मध्यकाल के कवियों को याद रखने का आसान रास्ता यह है कि हर कवि को उसकी एक पहचान वाली रचना और उसके आश्रयदाता से जोड़ दिया जाए। इस भाग में ईसरदास व दूरसा आढ़ा, दरबारी चारण कवि, बांकीदास व पृथ्वीराज राठौड़, आख्यान काव्य, जैन काव्य और अंत में गद्य व ख्यातकार क्रम से आते हैं। जहाँ किसी तथ्य पर पहले की परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम पास में दिया गया है।
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1. ईसरदास व दूरसा आढ़ा
ईसरदास बारहठ (भादरेस, बाड़मेर)
ईसरदास भक्त कवि थे, फिर भी उन्होंने वीर रस की कविताएँ भी लिखीं। उनकी कुल 13 रचनाएँ मिलती हैं।
- हरिरस
- छोटा हरिरस
- बाल लीला
- गुण भागवत हंस
- गरूड़ पुराण
- गुण आगम
… शेष 7 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- हाला-झाला री कुण्डलियां (डिंगल) — वीर रस में राजस्थानी की सर्वोत्तम कृति गिनी जाती है।
- आख़िरी दिन उन्होंने लूनी नदी के तट पर एक कुटिया में गुज़ारे।
- भक्ति के चमत्कारों की अनेक कथाएँ आज भी लोक में चलती हैं, इसलिए लोग उन्हें “ईसरा सो परमेसरा” कहते थे।
दूरसा आढ़ा
- जन्म ➜ 1535 ई., घुंधला गाँव (पाली)
- बचपन ➜ पिता का देहांत; बगड़ी के ठाकुर प्रतापसिंह ने पाला
- समकालीन ➜ जोधपुर के राव चन्द्रसेन और मेवाड़ के महाराणा प्रताप
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- विरुद छिहतरी ➜ सबसे ज़्यादा चर्चित कृति; इसमें महाराणा प्रताप के पराक्रम का बखान है।
- किरतार बावनी ➜ दूसरी प्रमुख रचना।
- झूलणा राव अमरसिंह गजसिंघोत रा को उनकी सर्वोत्तम रचना माना जाता है।
जिस दिन प्रताप का देहांत हुआ, दूरसा अकबर के दरबार में मौजूद थे। वहीं उन्होंने प्रताप की बड़ाई में एक प्रसिद्ध दोहा सुनाया — जिसका भाव है कि प्रताप ने न अपने घोड़ों पर (बादशाही) दाग लगने दिया, न पगड़ी किसी के आगे झुकाई; इसलिए उसकी मृत्यु का समाचार सुनकर अकबर भी चुप रह गया और उसकी आँखें भर आईं।
इसी क्षेत्र के और कवि
| कवि | पहचान | रचनाएँ |
|---|---|---|
| सांदु माला | रायसिंह (बीकानेर) और प्रताप के समय के कवि; झूलणा छन्द में निपुण | झूलणा महाराज रायसिंह जी रा · झूलणा दीवान श्री प्रताप सिंह जी रा · झूलणा अकबर पातशाह जी रा |
| दूदा विसराल | — | राव रतनसिंह री बेलि |
| केसोदास (केशवदास) गाडण | जोधपुर नरेश गजसिंह के मुख्य दरबारी कवि | गजगुण रूपक बंध (गुणरूपक) · राव अमरसिंह जी रा दूहा; भक्ति: निसाणी विवेक बार · छन्द महादेव जी रो · छन्द श्री गोरखनाथ |
ट्रिक: तीन “झूलणा” वाले — सांदु माला के तीन झूलणा (रायसिंह, प्रताप सिंह, अकबर) और दूरसा आढ़ा का झूलणा अमरसिंह गजसिंघोत रा।
ध्यान दें: ईसरदास का “देवियाण” और “हरिरस” दोनों भक्ति की रचनाएँ हैं; वीर रस की श्रेष्ठ रचना हाला-झाला री कुण्डलियां है।
2. दरबारी चारण कवि
| कवि | पहचान / आश्रय | रचनाएँ |
|---|---|---|
| गिरधर आसिया | — | सगत रासो — 943 छन्दों का प्रबंध काव्य; विषय प्रताप के अनुज शक्तिसिंह के पराक्रम |
| जग्गा खिड़िया | — | वचनिका राठौड़ रतनसिंह महेसदासोत री (रतन रासो) |
| कुम्भकरण सांदू | — | रतन रासो · जयचन्द रासो · महाराजा रायसिंह री सत्तियाँ रा कवित |
| वीरभान रतनू (घड़ोई, जोधपुर) | जोधपुर महाराजा अभयसिंह के समय | राजरूपक; अन्य — एकाक्षरी नाममाला · भागवत प्रकाश |
… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
एक युद्ध — तीन कवि, तीन काव्य
वि.सं. 1787 में गुजरात के शेर बुलन्द ख़ाँ और जोधपुर के महाराजा अभयसिंह की लड़ाई अहमदाबाद में हुई। रणभूमि में दो कवि — वीरभाण रतनू व करणीदान कविया — स्वयं हाज़िर थे; इस प्रसंग पर कुल तीन राजस्थानी कवियों के काव्य मिलते हैं।
| कवि | काव्य |
|---|---|
| वीरभान रतनू | राजरूपक |
| करणीदान कविया | सूरजप्रकाश |
| खिड़िया बखता | अहमदाबाद रा कवित्त |
सूरजप्रकाश में क्या-क्या
- डिंगल के इस काव्य में राठौड़ वंश की 13 शाखाएँ गिनाई गई हैं।
- इसमें सुमेल का युद्ध (1544 ई.) और धरमत का युद्ध (1658 ई.) वर्णित हैं।
- मुग़ल दरबार में सैयद बंधुओं के प्रभाव का भी ज़िक्र है।
ट्रिक: अहमदाबाद के एक ही युद्ध पर राजरूपक – सूरजप्रकाश – अहमदाबाद रा कवित्त — क्रम से वीरभान, करणीदान, बखता।
ध्यान दें: वीरभान रतनू और हम्मीर दान रतनू दोनों घड़ोई (जोधपुर) के हैं; हम्मीर दान की रचनाओं में “पिंगल” शब्द बार-बार आता है।
3. बांकीदास व पृथ्वीराज राठौड़
आसिया बांकीदास
- जन्म ➜ 1771 ई., भाडियावास (पचपदरा)
- दरबार ➜ जोधपुर के मानसिंह के चहेते दरबारी कवि और उनके काव्य-गुरु
- भाषाएँ ➜ संस्कृत · डिंगल · फ़ारसी · ब्रज
- चेतावनी रो गीत बहुत लोकप्रिय हुआ — इसमें उन्होंने अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के खिलाफ़ देशवासियों को चुनौती दी।
- धर्म का भेद भुलाकर हिन्दू-मुसलमान दोनों को देश के नाम पर जगाने वाली पंक्ति — “आबो इंगरेज पुलक रै ऊपर, राखो रे किहिक रजपूती, मरदां हिन्दू की मुसलमाण”।
- खुशामद के बजाय उन्होंने अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ कलम चलाई — इसीलिए उन्हें “लोक कवि” कहा गया।
पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल)
- जन्म ➜ 1549 ई.
- वंश ➜ बीकानेर के राव कल्याणमल के पुत्र, राव जैतसी के पौत्र
- लेखन-नाम ➜ पीथल
- वेलि क्रिसन रूकमणी री ➜ डिंगल शैली, भाषा उत्तरी मारवाड़ी; 304 छन्द; कृष्ण-रूकमणी की प्रेम-कथा में भक्ति, शृंगार और वीर रस का मेल; 16वीं सदी के धार्मिक-सामाजिक जीवन की झलक; गागरोन दुर्ग में रहकर रचित।
- दूरसा आढ़ा ने इसे डिंगल की सर्वश्रेष्ठ रचना मानकर “पाँचवाँ वेद” और “19वाँ पुराण” कहा।
- इसकी भाषा साहित्यिक राजस्थानी है; वेलियो गीत छन्द प्रयुक्त; इसे विद्वानों के सामने लाने का काम एल.पी. टेस्सीटोरी ने किया; कर्नल टॉड ने इसे दस हज़ार घोड़ों जितना बलवान बताया।
4. अन्य चारण कवि
| कवि | पहचान | रचनाएँ |
|---|---|---|
| किसना | — | महादेव-पारवती री वेलि |
| माधोदास दधवाड़िया (बलूंदा) | जोधपुर के एक महाराजा के आश्रित कवि | रामरासो (डिंगल; रामकथा, 1000 से अधिक छन्द); निसाणी गजमोख · भाषा दसमस्कंध · अक्षर बावनी |
| सायाजी झूला (लीलछा, ईडर) | कल्याणमल के आश्रित; कृष्ण-भक्त | रूकमणी हरण · नागदमण |
| सूरजनदास पूनिया | — | कथा हरिगुण · कथा गजमोख · कथा उषा पुराण · रामरासो |
- राव राजा से कृपाराम खिड़िया को जागीर में एक गाँव मिला; वह आज “कृपाराम की ढाणी” कहलाता है।
- उनके नीति-संबंधी सोरठे “राजिया रा सोरठे” नाम से मशहूर हैं; वे राजस्थानी के नीति-काव्य में संबोधन शैली के पहले रचनाकार हैं।
- सायाजी झूला की रचनाएँ कृष्ण-भक्ति पर आधारित हैं।
5. आख्यान काव्य
मध्यकाल में कथा-काव्य यानी आख्यान की भी लम्बी धारा बही; इनके विषय पुराणों और धर्म-ग्रंथों से लिए गए।
| कवि | रचना | ख़ास बात |
|---|---|---|
| डेल्ह जी | अहमनी | अभिमन्यु की कथा पर आधारित |
| पदम भगत | रूकमणी मंगल | — |
| मेहोजी गोदारा (भोजास, बीकानेर) | रामायण | रामकथा पर आधारित; मध्ययुग का उत्तम आख्यान |
| कैसोजी | कथा भींव दुसासणी · कथा सुरगा रोहिणी · कथा बहसोवनी · प्रहलाद चरित | — |
6. जैन काव्य व छन्द-रचनाएँ
| कवि | रचनाएँ / पहचान |
|---|---|
| ब्रह्म जिनदास | रामायण (राम सीता रास) |
| छीहल | पंच सहेली गीत · पंथीगीत · उदरगीत · पन्चेन्द्रिय बोल · नाम बावनी |
| लब्धोदय | पद्मिनी चरित चौपाई |
कुशललाभ — चार रूप
कुशललाभ की सभी रचनाएँ राजस्थानी में हैं। उन्हें चार वर्गों में बाँटा जा सकता है —
| वर्ग | रचनाएँ |
|---|---|
| प्रचलित लोककथाएँ | माधवानल चौपाई · ढोला मारवणी चौपाई |
| जैन परम्परा के कथानक | अगड़दत रास · पूज्यवाहण गीत |
| देवी या शक्ति पर | दुर्गासप्तशती · भवानी छंद |
समय सुन्दर
- 17वीं शताब्दी के जैन संत कवि और गीतकार।
- प्रमुख रचनाएँ ➜ मृगावती रास, नलदमयन्ती चौपाई, सीता राम चौपाई।
- अन्य ➜ समयाचारी शतक, क्षमा बत्तीसी, नलदमयंती रास, धनदत्त चौपाई, पुण्य सागर रास्त, चम्पक श्रेष्ठी चौपाई, शत्रुंजय रास, विषय शतक।
छन्द और अलंकार की रचनाएँ
- पिंगल शिरोमणि (कुशललाभ), हरि पिंगल प्रबन्ध (1664 ई.) और पिंगल प्रकाश (हमीरदान रतनू)।
- मंशाराम सेवग का रघुनाथ रूपक रा गीत (1806 ई.) इस परम्परा की प्रौढ़ रचना है — डिंगल, गीत, छंद और अलंकारों का अच्छा विवेचन, भगवान राम की कथा। (जोधपुर शासक मानसिंह के आश्रित विद्वान।)
7. गद्य, ख्यात व ख्यातकार
गद्य की शुरुआत
- विद्वानों के अनुसार राजस्थानी में गद्य 13वीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुआ।
- वि.सं. 1330 में “आराधना” नाम की एक टिप्पणी मिलती है — इसे राजस्थानी गद्य का आदि उदाहरण माना जाता है।
- बालावबोध ➜ जैन साधुओं ने धर्म-प्रचार के लिए व्याख्या वाली धर्मकथाएँ लिखीं; ये बालावबोध कहलाईं और गद्य के विकास में इनकी बड़ी भूमिका रही।
मध्ययुग में गद्य के कई रूप दिखते हैं —
राजस्थान के प्रमुख ख्यातकार — मुहणौत नैणसी, बांकीदास और दयालदास।
मुहणौत नैणसी
- जन्म ➜ 1610 ई., जोधपुर — ओसवाल जैन परिवार
- पिता ➜ जयमल
- उपाधि ➜ “राजस्थान की जनगणना के अग्रज”
- मुहणौत नैणसी री ख्यात (रचनाकाल 1643–1666 ई.) — राजस्थान के विभिन्न राज्यों और मध्य भारत का इतिहास; राजस्थान की सबसे प्राचीन और विश्वसनीय ख्यात; पहला ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है; भाषा डिंगल, इसमें कहीं “ह” का प्रयोग नहीं; राजपूतों की 36 शाखाओं का वर्णन; तुलना अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा से। [परीक्षा: जूनियर इंस्ट्रक्टर 2024, फायरमैन 2022 — “राजपूताने का अबुल फ़ज़ल” की उपाधि मुंशी देवी प्रसाद ने किसे दी? ➜ मुहणौत नैणसी]
- हिन्दी अनुवाद ➜ रामनारायण दुगड़; सम्पादन — बद्रीप्रसाद साकरिया व नारायण सिंह भाटी।
- मारवाड़ रा परगना री विगत (“गावां री ख्यात”) — जोधपुर राज्य का गज़ेटियर; तुलना आइन-ए-अकबरी से; जोधपुर राज्य के 7 परगनों, राजस्व और ग्रामीण जीवन के तथ्य। [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक 2025 — “आइन-ए-अकबरी” से किस नैणसी-कृति का मिलान किया जाता है? ➜ मारवाड़ रा परगना री विगत]
दयालदास
- जन्म ➜ 1798 ई., कुड़ीया गाँव (बीकानेर)
- दरबारी कवि ➜ बीकानेर के तीन महाराजा — सूरतसिंह, रतनसिंह, सरदारसिंह
- ख्यात ➜ दयालदास री ख्यात (बीकानेर रै राठौड़ां री ख्यात) — राठौड़ों की उत्पत्ति से महाराजा सरदारसिंह के राज्यारोहण (1851 ई.) तक
- बीकानेर राजवंश के ब्योरे, राठौड़ों के मुग़लों-मराठों से रिश्ते, फ़रमान-निशान के राजस्थानी अनुवाद और रियासत के प्रशासन को जानने में यह ख्यात बहुत काम आती है।
- अन्य रचनाएँ ➜ देश दर्पण (बीकानेर के इतिहास पर), आर्याख्यान कल्पद्रुम, बीकानेर के पट्टा रै गावाँ री विगत, सुजस बावनी, पंवार वंश दर्पण।
बांकीदास री ख्यात का परिचय पिछली शाखा में है — तीनों ख्यातों में नैणसी की ख्यात सबसे पुरानी है।
8. रैपिड फायर तथ्य
- ईसरदास की वीर रस की श्रेष्ठ कृति ➜ हाला-झाला री कुण्डलियां
- दूरसा आढ़ा की सबसे चर्चित कृति ➜ विरुद छिहतरी (प्रताप का पराक्रम)
- वेलि क्रिसन रूकमणी री ➜ पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल); 304 छन्द; दूरसा आढ़ा ने इसे «पाँचवाँ वेद» कहा
- अहमदाबाद के एक युद्ध पर तीन काव्य ➜ राजरूपक (वीरभान रतनू), सूरजप्रकाश (करणीदान कविया), अहमदाबाद रा कवित्त (खिड़िया बखता)
- राजिया रा सोरठे ➜ कृपाराम खिड़िया; नीति-काव्य में संबोधन शैली के पहले रचनाकार
- राजस्थानी गद्य की शुरुआत ➜ 13वीं शताब्दी का मध्य
- मुहणौत नैणसी री ख्यात ➜ सबसे प्राचीन व विश्वसनीय ख्यात (1643–1666 ई.)
- मारवाड़ रा परगना री विगत ➜ नैणसी की रचना, तुलना आइन-ए-अकबरी से
- दयालदास री ख्यात ➜ राठौड़ों की उत्पत्ति से सरदारसिंह के राज्यारोहण (1851 ई.) तक
अगले भाग में आधुनिक काल के कवि — 1857 की क्रांति के बाद की चेतना, जागरण काल और आज़ादी के बाद की कविता।
पिछला भाग: राजस्थानी साहित्यकार व कृतियाँ: आरम्भ काल एवं मध्यकाल (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थानी साहित्यकार व कृतियाँ: आधुनिक काल — कवि (भाग 1)
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