राजस्थान की वेशभूषा व पहनावा: सिर के वस्त्र एवं स्त्रियों के वस्त्र – Rajasthan Art and Culture Chapter 20

राजस्थानी पगड़ी, साफा, पुरुषों के वस्त्र, घाघरा-ओढ़नी और आदिवासी पहनावे का सार, PYQ सहित।

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In this chapter (20 sections)
  1. पगड़ी — आन-बान-शान
  2. कपड़ों के पुराने नाम
  3. सिर के वस्त्र
  4. पाग, पगड़ी, साफा, पेंचा, फेंटा
  5. अवसर और ऋतु की पगड़ियाँ
  6. मेवाड़ की पगड़ियाँ
  7. मारवाड़ और अन्य रियासतें
  8. आदिवासी और अन्य साफे
  9. ऊपर के वस्त्र
  10. नीचे के वस्त्र और टोपी-लुंगी
  11. घाघरा, लहंगा, सलवार
  12. कुर्ती, काँचली, आँगी
  13. ओढ़नी और उसकी किस्में
  14. साड़ियाँ और उनके केन्द्र
  15. बिछाने और आम वस्त्र
  16. ऊनी और सर्दी के वस्त्र
  17. भीलों के वस्त्र
  18. सहरियों के वस्त्र
  19. अन्य जनजातीय वस्त्र
  20. रिवीजन पॉइंटर्स

राजस्थानी पहनावे में पगड़ी सिर्फ़ कपड़ा नहीं, आन-बान-शान की पहचान है — तभी «पगड़ी की लाज रखना» मुहावरा आज भी बोला जाता है। इस भाग में पगड़ी और साफे के भेद, अवसर व ऋतु की पगड़ियाँ, ऊपर-नीचे के वस्त्र, घाघरा-ओढ़नी-साड़ियाँ, ऊनी वस्त्र और भील-सहरिया पहनावा क्रमवार दिए गए हैं। जहाँ पिछले वर्षों की परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम साथ में लिखा गया है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान की वेशभूषा व पहनावा, 6 चॉक-बोर्ड चित्र, 9 नक्शे, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
माइंड मैप खोलें ➜

1. पगड़ी — आन-बान-शान

बुज़ुर्गों के आगे नंगे सिर पहुँचना अपशकुन गिना जाता है; मान-सम्मान बचाने के लिए आज भी “पगड़ी की लाज रखना” मुहावरा बोला जाता है। साफा, पाग और पगड़ी राजस्थानी वेश से अलग नहीं की जा सकतीं; ये आन, बान और शान की पहचान हैं।

  • पगड़ी के काम ➜ तेज़ धूप से बचाव, खेती के समय धूल-मिट्टी से रक्षा, और आदमी की सामाजिक व धार्मिक हैसियत की पहचान।
  • पुरुषों के सिर का यह कपड़ा इलाक़े और बोली के हिसाब से अलग नामों से जाना गया — शिरोत्राण, फालिया, धुमालो, अमलो, सेलो, मोलिया, बागा, पाग, साफा, पेंचा, फेंटा।
  • पगड़ी को असली संरक्षण देने वाला शासक मुगल बादशाह अकबर बताया जाता है।
  • पगड़ी बाँधने वाला ➜ बंधेरा (जयपुर); मेवाड़ में छाबदार
  • जयपुर रियासत का आख़िरी बंधेरा ➜ सूरज बख्श — जिसे जागीर दी गई
  • सबसे छोटी पगड़ी का रिकॉर्ड ➜ बीकानेर के कृष्णचंद पुरोहित — सुई और पेंसिल पर पगड़ी बाँधी

ट्रिक: पगड़ी बाँधने वाला जयपुर में बंधेरा, मेवाड़ में छाबदार — नाम और रियासत मिलाकर याद करें।

2. कपड़ों के पुराने नाम

  • स्त्रियों के परिधानों में पहले इन्हीं कपड़ों का चलन रहा है।
  • कालीबंगा-आहड़ की सभ्यताओं के दौर में भी यहाँ सूती कपड़े पहने जाते थे। [परीक्षा: पशु परिचर 2024 — पुराने समय से राजस्थानी पुरुषों के कपड़े किस कपड़े के बनते आए हैं? ➜ सूती]

लोकगीत की एक मशहूर पंक्ति में राजस्थान के तीन रत्न गिनाए गए हैं — ढोला, मारवणी और तीसरा लाल कसूमल रंग: “मारू थारे देस में उपजे तीन रतन…“।

3. सिर के वस्त्र

ध्यान दें: मारवाड़ की पगड़ी मेवाड़ की पगड़ी से बड़ी और ऊँची होती है। उदयपुर की पगड़ी चपटी; मारवाड़ में छज्जेदार और खिड़कीदार; जयपुर की खूँटेदार।

4. पाग, पगड़ी, साफा, पेंचा, फेंटा

नामपहचान
पाग14 से 20 मीटर लम्बी
पगड़ी13 से 15 मीटर लम्बी; लम्बी हो तो पाग, छोटी हो तो पगड़ी
साफापाग से कम लम्बा, पर ज़्यादा चौड़ा; बाँधते समय एक पल्ला पीठ पर कमर के नीचे तक छोड़ दिया जाता है

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

सलीक़े से पगड़ी बाँध पाना हुनर है, इसलिए यह काम खास कारीगरों के ज़िम्मे रहा।

पगड़ी को सजाने के सामान

  • बालाबन्द ➜ पगड़ी पर लपेटा जाने वाला ज़रीदार वस्त्र।
  • ऊपरणी ➜ पगड़ी के ऊपर बाँधा जाने वाला कपड़ा।
  • रतनपेच ➜ पगड़ी पर लगने वाला विशेष गहना।

5. अवसर और ऋतु की पगड़ियाँ

पगड़ीकब / कौन
परतदार पगड़ीमेवाड़ की बहुरंगी, नज़र खींचने वाली पगड़ी
मोठड़े की पगड़ीविवाह के अवसर पर
लहरिया की पगड़ीश्रावण की तीज पर
मदील पगड़ीदशहरे पर

… शेष 10 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

रोचक तथ्य: आखा तीज (अक्षय तृतीया) यहाँ का सबसे शुभ दिन है, इसीलिए केसरिया पाग बाँधी जाती है। केसरिया त्याग की निशानी है, तभी युद्ध पर निकलते राजपूत योद्धा यही रंग बाँधते थे।

साफों के जाति-रंग

  • सफेद साफा ➜ विश्नोई समाज।
  • लाल टूल का साफा ➜ राईका / रेबारी।
  • लंगा, मांगणियार और कालबेलिया ➜ रंगीन छापे वाले डब्बीदार भाँत के साफे।

बंधेज वाले साफे

  • मोठरा / मोठड़ा ➜ दो रंग वाला बंधेज साफा (रंग दो बार उतारकर बनता है); राखी पर बहन अपने भाई को मोठड़ा साफा भेंट करती है।
  • राजशाही ➜ सिर्फ़ एक रंग का साफा जिसमें सफेद बूँदें हों; शायद राजा के पहनने से यह नाम पड़ा; जयपुर की प्रसिद्ध।
  • बावरा साफा ➜ बंधेज कला से पाँच रंगों में रँगा।

6. मेवाड़ की पगड़ियाँ

पगड़ीकिसके समय / कहाँ
मेवाड़ीमेवाड़ में प्रचलित
अमरशाहीमहाराणा अमरसिंह द्वितीय के समय
उदयशाही / उदेशाहीमेवाड़ में प्रचलित

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

मेवाड़ के सामन्तों की पगड़ियाँ

पगड़ीठिकाना
चूँडावतशाहीसलूम्बर
जसवंतशाहीदेवगढ़ (राजसमंद)
मांडपशाहीकानोड़ (उदयपुर)

7. मारवाड़ और अन्य रियासतें

पगड़ी / साफाकिसके समय / कहाँ
खिड़किया पाग17वीं सदी तक चलन; शाही लोग और आम लोग दोनों पहनते थे
तख्तशाही पागमहाराजा तख्तसिंह
जसवंतशाही पाग / पेंचाजसवंतसिंह द्वितीय
जालिमशाही पागमहाराजा तख्तसिंह के पुत्र जालिमसिंह

ट्रिक: उदयपुर → उमराव पाग; जयपुर → शाही साफा/राजशाही; बीकानेर → गंगाशाही; जोधपुर → जोधपुरी साफा।

8. आदिवासी और अन्य साफे

  • मीणा तथा गुर्जर अपनी पगड़ी को फेंटा बोलते हैं।
  • आदिवासियों में पगड़ी की जगह बाँधा जाने वाला कपड़ा पोतिया कहलाता है।
  • भीलों में पोत्या (सफेद साफा) और अंगोछा (केरी भांत का सबसे लोकप्रिय) सिर पर बाँधे जाते हैं।

9. ऊपर के वस्त्र

वस्त्रपहचान
कमीज़ग्रामीण पुरुष धोती के साथ पहनते हैं; कुर्ते जैसा
अंगरखी / बुगतरी / बण्डीपूरी बाँह का बिना कॉलर-बटन का चुस्त कुर्ता; पीठ और कंधे पर कढ़ाई होती है
अंगरखी के अन्य नामगाबा, गदर, मिरजाई, डोगी, कानो, तनसुख, दुतई, गमना
फर्रुखशाही अंगरखीप्रसिद्ध

10. नीचे के वस्त्र और टोपी-लुंगी

वस्त्रपहचान
पायजामाअंगरखी, चुगे और जामे के नीचे कमर-पैरों में पहना; नाड़े से बँधता है
सूथनासर्दी में बच्चों का पायजामा
बिरजस / ब्रीजेसचुड़ीदार की जगह घुड़सवारी/शिकार में पहना जाने वाला तंग पायजामा
धोतीकमर पर बाँधी जाने वाली सफेद चादर-जैसा वस्त्र

11. घाघरा, लहंगा, सलवार

वस्त्रपहचान
घाघराकमर से एड़ी तक का घेरदार; कई कलियाँ जोड़कर बनता है; जयपुर का रेशमी घाघरा प्रसिद्ध
घवलादेहाती औरतों का ऊनी घाघरा; पुराने समय में 80 कलियों वाला घाघरा मशहूर था
लहंगाघाघरे का छोटा रूप; घेर कम; शेखावाटी में खूब चलन
पेटीकोटलहंगे का एक प्रकार; साड़ी के नीचे

12. कुर्ती, काँचली, आँगी

वस्त्रपहचान
कुर्ती और काँचलीऊपरी वस्त्र; कुर्ती बिना बाँह की, काँचली बाँह वाली; दोनों मिलकर ब्लाउज़ का काम; मारवाड़ में बहुत चलन
आँगीबिना बाँह की चोली
कापड़ीकपड़े के दो टुकड़े बीच से जोड़कर बनी चौली; पीठ पर तनियों से बँधती है

13. ओढ़नी और उसकी किस्में

  • ओढ़नी / लुगड़ी ➜ कुर्ती, काँचली और घाघरे के ऊपर से ओढ़ा जाने वाला कपड़ा।
  • चलन की क़िस्में — पाटोदा का लूगड़ा, बंधेज का ओढ़ना, धनक, मोठड़ा, पंवरी, लहरिया और तीन पोमचे (साधारण, पीला, चीड़ का)।
  • चन्द्रकला ➜ स्त्रियों की एक बहुमूल्य ओढ़नी।
ओढ़नीपहचान
दामणी / दामड़ीमारवाड़ की लाल ओढ़नी जिस पर धागे की कशीदाकारी होती है
डूँगरशाही ओढ़नीजोधपुर
पंवरीदुल्हन की लाल रंग की ओढ़नी
मोठड़ाजब लहरिये की धारियाँ एक-दूसरे को काटती हुई बनें

14. साड़ियाँ और उनके केन्द्र

पुरानी साड़ियों के कुछ नाम — पट, दुकूल, चोल, निचोल, अंसुक, चीर-पटोरी, चोरसो, ओढ़नी, धोरावाली साड़ी। लहरिया और बंधेज की साड़ियाँ सबसे लोकप्रिय हैं।

साड़ीकेन्द्र
जेनब की साड़ियाँकोटसुआँ गाँव (दिगोद, कोटा)
स्प्रे पेंटिंग की साड़ियाँनाथद्वारा (राजसमंद)
चूवा-चंदन की साड़ियाँनाथद्वारा (राजसमंद)

15. बिछाने और आम वस्त्र

वस्त्रपहचान
कौपीनसाधु-संन्यासियों के पहनने का वस्त्र
पांतियोफ़र्श पर बैठ भोजन करने के लिए बिछने वाली लम्बी दरी
बुगची / बुगचोचौकोर कपड़े के तीन कोनों को जोड़कर बना थैला; सामान रखने में
भाखला / भाकला / भाकलियोऊँट के बाल से बुना दरी-जैसा बिछावन; देहात में जाड़े की ठंड रोकने को ओढ़ भी लेते हैं

16. ऊनी और सर्दी के वस्त्र

वस्त्रपहचान
सौड़ / सोवड़ऊन से बनी रजाई
घुघीऊन का वस्त्र जो बरसात-ठंड से बचने के लिए ओढ़ा जाता है
पछेवड़ागाँवों में पुरुष कम्बल की तरह ओढ़ते हैं
डोवटीदो पट्टियों को जोड़कर बनी ओढ़ने की चादर

17. भीलों के वस्त्र

वस्त्रपहचान
ढेपाड़ाभील पुरुषों की तंग धोती
खोयतुलंगोटिया भीलों में पुरुषों की कमर की लंगोटी
पोतियापगड़ी की जगह बाँधा जाने वाला मोटा वस्त्र
पोत्याबाल ढकने का सफेद साफा

18. सहरियों के वस्त्र

वस्त्रपहचान
सलूकासहरिया पुरुषों की अंगरखी, कमीज़ की जगह
पंछाघुटनों तक चढ़ी रहने वाली ऊँची बँधी धोती
रेजाविवाहित महिलाओं का वस्त्र

19. अन्य जनजातीय वस्त्र

वस्त्रपहचान
कटकीआदिवासी अविवाहित लड़कियों की ओढ़नी; लाल ज़मीन पर सफेद-काले धागे की बूँटियाँ; छपाई का अलंकरण पावली, छपी ओढ़नी पावली भांत की ओढ़नी
तारा भांत की ओढ़नीभूरी-लाल पृष्ठभूमि; छोरों पर काले रंग में तारे जैसी षट्कोण आकृति; आदिवासी स्त्रियों की सबसे प्रिय ओढ़नी
लहर भांत की ओढ़नीबिंदियों से लहरनुमा आकृति; किनारे-पल्लू ज्वार-भांत जैसे
ज्वार भांत की ओढ़नीज्वार के दानों जैसी छोटी बिंदियाँ और बेल-बूटे

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. पगड़ी बाँधने वाला जयपुर में बंधेरा और मेवाड़ में छाबदार कहलाता है।
  2. पाग 14 से 20 मीटर लम्बी होती है, पगड़ी 13 से 15 मीटर; साफा पाग से कम लम्बा पर ज़्यादा चौड़ा।
  3. मोठड़े की पगड़ी विवाह पर, लहरिया की श्रावण की तीज पर और मदील पगड़ी दशहरे पर बाँधी जाती है।
  4. सफेद साफा विश्नोई समाज का है; लाल टूल का साफा राईका / रेबारी का।
  5. उदयपुर ➜ उमराव पाग, जयपुर ➜ शाही साफा/राजशाही, बीकानेर ➜ गंगाशाही, जोधपुर ➜ जोधपुरी साफा।
  6. मीणा तथा गुर्जर पगड़ी को फेंटा कहते हैं; आदिवासियों में उसकी जगह बँधने वाला कपड़ा पोतिया है।
  7. कुर्ती बिना बाँह की और काँचली बाँह वाली होती है; दोनों मिलकर ब्लाउज़ का काम करती हैं।
  8. पंवरी दुल्हन की लाल ओढ़नी है, जबकि दामणी / दामड़ी मारवाड़ की लाल ओढ़नी कहलाती है।
  9. राजस्थानी पुरुषों के कपड़े पुराने समय से सूती बनते आए हैं (पशु परिचर 2024)।

अगले भाग में दुर्गों का परिचय — प्राचीन ग्रंथों में दुर्ग के भेद, श्रेणियाँ उदाहरण सहित, आकार से पड़े नाम, विश्व धरोहर के पहाड़ी किले और चित्तौड़गढ़।

पिछला भाग: राजस्थान के आभूषण: सिर, कान, नाक और दाँत एवं गले के आभूषण

अगला भाग: राजस्थान के दुर्ग: दुर्ग — परिचय व प्रकार एवं मेवाड़ व हाड़ौती के दुर्ग (भाग 1)

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के आभूषण · राजस्थान की जनजातियाँ

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न राजस्थान की वेशभूषा व पहनावा के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
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