चित्रकला के अध्याय में सबसे काम की चीज़ मिलान है — कौन-सी शैली, किसका स्वर्णकाल, कौन-सा चितेरा और कौन-सा उपनाम। ढूँढाड़ में आमेर से जयपुर, फिर अलवर और उणियारा तक की कड़ी साफ़ दिखती है, जबकि शेखावाटी दीवारों की शैली है। इस भाग में इन पाँच शैलियों के बाद स्वर्णकाल की तालिका, शैलियों की तुलना, उपनाम वाले चितेरे, आधुनिक चित्रकार और संस्थाएँ व संग्रहालय दिए गए हैं।
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1. ढूँढाड़ स्कूल
ढूँढाड़ क्षेत्र की चित्र-परम्परा आमेर से शुरू होकर जयपुर पहुँची; जयपुर से टूटकर अलवर शैली बनी, और जयपुर-बूँदी के असर से उणियारा उप-शैली। शेखावाटी में दीवारों पर चित्र चरम पर पहुँचे।
2. आमेर शैली
जयपुर नगर बसने से पूर्व रियासत की राजधानी आमेर थी; इसीलिए जयपुर की चित्र-परम्परा की जड़ आमेर शैली में है।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1582 | रज्मनामा की प्रति | रज्मनामा (महाभारत का फ़ारसी अनुवाद) की सचित्र प्रति आमेर के सूरतखाने (चित्र-निर्माण केन्द्र) में बनी; इसमें 169 बड़े चित्र थे। |
| 1591 | यशोधरा चरित | आमेर शैली के प्रारम्भिक चित्रित ग्रंथों में प्रमुख। |
| 1621–67 | मिर्ज़ा राजा जयसिंह | आमेर शैली का दूसरा चरण। |
- सवाई जयसिंह ने कलाओं को बढ़ावा देने और सामान बनाने के लिए 36 कारख़ाने खोले — इन्हीं में सूरतखाना था, जहाँ चित्र व लघुचित्र रचे जाते थे।
- गणेशपोल (आमेर क़िला) भित्ति चित्रों व अलंकरणों से सजा है; यह द्वार मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने 1639 में बनवाया था।
- इस दौर में बारहमासा, नवरस, रागमाला तथा रसिकप्रिया, कविप्रिया, गीत-गोविन्द पर चित्र बने।
रागमाला क्या है
रागमाला संगीत के ऐसे विशेष ग्रंथ हैं जिनमें रागों की धुन से जन्मे भावों को कवि ने कविता में ढाला और चित्रकार ने मानव-रूप में उतारा। इस तरह उनमें संगीत, कविता और चित्रकला एक साथ मिलती हैं।
ध्यान दें: गणेशपोल (आमेर) का बनवाने वाला नाम — मिर्ज़ा राजा जयसिंह (1639); “36 कारख़ाने” सवाई जयसिंह से जुड़े हैं। दोनों जयसिंह अलग हैं।
3. जयपुर शैली
- उद्भव व विकास ➜ 1700–1900 ई.
- स्वरूप ➜ मुग़ल + राजस्थानी (हिन्दू) शैली का मिश्रण
- स्वर्णकाल ➜ सवाई प्रतापसिंह
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| सवाई जयसिंह | स्वतंत्र रूप | शैली ने अपना स्वतंत्र रूप पाया; दरबारी चित्रकार मुहम्मद शाह ने कृष्ण-लीला के चित्र बनाए। |
| 1743–50 | सवाई ईश्वरीसिंह | सूरतखाना आमेर से जयपुर आ गया; चित्रकार लालचंद और साहिबराम। |
| सवाई माधोसिंह | मणिकुट्टिम | रंग भरने की जगह मोती, लाख और लकड़ी के मनके चिपकाकर अलंकारिक चित्र — रीतिकालीन मणिकुट्टिम प्रवृत्ति। |
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लालचंद और साहिबराम
- चौगान में होने वाले पशु-युद्ध, ख़ासकर हाथियों की भिड़ंत, के बेजोड़ चित्र लालचंद ने रचे।
- साहिबराम ने आदमकद व्यक्ति-चित्र (पोट्रेट) बनाकर नई परम्परा शुरू की — महाराजा ईश्वरीसिंह का आदमकद चित्र इसे राजस्थान का प्रथम आदमकद पोट्रेट कहा जाता है।
- राजस्थान में सबसे ज़्यादा व्यक्ति-चित्र जयपुर शैली में मिलते हैं।
विशेषताएँ
- बड़े पोट्रेट और भित्ति चित्रण जयपुर की ख़ास देन; दीवार-चित्रों में आलागीला / अराइश / मोराकसी विधि अपनाई गई, जो कछवाहा-मुग़ल सम्बन्धों का नतीजा थी।
- मुग़ल शैली का सबसे गहरा असर राजस्थान में इसी शैली पर पड़ा — दूसरी कोई शैली इतनी प्रभावित नहीं हुई।
- प्राकृतिक रंगों का बहुत प्रयोग; चित्रों में जस्ते का भी प्रयोग।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
प्रमुख चित्रकार
याद रखें: जयपुर शैली का असर ईसरदा, सिवाड़, झिलाय, उणियारा, चौमू, सामोद और मालपुरा ठिकानों पर भी पड़ा।
4. अलवर शैली
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1775 | शैली का आरम्भ | राव राजा प्रतापसिंह के समय जयपुर से अलग होकर; शिवकुमार व डालूराम जयपुर से अलवर आए। |
| बख़्तावरसिंह | मौलिक रूप | राजगढ़ (अलवर) क़िले के शीशमहल में भित्ति चित्र; जंगल में नाथों-जोगियों-फ़क़ीरों के साथ धर्म-चर्चा करते महाराजा के सैकड़ों चित्र। |
| विनयसिंह | स्वर्ण युग | विनयसिंह ने बलदेव से चित्रकारी सीखी; शेख़ सादी की “गुलिस्तां” की सुन्दर लिखाई व चित्र जवाहरात घोलकर बनी स्याही से करवाए — चित्र बलदेव व ग़ुलाम अली के; ग्रंथ अलवर संग्रहालय में। |
| बलवंतसिंह | पोथी-लघुचित्र | पोथी चित्र, लघुचित्र और लिपटवाँ पटचित्र — सालिगराम, जमनादास, छोटेलाल, बकसाराम, नन्दराम द्वारा। |
पहचान
- शैली में ईरानी, मुग़ल और जयपुर शैली का अचरज-भरा संतुलित मेल; अंग्रेज़ों का असर भी।
- पुरुषों के चेहरे आम की शक्ल जैसे; स्त्रियाँ ठिगने क़द की, उठी हुई वेणियाँ, अंग-प्रत्यंग बारीक परिश्रम से बने।
- बॉर्डर पर “बसलो” चित्रण ➜ वसलियों के किनारे सुन्दर बेल-बूटे — अलवर की निजी विशेषता।
प्रमुख चित्रकार
ध्यान दें: अलवर कला-विद्यालय से जुड़े नाम — बलदेव, डालूराम, जमनादास; “नानकराम” किशनगढ़ का है, अलवर का नहीं।
5. उणियारा उप-शैली
- नरूका ठिकाने ने इस उप-शैली के विकास का रास्ता खोला।
- सरदारसिंह (राव राजा) के राज में धीमा, मीरबक्श, काशी, रामलखन और भीम ने चित्रकारी की।
- मीरबक्श का चित्र “राम-सीता, लक्ष्मण व हनुमान” इस शैली की श्रेष्ठ कृति है।
6. शेखावाटी शैली
शेखावाटी शैली मुख्यतः भित्ति चित्रण की है; जयपुर के दीवार-चित्रों का सबसे ज़्यादा असर इसी पर पड़ा।
- 19वीं सदी के मध्य से 20वीं सदी के आरम्भ तक सेठों ने यहाँ विशाल हवेलियाँ बनवाईं — फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़, रामगढ़, मुकुन्दगढ़, नवलगढ़, मण्डावा, बिसाऊ आदि में दीवारों पर चित्र बने; इसीलिए शेखावाटी को “ओपन एयर आर्ट गैलरी” कहते हैं।
- फतेहपुर की गोयनका हवेली में 1850 ई. का चित्र — कृष्ण की आठ गोपियों से बना एक हाथी।
- भित्ति चित्रों में तिथि और रचनाकार का नाम मिलता है; लोक-जीवन की झाँकी सबसे ज़्यादा।
चित्रों में क्या-क्या
- बड़े-बड़े हाथी-घोड़े; गवाक्ष (झरोखे) के दोनों ओर चित्रांकन।
- मल्ल-युद्ध व कुश्ती, दधिमंथन व गौदोहन, राक्षस, कामकला, साधु-संत और लोककथाएँ।
- स्त्री-चित्रों में बलखाती बालों की लट एक ओर; परिवहन के साधनों के चित्र भी दीवारों पर।
- जोगीदास की छतरी (उदयपुरवाटी) अपने दीवार-चित्रों से पहचानी जाती है; ये चित्र देवा नामक चित्रकार के हैं।
- फ़्राँस की नादिन ला प्रिंस ने फतेहपुर (सीकर) की हवेलियों के भित्ति चित्रों के संरक्षण में उल्लेखनीय काम किया।
याद रखें: हवेलियों का विस्तृत ब्योरा (किसकी हवेली कहाँ) “हवेलियाँ और छतरियाँ” अध्याय में है।
7. चित्रकार, चित्र व संस्थाएँ
परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले सवाल — “किस शैली का स्वर्णकाल किसके समय”, “यह चित्र किस शैली का”, “इस चितेरे को किस नाम से जानते हैं” — इसी शाखा में समेटे गए हैं।
8. स्वर्णकाल व चित्रकार
| शैली | स्वर्णकाल | प्रमुख चित्रकार |
|---|---|---|
| उदयपुर | जगतसिंह प्रथम | साहबदीन, नासिरुद्दीन, नुरुद्दीन, कृपाराम, भैराराम, मनोहर, श्योबक्स, जीवराम, उमरा |
| नाथद्वारा | महाराणा राजसिंह | बाबा रामचन्द्र, चतुर्भुज, नारायण, रामलिंग, चम्पालाल, घासीराम, हीरालाल, तुलसीराम, विट्ठलदास, रामगोपाल विजयवर्गीय; महिलाएँ — कमला, इलायची |
| चावंड | अमरसिंह प्रथम | निसारदीन |
| देवगढ़ | रावत द्वारिकादास चूंडावत | बैजनाथ, चोखा, बगता/बख्ता, कंवला प्रथम, कंवला द्वितीय, हरचंद, नगा |
9. शैलियों की तुलना
| शैली | पशु-पक्षी | वृक्ष | मुख्य रंग |
|---|---|---|---|
| उदयपुर | हाथी, चकोर | कदंब | लाल (किनारे लाल-काले); पीला, हरा, नीला, सफ़ेद |
| नाथद्वारा | गाय, मोर | केला | पीला, हरा |
| देवगढ़ | — | — | पीला, हरा |
| जोधपुर | ऊँट, खंजन, कौआ | आम | पीला, लाल |
नायिका की आँख
| शैली | आँख कैसी |
|---|---|
| मेवाड़ (उदयपुर) | मछली के समान |
| नाथद्वारा | तिरछी व चकोर के समान |
| जोधपुर | बादाम के समान |
| बीकानेर | मृगनयनी |
10. प्रसिद्ध चित्र
| चित्र / ग्रंथ | शैली |
|---|---|
| उत्तराध्ययन सूत्र | मारवाड़ (जोधपुर) |
| कल्याण रागिनी (1623) | मारवाड़ (जोधपुर) |
| श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि | मेवाड़ |
| सुपासनाह चरियम | अपभ्रंश शैली |
11. उपनाम वाले चितेरे
| चित्रकार | उपनाम / पहचान | स्थान |
|---|---|---|
| परमानन्द चोयल | भैंसों का चितेरा; आधुनिक प्रयोगवादी | कोटा |
| भूर सिंह शेखावत | गाँव का चितेरा; ग्रामीण जीवन का सच्चा-यथार्थवादी चित्रण; स्वतंत्रता सेनानियों व शहीदों के चित्र | धोधलिया (बीकानेर) |
| गोवर्धनलाल जोशी | भीलों का चितेरा (आदिवासी लोकजीवन); उपनाम “बाबा”; प्रमुख चित्र “बारात” | कांकरोली (राजसमंद), जन्म 1914 |
| देवकीनन्दन शर्मा | “मास्टर ऑफ नेचर एंड लिविंग ऑब्जेक्ट” — भित्ति चित्र व पशु-पक्षी | अलवर |
12. आधुनिक चित्रकार
रामगोपाल विजयवर्गीय
- जन्म ➜ 1905 — बालेर ठिकाना (खण्डार, सवाई माधोपुर)
- शिक्षा ➜ 1924 — महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स, जयपुर से चित्रकला का डिप्लोमा
- सम्मान ➜ 1970 — राजस्थान ललित कला अकादमी का “कलाविद”; 1984 — पद्मश्री
ए. एच. मूलर (1878–1960)
- जर्मन मूल के भारत-जन्मे चित्रकार; पूरा नाम आर्चिबाल्ड हरमन मूलर।
- बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने उन्हें 1100 रुपये प्रतिमाह पर राजकीय चित्रकार नियुक्त किया; उनके चित्र बीकानेर संग्रहालय और मेहरानगढ़ संग्रहालय में हैं।
- जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह ने ख्याति सुनकर उन्हें ऐतिहासिक कथानकों पर यथार्थवादी तैल चित्र बनाने के लिए बुलाया; 1935–40 के बीच उन्होंने अनेक तैल चित्र बनाए।
अन्य चित्रकार
| चित्रकार | स्थान | पहचान |
|---|---|---|
| परमानन्द चोयल | कोटा | पुत्र शैल चोयल प्रसिद्ध चित्रकार; पुत्रवधू सुरजीत कौर चोयल (जयपुर) देश की अग्रणी महिला चितेरी — उनके चित्र जापान के फुकोका संग्रहालय में |
| श्रीमती प्रतिभा पाण्डे | धौलपुर | प्रकृति चित्रण; प्रसिद्ध चित्र “फॉल ऑफ बर्लिन” |
| कुन्दनलाल मिस्त्री | — | राजस्थान में आधुनिक चित्रकला शुरू करने का श्रेय |
| ज्योति स्वरूप शर्मा | जोधपुर | चमड़े पर चित्रकारी |
13. संस्थाएँ व संग्रहालय
चित्रकला के विकास में लगी संस्थाएँ
| संस्था | स्थान |
|---|---|
| टखमण-28 | उदयपुर |
| प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप | उदयपुर |
| तूलिका कलाकार परिषद | उदयपुर |
| कलावृत | जयपुर |
प्रमुख चित्रकला संग्रहालय
| संग्रहालय | स्थान |
|---|---|
| पोथीखाना संग्रहालय | जयपुर |
| पुस्तक प्रकाश | जोधपुर |
| सरस्वती भण्डार | उदयपुर |
| जिनभद्रसूरि ग्रंथ भंडार | जैसलमेर |
14. रैपिड फायर तथ्य
- आमेर शैली ➜ सूरतखाना आमेर में था; रज्मनामा की प्रति 1582 में यहीं बनी; गणेशपोल मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने 1639 में बनवाया
- जयपुर शैली ➜ 1700–1900 ई.; स्वर्णकाल सवाई प्रतापसिंह; राजस्थान में मुग़ल शैली का सबसे गहरा असर इसी पर
- साहिबराम ➜ आदमकद पोट्रेट की परम्परा शुरू की; ईश्वरीसिंह का आदमकद पोट्रेट राजस्थान का पहला
- लालचंद ➜ हाथियों की भिड़ंत के बेजोड़ अंकन के लिए जाने जाते हैं
- अलवर शैली ➜ आरम्भ 1775, राव राजा प्रतापसिंह; स्वर्ण युग विनयसिंह; बॉर्डर पर «बसलो» इसकी निजी विशेषता
- उणियारा उप-शैली ➜ नरूका ठिकाना; मीरबक्श की «राम-सीता, लक्ष्मण व हनुमान» श्रेष्ठ कृति
- शेखावाटी शैली ➜ भित्ति चित्रण की शैली; हवेलियों के कारण «ओपन एयर आर्ट गैलरी» कहलाती है
- नायिका की आँख ➜ उदयपुर में मछली जैसी, जोधपुर में बादाम जैसी, बीकानेर में मृगनयनी
- रामगोपाल विजयवर्गीय ➜ जन्म 1905; 1984 में पद्मश्री
अगले भाग में राजस्थान की हस्तकलाएँ — हस्तकला का परिचय, संरक्षण देने वाली संस्थाएँ, अब तक मिले भौगोलिक संकेतक, उदयपुर संभाग की कलाएँ और कोटा व भरतपुर संभाग की हस्तकलाएँ।
पिछला भाग: राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: मारवाड़ स्कूल (भाग 2) एवं हाड़ौती स्कूल
अगला भाग: राजस्थान की हस्तकलाएँ: हस्तकला का परिचय एवं उदयपुर संभाग
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