राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: ढूँढाड़ स्कूल एवं चित्रकार, चित्र व संस्थाएँ – Rajasthan Art and Culture Chapter 15

ढूँढाड़ स्कूल की पाँच शैलियाँ, सभी शैलियों के स्वर्णकाल, चित्रकार, तुलना, आधुनिक चित्रकार और संस्थाएँ।

10 min read Updated Notes in Hindi
In this chapter (14 sections)
  1. ढूँढाड़ स्कूल
  2. आमेर शैली
  3. जयपुर शैली
  4. अलवर शैली
  5. उणियारा उप-शैली
  6. शेखावाटी शैली
  7. चित्रकार, चित्र व संस्थाएँ
  8. स्वर्णकाल व चित्रकार
  9. शैलियों की तुलना
  10. प्रसिद्ध चित्र
  11. उपनाम वाले चितेरे
  12. आधुनिक चित्रकार
  13. संस्थाएँ व संग्रहालय
  14. रैपिड फायर तथ्य

चित्रकला के अध्याय में सबसे काम की चीज़ मिलान है — कौन-सी शैली, किसका स्वर्णकाल, कौन-सा चितेरा और कौन-सा उपनाम। ढूँढाड़ में आमेर से जयपुर, फिर अलवर और उणियारा तक की कड़ी साफ़ दिखती है, जबकि शेखावाटी दीवारों की शैली है। इस भाग में इन पाँच शैलियों के बाद स्वर्णकाल की तालिका, शैलियों की तुलना, उपनाम वाले चितेरे, आधुनिक चित्रकार और संस्थाएँ व संग्रहालय दिए गए हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ, 8 चॉक-बोर्ड चित्र, 20 नक्शे, 25 फ्लैशकार्ड और 15 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
माइंड मैप खोलें ➜

1. ढूँढाड़ स्कूल

ढूँढाड़ क्षेत्र की चित्र-परम्परा आमेर से शुरू होकर जयपुर पहुँची; जयपुर से टूटकर अलवर शैली बनी, और जयपुर-बूँदी के असर से उणियारा उप-शैली। शेखावाटी में दीवारों पर चित्र चरम पर पहुँचे।

2. आमेर शैली

जयपुर नगर बसने से पूर्व रियासत की राजधानी आमेर थी; इसीलिए जयपुर की चित्र-परम्परा की जड़ आमेर शैली में है।

काल / क्रमघटनाविवरण
1582रज्मनामा की प्रतिरज्मनामा (महाभारत का फ़ारसी अनुवाद) की सचित्र प्रति आमेर के सूरतखाने (चित्र-निर्माण केन्द्र) में बनी; इसमें 169 बड़े चित्र थे।
1591यशोधरा चरितआमेर शैली के प्रारम्भिक चित्रित ग्रंथों में प्रमुख।
1621–67मिर्ज़ा राजा जयसिंहआमेर शैली का दूसरा चरण।
  • सवाई जयसिंह ने कलाओं को बढ़ावा देने और सामान बनाने के लिए 36 कारख़ाने खोले — इन्हीं में सूरतखाना था, जहाँ चित्र व लघुचित्र रचे जाते थे।
  • गणेशपोल (आमेर क़िला) भित्ति चित्रों व अलंकरणों से सजा है; यह द्वार मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने 1639 में बनवाया था।
  • इस दौर में बारहमासा, नवरस, रागमाला तथा रसिकप्रिया, कविप्रिया, गीत-गोविन्द पर चित्र बने।

रागमाला क्या है

रागमाला संगीत के ऐसे विशेष ग्रंथ हैं जिनमें रागों की धुन से जन्मे भावों को कवि ने कविता में ढाला और चित्रकार ने मानव-रूप में उतारा। इस तरह उनमें संगीत, कविता और चित्रकला एक साथ मिलती हैं।

ध्यान दें: गणेशपोल (आमेर) का बनवाने वाला नाम — मिर्ज़ा राजा जयसिंह (1639); “36 कारख़ाने” सवाई जयसिंह से जुड़े हैं। दोनों जयसिंह अलग हैं।

3. जयपुर शैली

  • उद्भव व विकास ➜ 1700–1900 ई.
  • स्वरूप ➜ मुग़ल + राजस्थानी (हिन्दू) शैली का मिश्रण
  • स्वर्णकाल ➜ सवाई प्रतापसिंह

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

काल / क्रमघटनाविवरण
सवाई जयसिंहस्वतंत्र रूपशैली ने अपना स्वतंत्र रूप पाया; दरबारी चित्रकार मुहम्मद शाह ने कृष्ण-लीला के चित्र बनाए।
1743–50सवाई ईश्वरीसिंहसूरतखाना आमेर से जयपुर आ गया; चित्रकार लालचंद और साहिबराम।
सवाई माधोसिंहमणिकुट्टिमरंग भरने की जगह मोती, लाख और लकड़ी के मनके चिपकाकर अलंकारिक चित्र — रीतिकालीन मणिकुट्टिम प्रवृत्ति।

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

लालचंद और साहिबराम

  • चौगान में होने वाले पशु-युद्ध, ख़ासकर हाथियों की भिड़ंत, के बेजोड़ चित्र लालचंद ने रचे।
  • साहिबराम ने आदमकद व्यक्ति-चित्र (पोट्रेट) बनाकर नई परम्परा शुरू की — महाराजा ईश्वरीसिंह का आदमकद चित्र इसे राजस्थान का प्रथम आदमकद पोट्रेट कहा जाता है।
  • राजस्थान में सबसे ज़्यादा व्यक्ति-चित्र जयपुर शैली में मिलते हैं।

विशेषताएँ

  • बड़े पोट्रेट और भित्ति चित्रण जयपुर की ख़ास देन; दीवार-चित्रों में आलागीला / अराइश / मोराकसी विधि अपनाई गई, जो कछवाहा-मुग़ल सम्बन्धों का नतीजा थी।
  • मुग़ल शैली का सबसे गहरा असर राजस्थान में इसी शैली पर पड़ा — दूसरी कोई शैली इतनी प्रभावित नहीं हुई।
  • प्राकृतिक रंगों का बहुत प्रयोग; चित्रों में जस्ते का भी प्रयोग।

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

प्रमुख चित्रकार

याद रखें: जयपुर शैली का असर ईसरदा, सिवाड़, झिलाय, उणियारा, चौमू, सामोद और मालपुरा ठिकानों पर भी पड़ा।

4. अलवर शैली

काल / क्रमघटनाविवरण
1775शैली का आरम्भराव राजा प्रतापसिंह के समय जयपुर से अलग होकर; शिवकुमार व डालूराम जयपुर से अलवर आए।
बख़्तावरसिंहमौलिक रूपराजगढ़ (अलवर) क़िले के शीशमहल में भित्ति चित्र; जंगल में नाथों-जोगियों-फ़क़ीरों के साथ धर्म-चर्चा करते महाराजा के सैकड़ों चित्र।
विनयसिंहस्वर्ण युगविनयसिंह ने बलदेव से चित्रकारी सीखी; शेख़ सादी की “गुलिस्तां” की सुन्दर लिखाई व चित्र जवाहरात घोलकर बनी स्याही से करवाए — चित्र बलदेव व ग़ुलाम अली के; ग्रंथ अलवर संग्रहालय में।
बलवंतसिंहपोथी-लघुचित्रपोथी चित्र, लघुचित्र और लिपटवाँ पटचित्र — सालिगराम, जमनादास, छोटेलाल, बकसाराम, नन्दराम द्वारा।

पहचान

  • शैली में ईरानी, मुग़ल और जयपुर शैली का अचरज-भरा संतुलित मेल; अंग्रेज़ों का असर भी।
  • पुरुषों के चेहरे आम की शक्ल जैसे; स्त्रियाँ ठिगने क़द की, उठी हुई वेणियाँ, अंग-प्रत्यंग बारीक परिश्रम से बने।
  • बॉर्डर पर “बसलो” चित्रण ➜ वसलियों के किनारे सुन्दर बेल-बूटे — अलवर की निजी विशेषता।

प्रमुख चित्रकार

ध्यान दें: अलवर कला-विद्यालय से जुड़े नाम — बलदेव, डालूराम, जमनादास; “नानकराम” किशनगढ़ का है, अलवर का नहीं।

5. उणियारा उप-शैली

  • नरूका ठिकाने ने इस उप-शैली के विकास का रास्ता खोला।
  • सरदारसिंह (राव राजा) के राज में धीमा, मीरबक्श, काशी, रामलखन और भीम ने चित्रकारी की।
  • मीरबक्श का चित्र “राम-सीता, लक्ष्मण व हनुमान” इस शैली की श्रेष्ठ कृति है।

6. शेखावाटी शैली

शेखावाटी शैली मुख्यतः भित्ति चित्रण की है; जयपुर के दीवार-चित्रों का सबसे ज़्यादा असर इसी पर पड़ा।

  • 19वीं सदी के मध्य से 20वीं सदी के आरम्भ तक सेठों ने यहाँ विशाल हवेलियाँ बनवाईं — फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़, रामगढ़, मुकुन्दगढ़, नवलगढ़, मण्डावा, बिसाऊ आदि में दीवारों पर चित्र बने; इसीलिए शेखावाटी को “ओपन एयर आर्ट गैलरी” कहते हैं।
  • फतेहपुर की गोयनका हवेली में 1850 ई. का चित्र — कृष्ण की आठ गोपियों से बना एक हाथी।
  • भित्ति चित्रों में तिथि और रचनाकार का नाम मिलता है; लोक-जीवन की झाँकी सबसे ज़्यादा।

चित्रों में क्या-क्या

  • बड़े-बड़े हाथी-घोड़े; गवाक्ष (झरोखे) के दोनों ओर चित्रांकन।
  • मल्ल-युद्ध व कुश्ती, दधिमंथन व गौदोहन, राक्षस, कामकला, साधु-संत और लोककथाएँ।
  • स्त्री-चित्रों में बलखाती बालों की लट एक ओर; परिवहन के साधनों के चित्र भी दीवारों पर।
  • जोगीदास की छतरी (उदयपुरवाटी) अपने दीवार-चित्रों से पहचानी जाती है; ये चित्र देवा नामक चित्रकार के हैं।
  • फ़्राँस की नादिन ला प्रिंस ने फतेहपुर (सीकर) की हवेलियों के भित्ति चित्रों के संरक्षण में उल्लेखनीय काम किया।

याद रखें: हवेलियों का विस्तृत ब्योरा (किसकी हवेली कहाँ) “हवेलियाँ और छतरियाँ” अध्याय में है।

7. चित्रकार, चित्र व संस्थाएँ

परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले सवाल — “किस शैली का स्वर्णकाल किसके समय”, “यह चित्र किस शैली का”, “इस चितेरे को किस नाम से जानते हैं” — इसी शाखा में समेटे गए हैं।

8. स्वर्णकाल व चित्रकार

शैलीस्वर्णकालप्रमुख चित्रकार
उदयपुरजगतसिंह प्रथमसाहबदीन, नासिरुद्दीन, नुरुद्दीन, कृपाराम, भैराराम, मनोहर, श्योबक्स, जीवराम, उमरा
नाथद्वारामहाराणा राजसिंहबाबा रामचन्द्र, चतुर्भुज, नारायण, रामलिंग, चम्पालाल, घासीराम, हीरालाल, तुलसीराम, विट्ठलदास, रामगोपाल विजयवर्गीय; महिलाएँ — कमला, इलायची
चावंडअमरसिंह प्रथमनिसारदीन
देवगढ़रावत द्वारिकादास चूंडावतबैजनाथ, चोखा, बगता/बख्ता, कंवला प्रथम, कंवला द्वितीय, हरचंद, नगा

9. शैलियों की तुलना

शैलीपशु-पक्षीवृक्षमुख्य रंग
उदयपुरहाथी, चकोरकदंबलाल (किनारे लाल-काले); पीला, हरा, नीला, सफ़ेद
नाथद्वारागाय, मोरकेलापीला, हरा
देवगढ़——पीला, हरा
जोधपुरऊँट, खंजन, कौआआमपीला, लाल

नायिका की आँख

शैलीआँख कैसी
मेवाड़ (उदयपुर)मछली के समान
नाथद्वारातिरछी व चकोर के समान
जोधपुरबादाम के समान
बीकानेरमृगनयनी

10. प्रसिद्ध चित्र

चित्र / ग्रंथशैली
उत्तराध्ययन सूत्रमारवाड़ (जोधपुर)
कल्याण रागिनी (1623)मारवाड़ (जोधपुर)
श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णिमेवाड़
सुपासनाह चरियमअपभ्रंश शैली

11. उपनाम वाले चितेरे

चित्रकारउपनाम / पहचानस्थान
परमानन्द चोयलभैंसों का चितेरा; आधुनिक प्रयोगवादीकोटा
भूर सिंह शेखावतगाँव का चितेरा; ग्रामीण जीवन का सच्चा-यथार्थवादी चित्रण; स्वतंत्रता सेनानियों व शहीदों के चित्रधोधलिया (बीकानेर)
गोवर्धनलाल जोशीभीलों का चितेरा (आदिवासी लोकजीवन); उपनाम “बाबा”; प्रमुख चित्र “बारात”कांकरोली (राजसमंद), जन्म 1914
देवकीनन्दन शर्मा“मास्टर ऑफ नेचर एंड लिविंग ऑब्जेक्ट” — भित्ति चित्र व पशु-पक्षीअलवर

12. आधुनिक चित्रकार

रामगोपाल विजयवर्गीय

  • जन्म ➜ 1905 — बालेर ठिकाना (खण्डार, सवाई माधोपुर)
  • शिक्षा ➜ 1924 — महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स, जयपुर से चित्रकला का डिप्लोमा
  • सम्मान ➜ 1970 — राजस्थान ललित कला अकादमी का “कलाविद”; 1984 — पद्मश्री

ए. एच. मूलर (1878–1960)

  • जर्मन मूल के भारत-जन्मे चित्रकार; पूरा नाम आर्चिबाल्ड हरमन मूलर।
  • बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने उन्हें 1100 रुपये प्रतिमाह पर राजकीय चित्रकार नियुक्त किया; उनके चित्र बीकानेर संग्रहालय और मेहरानगढ़ संग्रहालय में हैं।
  • जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह ने ख्याति सुनकर उन्हें ऐतिहासिक कथानकों पर यथार्थवादी तैल चित्र बनाने के लिए बुलाया; 1935–40 के बीच उन्होंने अनेक तैल चित्र बनाए।

अन्य चित्रकार

चित्रकारस्थानपहचान
परमानन्द चोयलकोटापुत्र शैल चोयल प्रसिद्ध चित्रकार; पुत्रवधू सुरजीत कौर चोयल (जयपुर) देश की अग्रणी महिला चितेरी — उनके चित्र जापान के फुकोका संग्रहालय में
श्रीमती प्रतिभा पाण्डेधौलपुरप्रकृति चित्रण; प्रसिद्ध चित्र “फॉल ऑफ बर्लिन”
कुन्दनलाल मिस्त्री—राजस्थान में आधुनिक चित्रकला शुरू करने का श्रेय
ज्योति स्वरूप शर्माजोधपुरचमड़े पर चित्रकारी

13. संस्थाएँ व संग्रहालय

चित्रकला के विकास में लगी संस्थाएँ

संस्थास्थान
टखमण-28उदयपुर
प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुपउदयपुर
तूलिका कलाकार परिषदउदयपुर
कलावृतजयपुर

प्रमुख चित्रकला संग्रहालय

संग्रहालयस्थान
पोथीखाना संग्रहालयजयपुर
पुस्तक प्रकाशजोधपुर
सरस्वती भण्डारउदयपुर
जिनभद्रसूरि ग्रंथ भंडारजैसलमेर

14. रैपिड फायर तथ्य

  • आमेर शैली ➜ सूरतखाना आमेर में था; रज्मनामा की प्रति 1582 में यहीं बनी; गणेशपोल मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने 1639 में बनवाया
  • जयपुर शैली ➜ 1700–1900 ई.; स्वर्णकाल सवाई प्रतापसिंह; राजस्थान में मुग़ल शैली का सबसे गहरा असर इसी पर
  • साहिबराम ➜ आदमकद पोट्रेट की परम्परा शुरू की; ईश्वरीसिंह का आदमकद पोट्रेट राजस्थान का पहला
  • लालचंद ➜ हाथियों की भिड़ंत के बेजोड़ अंकन के लिए जाने जाते हैं
  • अलवर शैली ➜ आरम्भ 1775, राव राजा प्रतापसिंह; स्वर्ण युग विनयसिंह; बॉर्डर पर «बसलो» इसकी निजी विशेषता
  • उणियारा उप-शैली ➜ नरूका ठिकाना; मीरबक्श की «राम-सीता, लक्ष्मण व हनुमान» श्रेष्ठ कृति
  • शेखावाटी शैली ➜ भित्ति चित्रण की शैली; हवेलियों के कारण «ओपन एयर आर्ट गैलरी» कहलाती है
  • नायिका की आँख ➜ उदयपुर में मछली जैसी, जोधपुर में बादाम जैसी, बीकानेर में मृगनयनी
  • रामगोपाल विजयवर्गीय ➜ जन्म 1905; 1984 में पद्मश्री

अगले भाग में राजस्थान की हस्तकलाएँ — हस्तकला का परिचय, संरक्षण देने वाली संस्थाएँ, अब तक मिले भौगोलिक संकेतक, उदयपुर संभाग की कलाएँ और कोटा व भरतपुर संभाग की हस्तकलाएँ।

पिछला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: मारवाड़ स्कूल (भाग 2) एवं हाड़ौती स्कूल

अगला भाग: राजस्थान की हस्तकलाएँ: हस्तकला का परिचय एवं उदयपुर संभाग

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान की हस्तकलाएँ · आमेर का कछवाहा राजवंश

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
इस विषय का माइंड मैप ➜Complete Rajasthan GK पास देखें

Useful for these exams