पूर्वी राजस्थान के किले अक्सर एक ही विशेषता से पहचाने जाते हैं — रणथम्भौर इतना छिपा कि पास पहुँचकर ही दिखता है, लोहागढ़ अजेय रहा और जयगढ़ पर कभी बाहरी हमला नहीं हुआ। इस भाग में रणथम्भौर से करौली, भरतपुर, डीग और धौलपुर तक, फिर आमेर, जयगढ़, नाहरगढ़, अलवर और शेखावाटी के दुर्ग क्रम से हैं। जहाँ-जहाँ पिछली परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम साथ में लिखा गया है।
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1. रणथम्भौर
- ज़िला ➜ सवाई माधोपुर
- मान्य निर्माता ➜ अजमेर के चौहान राजा जयंत, 8वीं सदी
- श्रेणी ➜ गिरि + वन · विश्व धरोहर
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- अरावली की 7 श्रेणियों से घिरा, अरावली और विंध्याचल के बीच, रणथम्भौर बाघ परियोजना के बीचोंबीच; घाटियाँ-नाले चम्बल-बनास ने काटे।
- ऊँची चोटी पर होकर भी इतना छिपा कि बिल्कुल पास पहुँचने पर ही दिखता है।
- असली नाम रंतःपुर — “रण की घाटी का नगर”। रण = नीचे वाली पहाड़ी, थंभ = जिस स्तम्भनुमा पहाड़ी पर किला है; इससे रणस्तम्भपुर → रणथम्भौर।
किसने बनवाया — अलग-अलग मत
- महेश्वर के चन्द्रवंशी राजा रंतिदेव
- सपादलक्ष के चौहान रणथान देव
- चंदेल राव जैता, 8वीं सदी
द्वार, महल, मंदिर, जलाशय
- 7 द्वार ➜ नौलखा दरवाज़ा (मुख्य), हाथीपोल, गणेशपोल, सूरजपोल, अंधेरी पोल, सतपोल, दिल्ली पोल; तोरण (त्रिपोलिया) दरवाज़ा।
- त्रिनेत्र गणेश मंदिर ➜ चौहानों का बनवाया, देश भर में प्रसिद्ध; पीछे शिव मंदिर। लक्ष्मीनारायण (खंडित) और जैन मंदिर भी।
- जोगी महल ➜ मुख्य द्वार के बाहर। हम्मीर महल — करौली के लाल पत्थर का। हम्मीर की कचहरी, रानी महल, बादल महल।
- सुपारी महल ➜ एक ही जगह मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर — साम्प्रदायिक सद्भाव का नमूना।
- जौंरा-भौंरा ➜ अनाज का गोदाम।
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घटनाक्रम
- हम्मीर ने अलाउद्दीन के बागी मीर मुहम्मद शाह और उसकी बेगम चिमना को पनाह दी
- अलाउद्दीन का सेनापति नुसरत ख़ाँ घेरे में किले से फेंके पत्थरों से मारा गया
- अलाउद्दीन ख़ुद आया, लंबा घेरा
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- जीत पर अमीर ख़ुसरो — आज कुफ़्र का गढ़ इस्लाम का घर बन गया।
- जलालुद्दीन ख़िलजी ने 1291–92 में दो बार हमला किया, असफल होकर बोला — सौ ऐसे किले भी एक मुसलमान के बाल जितने क़ीमती नहीं।
- अबुल फ़ज़ल ➜ बाकी किले नंगे हैं, यह बख़्तरबंद है।
बाद का इतिहास
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| सबसे पहले | कुतुबुद्दीन ऐबक | पहला आक्रमण |
| 1192 के बाद | गोविन्दराज | तराइन-II के बाद पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र से रणथम्भौर में चौहानों की नई शाखा शुरू हुई; फिर ऐबक, इल्तुतमिश, बलबन का दबदबा |
| 1282–1301 | हम्मीरदेव चौहान | यहाँ का सबसे शक्तिशाली शासक |
| 1398 के बाद | कुम्भा बनाम महमूद ख़िलजी | तैमूर के बाद दिल्ली कमज़ोर, किले के लिए खींचतान |
याद रखें: इसी किले के लिए जयपुर और मराठों के बीच कांकोड़ (उनियारा) का युद्ध हुआ।
2. झाईन व खंडार
| दुर्ग | उपनाम | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| झाईन (छानगढ़) | रणथम्भौर की कुंजी | 1299 में अलाउद्दीन के हमले में उलूग ख़ाँ ने रक्षक गुरुदास को मारकर कब्ज़ा किया |
| खंडार | रणथम्भौर का सहायक / पृष्ठ-रक्षक | सांगा ने रणथम्भौर के साथ इसे भी रानी कर्मावती को दिया; हार के डर से सुरजन हाड़ा ने दोनों अकबर को सौंपे; अष्टधातु की शारदा तोप — मारक क्षमता के लिए प्रसिद्ध |
3. करौली के दुर्ग
| दुर्ग | मुख्य बातें |
|---|---|
| मंडरायल | “ग्वालियर दुर्ग की कुंजी“; भीतर मर्दानशाह मस्जिद |
| तवनगढ़ / त्रिभुवनगढ़ (तिमनगढ़) | त्रिभुवनगिरि पहाड़ी; बयाना के त्रिभुवनपाल ने 11वीं सदी के उत्तरार्ध में बनवाया; मुस्लिम कब्ज़े के बाद नाम इस्लामाबाद; द्वार जगनपोल व सूर्यपोल |
| ऊँटगिरि | कल्याणपुर (करौली); मुगल इतिहासकारों के नाम — ऊँटगढ़, उटगर, अवन्तगढ़ |
4. भरतपुर — लोहागढ़
- ज़िला ➜ भरतपुर
- निर्माता ➜ महाराजा सूरजमल
- शुरुआत ➜ 19 फ़रवरी 1733
- जहाँ खेमकरण जाट ने 1708 में मिट्टी की कच्ची गढ़ी (चौबुर्जा) बनाई थी, वहीं सूरजमल ने 19 फ़रवरी 1733 को काम शुरू कराया — तब शासक बदनसिंह थे (सूरजमल कुँवर थे)।
- दोहरी मिट्टी की प्राचीर, बीच में मिट्टी भरी — तोप के गोले धँस जाते या ऊपर से निकल जाते। इसी से “मिट्टी का किला” और अजेय रहने से “लोहागढ़“।
- स्थल दुर्गों में राज्य का सबसे सुरक्षित किला।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1765 | अष्टधातु किवाड़ | जवाहरसिंह ने दिल्ली के नजीबुद्दौला को हराकर लाल किले से उखाड़कर उत्तरी द्वार पर लगवाए (जनश्रुति — ये पहले चित्तौड़ के थे, अलाउद्दीन दिल्ली ले गया था) |
| 1765 | जवाहर बुर्ज | दिल्ली-विजय की याद; ऊपर लौह स्तम्भ पर राजाओं की वंशावली; यहीं जाट राजाओं का राजतिलक |
| जनवरी–अप्रैल 1805 | लॉर्ड लेक का घेरा | रणजीतसिंह ने जसवंतराव होल्कर को शरण दी; लेक ने 5 बार हमला किया, हारा; 17 अप्रैल 1805 को घेरा उठाकर संधि |
रोचक तथ्य: कहावत चली — भरतपुर में लॉर्ड लेक की सारी इज़्ज़त मिट्टी में मिल गई।
| भीतर का स्थल | बात |
|---|---|
| किशोरी महल | सूरजमल ने बनवाया; नाम बृजेन्द्रसिंह ने रखा |
| कचहरी कलां | बलवंतसिंह का |
| राजेश्वरी माता मंदिर | भरतपुर के जाटों की कुलदेवी |
ध्यान दें: गंगा मंदिर और लक्ष्मण मंदिर किले के भीतर नहीं — भरतपुर शहर में हैं।
5. बयाना, वैर, डीग
बयाना दुर्ग (भरतपुर)
- यादव राजा विजयपाल ने लगभग 1040 ई. में मानी (नैनी) पहाड़ी पर बनवाया।
- भीमलाट ➜ राजस्थान का पहला विजय स्तम्भ; समुद्रगुप्त के सामंत विष्णुवर्धन पुंडरीक ने 371–72 ई. में बनवाया; लाल बलुआ पत्थर की 8 मंज़िली लाट — “राजस्थान की कुतुबमीनार“।
- ऊषा मंदिर ➜ 956 ई. में लक्ष्मणसेन की रानी चित्रलेखा ने बनवाया; इल्तुतमिश ने 1224 में मूर्ति तोड़कर इसे मस्जिद बना दिया; 18वीं सदी में जाटों ने फिर मंदिर बनाया।
| दुर्ग | निर्माता / वर्ष | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| वैर (भरतपुर) | बदनसिंह, 1726 | बेटे प्रतापसिंह को दिया, जिसने चारों ओर प्रताप नहर बनाई |
| डीग (डीग) | बदनसिंह, 1730 | पारिख दुर्ग — चारों ओर खाई; 12 बुर्जें, लक्खा बुर्ज पर भारी तोपें; बीच में सूरजमल का महल; पास में डीग के जलमहल — डीग “जल महलों की नगरी” |
| कामां दुर्ग | — | डीग |
6. शेरगढ़ — धौलपुर
- चम्बल के किनारे; कुषाण काल में मालवा के शासक मालदेव का बनवाया — कहते हैं उन्हीं के नाम पर “मालवा” नाम पड़ा।
- 11वीं सदी में धौलपुर नगर बसाने वाले धोरपाल (धोलनदेव) ने मरम्मत कराई — इसलिए धौलपुर दुर्ग / धौला दोहरागढ़।
- उपनाम ➜ “दक्खिन का द्वार गढ़“।
- 1540 में मरम्मत के बाद शेरशाह सूरी ने नाम शेरगढ़ रखा; मुगलों ने इसे फ़ौजी चौकी बनाया।
7. आमेर का किला
- ज़िला ➜ जयपुर
- पहाड़ी ➜ कालीखोह
- निर्माता ➜ मानसिंह प्रथम, 1592
- गिरि दुर्ग; 11वीं सदी के पुराने किले की जगह मानसिंह प्रथम ने 1592 में नया बनवाया, मिर्ज़ा राजा जयसिंह के समय पूरा हुआ।
- पुराने नाम ➜ आम्बेर, अम्बिकापुर, अम्बावती (ऋषि अंबरीश की तपोभूमि); 1707 में बहादुरशाह ने कब्ज़ा कर नाम मोमिनाबाद रखा।
द्वार
| द्वार | बात |
|---|---|
| जयपोल | ऊपर चढ़ने का पहला द्वार; भीतर बड़ा आँगन जलेब चौक |
| सूरजपोल | किले का मुख्य द्वार — जलेब चौक का पूर्वी दरवाज़ा |
| चाँदपोल | जलेब चौक का पश्चिमी दरवाज़ा |
महल
| महल | बात |
|---|---|
| दीवान-ए-आम | मिर्ज़ा राजा जयसिंह; आम दरबार; संगमरमर के 40 खंभों पर टिका आयताकार भवन |
| दीवान-ए-ख़ास / जय मंदिर (शीश महल) | सबसे दर्शनीय; ख़ास सामंतों से मंत्रणा |
| सुख निवास (सुख मंदिर) | सामने आराम बाग |
| यश (जस) मंदिर | दीवान-ए-ख़ास के ऊपर का मंडप — मावठा झील दिखती है |
मंदिर, बाग, जलाशय
- शिला देवी ➜ सिंहपोल के पास; महिषमर्दिनी प्रतिमा मानसिंह प्रथम पूर्वी बंगाल के शासक केदार से जीतकर लाए।
- जगत शिरोमणि ➜ रानी कनकावती ने बेटे जगतसिंह की याद में बनवाया; तोरण द्वार व नक्काशी बेजोड़; काले पत्थर की कृष्ण-मूर्ति चित्तौड़ से लाई कही जाती है — वही जिसे मीराबाई पूजती थीं।
- अन्य ➜ सूर्य मंदिर, नृसिंह मंदिर (सफ़ेद संगमरमर का हिंडोला), अम्बिकेश्वर महादेव।
याद रखें: बिशप हैबर — क्रेमलिन में जो देखा और अलहम्ब्रा के बारे में जो सुना, आमेर के महल उनसे भी बढ़कर।
8. जयगढ़
- आमेर महलों के दक्षिण की चोटी चील का टीला (ईगल की पहाड़ी) पर।
- शुरुआत मानसिंह प्रथम ने की; फिर मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने काम कराया, इसलिए नाम जयगढ़ (गहलोत, गोपीनाथ शर्मा, देवीसिंह मंडावा का मत); मौजूदा रूप 1726 में सवाई जयसिंह के समय।
- यहाँ कछवाहों का ख़ज़ाना (दफ़ीना) रहता था — इसलिए “रहस्यमयी दुर्ग“; इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते 1976 में छिपे ख़ज़ाने के लिए बड़ी खुदाई हुई।
- राज्य का एकमात्र किला जिस पर कभी बाहरी हमला नहीं हुआ; घेरा लगभग 4 किमी।
- द्वार ➜ डूंगर दरवाज़ा (मुख्य), अवनि दरवाज़ा (आमेर की ओर), भैरू दरवाज़ा।
जयबाण तोप
- बनवाई ➜ सवाई जयसिंह, 1720
- वज़न ➜ 50 टन
- नाल ➜ 20 फ़ीट
9. नाहरगढ़ (सुदर्शनगढ़)
- आमेर-जयपुर के बीच उत्तर-दक्षिण फैली अरावली के एक सिरे पर जयगढ़, दूसरे पर नाहरगढ़।
- सवाई जयसिंह ने 1734 में मराठों से राजधानी बचाने को बनवाया; मौजूदा रूप सवाई रामसिंह (द्वितीय) ने 1868 में दिया।
- पुराना नाम सुदर्शनगढ़ — भीतर सुदर्शनधारी कृष्ण का मंदिर।
- नाम की कथा ➜ निर्माण में नाहरसिंह भोमिया (जुझार) ने बाधा डाली; राजगुरु तांत्रिक रत्नाकर पौंडरीक की सलाह पर उनकी छतरी (स्मारक) किले में बनी और किला “नाहरगढ़” कहलाया; आज लोग उन्हें लोकदेवता मानकर पूजते हैं। [परीक्षा: राज. हाईकोर्ट LDC 2023 — “सुदर्शनगढ़” किस किले का दूसरा नाम है? ➜ नाहरगढ़]
10. जयपुर-दौसा के अन्य दुर्ग
| दुर्ग | निर्माता | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| चौमू | ठाकुर कर्णसिंह | उपनाम रघुनाथगढ़, धाराधारगढ़, चौमुँहागढ़; भूमि (स्थल) दुर्ग |
| माधोराजपुरा | सवाई माधोसिंह प्रथम | कांकोड़ के युद्ध (1759) में मराठों पर जीत की याद; आगे चलकर नरूका कछवाहों के हाथ |
| करणसर | बहादुरसिंह राजावत | हिगोनिया गाँव के पास |
दौसा का किला
- देवगिरि पहाड़ी पर; गुर्जर प्रतिहारों (बड़गुजरों) का बनवाया, बाद में कछवाहों ने मरम्मत कराई।
- आकार सूप (छाजले) जैसा — छाजमुखी दुर्ग।
- भीतर ➜ राजाजी का कुआँ, 14 राजाओं की साल, भोमिया (सूरजमल) के महल।
11. अलवर क्षेत्र के दुर्ग
बाला दुर्ग (अलवर का किला)
- जनश्रुति ➜ आमेर के कोकिलदेव के छोटे बेटे अलघुराय ने 1049 में छोटी गढ़ी बनाई; उसके बेटे सागर से निकुम्भ क्षत्रियों ने छीनकर विस्तार किया; फिर अलावल ख़ाँ ने बड़ा द्वार और परकोटा जोड़ा।
- इब्राहिम लोदी के साथ बाबर के युद्ध में अलावल ख़ाँ के मरने पर बाबर का अधिकार; खानवा (1527) के बाद बाबर यहाँ रुका और फिर सामंत चैन सुल्तान को दे दिया। यहाँ का शासक हसन ख़ाँ मेवाती खानवा में सांगा के पक्ष में लड़ा था।
- अकबर ने बेटे सलीम को 3 साल यहाँ नज़रबंद रखा — वह भवन सलीम महल।
| दुर्ग | ज़िला | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| कांकवाड़ी | अलवर (सरिस्का अभयारण्य) | अकाल में लोगों को काम (राहत) देने के लिए आमेर के जयसिंह ने बनवाया; औरंगज़ेब ने भाई दाराशिकोह को यहीं क़ैद रखा |
| भानगढ़ | अलवर | बाणगंगा की सहायक सावा के दाहिने किनारे; मानसिंह के भाई माधोसिंह ने बनवाया; “भूतों का भानगढ़“, भूतहा किला, खंडहरों का नगर |
| केसरोली | अलवर | यदुवंशी शासकों का |
| अजबगढ़ | अलवर | अजबसिंह राजावत, 1635 |
12. शेखावाटी के दुर्ग
| दुर्ग | ज़िला | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| फतेहपुर | सीकर | शेखावाटी का सबसे अहम दुर्ग; फ़तेह ख़ाँ कायमख़ानी का बनवाया; तेलिन का महल, नवाब दौलत ख़ाँ का मकबरा; 1731 में शेखावतों के पास |
| लक्ष्मणगढ़ | सीकर | बेड़ पहाड़ी; राव राजा लक्ष्मणसिंह, 1805 |
| दांतारामगढ़, खंडेला, रघुनाथगढ़ | सीकर | — |
13. रैपिड फायर तथ्य
- रणथम्भौर ➜ सवाई माधोपुर; गिरि + वन दुर्ग, विश्व धरोहर
- हम्मीरदेव चौहान ➜ रणथम्भौर के सबसे शक्तिशाली शासक (1282–1301)
- झाईन (छानगढ़) ➜ रणथम्भौर की कुंजी
- लोहागढ़ ➜ महाराजा सूरजमल ने 19 फ़रवरी 1733 को शुरू कराया; लॉर्ड लेक 5 बार हमला करके भी हारा
- भीमलाट (बयाना) ➜ राजस्थान का पहला विजय स्तम्भ
- डीग ➜ पारिख दुर्ग, बदनसिंह ने 1730 में बनवाया
- जयगढ़ ➜ राज्य का एकमात्र किला जिस पर कभी बाहरी हमला नहीं हुआ; जयबाण तोप 50 टन की
- नाहरगढ़ ➜ पुराना नाम सुदर्शनगढ़ (राज. हाईकोर्ट LDC 2023)
- भानगढ़ ➜ अलवर का «भूतों का भानगढ़»
अगले भाग में अजमेर, ब्यावर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, भीलवाड़ा और टोंक के किले, साथ में जोधपुर, बाड़मेर, बालोतरा और सिवाणा के दुर्ग।
पिछला भाग: राजस्थान के दुर्ग: मेवाड़ व हाड़ौती के दुर्ग (भाग 2)
अगला भाग: राजस्थान के दुर्ग: अजमेर संभाग के दुर्ग एवं जोधपुर संभाग (मारवाड़) के दुर्ग (भाग 1)
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