राजस्थान के मंदिर: उदयपुर संभाग (भाग 2) एवं हाड़ौती व पूर्वी राजस्थान – Rajasthan Art and Culture Chapter 31

बाँसवाड़ा-डूँगरपुर-प्रतापगढ़ के मंदिर तथा कोटा संभाग और भरतपुर संभाग के प्रमुख मंदिर।

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In this chapter (9 sections)
  1. बाँसवाड़ा के मंदिर
  2. डूँगरपुर व प्रतापगढ़
  3. हाड़ौती व पूर्वी राजस्थान
  4. कोटा के मंदिर
  5. बूँदी व बारां के मंदिर
  6. झालावाड़ के मंदिर
  7. भरतपुर, डीग व धौलपुर
  8. करौली व सवाई माधोपुर
  9. रैपिड फायर तथ्य

हाड़ौती और पूर्वी राजस्थान के मंदिरों में गुप्तकाल के शिवालय से लेकर जैन और बौद्ध स्थलों तक सब कुछ मिलता है, इसलिए हर मंदिर को उसके ज़िले और अपनी ख़ास पहचान से जोड़कर पढ़ें। इस भाग में बाँसवाड़ा, डूँगरपुर-प्रतापगढ़ (बेणेश्वर धाम सहित), कोटा, बूँदी-बारां, झालावाड़, भरतपुर-डीग-धौलपुर तथा करौली-सवाई माधोपुर के मंदिर लिए गए हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान के मंदिर, 7 चॉक-बोर्ड चित्र, 20 नक्शे, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. बाँसवाड़ा के मंदिर

मंदिरस्थानविशेष
घोटिया अम्बा माताबाँसवाड़ाचैत्र अमावस्या को भील मेला; मान्यता — पाण्डवों ने वनवास का कुछ समय यहाँ बिताया; पाण्डव-कुन्ती-द्रौपदी की मूर्तियाँ, पाण्डव कुण्ड और भीम कुण्ड
नंदिनी माताबड़ोदियापहाड़ी पर प्राचीन मंदिर; पौष पूर्णिमा को मेला; श्वेत पत्थर की अष्टभुजी प्रतिमा; दर्शनार्थी छोटे पत्थरों से घरौंदे बनाते हैं; मान्यता है कि ये द्वापर में यशोदा की कन्या थीं, जिसे देवकी की आठवीं संतान मानकर कंस ने मारना चाहा
छींछ माताछींछब्रह्मा मंदिर के पास भगवती छींछा का मंदिर — देवीदास ने बनवाया
ब्रह्मा मंदिरछींछतालाब किनारे, लगभग 12वीं सदी; ब्रह्मा की आदमकद चतुर्मुख प्रतिमा, स्थापना महारावल जगमाल सिंह ने की

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

वागड़ के परमारों के मंदिर

मंदिरकिसने / कबविशेष
अर्थुना के जैन व शैव मंदिर11वीं–12वीं सदी, वागड़ के परमारप्राचीन नाम उत्थुनक; पहले परमारों की राजधानी; खुदाई में शिव, वैष्णव और जैन टूटी मूर्तियाँ मिलीं
मंडलेश्वर महादेव1079 ई. — चामुण्डराज, परमार राजा मंडलीक का बेटाअर्थुना में; प्राचीन लकुलिश-पंथ का शिवालय; शिलालेख बनवाने वाले और वर्ष की जानकारी देता है
मंडलीश्वर महादेव1059 ई. — परमार शासक मंडलीकपाणाहेड़ा, नागेला तालाब की पाल पर

अर्थुना के अन्य प्रमुख मंदिर —

ध्यान दें: दो मिलते-जुलते नाम — मंडलेश्वर (अर्थुना, 1079, चामुण्डराज) और मंडलीश्वर (पाणाहेड़ा, 1059, मंडलीक)।

2. डूँगरपुर व प्रतापगढ़

बेणेश्वर धाम — नवाटापरा (साबला तहसील)

  • संगम ➜ सोम, माही और जाखम नदियाँ — त्रिकोण-आकार का टापू
  • शिवलिंग ➜ खंडित; 5 फुट ऊँचा, ऊपर से 5 जगह खंडित
  • लेप ➜ सुबह केसर, शाम भभूत

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

  • मेले के उपनाम ➜ आदिवासियों का कुम्भ / बागड़ का कुम्भ / बागड़ का पुष्कर।
  • लक्ष्मीनारायण मंदिर मावजी के दो शिष्य अजे और वाजे ने बनवाया।
मंदिरस्थानविशेष
देव सोमनाथडूँगरपुरसोम नदी किनारे, 12वीं सदी का शिव मंदिर; बिना सीमेंट, चूने, मिट्टी के केवल सफेद पारेवा पत्थर से बना
विजय राज राजेश्वरडूँगरपुरगैबसागर के तट पर शिव मंदिर; महारावल विजयसिंह ने शुरू किया, पुत्र लक्ष्मणसिंह ने 1923 ई. में पूरा
हरि मंदिर (संत मावजी मंदिर)साबलामावजी = कृष्ण के निष्कलंकी अवतार; उनका ग्रंथ “चोपड़ा” यहाँ रखा है, जिसकी भविष्यवाणियाँ आज भी सच होती बताई जाती हैं

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

प्रतापगढ़ ज़िला

मंदिरस्थानविशेष
गौतमेश्वर महादेवअरनोदमेला बुद्ध पूर्णिमा (वैशाख पूर्णिमा) पर; गौतम ऋषि की तपोस्थली; पवित्र कुण्ड में स्नान; “कांठल का हरिद्वार”
भ्रमर (भँवर) माताछोटी सादड़ी—

ट्रिक: बेणेश्वर के तीन नाम — आदिवासियों का कुम्भ, बागड़ का कुम्भ, बागड़ का पुष्कर; संगम की तीन नदियाँ — सोम, माही, जाखम।

3. हाड़ौती व पूर्वी राजस्थान

  • कोटा संभाग ➜ कोटा · बूँदी · बारां · झालावाड़
  • भरतपुर संभाग ➜ भरतपुर · डीग · धौलपुर · करौली · सवाई माधोपुर

ध्यान दें: कोटा संभाग गुप्तकाल से जुड़े शिव मंदिरों, भूमिज/पंचायतन के उदाहरणों और झालरापाटन के कच्छपघात मंदिरों के लिए जाना जाता है।

4. कोटा के मंदिर

मंदिरस्थानविशेष
मथुराधीशपाटनपोल (कोटा)वल्लभ-सम्प्रदाय की सात पीठों में पहली; प्रतिमा 1670 में बूँदी लाई गई, फिर 1744 ई. में कोटा शासक दुर्जनशाल सिंह कोटा लाए
चारचौमा शिवालयचारचौमा गाँवगुप्तकालीन; चतुर्मुखी शिवलिंग; महाशिवरात्रि पर “चारचौमा की सोरती” मेला
कंसुआ शिव मंदिरकोटा8वीं सदी का; गर्भगृह का शिवलिंग काले पत्थर का और चतुर्भुज; पास में 1008-मुखी सहस्रमुखी शिवलिंग; भैरव की आदमकद मूर्ति
विभीषण मंदिरकैथूनअनुमानित काल तीसरी–पाँचवीं सदी; छतरी के नीचे बिना धड़ की, ऊपरी भाग की विशाल मूर्ति; राम-भक्त के रूप में शीश की पूजा; भारत का एकमात्र विभीषण मंदिर माना जाता है

कंसुआ — शकुंतला की स्मृतियाँ

  • सूर्य की पहली किरण मंदिर में 20–25 फुट भीतर बैठे शिवलिंग पर सीधी पड़ती है।
  • माना जाता है कि यहीं कण्व ऋषि का आश्रम था और शकुंतला का बचपन-किशोरावस्था यहीं बीती।
  • परिक्रमा-पथ की बायीं दीवार पर कुटिलाक्षर लिपि में 738 ई. (8वीं सदी) का शिवगण मौर्य का शिलालेख है, जिसमें मंदिर के निर्माण का ज़िक्र है।

ट्रिक: गुप्तकालीन तिकड़ी — चारचौमा, भीमचौरी, कंसुआ; सबके सब कोटा में।

5. बूँदी व बारां के मंदिर

बूँदी

मंदिरस्थानविशेष
कपालेश्वर महादेव / कंवलेश्वरइन्द्रगढ़नागर शैली, चाकण नदी के किनारे; बनवाने वाले जैत्रसिंह (चौहान हम्मीर के पिता)
प्राकृतिक शिव मंदिररामेश्वर—
केशवराय जीकेशोरायपाटनविष्णु तीर्थ — चम्बल किनारे; बूँदी के राव छत्रसाल ने बनवाया; केशवराय जी की सुन्दर मूर्ति

बारां

मंदिरस्थानविशेष
भण्डदेवरा शिव मंदिररामगढ़पंचायतन/भूमिज शैली का उत्कृष्ट नमूना; मेदवंशीय राजा मलय वर्मा ने 10वीं सदी में किसी विजय की याद में बनवाया; “भण्डदेवरा” = टूटा-फूटा शिवालय; 1162 ई. में राजा त्रिशावर्मन ने जीर्णोद्धार करवाया; मिथुन मूर्तियों से “राजस्थान का मिनी खजुराहो / हाड़ौती का खजुराहो”
बांसथूनी शिवालयबारांखंडित मंदिर, कोटा–शाहबाद मार्ग पर
मामा-भान्जा मंदिरफूलदेवरा (अटरू)न चूना, न सीमेंट — इन दोनों का इस्तेमाल नहीं हुआ
गड़गच्च देवालयअटरूखजुराहो शैली पर आधारित 10वीं सदी का मंदिर; औरंगजेब ने तोपों से तुड़वाया, बाद में फिर बना

सीताबाड़ी — केलवाड़ा के पास

  • सीता, लक्ष्मण और वाल्मीकि के मंदिर।
  • “सहरिया जनजाति का कुम्भ”; सहरिया अपने मृतकों की अस्थियाँ यहीं प्रवाहित करते हैं।
  • मान्यता ➜ राम के त्याग देने पर सीता यहीं रहीं और यही लव-कुश की जन्मस्थली है।

6. झालावाड़ के मंदिर

शीतलेश्वर महादेव — झालरापाटन

  • खासियत ➜ राजस्थान के तिथियुक्त मंदिरों में सबसे प्राचीन
  • वर्ष ➜ 689 ई.
  • निर्माता ➜ राजा दुर्गण के सामंत वाप्पक

फर्ग्यूसन की राय में यह सबसे पुराने हिन्दू मंदिरों में है और स्थापत्य के लिहाज़ से देश के मंदिरों में अव्वल।

सात सहेली मंदिर (पद्मनाभ / सूर्य मंदिर)

  • सूर्य को घुटनों तक के जूतों में गढ़ा गया है।
  • शैली कच्छपघात; पिछली दीवार (मण्डोवर) की मुख्य रथिका में सूर्य-विष्णु का संयुक्त रूप।
  • बनावट सप्तरथ और सप्तभूम; सात शृंगों वाला विशाल शिखर; 10वीं सदी का।
मंदिरस्थानविशेष
चन्द्रभागा मंदिर-समूहझालरापाटन7वीं सदी, चन्द्रभागा नदी के तट पर
शांतिनाथ जैन मंदिरझालरापाटनकच्छपघात शैली; भीतर श्याम पाषाण की दिगम्बर शांतिनाथ-मूर्ति
चांदखेड़ी का जैन मंदिरखानपुरआदिनाथ की प्रतिमा; कोटा शासक किशोर सिंह के समय एक बघेरवाल जैन व्यापारी ने बनवाया

कोल्वी की गुफाएँ — “राजस्थान का एलोरा”

डग क्षेत्र में कोल्वी, बिनायगा, हथियागौड़ और गुनाई में प्राचीन बौद्ध गुफाएँ और स्तूप हैं। ये 7वीं सदी की मानी जाती हैं।

7. भरतपुर, डीग व धौलपुर

भरतपुर

मंदिरकिसने / कबविशेष
गंगा मंदिरमहाराजा बलवन्त सिंह ने 1845 में शुरू किया; 12 फ़रवरी 1937 को महाराजा ब्रजेन्द्र सिंह ने गंगा की मूर्ति स्थापित कीकाम लगभग 90 वर्ष खिंचा; कहा जाता है कि सभी राज्य-कर्मचारी और धनी लोग अपनी एक महीने की कमाई दान कर गए; सामने का भाग मुगल शैली का, पीछे का बौद्ध शैली पर
लक्ष्मण मंदिरशुरू बलदेव सिंह, पूरा बलवन्त सिंह नेजाट राजवंश (भरतपुर) के कुलदेवता; राज्य के बड़े मंदिरों में अकेला लक्ष्मण-मंदिर
उषा मंदिर / उषा मस्जिदबयाना दुर्गविस्तार “बयाना किला” (दुर्ग अध्याय) में

डीग

मंदिरस्थानविशेष
पूंछरी का लौठा मंदिरडीगगिरिराज (गोवर्धन) की 21 किमी परिक्रमा के मार्ग में
चौरासी खम्भा मंदिरकामां (डीग)बिना मूर्ति का मंदिर; पुराणों में इसे विष्णु मंदिर कहा गया

धौलपुर

मंदिरस्थानविशेष
सैपऊ महादेवसैपऊप्राचीन शिव मंदिर
महाकालेश्वर मंदिरसरमथुरा—
चौपड़ा शिव मंदिरधौलपुर—

8. करौली व सवाई माधोपुर

करौली

मंदिरस्थानविशेष
मदन मोहन जीकरौलीगौड़ीय सम्प्रदाय का; मूर्ति वृंदावन से आई। महाराजा गोपालसिंह जयपुर से गुसाईं सबलदास के माध्यम से विग्रह करौली लाए और वर्तमान मंदिर बनवाया
श्री महावीर जीहिंडौन सिटीप्राचीन नाम चांदनपुर — इसलिए “चांदनपुर के महावीर”; गम्भीर नदी किनारे; निर्माण जैन श्रावक अमरचन्द बिलाला ने करवाया
  • यहाँ जैन ही नहीं, मीणा, गुर्जर और दूसरे समुदाय भी पूजा करते हैं।
  • चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (महावीर जयंती) पर 4 दिन का विशाल मेला; वैशाख कृष्ण प्रतिपदा को जिनेन्द्र रथयात्रा — इस रथ का सारथी क्षेत्र का उपखंड अधिकारी (SDM) बनता है।

सवाई माधोपुर

मंदिरस्थानविशेष
त्रिनेत्र गणेशरणथम्भौर दुर्गदेश का सबसे प्राचीन गणेश मंदिर कहा जाता है, एकमात्र त्रिनेत्र गणेश; प्रतिमा का केवल मुख; भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मेला; निर्माण पर प्रामाणिक जानकारी नहीं — चौहानों का अनुमान; पूर्वी राजस्थान में शादी-ब्याह और शुभ कामों का पहला न्योता इन्हीं को भेजा जाता है; मंदिर के पीछे कुछ दूर प्राचीन शिव मंदिर
घुश्मेश्वर महादेवशिवाड़शिव के बारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में माना जाता है; शिवलिंग सदा जल में डूबा रहता है
चमत्कार जीआलनपुरस्फटिक पाषाण की ऋषभदेव प्रतिमा

9. रैपिड फायर तथ्य

  • बेणेश्वर का संगम ➜ सोम, माही, जाखम; मेला «बागड़ का कुम्भ»
  • गुप्तकालीन तिकड़ी ➜ चारचौमा, भीमचौरी, कंसुआ — तीनों कोटा में
  • कंसुआ का शिलालेख ➜ 738 ई., शिवगण मौर्य का
  • भारत का एकमात्र विभीषण मंदिर ➜ कैथून (कोटा)
  • हाड़ौती का खजुराहो ➜ भण्डदेवरा शिव मंदिर, रामगढ़ (बारां)
  • सहरिया जनजाति का कुम्भ ➜ सीताबाड़ी (बारां)
  • तिथियुक्त मंदिरों में सबसे प्राचीन ➜ शीतलेश्वर महादेव, झालरापाटन, 689 ई.
  • राजस्थान का एलोरा ➜ कोल्वी की गुफाएँ (7वीं सदी)
  • त्रिनेत्र गणेश ➜ रणथम्भौर दुर्ग; देश का सबसे प्राचीन गणेश मंदिर कहा जाता है

अगले भाग में जयपुर संभाग के मंदिर — कृष्ण के गौड़ीय मंदिर, आभानेरी, मेहन्दीपुर बालाजी, नीलकंठेश्वर, हर्षनाथ और खाटूश्याम।

पिछला भाग: राजस्थान के मंदिर: उदयपुर संभाग (भाग 1)

अगला भाग: राजस्थान के मंदिर: जयपुर संभाग

इन्हें भी पढ़ें: मुस्लिम पीर, मस्जिदें, दरगाह, मीनार, मकबरे · प्रतिहार वंश (गुर्जर–प्रतिहार)

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

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