मंदिर के बारे में पहले यह पूछिए कि वह किस शैली का है और किस काल का — राजस्थान के मंदिर-सवाल इन्हीं दो धुरियों पर घूमते हैं। इस भाग में नागर, द्रविड़ और बेसर शैली, फिर पंचायतन, एकायतन, भूमिज, कच्छपघात, सोमपुरा और दुर्ग-स्थापत्य आते हैं। उसके बाद मौर्य-गुप्त काल, गुर्जर-प्रतिहार, सोलंकी और सूर्य-पूजा के मंदिर क्रम से दिए गए हैं।
माइंड मैप खोलें ➜
1. स्थापत्य: शैलियाँ व काल
भारत में मंदिर का सबसे पहला उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में मिलता है। मंदिर बनाने के ढंग को शैली कहते हैं — देश में तीन शैलियाँ मुख्य रहीं: नागर, द्रविड़ और बेसर। राजस्थान में इनके साथ कुछ स्थानीय शैलियाँ भी पनपीं और हर काल की अपनी पहचान रही।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 300 ई.पू. | मौर्य काल | यक्ष-प्रतिमाएँ, नगरी का बिना छत वाला वैष्णव मंदिर और बैराठ का बौद्ध मठ |
| 300–700 ई. | गुप्त काल | कोटा-झालावाड़ क्षेत्र के शिव मंदिर — चारचौमा, भीमचौरी, शीतलेश्वर आदि |
| 8वीं सदी से | गुर्जर-प्रतिहार (महामारू) | आभानेरी, ओसियां, किराडू — ज़्यादातर मंदिर विष्णु या सूर्य के |
ट्रिक: क्रम याद रखें — मौर्य (यक्ष) → गुप्त (कोटा के शिव) → प्रतिहार (विष्णु-सूर्य) → सोलंकी (शिल्प का शिखर)।
2. नागर शैली
उत्तर भारत की इस शैली में मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर टिका रहता है, जिसे जगती कहते हैं। ऊपर उठता शिखर आख़िर में आमलक और उसके ऊपर कलश पर जाकर खत्म होता है। मूर्ति रखने का कक्ष — गर्भगृह — वर्गाकार बनाया जाता है।
| अंग | क्या है |
|---|---|
| जगती | पूरे मंदिर को उठाकर रखने वाला ऊँचा चबूतरा |
| गर्भगृह | मूर्ति वाला वर्गाकार कक्ष |
| अर्धमंडप | प्रवेश की ओर का सबसे छोटा खुला भाग |
| मंडप | बीच का सभा-भाग |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
कहाँ तक फैली
- क्षेत्र ➜ हिमालय और विंध्याचल के बीच
- पश्चिम–पूर्व ➜ महाराष्ट्र से बंगाल-उड़ीसा तक
- दक्षिण–उत्तर ➜ तुंगभद्रा से हिमाचल के चम्बा-काँगड़ा तक
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
राजस्थान के उदाहरण
| मंदिर | स्थान |
|---|---|
| सोमेश्वर मंदिर | किराडू (बाड़मेर) |
| अम्बिका मंदिर | जगत (उदयपुर) |
| दधिमाता मंदिर | गोठ मांगलोद (नागौर) |
ट्रिक: चार ठिकाने, पश्चिम से पूर्व तक — किराडू → ओसियां → गोठ मांगलोद → जगत।
3. द्रविड़ और बेसर
द्रविड़ शैली
दक्षिण भारत की इस शैली में गर्भगृह आयताकार होता है और उसके ऊपर अलंकृत विमान (पिरामिड-जैसी मीनार) उठता है। मंदिर का मुख्य प्रवेश-द्वार गोपुरम कहलाता है। छत या शिखर की बनावट गजपृष्ठकृत (हाथी की पीठ जैसी) बताई गई है।
- मंदिर बहुत ऊँचे और प्रांगण बहुत बड़े होते हैं।
- कुछ मंदिरों में गोपुरम की ऊँचाई मुख्य मंदिर से भी ज़्यादा होती है।
- यह शैली द्रविड़ क्षेत्र में सबसे ज़्यादा फली-फूली, इसीलिए यह नाम मिला। इसके बहुत-से मंदिर विजयनगर राज्य के हम्पी, तंजौर, मदूरा और काँची में हैं।
| राजस्थान में उदाहरण | स्थान | ख़ास बात |
|---|---|---|
| रंगनाथ मंदिर | पुष्कर (अजमेर) | 1844 में सेठ पूरनमल ने बनवाया; रामानुज शाखा; राजस्थान का सबसे बड़ा द्रविड़-शैली मंदिर |
| तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्वर) मंदिर | सुजानगढ़ (चूरू) | द्रविड़ ढंग का; सोहनलाल जानोदिया की देन, लागत लगभग 2 करोड़ रुपये; 1994 में भैरोसिंह शेखावत के हाथों उद्घाटन |
बेसर (वेसर) शैली
नागर और द्रविड़ का मिश्रित रूप ही बेसर शैली है — “बेसर” शब्द का अर्थ ही मिश्रित है। जिस इलाके में दोनों शैलियों के तत्त्व मिलाकर इस्तेमाल हुए, वही बेसर कहलाया। इसे चालुक्य शैली भी कहते हैं।
- देश में यह सबसे अधिक प्रचलित शैली है।
- आरंभ बादामी के चालुक्यों ने किया और सबसे पहले कर्नाटक में विकसित हुई।
- इसके नमूने ➜ कर्नाटक के चालुक्य मंदिर, बेलूर के मंदिर और एलोरा की गुफाएँ।
| नागर | द्रविड़ | बेसर | |
|---|---|---|---|
| क्षेत्र | उत्तर भारत | दक्षिण भारत | दोनों के बीच का इलाका |
| गर्भगृह | वर्गाकार | आयताकार | मिला-जुला |
| पहचान | आमलक-कलश वाला शिखर, जगती | विमान + गोपुरम, विशाल प्रांगण | दोनों के तत्त्वों का मेल |
4. पंचायतन, एकायतन, भूमिज
पंचायतन शैली
बीच का मुख्य मंदिर विष्णु का होता है; उसके चारों कोनों पर चार छोटे मंदिर बनते हैं — सूर्य, शक्ति, शिव और गणेश के। पाँचों की परिक्रमा एक ही रास्ते से होती थी। यह नागर शैली का ही फैला हुआ रूप है।
- अब तक ज्ञात मंदिरों में राजस्थान में पंचायतन का सबसे पहला उदाहरण — ओसियां का हरिहर मंदिर।
- उदयपुर का जगदीश मंदिर भी पंचायतन है; उसके कोनों में शिव, पार्वती, गणेश और सूर्य के मंदिर हैं।
| पंचायतन के उदाहरण | स्थान |
|---|---|
| भंडदेवरा शिव मंदिर | बारां |
| बूढ़ादीत सूर्य मंदिर | कोटा |
| जगदीश मंदिर | उदयपुर |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
एकायतन शैली
जहाँ परिसर में सिर्फ़ एक प्रमुख देवता को स्थान मिलता है, वह एकायतन है — यानी पंचायतन का उलटा।
भूमिज शैली
यह नागर की उपशैली है। इसकी ख़ास पहचान यह कि प्रदक्षिणा-पथ ढका हुआ नहीं, खुला रहता है।
- भूमिज का सबसे प्राचीन मंदिर — सेवाड़ी का जैन मंदिर (पाली)।
| भूमिज के अन्य उदाहरण | स्थान |
|---|---|
| उंडेश्वर मंदिर | बिजौलिया (भीलवाड़ा) |
| महानालेश्वर मंदिर | मेनाल (चित्तौड़गढ़) |
| भण्डदेवरा मंदिर | रामगढ़ (बारां) |
5. कच्छपघात, सोमपुरा, दुर्ग
कच्छपघात शैली
कच्छपघात एक राजवंश था, जिसे राम के पुत्र कुश से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि युद्ध में कछुए (कच्छप) की तरह डटकर हमला करने से यह नाम पड़ा। इस वंश को देवालय बनवाने का बड़ा शौक था, इसलिए उसके समय मंदिरों की एक अलग क्षेत्रीय प्रवृत्ति बनी। फिर भी ये मंदिर नागर शैली के भीतर ही गिने जाते हैं।
- पहचान ➜ विशाल शिखर, मेरु-मण्डोवर की बनावट वाले स्तम्भों पर घटपल्लव (कलश-पत्तों) की नक्काशी, और पंचशाखा द्वार, जिसकी एक शाखा पर सर्प लिपटे दिखते हैं।
| उदाहरण | स्थान |
|---|---|
| शांतिनाथ जैन मंदिर | झालरापाटन (झालावाड़) |
| पद्मनाभ मंदिर | झालरापाटन (झालावाड़) |
सोमपुरा स्थापत्य शैली
गुजरात के सोमपुरा ब्राह्मण शिल्पी पीढ़ी-दर-पीढ़ी मंदिर और भवन बनाते आए हैं; राजस्थान के कई बड़े मंदिरों के पीछे इन्हीं कलाकारों का हाथ रहा।
दुर्ग-स्थापत्य
14वीं से 16वीं सदी के बीच मंदिरों को भी किले जैसा बनाया जाता था — चारों ओर ऊँची दीवार, द्वार और बुर्ज।
कुंभाकालीन मंदिर
वी.के. श्रीवास्तव के अनुसार महाराणा कुम्भा के निर्माण-कार्य के तीन केन्द्र थे — कुंभलगढ़, चित्तौड़ और अचलगढ़।
- शिखर नागर शैली के, ऊँची प्रासाद-पीठ (कुर्सी) पर खड़े।
- ज़्यादातर भूरे बलुआ पत्थर का प्रयोग।
- सादा गर्भगृह, अर्धमंडप, सभामंडप, प्रदक्षिणा-पथ और आमलक वाला शिखर।
6. मौर्य और गुप्त काल
मौर्य काल — 300 ई.पू.
| स्थान | क्या मिला |
|---|---|
| नांद (पुष्कर) | कुषाणकालीन शिवलिंग और गजमुखी यक्ष-प्रतिमा |
| नोह (भरतपुर) | यक्ष (जाख बाबा) का मंदिर — शुंगकाल की 8 फुट ऊँची यक्ष-प्रतिमा आज भी जाख बाबा के रूप में पूजी जाती है |
| मध्यमिका / नगरी (चित्तौड़गढ़) | बिना छत का वैष्णव मंदिर |
गुप्त काल — 300 से 700 ई.
| मंदिर | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| चारचौमा शिवालय | कोटा | चतुर्मुखी शिवलिंग; शिवरात्रि पर “चारचौमा की सोरती” मेला |
| भीमचौरी शिव मंदिर | कोटा (मुकुन्दरा हिल्स) | प्रदक्षिणा-पथ वाला; ज्ञात गुप्तकालीन मंदिरों में सबसे प्राचीन उदाहरण |
| कंसुआ शिव मंदिर | कोटा | 738 ई. का शिलालेख; गुप्त-परम्परा की सूची में गिना जाता है |
याद रखें: गुप्त काल का गढ़ — कोटा-झालावाड़ पट्टी; पाँच में से चार मंदिर कोटा संभाग में हैं।
7. गुर्जर-प्रतिहार (महामारू)
राजस्थान की अपनी क्षेत्रीय शैली का विकास करीब 8वीं सदी में शुरू हुआ; इसे गुर्जर-प्रतिहार शैली / महामारू शैली नाम मिला। शुरुआती निर्माण मण्डोर के प्रतिहारों, सांभर के चौहानों और चित्तौड़ के मौर्यों ने करवाए। 8वीं से 12वीं सदी के बीच बने इन मंदिरों में ज़्यादातर विष्णु या सूर्य को समर्पित हैं।
शैली का विकास
- आरंभ (8वीं – 9वीं की शुरुआत)
- 9वीं सदी — बढ़त
- 10वीं–11वीं — पूर्ण विकास
| चरण | प्रमुख मंदिर |
|---|---|
| आरंभ (8वीं सदी – 9वीं की शुरुआत) | हर्षद माता — आभानेरी (दौसा) · ओसियां का सूर्य मंदिर (जोधपुर) · कालिका माता — चित्तौड़गढ़ किला · कुम्भश्याम — चित्तौड़गढ़ किला |
| 9वीं सदी | कामेश्वर मंदिर — आउवा (पाली), लगभग 850 ई. · रणछोड़जी मंदिर — खेड़ (बालोतरा), लगभग 850 ई. |
| 10वीं–11वीं सदी (पूर्ण विकास) | हर्षनाथ — सीकर · नीलकण्ठेश्वर — जसनगर (मेड़ता, नागौर) · नीलकण्ठेश्वर — पारानगर (सरिस्का, अलवर) · मरकंडी माता — निमाज (ब्यावर) · नकटी माता — जयभवानीपुरा (जयपुर) · दधिमाता — गोठ मांगलोद (नागौर) |
ध्यान दें: किराडू का सोमेश्वर = प्रतिहार शैली का आख़िरी (लगभग 1016 ई.) पर सबसे भव्य; शुरुआत आभानेरी-ओसियां से।
8. सोलंकी (मारू-गुर्जर)
राजस्थान के सबसे उत्कृष्ट मंदिर 11वीं–13वीं सदी के बीच के हैं। यह दौर मंदिर-शिल्प का स्वर्णकाल था, और इस समय की शैली को सोलंकी कालीन शैली / मारू-गुर्जर शैली कहा गया।
| मंदिर | स्थान |
|---|---|
| सच्चियाय माता मंदिर | ओसियां (जोधपुर) |
| समीधेश्वर मंदिर | चित्तौड़गढ़ किला |
| दिलवाड़ा के जैन मंदिर | माउण्ट आबू (सिरोही) |
9. सूर्य-पूजा के मंदिर
पूर्वमध्यकाल में राजस्थान के पश्चिमी और दक्षिणी भाग में सौर सम्प्रदाय (सूर्य-पूजा) सबसे लोकप्रिय पंथों में से एक था। मारवाड़ का भीनमाल (जालौर) सूर्य-उपासना का बड़ा केन्द्र रहा, जहाँ गुर्जर-प्रतिहारों ने “जगत स्वामी” नाम का सूर्य मंदिर बनवाया। राजस्थान में सूर्य की बैठी (आसनस्थ) और खड़ी (स्थानक) — दोनों तरह की प्रतिमाएँ बड़ी संख्या में मिली हैं।
| सूर्य मंदिर | स्थान | ख़ास |
|---|---|---|
| चित्तौड़ किले का सूर्य मंदिर | चित्तौड़गढ़ | सूर्य को अर्पित राजस्थान का सबसे पुराना मंदिर; आज उसे कालिका माता मंदिर पुकारते हैं |
| सूर्य मंदिर | कुंभलगढ़ किले में | — |
| सूर्य मंदिर | जैसलमेर किले में | — |
| सूर्य मंदिर | गलता जी (जयपुर) | — |
10. रैपिड फायर तथ्य
- भारत में मंदिर का पहला उल्लेख ➜ शतपथ ब्राह्मण
- तीन मुख्य शैलियाँ ➜ नागर, द्रविड़ और बेसर
- नागर में ऊँचा चबूतरा ➜ जगती; गर्भगृह वर्गाकार
- राजस्थान का सबसे बड़ा द्रविड़-शैली मंदिर ➜ रंगनाथ मंदिर, पुष्कर (1844)
- बेसर शैली ➜ नागर और द्रविड़ का मिश्रण; चालुक्य शैली भी कहते हैं
- पंचायतन का पहला उदाहरण ➜ ओसियां का हरिहर मंदिर
- भूमिज का सबसे प्राचीन मंदिर ➜ सेवाड़ी का जैन मंदिर (पाली)
- गुप्तकाल के मंदिर ➜ कोटा-झालावाड़ पट्टी — चारचौमा, भीमचौरी, कंसुआ
- सोलंकी काल ➜ 11वीं–13वीं सदी, मारू-गुर्जर शैली, मंदिर-शिल्प का स्वर्णकाल
अगले भाग में उदयपुर संभाग के मंदिर — एकलिंगजी, नागदा, जगत, ऋषभदेव, जगदीश, चित्तौड़ दुर्ग और राजसमंद के प्रमुख मंदिर।
पिछला भाग: राजस्थान की हवेलियाँ और छतरियाँ: एक नज़र में
अगला भाग: राजस्थान के मंदिर: उदयपुर संभाग (भाग 1)
इन्हें भी पढ़ें: मुस्लिम पीर, मस्जिदें, दरगाह, मीनार, मकबरे · प्रतिहार वंश (गुर्जर–प्रतिहार)
पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय
इस विषय का माइंड मैप ➜Complete Rajasthan GK पास देखें



