आमेर का कछवाहा राजवंश: आरम्भिक शासक एवं भारमल व भगवन्तदास – Rajasthan History Chapter 26

आमेर के कछवाहों की उत्पत्ति, आरम्भिक शासक, भारमल और भगवन्तदास तथा कुँवर मानसिंह के आरम्भिक वर्ष।

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In this chapter (14 sections)
  1. एक नज़र में
  2. ढूँढाड़ और वंश की उत्पत्ति
  3. ध्वज, राजचिह्न और आराध्य
  4. आरम्भिक शासक
  5. दुल्हराय (धौलाराय)
  6. कोकिलदेव और शाखाएँ
  7. पृथ्वीराज
  8. पूर्णमल से आसकरण
  9. भारमल व भगवन्तदास
  10. भारमल (बिहारीमल)
  11. भगवन्तदास
  12. जन्म, उपाधियाँ, पहचान
  13. कुँवर मानसिंह (1562–89)
  14. रिवीजन पॉइंटर्स

कछवाहों की कहानी एक क्षेत्रीय राज्य के मुग़ल दरबार तक पहुँचने की कहानी है, और इसका असली मोड़ भारमल के समय आया। इसीलिए इस भाग को दो हिस्सों में पढ़ना ठीक रहेगा — पहले ढूँढाड़ की नींव और आरम्भिक शासक, फिर भारमल, भगवन्तदास और कुँवर मानसिंह। ध्वज, राजचिह्न और आराध्य जैसे छोटे तथ्य भी यहीं समेटे गए हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — आमेर का कछवाहा राजवंश, 8 चॉक-बोर्ड चित्र, 6 चार्ट, 26 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एक नज़र में

शासककाल (ई.)पहचान
दुल्हराय1137–1170दौसा में नींव; माँची को रामगढ़ बनाया
कोकिलदेव1207 में आमेरआमेर को राजधानी बनाया
पृथ्वीराज1503–1527खानवा में साँगा के साथ; बारह कोठड़ी
भारमल1547–1574मुग़लों से सबसे पहले सम्बन्ध जोड़ने वाले

… शेष 6 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

2. ढूँढाड़ और वंश की उत्पत्ति

  • दौसा के आसपास कभी ढूँढ नदी बहती थी; जिस भूभाग से वह गुज़री, वही ढूँढाड़ कहलाया।
  • सूर्यमल्ल मिश्रण के मत में वंश का नाम रघुवंशी राजा कूर्म से चला — कूर्म की सन्तान कूर्मवंशी, बोलचाल में कछवाहा।
  • दूसरी परम्परा: नरवर (ग्वालियर, म.प्र.) के वन में रहीं सीता के दो पुत्र लव और कुश थे; कछवाहे स्वयं को कुश की सन्तान मानते हैं।

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

याद रखें: ढूँढ नदी → ढूँढाड़ · कूर्म → कछवाहा · कुश → वंशावली का दावा — तीन नाम, तीन स्रोत।

3. ध्वज, राजचिह्न और आराध्य

  • झंडा ➜ पंचरंगा
  • झंडे के बीच ➜ सूर्य की आकृति
  • मूलमंत्र ➜ यतो धर्मस्ततो जयः
  • पहले का ध्वज ➜ सफ़ेद, कचनार वृक्ष

… शेष 4 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

  • मानसिंह प्रथम से पहले आमेर का राजकीय ध्वज सफ़ेद था और उस पर कचनार का पेड़ बना होता था।
  • जयपुर के राजा स्वयं को गोविन्द देवजी का दीवान (सेवक) मानते थे, इसलिए आदेश “श्री दीवान बचनात” से शुरू होते थे।
  • कुलदेवी जमुवाय माता का मन्दिर रामगढ़ में दुल्हराय ने बनवाया।

ट्रिक: रंग बदलने का क्रम: सफ़ेद (कचनार) → पंचरंगा (सूर्य + मूलमंत्र)।

4. आरम्भिक शासक

काल / क्रमघटनाविवरण
1137दुल्हरायदौसा को पहली राजधानी बनाकर कछवाहा राज्य की नींव।
1170दुल्हराय की मृत्युमीणों के आक्रमण में मारा गया; पुत्र कोकिलदेव बाद में जन्मा।
1207कोकिलदेवआमेर के मीणों को हराकर आमेर नई राजधानी।

5. दुल्हराय (धौलाराय)

  • मूल नाम ➜ तेजकरण
  • पिता ➜ सोढ़देव (सोढ़ासिंह)
  • पहली राजधानी ➜ दौसा
  1. महिपाल के वंशज सोढ़देव के पुत्र तेजकरण बेहद सुन्दर थे, इसीलिए दुल्हराय / धौलाराय कहलाए।
  2. मोरागढ़ (दौसा) के चौहान राजा रालणसी ने प्रसन्न होकर बेटी सुजान कँवर का विवाह दुल्हराय से किया; पुत्र न होने से दहेज में दौसा राज्य दे दिया।
  3. दुल्हराय ने पिता को नरवर से बुलाकर दौसा में विधिवत राज्याभिषेक कराया; 1137 ई. के आसपास दौसा को राजधानी बनाकर कछवाहा राज्य की नींव रखी।

ट्रिक: छीने हुए इलाके: गैता → गैटोर, झोटा → झोटवाड़ा — नाम में ही नाम छिपा है।

6. कोकिलदेव और शाखाएँ

  • कोकिलदेव (काखलजी, कांकलदेव) ने 1207 ई. में आमेर के मीणों को हराकर आमेर को नई राजधानी बनाया।
  • आमेर 1727 ई. में जयपुर बसने तक ढूँढाड़ राज्य की राजधानी रहा।
  • कोकिलदेव ने यादवों से मेड़ और बैराठ जीते और राज्य का विस्तार शेखावाटी तक किया।

7. पृथ्वीराज

  • काल ➜ 1503–1527 ई.
  • रानी ➜ बालाबाई (अपूर्वा कँवर)
  • पिता (रानी के) ➜ राव लूणकरण, बीकानेर
  • महाराणा कुम्भा के सैन्य अभियान में आमेर के कछवाहा राजा उनके सामन्त बन गए थे।
  • रानी बालाबाई बीकानेर के राव लूणकरण की पुत्री थीं; उनसे भीमदेव, पूर्णमल, साँगासिंह, भारमल पुत्र हुए।
  • पृथ्वीराज के राज में रामानुज सम्प्रदाय के सन्त कृष्णदास पयहारी ने जयपुर की गलता जी पहाड़ी पर अपने सम्प्रदाय की गद्दी जमाई।

ध्यान दें: पृथ्वीराज के 12 पुत्र थे; आमेर की गद्दी पर झगड़ा न हो, इसलिए राज्य 12 हिस्सों में बाँट दिया गया — यही बारह कोठड़ी।

8. पूर्णमल से आसकरण

शासककालमुख्य बात
पूर्णमल1527–1534बड़े भाई भीमदेव को छोड़ रानी बालाबाई के कहने पर राजा बना; भीमदेव नाराज़
—1534हुमायूँ की मदद से बयाना क़िला लेने में मंडरायल के युद्ध में मारा गया
भीमदेव1534–1537पूर्णमल के बाद गद्दी मिली
  • रतनसिंह हुमायूँ के समय स्वतन्त्र रहा; उसके बाद शेरशाह सूरी की अधीनता माननी पड़ी।
  • आसकरण को भाई का हत्यारा ठहराकर भारमल ने गद्दी ले ली।

9. भारमल व भगवन्तदास

आमेर → मुग़ल दरबार

  1. भारमल की अधीनता 1562
  2. हरका बाई का विवाह
  3. पुत्र-पौत्र अकबर की सेवा में

10. भारमल (बिहारीमल)

  • काल ➜ 1547–1574 ई.
  • गद्दी पर आयु ➜ 50 वर्ष
  • अकबर से भेंट ➜ 20 जनवरी 1562

गद्दी मिलते ही भारमल पर दो संकट आए — भाई आसकरण की बग़ावत और मीणों की समस्या।

  • आसकरण नागौर में सलीमशाह सूर (शेरशाह का पुत्र) की शरण में गया और उसके सरदार हाजी ख़ाँ पठान को आमेर पर चढ़ा लाया; भारमल ने हाजी ख़ाँ को बहुत धन देकर अपनी ओर कर लिया।
  • पानीपत के दूसरे युद्ध के बाद दिल्ली लौटे अकबर को मजनू ख़ाँ ने भारमल की सेवा-सहायता की बात बताई।
  • अकबर राजपूतों की ताक़त जानता था; उसकी सुलह-कुल नीति का सार था — या तो रिश्ता जोड़कर अधीन करो, या दबा दो।
  • जनवरी 1562 में अकबर अजमेर में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की ज़ियारत को चला; 20 जनवरी 1562 को भारमल चगताई ख़ाँ की मदद से उससे मिला और अधीनता मान ली।
  • अजमेर से लौटते अकबर के साथ साँभर में भारमल की बेटी हरका बाई (उर्फ़ शाही बाई) का निकाह हुआ; आगे चलकर जहाँगीर उन्हीं की कोख से जन्मा।
काल / क्रमघटनाविवरण
जून 1547गद्दीआसकरण को हटाकर 50 वर्ष की आयु में भारमल आमेर का शासक।
20 जनवरी 1562अकबर से भेंटचगताई ख़ाँ के माध्यम से; अधीनता स्वीकार।
फ़रवरी 1562विवाहहरका बाई का अकबर से — साँभर में।

11. भगवन्तदास

  • गद्दी ➜ 28 जनवरी 1574
  • मनसब ➜ 5000
  • पंजाब का सूबेदार ➜ 1583–1589
  • पिता भारमल के बाद 28 जनवरी 1574 को भगवन्तदास गद्दीनशीन हुआ; अकबर की ओर से टीका आया और पाँच हज़ारी मनसब भी मिला।
  • युवराज रहते भी और राजा बनकर भी वह मुग़लों का सेवक रहा; अकबर के चित्तौड़ घेरे (1567–68) में शाही फ़ौज के साथ गया।
  • अफ़ग़ानों से लड़ाई में सरनाल के मैदान में एक बिगड़े हाथी को क़ाबू कर वीरता दिखाई।

मानबाई (मनभावती) भगवन्तदास की पुत्री और भारमल की पौत्री थी। उसका विवाह शहज़ादे सलीम (जहाँगीर) से 13 फ़रवरी 1585 को लाहौर में हुआ। जहाँगीर ने उसे “सुल्तान-निस्सा” नाम दिया; मुग़ल दरबार में उसे शाह बेगम का ओहदा मिला और शहज़ादा ख़ुसरो उसी का पुत्र था।

12. जन्म, उपाधियाँ, पहचान

  • जन्म ➜ 6 दिसम्बर 1550, मौजमाबाद
  • अकबर की सेवा में ➜ 1562 (12 वर्ष की आयु)
  • उपाधियाँ ➜ मिर्ज़ा राजा, फ़र्ज़न्द
  • आमेर के 1612 ई. वाले शिलालेख से प्रमाणित होता है कि मानसिंह के पिता भगवन्तदास थे।
  • बचपन मौजमाबाद (जयपुर) में गुज़रा; 1562 में, जब वह मात्र 12 साल का था, अकबर के दरबार से जुड़ गया।
  • अकबर ने उसे “मिर्ज़ा राजा” और “फ़र्ज़न्द” की उपाधि दी; वह नवरत्नों में गिना जाता था।
काल / क्रमघटनाविवरण
1550जन्म6 दिसम्बर, मौजमाबाद।
1562अकबर की सेवा12 वर्ष की आयु में।
1567–69चित्तौड़ और रणथम्भौरशाही सेना में; रणथम्भौर के सुर्जन हाड़ा से अधीनता स्वीकार करवाई।
1572गुजरात अभियानसरनाल में मिर्ज़ा इब्राहिम के विरुद्ध हरावल का नेतृत्व।

13. कुँवर मानसिंह (1562–89)

वर्षअभियानक्या हुआ
1567–68चित्तौड़अकबर के आक्रमण के समय शाही सेना में
1569रणथम्भौरपिता भगवन्तदास के साथ मध्यस्थता कर दुर्गपति सुर्जन हाड़ा (बूँदी) से अधीनता स्वीकार करवाई
1572गुजरातसरनाल के युद्ध में मिर्ज़ा इब्राहिम के विरुद्ध सेना के हरावल का नेतृत्व
18 जून 1576हल्दीघाटीराणा प्रताप को पकड़ने में असफल; अकबर को मानसिंह पर सन्देह हुआ और वह नाराज़ हुआ

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. ढूँढ नदी से ढूँढाड़ नाम पड़ा और कूर्म से कछवाहा; कछवाहे स्वयं को कुश की सन्तान मानते हैं।
  2. दुल्हराय (धौलाराय, मूल नाम तेजकरण) ने 1137 के आसपास दौसा को पहली राजधानी बनाकर राज्य की नींव रखी।
  3. कोकिलदेव ने 1207 में आमेर के मीणों को हराकर आमेर को राजधानी बनाया, जो 1727 में जयपुर बसने तक बनी रही।
  4. पृथ्वीराज (1503–1527) के 12 पुत्र थे, इसलिए राज्य 12 हिस्सों में बँटा — यही बारह कोठड़ी है।
  5. भारमल (1547–1574) मुग़लों से सबसे पहले सम्बन्ध जोड़ने वाले शासक थे; 20 जनवरी 1562 को अकबर से भेंट कर अधीनता मानी।
  6. भारमल की पुत्री हरका बाई का विवाह अकबर से हुआ, और जहाँगीर उन्हीं की कोख से जन्मे।
  7. भगवन्तदास 28 जनवरी 1574 को गद्दी पर बैठे और पाँच हज़ारी मनसब पाया; उनकी पुत्री मानबाई का विवाह सलीम से 13 फ़रवरी 1585 को लाहौर में हुआ।
  8. मानसिंह का जन्म 6 दिसम्बर 1550 को मौजमाबाद में हुआ; 12 वर्ष की उम्र में 1562 में अकबर की सेवा में आए और «मिर्ज़ा राजा» व «फ़र्ज़न्द» की उपाधियाँ पाईं।

अगले भाग में मानसिंह प्रथम का शेष शासन और मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम — काबुल से बंगाल-उड़ीसा तक विजय, आमेर के महल-मन्दिर, उत्तराधिकार युद्ध और पुरन्दर की संधि।

पिछला भाग: बीकानेर का राठौड़ राजवंश: दलपतसिंह से अनूपसिंह एवं स्वरूपसिंह से डूँगरसिंह

अगला भाग: आमेर का कछवाहा राजवंश: मानसिंह प्रथम एवं मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम

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इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न आमेर का कछवाहा राजवंश के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
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