदेव) हैं, जो प्रथम तीर्थंकर थे। कुल 24 तीर्थंकर हुए। महावीर स्वामी (24वें) को जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
| क्रम | तीर्थंकर |
|---|---|
| 1 | आदिनाथ / ऋषभदेव |
| 5 | सुमतिनाथ |
| 8 | चन्द्रप्रभु |
9. तेरापंथ के आचार्य
| आचार्य | क्रम | जन्म | विशेष |
|---|---|---|---|
| भीक्षु / भीखणजी | संस्थापक | कण्टालिया (पाली), 1726 ई. | समाधि सिरियारी (पाली) |
| आचार्य तुलसी | 9वें | लाडनूँ (डीडवाना-कुचामन), 1914 ई. | 1949 में अणुव्रत आन्दोलन; पिता झूमरमल, माता वंदना |
| आचार्य महाप्रज्ञ | 10वें | टमकोर (झुंझुनूं) | प्रेक्षाध्यान; मूल नाम नथमल चौरड़िया |
आचार्य तुलसी
- कथन ➜ “मैं सबसे पहले मानव हूँ, फिर धार्मिक, फिर जैन धर्माचार्य।”
- सन्देश ➜ “इंसान पहले इंसान, फिर हिन्दू या मुसलमान”।
- जैन विश्व भारती, लाडनूँ उन्हीं की प्रेरणा का फल है; इसे डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला है।
आचार्य महाप्रज्ञ
अहिंसा यात्रा — 5 दिसम्बर 2001 को सुजानगढ़ से शुरू होकर 4 जनवरी 2009 को सुजानगढ़ में ही समाप्त हुई।
आचार्य महाश्रमण की कृतियाँ
10. आचार्य नानेश मुनि
- जन्म ➜ मेवाड़ का दाँता गाँव
- बचपन का नाम ➜ गोवर्धन (नाना)
- गुरु ➜ कोटा के गणेशलाल जी महाराज
11. रैपिड फायर तथ्य
- संत पीपा ➜ बचपन का नाम प्रतापसिंह खींची; जन्म 1425 ई., गागरोन; संत बनकर दर्ज़ी का काम किया
- धन्नाजी ➜ जन्म 1415 ई., धुवन (टोंक); गुरु रामानन्द
- रैदास ➜ रामानन्द के शिष्य; उनकी छतरी चित्तौड़ दुर्ग में मीरां मंदिर के सामने है
- मीरां बाई ➜ «राजस्थान की राधा»; जन्म 1498 ई., कुड़की; 1516 में भोजराज से विवाह
- मीरां का डाक टिकट ➜ 1 अक्टूबर 1952 को जारी; टिकट पाने वाली राजस्थान की पहली ऐतिहासिक नारी
- मावजी ➜ «वागड़ का धणी»; निष्कलंक सम्प्रदाय के संस्थापक; वाणी चौपड़ा
- गवरी बाई ➜ «वागड़ की मीरां»; रचना कीर्तनमाला
- राना बाई ➜ «राजस्थान की दूसरी मीरां»; जन्म 1504 ई., हरनावा गाँव
- तेरापंथ ➜ संस्थापक भीक्षु (भीखणजी); आचार्य तुलसी 9वें और महाप्रज्ञ 10वें आचार्य
अगले भाग में लोकदेवता किसे कहते हैं और क्यों उभरे, परचा-चिरजा जैसे शब्द, रिश्तेदार जोड़ियाँ और पंचपीर के पहले दो नाम।
पिछला भाग: राजस्थान के सम्प्रदाय व संत: लालदासी · चरणदासी · रामस्नेही…
अगला भाग: राजस्थान के लोकदेवता: पंचपीर (भाग 1)
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