लोक गायन शैलियाँ एवं प्रमुख संगीतज्ञ व कलाकार – Rajasthan Art and Culture Chapter 50

छह लोक गायन शैलियाँ, ध्रुपद की वाणियाँ, संगीत घराने, संगीतज्ञ और संगीत ग्रंथ, PYQ सहित।

12 min read Updated Notes in Hindi
In this chapter (21 sections)
  1. एक नज़र में
  2. माण्ड गायकी
  3. मांगणियार गायकी
  4. लंगा गायकी
  5. तालबंदी गायकी
  6. हवेली संगीत
  7. फड़ गायकी
  8. ध्रुपद गायन शैली
  9. प्रमुख संगीत घराने
  10. जयपुर घराना
  11. अतरौली, पटियाला, बीनकार, सेनिया
  12. डागर, मेवाती, जोधपुर, मथुरा, दिल्ली, आगरा
  13. प्रमुख संगीतज्ञ व कलाकार
  14. अमीर ख़ुसरो व पुराने नाम
  15. संगीत-संरक्षक शासक
  16. आधुनिक कलाकार
  17. मांगणियार-लोक कलाकार
  18. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  19. प्रमुख संगीत ग्रंथ
  20. संगीतजीवी जातियाँ
  21. रिवीजन पॉइंटर्स

इस अध्याय में नाम और जगह की जोड़ियाँ ही सबसे ज़्यादा काम आती हैं — कौन-सी गायकी किस इलाक़े की, कौन-सा घराना किस कलाकार से चला। इस भाग में माण्ड, मांगणियार, लंगा, तालबंदी, हवेली संगीत और फड़ गायकी के बाद ध्रुपद की वाणियाँ, प्रमुख घराने, संगीत-संरक्षक शासक, आधुनिक कलाकार, अकादमी पुरस्कार, संगीत ग्रंथ और संगीतजीवी जातियाँ आती हैं। जहाँ पिछली परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम साथ में लिखा गया है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — लोक गायन शैलियाँ, संगीत घराने व संगीतज्ञ, 6 चॉक-बोर्ड चित्र, 17 नक्शे, 24 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
माइंड मैप खोलें ➜

1. एक नज़र में

विषयख़ास नाम
लोक गायन शैलियाँमाण्ड, मांगणियार, लंगा, तालबंदी, हवेली संगीत, फड़
ध्रुपद की वाणियाँगोहर, डागुर, खण्डार, नौहर
घरानेजयपुर, अतरौली, पटियाला, सेनिया, डागर, मेवाती, जोधपुर (रंगीला), मथुरा, दिल्ली, आगरा

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: पूरे अध्याय में पाँच “ख़ास” बातें — माण्ड = राज्यगीत की शैली, मांगणियार = 6 राग-36 रागनियाँ, सवाई प्रतापसिंह = गंधर्व बाईसी, जयपुर घराना = मनरंग, मोहनवीणा = विश्वमोहन भट्ट।

2. माण्ड गायकी

  • क्षेत्र ➜ बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर, फलौदी
  • नाम का कारण ➜ 10वीं-11वीं सदी में जैसलमेर इलाक़ा “माँड क्षेत्र” कहलाता था
  • स्वरूप ➜ शृंगार प्रधान; शास्त्रीय गायन की लोक शैली

इलाक़े के असर से इसके कई रूप बन गए — उदयपुर, जोधपुर, जयपुर, बीकानेर और जैसलमेर की माँड।

प्रसिद्ध माण्ड गायिकाएँ

गायिकाशहर
अल्लाह जिलाई बाईबीकानेर
गवरी देवीबीकानेर
बन्नो बेगमजयपुर
जमीला बानोजोधपुर

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ध्यान दें: गवरी देवी दो हैं — एक बीकानेर की (“माँड मल्लिका”), दूसरी पाली की (भैरवी-युक्त माण्ड); नाम समान पर शहर अलग।

3. मांगणियार गायकी

  • केन्द्र ➜ बाड़मेर, बालोतरा (जैसलमेर में भी)। पर्यटन के लिहाज़ से यह राजस्थान की प्रमुख गायन शैली है।
  • ये सिन्ध से आई मुस्लिम जाति हैं; शुभ मौक़ों पर गाना-बजाना ही इनकी रोज़ी है।
  • गायन में छह राग और छत्तीस रागनियाँ बरती जाती हैं।

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

प्रसिद्ध नाम

नामपहचान
सदीक खाँ मांगणियारप्रसिद्ध खड़ताल वादक
कमल साकर खाँप्रसिद्ध कामायचा वादक
रुकमा मांगणियारबाड़मेर की विकलांग गायिका — रामसर निवासी; जाति की पहली महिला जो सार्वजनिक रूप से गाती हैं

सदीक खाँ की याद में सदीक खां मांगणियार लोककला व अनुसंधान परिषद (लोकरंग) की स्थापना जयपुर में 2002 में हुई।

4. लंगा गायकी

  • ज़्यादा बसावट ➜ बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर (साथ में फलौदी, जोधपुर, बीकानेर)।
  • लंगा जाति राजपूत घरानों में पीढ़ियों की वंशावली सुनाती और शुभ अवसरों पर गाती थी।
  • बाड़मेर का “बड़वणा” गाँव लंगों का गाँव कहलाता है; बरनवा जागीर को “लंगा संगीत का मक्का” कहते हैं; कलाकारों के गाँव — बरनवा जागीर, लखे की ढाणी।
वर्गजजमानवाद्य
सारंगिया लंगासिंधी सिपाहीसिंधी सारंगी
सुरनिया लंगामेहर मुस्लिम—

लंगा और मांगणियार — एक नोट

  • दोनों वंशानुगत पेशेवर संगीतकार हैं और पश्चिमी राजस्थान (बाड़मेर, बालोतरा, फलौदी, जैसलमेर, जोधपुर) में रहते हैं।
  • दोनों मुस्लिम हैं और मिरासी (मनोरंजन करने वाली) जाति से जुड़े हैं।
  • संगीत में बड़ा फ़र्क़ नहीं ➜ फ़र्क़ बस जजमानों का है, और उसी के हिसाब से गीतों-शैली में थोड़ा अंतर।

ट्रिक: लंगा = सारंगी, मांगणियार = कमायचा-खड़ताल; “मक्का” उपाधि बरनवा (बाड़मेर) की है।

5. तालबंदी गायकी

  • मुख्यतः सवाई माधोपुर में; करौली, डीग, धौलपुर, भरतपुर में भी चलती है।
  • औरंगज़ेब ने संगीत पर पाबंदी लगाई तो विस्थापित हुए कलाकारों ने सवाई माधोपुर में यह शैली विकसित की।
  • प्राचीन कवियों की पदावलियाँ हारमोनियम और तबला के साथ गाई जाती हैं।

याद रखें: तालबंदी = औरंगज़ेब की पाबंदी से उपजी; “संगीत दंगल” शब्द हेला ख्याल के लिए भी आता है।

6. हवेली संगीत

  • मध्यकाल में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों हिन्दू मंदिरों के टूटने से हवेलियों और घरों में मंदिर बसाए गए।
  • इन मंदिरों में भक्ति के साथ शास्त्रीय संगीत, ध्रुपद और कीर्तन जैसी शैलियाँ पनपीं।
  • यही धारा “हवेली संगीत” कहलाई।

7. फड़ गायकी

  • लोकदेवताओं की कथाएँ कपड़े पर चित्रित होती हैं — उन्हीं के सहारे गाई जाती हैं।
  • ये फड़ें शाहपुरा (भीलवाड़ा) में बनती हैं।
  • पूरे राजस्थान में भोपा समुदाय इन्हें गाता है, श्रद्धा के रंग के हिसाब से अलग-अलग वाद्य बजाते हुए।

8. ध्रुपद गायन शैली

  • जनक ➜ मानसिंह तोमर, ग्वालियर के राजा (1486 से 1516 ई. तक)
  • सहयोगी ➜ महान संगीतज्ञ बैजू बावरा (उनके दरबार में)
  • तालें ➜ चौताल, मत्त, ब्रह्म, लक्ष्मी, सूल, तीव्रा

मानसिंह ख़ुद अच्छे विद्वान और संगीतज्ञ थे; बैजू बावरा की मदद से उन्होंने ध्रुपद की शुरुआत की। आगे चलकर ध्रुपद चार खण्डों (वाणियों) में बँट गया।

वाणीउत्पत्तिजनक
गोहरवाणीग्वालियरतानसेन
डागुरवाणीजयपुरब्रजचंद डागर
खण्डारवाणीउनियारा (टोंक)खण्डार के शासक समोखन सिंह

और भी बातें

  • ध्रुपद गायन में राज्य की इकलौती महिला कलाकार — मधुभट्ट तैलंग।
  • बीकानेर के बैण्ड मास्टर विलियम जेम्स ने रोमन अंग्रेज़ी में व्याख्या सहित “इण्डियन म्यूज़िक” नाम की कृति लिखी।

9. प्रमुख संगीत घराने

जब किसी बड़े कलाकार की अपनी अलग गायकी या वादन-शैली परिवार और शिष्यों में चल पड़ी, तो वह उसी के नाम से “घराना” कहलाई।

10. जयपुर घराना

  • गायकी ➜ ख्याल
  • प्रवर्तक ➜ मनरंग (भूपत खाँ) — सदारंग के पुत्र
  • सदारंग ➜ दिल्ली घराने के प्रवर्तक (असली नाम नियामत खाँ)

इस घराने के अन्य गायक

11. अतरौली, पटियाला, बीनकार, सेनिया

अतरौली (अल्लादिया खाँ) घराना

  • इसे चलाने वाले ➜ साहब खाँ और अल्लादिया खाँ, जो ध्रुपद की खण्डारवाणी गाते थे।
  • अल्लादिया खाँ जयपुर घराने के ही कलाकार थे और नौहरवाणी तथा खण्डारवाणी के नामी गायक रहे।
  • इन्हें “संगीत सम्राट” / “माउण्ट एवरेस्ट ऑफ़ म्यूज़िक” कहा जाता है; इसे “अल्लादिया खाँ घराना” भी कहते हैं।

पटियाला घराना

  • प्रवर्तक ➜ फतेह अली और अली बख्श, जो “आलिया-फत्तू” नाम से जाने जाते हैं; यह भी जयपुर घराने की उपशाखा है।
  • इन्होंने जयपुर में संगीत की शिक्षा ली, फिर टोंक में रहे और उसके बाद पटियाला चले गए।
  • प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली इसी घराने से हैं।

बीनकार घराना — जयपुर

इसके प्रवर्तक अली बीनकार (नाम का पहला हिस्सा धुँधला) सवाई रामसिंह द्वितीय के दरबारी संगीतकार थे; दो अन्य कलाकारों के नाम पन्ने पर स्पष्ट नहीं हैं।

सेनिया घराना — जयपुर

  • प्रवर्तक तानसेन के पुत्र माने जाते हैं।
  • इसे “सितारियों का घराना” भी कहते हैं।
  • इस घराने के कलाकार ध्रुपद की गोहरवाणी और खण्डारवाणी में सिद्धहस्त थे।

12. डागर, मेवाती, जोधपुर, मथुरा, दिल्ली, आगरा

घरानाप्रवर्तक / ख़ास बात
सहारनपुर / डागरबहराम खाँ डागर — महाराजा रामसिंह के दरबारी गायक; ध्रुपद की डागुरवाणी के लिए प्रसिद्ध
मेवातीसंस्थापक उस्ताद घग्घे नज़ीर खाँ, जो जोधपुर के जसवंत सिंह के दरबार में गाते थे; उन्होंने जयपुर की ख्याल गायकी को अपना अलग रूप देकर यह घराना शुरू किया
जोधपुर / रंगीलाप्रवर्तक रमजान खाँ रंगीले — जोधपुर के गायक इमाम बख्श के शिष्य

13. प्रमुख संगीतज्ञ व कलाकार

इस शाखा में पहले संगीत-संरक्षक शासक और पुराने संगीतज्ञ, फिर आधुनिक कलाकार आते हैं।

14. अमीर ख़ुसरो व पुराने नाम

नामब्योरा
अमीर ख़ुसरोअलाउद्दीन खिलजी के दरबारी संगीतज्ञ; जन्म 1253 (उत्तर प्रदेश); ईरानी और भारतीय संगीत के मेल से गायन की नई शैली “क़व्वाली” शुरू की; कुछ विद्वान तबला और सितार का आविष्कारक भी मानते हैं
रमाबाईमहाराणा कुम्भा (मेवाड़) की बेटी, स्वयं संगीतज्ञ; दूसरा नाम “वागीश्वरी देवी”
हम्मीर देवरणथम्भौर के शासक; रचना “शृंगार हार”

15. संगीत-संरक्षक शासक

सवाई प्रतापसिंह — जयपुर

  • हवामहल के निर्माता; “ब्रजनिधि” नाम से कविता लिखते थे।
  • संगीत का विशाल सम्मेलन कराकर प्रसिद्ध ग्रंथ “राधा गोविन्द संगीत सार” लिखवाया, जिसके रचयिता देवर्षि ब्रजपाल भट्ट थे।
  • ख़ुद संगीताचार्य; दरबार में 22 संगीतज्ञों की मंडली “गंधर्व बाईसी” थी।

महाराणा कुम्भा — मेवाड़

  • उपाधियाँ ➜ “अभिनव भरताचार्य” और “नंदिकेश्वरावतार”।
  • रचनाएँ ➜ संगीत राज, संगीत मीमांसा, सूड प्रबन्ध, रसिक प्रिया (गीत गोविन्द की टीका)।

महाराजा अनूपसिंह — बीकानेर

स्वयं विद्वान संगीतज्ञ; उनके दरबारी कवि थे प्रसिद्ध संगीतज्ञ भावभट्ट।

16. आधुनिक कलाकार

अल्लाह जिलाई बाई — बीकानेर

  • शिक्षा ➜ बचपन में उस्ताद हुसैन बख्श से संगीत सीखा
  • अवसर ➜ छोटी उम्र में बीकानेर नरेश गंगासिंह के सामने गाईं; प्रभावित होकर उन्होंने उन्हें “बीकानेर म्यूज़िकल स्कूल” (गुणीजन खाना) में दाख़िल करा दिया
  • विदेश ➜ 1987 में लंदन के अल्बर्ट हॉल में प्रस्तुति

राज्यगीत “केसरिया बालम … म्हारे देश” को गाकर वे प्रसिद्ध हुईं; मांगी बाई आर्य (उदयपुर) को भी राज्यगीत प्रथम बार गाने वाली बताया गया है।

संगीत और रंगमंच के कलाकार

नामब्योरा
जगजीत सिंहजन्म 8 फरवरी 1941, श्रीगंगानगर; ग़ज़ल, भक्ति संगीत और शास्त्रीय गायन; 2003 पद्मभूषण; 2012 (मरणोपरान्त) राजस्थान रत्न; अटल बिहारी वाजपेयी के गीतों के दो एल्बम “नई दिशा” और “संवेदना” [परीक्षा: LSA, 2022 — निम्न में से कौन राजस्थान से संबंधित ग़ज़ल गायक है? ➜ जगजीत सिंह]
पं. विश्वमोहन भट्ट (जयपुर)जन्म 27 जुलाई 1950; पश्चिमी गिटार में बदलाव कर वीणा-सरोद-सितार की ख़ूबियों वाला वाद्य “मोहनवीणा” बनाया; 2002 पद्मश्री, 2017 पद्मभूषण, 2012 राजस्थान रत्न; “A Meeting by the River” के लिए ग्रेमी पुरस्कार (1994 के समारोह में) [परीक्षा: पशु परिचर, 2024 — “मोहन वीणा” संगीत वाद्य का आविष्कार किसने किया? ➜ पं. विश्वमोहन भट्ट]
गणपतलाल डांगी (जोधपुर)“अभिनय, गायन व लोकरंग की त्रिवेणी”; उपनाम “गीगला का बापू / बिज्जू भाई”; 1965 के भारत-पाक युद्ध में आकाशवाणी का धारावाहिक “लड़े सूरमा आगे जी” राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध
मेहन्दी हसनपाकिस्तानी ग़ज़ल गायक; मूल रूप से झुंझुनूं ज़िले के लूणा गाँव के

17. मांगणियार-लोक कलाकार

नामब्योरा
कोमल कोठारीजन्म 4 मार्च 1929, कपासन (चित्तौड़गढ़); जोधपुर के बोरूंदा में “रूपायन संस्थान” (लोक-संस्कृति को समर्पित); 1983 में पद्मश्री; सारंगी-कमायचा लोकवाद्य, कलावंत जातियों के शिविर और नाट्य कार्यशालाएँ करवाईं
श्रीमती मांगीबाईतेरहताली नृत्यांगना; जन्म चित्तौड़गढ़ के वानिणा (वाणिया) गाँव में; 1935 में पादरला (पाली) में विवाह; जेठ गोरमदास से नृत्य सीखा; 1954 में चित्तौड़गढ़ के गाड़िया लुहार सम्मेलन में नेहरू के सामने प्रस्तुति
शकुंतला पंवारसंगीत और नृत्य की बहुविध कलाकार; उदयपुर में “शकुंतलम् संस्थान” की स्थापना
बतुल बेगम (नागौर)माण्ड और फाग गायिका; लोक धुनों में अपने गीत; नारी शक्ति पुरस्कार 2021 (8 मार्च, राष्ट्रपति द्वारा)

साकर खाँ के एक छोटे भाई (हमीरा गाँव के मुरली-वादक) का नाम पन्ने पर धुँधला है।

18. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

नामक्षेत्रवर्ष
वसंत काबरासरोद वादन — जोधपुर2022
गफ़रुद्दीन मेवाती जोगीभपंग वादन — भरतपुर2022
दौलतरामथियेटर आर्ट्स में लाइटिंग (अलाइड थियेटर आर्ट्स)2022

19. प्रमुख संगीत ग्रंथ

ग्रंथरचनाकार
शृंगार हारहम्मीर (रणथम्भौर)
राधा गोविन्द संगीत सारदेवर्षि ब्रजपाल भट्ट
ब्रजनिधि ग्रन्थावलीसवाई प्रतापसिंह
रागमाला, राग मंजरी, नर्तन निर्णय, सद्राग चन्द्रोदयपुण्डरीक विट्ठल

20. संगीतजीवी जातियाँ

जातिपहचान
मांगणियारपश्चिमी मरुस्थलीय ज़िले; विशिष्ट गायन; कमायचा और सारंगी बजाने में पारंगत
लंगाबाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर में सबसे ज़्यादा; मूलतः सिन्ध से आई मुस्लिम जाति; सारंगी-कमायचा के साथ लंगा गायकी
भाटयजमानों की वंशावलियाँ लिखना और बखान करना
ढोलीपरम्परा से ढोल बजाने के कारण नाम

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. माण्ड गायकी बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर और फलौदी की शृंगार प्रधान शैली है; 10वीं-11वीं सदी में जैसलमेर का इलाक़ा «माँड क्षेत्र» कहलाता था।
  2. मांगणियार सिन्ध से आई मुस्लिम जाति है, गायन में छह राग और छत्तीस रागनियाँ बरतते हैं; सदीक खाँ प्रसिद्ध खड़ताल वादक और कमल साकर खाँ प्रसिद्ध कामायचा वादक हैं।
  3. बरनवा जागीर को «लंगा संगीत का मक्का» कहते हैं, जबकि बाड़मेर का बड़वणा गाँव लंगों का गाँव कहलाता है।
  4. तालबंदी गायकी सवाई माधोपुर में उन कलाकारों ने विकसित की जो औरंगज़ेब की संगीत-पाबंदी से विस्थापित हुए थे।
  5. ध्रुपद के जनक ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (1486 से 1516 ई.) हैं, सहयोगी बैजू बावरा; चार वाणियाँ हैं — गोहर, डागुर, खण्डार और नौहर।
  6. जयपुर घराने के प्रवर्तक मनरंग (भूपत खाँ) हैं, जो सदारंग के पुत्र थे; सदारंग दिल्ली घराने के प्रवर्तक माने जाते हैं।
  7. सवाई प्रतापसिंह के दरबार में 22 संगीतज्ञों की मंडली «गंधर्व बाईसी» थी; वे «ब्रजनिधि» नाम से कविता लिखते थे।
  8. पं. विश्वमोहन भट्ट ने «मोहनवीणा» बनाई, और राज्यगीत «केसरिया बालम» से अल्ला जिलाई बाई (बीकानेर) को अमरत्व मिला।
  9. राज्य की ध्रुपद गायन में इकलौती महिला कलाकार मधुभट्ट तैलंग हैं; «राधा गोविन्द संगीत सार» के रचयिता देवर्षि ब्रजपाल भट्ट थे।

अगले भाग में लोकगीत क्या हैं और कितने वर्गों में बँटे हैं, साथ में विवाह के हर चरण पर गाए जाने वाले गीत तथा जन्म और मृत्यु के गीत।

पिछला भाग: राजस्थान के प्रमुख लोक नाट्य: ख्याल एवं रम्मत, तमाशा, नौटंकी, चारबैत

अगला भाग: राजस्थान के लोकगीत: विरह व शृंगार के गीत

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के लोकगीत · राजस्थान के लोक वाद्यंत्र

पूरी श्रृंखला: राजस्थान की कला एवं संस्कृति — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न लोक गायन शैलियाँ, संगीत घराने व संगीतज्ञ के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
इस विषय का माइंड मैप ➜Complete Rajasthan GK पास देखें

Useful for these exams