औरंगज़ेब के दौर से भूपालसिंह तक मेवाड़ की कहानी एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है — ताक़तवर पड़ोसियों के बीच अपनी पहचान कैसे बचाई जाए। कभी तलवार उठी, कभी संधि हुई, और आगे चलकर मराठों व अंग्रेज़ों से भी वास्ता पड़ा। इस भाग में राजसिंह प्रथम, जयसिंह व अमरसिंह द्वितीय, संग्रामसिंह द्वितीय से जगतसिंह द्वितीय, अरिसिंह से भीमसिंह, अंग्रेज़ों से संधि और शम्भूसिंह से भूपालसिंह तक के शासक क्रम से दिए गए हैं।
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1. राजसिंह प्रथम (1652–80)
- जन्म ➜ 24 सितम्बर 1629
- राज्याभिषेक ➜ 10 अक्टूबर 1652 (उम्र 23)
- मनसब ➜ 5,000 जात व सवार → 6,000
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- राज्याभिषेक पर शाहजहाँ ने राणा का खिताब, हाथी, घोड़े और 5,000 जात-सवार का मनसब भेजा।
- पिता की शुरू की चित्तौड़ की मरम्मत राजसिंह ने भी जारी रखी; ख़बर पाकर शाहजहाँ ने सादुल्ला ख़ाँ की कमान में 30,000 सैनिक भेजे, जिन्होंने किले के सारे नए निर्माण गिरा दिए।
- उत्तराधिकारी-युद्ध ➜ सितम्बर 1657 में शाहजहाँ बीमार पड़े और बेटों में लड़ाई छिड़ी; इस उथल-पुथल का लाभ लेकर राजसिंह ने “टीका दौड़” उत्सव की आड़ में 2 मई 1658 से मुग़ल चौकियों और पड़ोसी इलाक़ों पर धावे शुरू किए — पहली चौकी दरीबा, दूसरा लक्ष्य मांडल (22,000 रुपये), फिर बनेड़ा, शाहपुरा, खरवड़, जहाजपुर, सावर, फूलिया (कुल 48,000 रुपये हाथ लगे)।
| घटना | विवरण |
|---|---|
| चारुमती प्रकरण (1660) | चारुमती रूपनगर (किशनगढ़) के राजा मानसिंह की बहन थी; औरंगज़ेब उससे ब्याह रचाना चाहता था और सगाई का डोला किशनगढ़ भिजवाया, जिसे भाई ने मजबूरी में मान लिया; चारुमती राजसिंह के पराक्रम पर रीझी हुई थी, उसने मदद माँगता पत्र भेजा — राजसिंह ने तुरन्त जाकर उससे 1660 में विवाह कर लिया |
| मंदिर-मूर्तियाँ | 1669 (शासन के 11वें वर्ष) से औरंगज़ेब ने सेना को हिन्दू मंदिर, पाठशालाएँ और मूर्तियाँ तोड़ने का आदेश दिया |
| जज़िया | 2 अप्रैल 1679 को हिन्दुओं पर लगा; राजसिंह ने खुलकर विरोध किया और औरंगज़ेब को पत्र लिखा |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- देबारी (उदयपुर) ➜ नवम्बर 1679 में औरंगज़ेब अजमेर से मेवाड़ चला और जनवरी 1680 में देबारी पहुँचा; उदयपुर पूरी तरह ख़ाली मिला, तो मंदिर तोड़ता चित्तौड़ की ओर बढ़ा।
- औरंगज़ेब ने बेटे अकबर को मेवाड़-मारवाड़ दबाने भेजा; राजसिंह ने राजगद्दी का लालच देकर सेनापति तहव्वर ख़ाँ के ज़रिए अकबर को अपनी ओर मिला लिया; बाद में औरंगज़ेब ने तहव्वर ख़ाँ को धोखे से मरवाया और बेटे व राजपूत खेमे में फूट डलवा दी।
- ओड़ा गाँव (राजसमंद) में ज़हर के कारण 22 अक्टूबर 1680 को राजसिंह चल बसे; उधर 1 जनवरी 1681 को शहज़ादे अकबर ने नाडोल (पाली) में स्वयं को भारत का बादशाह घोषित कर दिया।
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हाड़ी रानी
- पति ➜ सलूम्बर के राव रतनसिंह चूण्डावत; पिता — बूँदी के जागीरदार संग्रामसिंह हाड़ा; असली नाम सलह / सहलकँवर।
- शादी के अगले ही दिन रतनसिंह को औरंगज़ेब की फ़ौज से भिड़ने देसूरी की नाल जाना पड़ा; उन्होंने सेवक भेजकर निशानी माँगी तो हाड़ी रानी ने अपना सिर काटकर भेज दिया। रतनसिंह लड़ते हुए मारे गए; उनकी छतरी देसूरी की नाल में है।
ट्रिक: राजसिंह — टीका दौड़ 1658 · चारुमती 1660 · जज़िया 1679 · मृत्यु 1680; औरंगज़ेब से तनाव के चार कारण — चारुमती, मंदिर, जज़िया, अजीतसिंह-दुर्गादास।
2. जयसिंह व अमरसिंह द्वितीय
महाराणा जयसिंह (1680–1698)
- राज्याभिषेक कुरज गाँव (राजसमंद) में; गद्दी पर बैठे तब मेवाड़-मुग़ल संघर्ष जारी था।
- 24 जून 1681 को राजसमंद झील के किनारे औरंगज़ेब के पुत्र मुअज्जम से संधि।
- जयसमंद झील ➜ गोमती नदी का पानी रोककर विशाल जयसमुद्र झील बनवाई।
| 1681 की संधि की शर्तें |
|---|
| मारवाड़ के राजकुमार अजीतसिंह की सहायता नहीं की जाएगी |
| जज़िया के बदले पुर, मांडल और बदनौर के परगने औरंगज़ेब को |
| औरंगज़ेब मुग़ल सेना मेवाड़ से हटाएगा और जयसिंह पर आक्रमण नहीं करेगा |
महाराणा अमरसिंह द्वितीय (1698–1710)
- सिंहासनारोहण पर डूँगरपुर, बाँसवाड़ा और देवलिया के रावत ने “टीके का दस्तूर” पेश नहीं किया — महाराणा ने आक्रमण कर दण्डित किया।
- 1681 की संधि में मुग़लों को गए पुर, मांडल, बदनौर परगने उन्होंने 1709 में लौटा लिए — बदले में हर साल एक लाख रुपये देना मंज़ूर करके।
- 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी-युद्ध में शहज़ादे मुअज्जम (बाद में बहादुरशाह प्रथम) का पक्ष लिया।
देबारी समझौता (1708)
- अजीतसिंह (जोधपुर), सवाई जयसिंह (जयपुर), अमरसिंह द्वितीय (मेवाड़) देबारी में मिले
- तय हुआ — महाराणा मदद करेंगे ताकि अजीतसिंह मारवाड़ और जयसिंह आमेर की गद्दी पर लौटें
- अमरसिंह की बेटी चन्द्रकुँवरी सवाई जयसिंह को ब्याही गई
3. संग्रामसिंह द्वितीय से जगतसिंह द्वितीय
महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय (1710–1734)
- मराठों ने मई 1711 में पहली बार मेवाड़ के अधीन मंदसौर इलाक़े से रक़म वसूली।
- सम्मेलन की योजना ➜ मराठों के ख़िलाफ़ राजपूतों को जोड़ने के लिए सवाई जयसिंह ने आमेर से आकर महाराणा के साथ बैठक की रूपरेखा बनाई; स्थान हुरड़ा (भीलवाड़ा), तिथि 17 जुलाई 1734, अध्यक्ष संग्रामसिंह द्वितीय तय हुए; पर जनवरी 1734 में ही उनकी मृत्यु हो गई।
- सहेलियों की बाड़ी (उदयपुर) बनवाई।
| चित्रशाला | विवरण |
|---|---|
| छोटी चित्रशाली | कर्णसिंह प्रथम ने प्रोत्साहन दिया; उदयपुर के राजप्रासाद में बनवाई |
| बड़ी चित्रशाली | संग्रामसिंह द्वितीय ने बनवाई, अलंकृत चित्रावली से सजी |
| जोतदान | राणाओं का चित्र-भंडार; इसमें फ़र्रुख़सियर का चित्र जिस पर “आसफ़ खाँ रो बेटो” लिखा है — भारत के दुष्प्राप्य चित्रों में गिना जाता है |
महाराणा जगतसिंह द्वितीय (1734–1751)
- 17 जुलाई 1734 को हुरड़ा (भीलवाड़ा) सम्मेलन — अध्यक्षता जगतसिंह द्वितीय, मुख्य आयोजक सवाई जयसिंह।
- उद्देश्य मराठों के विरुद्ध राजपूतों को एकजुट करना था; पर आपसी मनमुटाव और लालच से यह असफल रहा। इसमें रतलाम, शिवपुरी, ईडर आदि के राजा भी आए, इसलिए यह केवल राजस्थान नहीं, राजपूत राजाओं का सम्मेलन था।
- इन्हीं के समय मराठे पहली बार मेवाड़ पर चढ़ आए और कर लिया; पेशवा बाजीराव (प्रथम) जनवरी 1736 में मेवाड़ पहुँचा और डेढ़ लाख रुपये सालाना चौथ तय किया।
| हुरड़ा सम्मेलन में शासक | रियासत |
|---|---|
| जगतसिंह द्वितीय | मेवाड़ (अध्यक्ष) |
| सवाई जयसिंह | जयपुर (मुख्य आयोजक) |
| अभयसिंह | जोधपुर |
| दुर्जनसाल | कोटा |
ट्रिक: हुरड़ा — 17 जुलाई 1734 · भीलवाड़ा · अध्यक्ष जगतसिंह द्वितीय · आयोजक सवाई जयसिंह · उद्देश्य मराठे · नतीजा असफल।
4. अरिसिंह से भीमसिंह तक
- अरिसिंह द्वितीय (1761–1773) ➜ राजसिंह द्वितीय की निःसंतान मृत्यु के बाद उनके भाई गद्दी पर बैठे। सरदारों ने राजसिंह द्वितीय की झाली रानी के पुत्र रतनसिंह को उत्तराधिकारी घोषित कर अरिसिंह का विरोध किया।
- नाराज़ अरिसिंह ने बागोर के नाथसिंह और सलूम्बर के राव जोधसिंह की हत्या करवाई।
- देवगढ़ के रावत जसवन्त सिंह ने रतनसिंह का पक्ष मज़बूत करने माधवराव सिंधिया से मदद माँगी; अरिसिंह ने भी पेशवा से मदद का प्रयास किया।
कृष्णा कुमारी विवाद
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1798 | सगाई | महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी की सगाई मारवाड़ के राव भीमसिंह से तय हुई। |
| 1803 | वर की मृत्यु | विवाह से पहले ही मारवाड़ के भीमसिंह चल बसे; विवाह का प्रस्ताव जयपुर के जगतसिंह द्वितीय को भेजा गया। |
| 1806 | टीका जयपुर | मारवाड़ के मानसिंह की आपत्ति दरकिनार कर सगाई का टीका जयपुर रवाना हुआ। |
5. अंग्रेज़ों से संधि: भीमसिंह–स्वरूपसिंह
| घटना | विवरण |
|---|---|
| अंग्रेज़ों से संधि | 13 जनवरी 1818 — महाराणा भीमसिंह; मेवाड़ की ओर से ठाकुर अजीतसिंह चूण्डावत (आसींद) और अंग्रेज़ अधिकारी चार्ल्स मेटकाफ़ ने हस्ताक्षर किए |
| कर्नल जेम्स टॉड | फ़रवरी 1818 में उदयपुर पहुँचे — मेवाड़ के पहले पॉलिटिकल एजेन्ट; टॉड के बाद कैप्टन वॉ (वांग) |
| कौलनामा | मई 1818 में सरदारों पर नियंत्रण के लिए टॉड के साथ |
| महाराणा | काल (ई.) | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| जवानसिंह | 1828–1838 | निःसंतान मृत्यु |
| सरदारसिंह | 1838–1842 | बागोर ठिकाने (भीलवाड़ा) से गोद लिए गए; 1839 में मोमट क्षेत्र के भीलों का विद्रोह (लगान को लेकर) — अप्रैल 1841 में खेरवाड़ा में मेवाड़ भील कोर (M.B.C.) की स्थापना |
| स्वरूपसिंह | 1842–1861 | सरदारसिंह के छोटे भाई; 8 फ़रवरी 1845 को सरदारों से नया कौलनामा और कर्ज़ चुकता; 1854 में फिर नया कौलनामा; 1857 में अंग्रेज़ों का साथ दिया; बिजली गिरने से टूटे विजय स्तम्भ की मरम्मत; 15 अगस्त 1861 को सती-प्रथा पर रोक (डाकन व समाधि प्रथा पर भी) |
1861 में स्वरूपसिंह के निधन पर उनकी पासवान ऐंजाबाई चिता पर बैठीं — किसी महाराणा के साथ हुई यह आख़िरी सती थी।
6. शम्भूसिंह से भूपालसिंह
| महाराणा | काल (ई.) | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| शम्भूसिंह | 1861–1874 | अल्पवयस्क; मेजर टेलर (पॉलिटिकल एजेन्ट) की अगुवाई में बनी रीजेन्सी कौन्सिल (पंच सरदारी) ने शासन चलाया; ब्रिटिश सरकार GCSI (Grand Commander of the Star of India) देने लगी तो कहा — मेवाड़ के महाराणा तो पहले ही हिन्दुआ सूरज हैं, स्टार की ज़रूरत नहीं — समझाने पर 1871 में ग्रहण किया; दीवानी-फ़ौजदारी अदालतें; नई अदालतों के विरोध में नगर सेठ चम्पालाल की अगुवाई में 1 जनवरी 1864 को हड़ताल; शम्भूरत्न पाठशाला (1863); श्यामलदास को मेवाड़ का इतिहास लिखने का काम |
| सज्जनसिंह | 1874–1884 | नाबालिग, रीजेन्सी कौंसिल; 1875 में प्रिन्स ऑफ़ वेल्स से मिलने मुम्बई गए पर पद के अनुकूल स्थान न मिलने पर बिना बैठे उदयपुर लौटे; 1877 में लॉर्ड लिटन का दिल्ली दरबार; 14 फ़रवरी 1878 को नमक समझौता; 20 अगस्त 1880 को महेन्द्रराज सभा; 23 नवम्बर 1881 को लॉर्ड रिपन ने चित्तौड़ आकर GCSI दिया; गवर्नर जनरल लॉर्ड नॉर्थब्रुक उदयपुर आने वाले पहले |
| फतेहसिंह | 1884–1930 | 1903 दिल्ली दरबार (एडवर्ड सप्तम) जाते समय केसरीसिंह बारहठ का “चेतावनी रा चूंगट्या” पढ़कर बिना शामिल हुए लौटे; 1911 दरबार (जॉर्ज पंचम) में दिल्ली गए पर हाज़िर हुए बिना स्टेशन पर मिलकर लौटे; 1921 में प्रिन्स ऑफ़ वेल्स से बीमारी बताकर नहीं मिले; अंग्रेज़ ख़ुश नहीं थे, इसलिए जुलाई 1921 में अधिकार छीनकर कुँवर भूपालसिंह को सौंपे |
सज्जनसिंह के सुधार
- सज्जन यंत्रालय (छापाखाना) से साप्ताहिक सज्जन कीर्ति सुधारक छपवाया।
- सज्जन वाणी विलास पुस्तकालय ➜ 11 फ़रवरी 1875 को उदयपुर के राजमहल में; श्यामलदास को सौंपा, जिन्होंने यहीं बैठकर वीर विनोद लिखा; महाराणा ने उन्हें “कविराजा” की उपाधि दी।
- सुन्दर बाग सज्जन निवास लगवाया।
7. रैपिड फायर तथ्य
- चारुमती से विवाह ➜ 1660, राजसिंह ने रूपनगर की राजकुमारी से किया; औरंगज़ेब भी उसे चाहता था
- जज़िया लगा ➜ 2 अप्रैल 1679; राजसिंह ने खुलकर विरोध किया
- राजसिंह की मृत्यु ➜ 22 अक्टूबर 1680, ओड़ा गाँव (राजसमंद)
- जयसिंह की संधि ➜ 24 जून 1681, राजसमंद झील के किनारे औरंगज़ेब के पुत्र मुअज्जम से
- जयसमंद झील ➜ जयसिंह ने गोमती का पानी रोककर बनवाई
- देबारी समझौता ➜ 1708; अजीतसिंह, सवाई जयसिंह और अमरसिंह द्वितीय का गठजोड़
- हुरड़ा सम्मेलन ➜ 17 जुलाई 1734, भीलवाड़ा; अध्यक्ष जगतसिंह द्वितीय, मक़सद मराठों के विरुद्ध एकता — असफल रहा
- अंग्रेज़ों से संधि ➜ 13 जनवरी 1818, महाराणा भीमसिंह के समय
- सती-प्रथा पर रोक ➜ 15 अगस्त 1861, स्वरूपसिंह के समय; उसी वर्ष ऐंजाबाई की आख़िरी सती
अगले भाग में मारवाड़ का क्षेत्र, राठौड़ शब्द की व्युत्पत्ति, उत्पत्ति के मत, सीहा से चूण्डा और रणमल्ल से गांगा तक का काल।
पिछला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: उदयसिंह व प्रताप (भाग 2) एवं अमरसिंह से भूपालसिंह (भाग 1)
अगला भाग: मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: सीहा से चूण्डा एवं रणमल्ल से गांगा (भाग 1)
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