एक ही प्रदेश पर छठी सदी से 1947 तक राज करने वाला गुहिल घराना इतिहास की अनोखी मिसाल है, इसलिए इसकी शुरुआत की बुनियादी बातें — राजधानी, प्रतीक और उत्पत्ति पर मत — सबसे पहले पक्की कर लेनी चाहिए। इस भाग में परिचय, क्षेत्र और परम्पराएँ, उत्पत्ति के मत, शील से नागादित्य तक का दौर और शासक-क्रम है। उसके बाद बप्पा रावल, भर्तृभट्ट, अल्लट, जैत्रसिंह, तेजसिंह और समरसिंह का ब्योरा आता है।
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1. परिचय व उत्पत्ति
- शासन ➜ 6वीं सदी से 1947 ई. तक
- वास्तविक संस्थापक ➜ बप्पा रावल (734–753)
- पहली राजधानी ➜ नागदा
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2. क्षेत्र, प्रतीक व परम्पराएँ
मेवाड़ पर गुहिल (गहलोत / सिसोदिया) घराने का एकछत्र राज छठी सदी से 1947 ई. तक रहा — एक ही प्रदेश पर इतने लंबे समय तक शासन करने वाला यह दुनिया का अनोखा राजवंश माना जाता है। वंश का आदि पुरुष गुहिल (गुहदत्त / गोह) है, पर मेवाड़ में इसकी जड़ें जमाने वाला असली संस्थापक बप्पा रावल है।
- प्राचीन नाम ➜ शिबि · प्राग्वाट · मेदपाट
- आज के ज़िले ➜ चित्तौड़गढ़ · भीलवाड़ा · प्रतापगढ़ · राजसमंद · उदयपुर · सलूम्बर
- पहली राजधानी ➜ नागदा
| प्रतीक / परम्परा | क्या है |
|---|---|
| हिन्दुआ सूरज | ये राजा खुद को राम का वंशज (रघुवंशी) बताते थे, इसलिए “हिन्दुओं का सूरज” कहलाए |
| राज्य चिह्न | एक राजपूत और एक भील सरदार की आकृति; नीचे लिखा — “जो दृढ़ राखे धर्म को, तिही राखे करतार” |
| रक्त तिलक | गद्दी पर बैठते समय उन्दरी गाँव (ईडर) का भील गमेती अपने अँगूठे के रक्त से तिलक करता था; राजसिंह द्वितीय के समय यह रीत बंद हुई |
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ट्रिक: राजधानियों का क्रम — ना-आ-चि-उ-गो-कुं-चा-उ = नागदा → आहड़ → चित्तौड़ → उदयपुर → गोगुन्दा → कुम्भलगढ़ → चावण्ड → उदयपुर।
3. गुहिलों की उत्पत्ति
| विद्वान / ग्रन्थकार | मत |
|---|---|
| अबुल फ़ज़ल | गुहिल ईरान के बादशाह नौशेरवाँ आदिल की संतान |
| कर्नल टॉड | राजपूत विदेशी मूल के; गुहिलों की जड़ वल्लभी के शासक शिलादित्य में |
| स्मिथ | गुहिल विदेशी |
| श्यामलदास (वीर विनोद) | वल्लभी के गुहिल; क्षत्रियों की 36 शाखाओं में गिनती |
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टॉड की कथा
- 524 ई. — विदेशी हमले में वल्लभी नष्ट, राजा शिलादित्य का अन्त
- गर्भवती रानी पुष्पावती बच गईं — वे आबू-चन्द्रावती में अपने परमार पिता के यहाँ देवी-दर्शन को गई थीं
- पुत्र गोह (गुहदत्त) का जन्म
भण्डारकर के तीन प्रमाण
- 977 ई. का आहड़ (आटपुर) लेख ➜ इसमें गुहिल को आनन्दपुर से आए ब्राह्मण-कुल की प्रसन्नता बढ़ाने वाला बताया गया है।
- रावल समरसिंह के समय की चीरवा प्रशस्ति (1273 ई.) — बापा के लिए “विप्र” शब्द।
- कुम्भलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) और एकलिंग माहात्म्य — वही भाव — वंश का नाता आनन्दपुर (वडनगर) के ब्राह्मण कुल से, जिसकी शोभा उसने बढ़ाई।
गुहिलों की शाखाएँ
नैणसी (अपनी ख्यात में) और टॉड — दोनों गुहिलों की 24 शाखाएँ गिनते हैं। इनमें ज़्यादा प्रसिद्ध हैं —
ट्रिक: किसने क्या माना — ओझा = सूर्य, भण्डारकर, नैणसी, शर्मा = ब्राह्मण, टॉड, स्मिथ, अबुल फ़ज़ल = विदेशी/ईरानी।
4. शील से नागादित्य तक
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 524 ई. | वल्लभी का पतन | शिलादित्य के समय विदेशी आक्रमण; गर्भवती रानी पुष्पावती बच निकलीं और गोह को जन्म दिया। |
| — | गोह का पालन | ईडर के पास वीरनगर में कमलावती नाम की ब्राह्मण स्त्री ने बच्चे को पाला। |
| — | ईडर की गद्दी | भील राजा मांडलिक ने बूढ़ा होने पर गोह को राज सौंप दिया और खुद संन्यास ले लिया; उसके वंशज गुहिल / गुहिलोत कहलाए। |
| लगभग 566 ई. | गुहिल का शासन | ओझा के मत से गुहिल ने इसी के आस-पास अपना राज जमाया; आठवीं पीढ़ी तक ईडर पर राज रहा। |
| लेख / प्रशस्ति | वर्ष | क्या बताता है |
|---|---|---|
| सामोली लेख | 646 | शील / शिलादित्य |
| नागदा — अपराजित का लेख | 661 | अपराजित की जीत, विष्णु मंदिर |
| प्रतापगढ़ अभिलेख | 942 | भर्तृभट्ट द्वितीय को “महाराजाधिराज” कहा |
| नाथ प्रशस्ति | 971 | नरवाहन का पराक्रम |
शील (सामोली लेख वाले गुहिल राजा) और शिलादित्य (वल्लभी का राजा, गोह का पिता) अलग-अलग हैं — नाम की समानता से भ्रम न हो।
5. शासक-क्रम व शासनकाल
रावल काल (734 – 1303)
| शासक | काल (ई.) | पहचान |
|---|---|---|
| बप्पा रावल | 734–753 | वास्तविक संस्थापक; नागदा |
| भर्तृभट्ट द्वितीय | 903–951 | राष्ट्रकूट महालक्ष्मी से विवाह (942) |
| अल्लट | 951–971 | आहड़ राजधानी; नौकरशाही; हूण रानी |
| नरवाहन | 971–973 | चौहान रानी; नाथ प्रशस्ति |
राणा / महाराणा काल (1326 – 1597)
| शासक | काल (ई.) | पहचान |
|---|---|---|
| हम्मीर | 1326–1364 | सिसोदिया साम्राज्य का संस्थापक; सिंगोली 1336 |
| क्षेत्रसिंह (खेता) | 1364–1382 | अजमेर, मांडल, जहाजपुर मिलाए |
| लक्षसिंह (लाखा) | 1382–1421 | जावर की चाँदी की खान |
| मोकल | 1421–1433 | रामपुरा 1428; हत्या |
मुग़ल संधि से 1955 तक (1597 – 1955)
| शासक | काल (ई.) | पहचान |
|---|---|---|
| अमरसिंह प्रथम | 1597–1620 | मुग़ल-मेवाड़ संधि 1615 |
| कर्णसिंह | 1620–1628 | पहले मनसबदार; खुर्रम को शरण |
| जगतसिंह प्रथम | 1628–1652 | चित्तौड़ की मरम्मत; प्रतापगढ़-शाहपुरा अलग |
| राजसिंह प्रथम | 1652–1680 | औरंगज़ेब से टकराव; राजसमंद झील |
6. बप्पा से रावल रतनसिंह
रावल काल की कड़ियाँ
- 734 — बप्पा, चित्तौड़
- 951 — अल्लट, आहड़ व नौकरशाही
- 977 — शक्तिकुमार, मुंज का हमला
7. बप्पा रावल (734–753)
पिता नागादित्य की हत्या के बाद नन्हा बप्पा नागदा में पला। वहाँ वह ब्राह्मणों की गायें चराता और हारित ऋषि की सेवा करता था। नैणसी लिखता है कि सेवा से तुष्ट हारित ऋषि ने देवी राष्ट्रसेनी को मनाकर बापा के लिए राजपाट माँगा।
| विद्वान | बप्पा के बारे में मत |
|---|---|
| श्यामलदास | असली नाम महेन्द्र (शील का पौत्र); बप्पा नाम नहीं, खिताब |
| कर्नल टॉड | असली नाम शील; शील का ही दूसरा नाम बापा |
| भण्डारकर | नाम खुम्माण |
- 734 ई. में हारित ऋषि के आशीर्वाद से चित्तौड़ पर चढ़ाई कर राजा मान मौर्य को हराया — यहीं गुहिल साम्राज्य की नींव पड़ी। श्यामलदास चित्तौड़ लेने का समय 734 मानते हैं; ओझा 713 के बाद का मानकर शासन 734–753 मानते हैं।
- चित्तौड़ पर विदेशी सेना के हमले की चुनौती स्वीकार कर उन्हें सिंध तक खदेड़ा।
- उपाधियाँ ➜ हिन्दू सूरज, राजगुरु, चक्कवै (चारों दिशाओं का विजेता)।
- एकलिंगनाथ मंदिर (कैलाशपुरी, उदयपुर) बनवाया; एकलिंग जी गुहिलों के मूल देवता।
बप्पा का उत्थान
- नागदा — गाय चराना
- हारित ऋषि की सेवा
- 734 — चित्तौड़ पर चढ़ाई
8. खुमाण से शक्तिकुमार
बप्पा के पुत्र खुमाण प्रथम से खुमाण तृतीय तक के राजाओं का ज़्यादा ब्योरा नहीं मिलता। इस दौर में गुहिल केवल दक्षिण-पश्चिमी मेवाड़ तक सीमित रह गए, राजधानी नागदा रही और वे राष्ट्रकूट, प्रतिहार और परमार शक्तियों के सामन्त / मददगार बनकर रहे।
| शासक | काल (ई.) | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| भर्तृभट्ट द्वितीय (खुमाण तृतीय का पुत्र) | 903–951 | आहड़ (आटपुर) लेख 977 — “तीनों लोकों का तिलक”; 942 में राष्ट्रकूट राजकुमारी महालक्ष्मी से विवाह; 942 के प्रतापगढ़ अभिलेख में महाराजाधिराज |
| अल्लट (भर्तृभट्ट का पुत्र) | 951–971 | ख्यातों में “आलू रावल“; हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह; मेवाड़ में पहली बार नौकरशाही; आहड़ को राजधानी बनाया; आहड़ में वराह (आदिवराह) मंदिर |
| नरवाहन (अल्लट का पुत्र) | 971–973 | चौहानों से मेल — चौहान राजा जेजय की पुत्री से विवाह; नाथ प्रशस्ति (971) व 977 के लेख में पराक्रमी शासक |
9. रणसिंह से जैत्रसिंह
| शासक | काल (ई.) | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| रणसिंह / कर्णसिंह | 1158–1168 | दो पुत्र — क्षेम सिंह व राहप; छतरी आहड़ में; इसी के समय वंश दो शाखाओं में बँटा |
| क्षेम सिंह | 1168–1172 | रावल शाखा शुरू कर मेवाड़ का शासक; पुत्र — सामन्त सिंह, कुमार सिंह |
| सामन्त सिंह | 1172–1179 | लगभग 1174 में सोलंकी राजा कुमारपाल के भतीजे अजयपाल को पराजित कर चित्तौड़ फिर पाया; लगभग 1177 में कीर्तिपाल चौहान ने मेवाड़ छीना; 1178 में वागड़ जाकर नया राज बनाया, राजधानी वटप्रदक (बड़ौदा); 1192 में पृथ्वीराज तृतीय की ओर से गौरी से लड़ते मारे गए |
जैत्र सिंह (1213–1253) — पद्म सिंह का पुत्र
| घटना | वर्ष | क्या हुआ |
|---|---|---|
| नाडोल से संधि | — | नाडोल के चौहान उदय सिंह पर चढ़ाई; बचने को उदय सिंह ने संधि की और पौत्री रूपादेवी का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह से किया |
| इल्तुतमिश का हमला | — | राजधानी नागदा तहस-नहस; जैत्रसिंह ने प्रतिष्ठा लौटाई और पहली बार चित्तौड़गढ़ को राजधानी बनाया |
| भुताला का युद्ध | लगभग 1227 | जयसिंह सूरि के हम्मीर मद मर्दन में लिखा है कि जैत्रसिंह तुर्क फ़ौज को मेवाड़ से बाहर खदेड़ सका, पर मेवाड़ को जन-धन की भारी क्षति उठानी पड़ी; सेनापति बालक व मदन |
- ओझा की राय में गुलाम-वंश के सुल्तानों के दौर में मेवाड़ का सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राजा जैत्रसिंह था; विरोधियों तक ने उसकी बहादुरी मानी।
- डॉ. दशरथ शर्मा ने इसका काल “मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल” कहा।
10. तेजसिंह व समरसिंह
तेजसिंह (1253–1267) — जैत्रसिंह का पुत्र
- उपाधियाँ ➜ परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, उमापतिवरलब्धप्रौढ़ प्रताप।
- 1253–54 में दिल्ली के बलबन ने रणथम्भौर, बूँदी और मेवाड़ पर हमले किए; तेजसिंह ने उसका आक्रमण विफल किया।
समरसिंह (1267–1302) — तेजसिंह का पुत्र
| स्रोत | समरसिंह के लिए विशेषण |
|---|---|
| कुम्भलगढ़ प्रशस्ति | शत्रुओं की शक्ति का अपहर्ता |
| आबू शिलालेख | तुर्कों से गुजरात का उद्धारक |
| चीरवा का लेख | शत्रु-संहार में सिंह के समान और शूर |
- 1299 में अलाउद्दीन का सेनापति उलूग ख़ाँ गुजरात-अभियान पर जा रहा था; समरसिंह ने दण्ड (धन) लेकर शाही सेना को आगे जाने दिया।
- दरबार के जैन विद्वान ➜ रत्नप्रभ सूरि और पार्श्वचन्द्र; प्रमुख शिल्पी-कलाकार — पद्मसिंह, केलसिंह, केल्हण, कर्मसिंह।
रिवीजन पॉइंटर्स
- गुहिलों का शासन छठी सदी से 1947 ई. तक चला; वास्तविक संस्थापक बप्पा रावल (734–753) और पहली राजधानी नागदा।
- राजधानियों का क्रम — नागदा ➜ आहड़ ➜ चित्तौड़ ➜ उदयपुर ➜ गोगुन्दा ➜ कुम्भलगढ़ ➜ चावण्ड ➜ उदयपुर।
- मेवाड़ के प्राचीन नाम शिबि, प्राग्वाट और मेदपाट थे; राजा खुद को रघुवंशी मानते थे, इसलिए «हिन्दुआ सूरज» कहलाए।
- रक्त तिलक की रीत — उन्दरी गाँव (ईडर) का भील गमेती अँगूठे के रक्त से तिलक करता था; राजसिंह द्वितीय के समय यह बंद हुई।
- उत्पत्ति पर मत — ओझा: सूर्यवंशी; भण्डारकर, नैणसी, शर्मा: ब्राह्मण; टॉड, स्मिथ, अबुल फ़ज़ल: विदेशी या ईरानी।
- 734 ई. में हारित ऋषि के आशीर्वाद से बप्पा ने मान मौर्य को हराकर चित्तौड़ लिया, और एकलिंगनाथ मंदिर उन्हीं का बनवाया हुआ है।
- अल्लट (951–971) ने मेवाड़ में पहली बार नौकरशाही शुरू की और आहड़ को राजधानी बनाया।
- रणसिंह के समय वंश दो शाखाओं में बँटा, और क्षेम सिंह ने रावल शाखा शुरू की।
- जैत्रसिंह (1213–1253) ने पहली बार चित्तौड़गढ़ को राजधानी बनाया और भुताला के युद्ध (लगभग 1227) में तुर्क फ़ौज को मेवाड़ से बाहर खदेड़ा।
अगले भाग में रावल रतनसिंह और चित्तौड़ का पहला साका, फिर सिसोदिया शाखा के हम्मीर से मोकल तक और महाराणा कुम्भा की गद्दी, युद्ध, किले व उपाधियाँ आएँगी।
पिछला भाग: चौहान राजवंश: जालौर, सिवाणा व सिरोही एवं हाड़ौती — बूँदी व कोटा
अगला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: बप्पा से रावल रतनसिंह (भाग 2) एवं हम्मीर से मोकल
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