राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: परमार राजवंश एवं जैसलमेर के भाटी – Rajasthan History Chapter 30

सभी रियासतों की झलक, प्राचीन अभिलेख, परमार वंश की चारों शाखाएँ और जैसलमेर के भाटियों की शुरुआत।

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In this chapter (13 sections)
  1. एक नज़र में
  2. अभिलेख व प्रशस्तियाँ
  3. ग्रन्थ व रचनाकार
  4. परमार राजवंश
  5. आबू के परमार
  6. धारावर्ष (1163–1219)
  7. जालौर के परमार
  8. मालवा के परमार
  9. वागड़ के परमार
  10. जैसलमेर के भाटी
  11. उत्पत्ति व राजधानियाँ
  12. जैसल से दूदा तक: साके
  13. रिवीजन पॉइंटर्स

राजस्थान के छोटे-बड़े राजवंश पढ़ने का सबसे सीधा तरीका है हर वंश को उसकी राजधानी और संस्थापक से जोड़ देना। यह भाग पहले सभी रियासतों की एक झलक, अभिलेखों और ग्रन्थों की सूची देता है, फिर आबू, जालौर, मालवा और वागड़ की परमार शाखाओं तथा जैसलमेर के भाटियों की शुरुआत पर आता है। तिथियाँ यहाँ बहुत हैं, इसलिए क्रम पर विशेष ध्यान रखें।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश, 10 चॉक-बोर्ड चित्र, 11 चार्ट, 42 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एक नज़र में

रियासत / शाखावंशआरम्भ करने वालाराजधानीअन्त
आबूपरमारधूमराजचन्द्रावती1311 में लूम्बा ने छीना
जालौरपरमारवाक्पतिराज (960–985)जालौरआबू की ही शाखा
मालवापरमारमूल स्थान आबूधार / उज्जैनलगभग 1135 में सिद्धराज का अधिकार
वागड़परमारकृष्णराज के दूसरे पुत्र का वंशअर्थूणालगभग 1178 में सामन्तसिंह ने समाप्त किया

… शेष 14 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

काल / क्रमघटनाविवरण
371 ई.वरीक वंश का विजयगढ़ लेखबयाना
423 ई.औलीकर वंश का गंगधार लेखझालावाड़
625–641 ई.भीनमाल में चावड़ावसन्तगढ़ लेख से ह्वेनसांग तक
1040करौली में यदुवंशविजयपाल

… शेष 10 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

2. अभिलेख व प्रशस्तियाँ

अभिलेखवर्षवंश / स्थानक्या जानकारी
विजयगढ़ यूप स्तम्भ लेख371 ई.वरीक · बयानाराजा विष्णुवर्धन (पिता यशोवर्धन)
गंगधार का लेख423 ई.औलीकर · झालावाड़राजा विश्ववर्मा
वसन्तगढ़ का लेख625 ई.चावड़ा · भीनमालप्रसिद्ध शासक वर्मल्लात
जालौर शिलालेख1118 ई.जालौर के परमारसात शासकों की सूची

… शेष 6 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: तिथि वाले चार प्राचीन लेख क्रम से: 371 (विजयगढ़) → 423 (गंगधार) → 625 (वसन्तगढ़) → 1118 (जालौर)।

3. ग्रन्थ व रचनाकार

रचनारचनाकारराज्य / संरक्षक
पार्थ पराक्रम व्यायोग (नाटक)प्रहलादनआबू — धारावर्ष का छोटा भाई
कीर्ति कौमुदीसोमेश्वरआबू — धारावर्ष का दरबारी कवि
सरस्वती कण्ठाभरण, राजमृगांक, विद्वज्जनमण्डल, समरांगण, शृंगार मंजरीकथा, कूर्मशतकराजा भोज स्वयंमालवा के परमार
पिंगल शिरोमणिरावल हररायजैसलमेर
  • कुशललाभ, डूंगरसी रतनू ➜ हरराय के समकालीन कवि
  • शिवदान रतनू ➜ बैरीशाल का राजकवि; “कविराजा”

4. परमार राजवंश

परमार का अर्थ है “शत्रु को मारने वाला”। शुरू में ये आबू के आसपास ही टिके रहे; प्रतिहारों की शक्ति घटी तो परमारों का उत्थान शुरू हुआ। चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज रासो में इन्हें आबू के वशिष्ठ-अग्निकुण्ड से प्रकट हुआ बताया है।

  • प्राचीनतम ज्ञात सदस्य ➜ उपेन्द्र कृष्णराज
  • आरम्भ में ➜ दक्षिण के राष्ट्रकूटों के सामन्त
  • कुलदेवी ➜ कालिका माता (धार, म.प्र.)

5. आबू के परमार

आबू शाखा की नींव का श्रेय धूमराज को दिया जाता है, पर क्रमबद्ध वंश-सूची उत्पलराज से मिलती है। राजधानी चन्द्रावती (सिरोही) थी। सबसे प्रतापी सिन्धुराज “मरुमण्डल का महाराज” कहलाया। गुजरात का पड़ोसी होने से सोलंकियों से टकराव लगातार चला।

शासकक्या हुआ
धरणीवराहगुजरात के मूलराज सोलंकी से हारकर राष्ट्रकूट धवल की शरण में गया; कुछ समय बाद आबू वापस ले लिया
महिपाल (धरणीवराह का पुत्र)1002 ई. में आबू पर अधिकार प्रमाणित; तब तक परमार सोलंकियों की अधीनता मान चुके थे
धन्धुक (महिपाल का पुत्र)सोलंकी भीमदेव ने आक्रमण किया; धन्धुक धार के भोज की शरण में चला गया; भीमदेव ने आबू की देखरेख विमलशाह को सौंपी, जिसने बाद में दोनों में सुलह करवाई
काल / क्रमघटनाविवरण
1002महिपाल का अधिकार प्रमाणित
1060कृष्णदेव; बालाप्रसाद की मध्यस्थता
1163–1219धारावर्ष का शासन56 वर्ष

याद रखें: लूणवशाही मन्दिर — देलवाड़ा (आबू), नेमिनाथ को समर्पित, निर्माता वास्तुपाल–तेजपाल, समय सोमसिंह।

6. धारावर्ष (1163–1219)

  • विक्रमदेव का पड़पौत्र; आबू के परमारों में सबसे बलवान; 56 वर्ष राज किया।
  • नाडौल के चौहान राजा केल्हण की दो पुत्रियाँ — शृंगारदेवी और गीगादेवी — उसकी रानियाँ थीं।
  • मुहम्मद गौरी के विरुद्ध लड़ाई में उसने गुजरात की सेना का सेनापतित्व किया।
  • समकालीन चार गुजराती सोलंकी राजा ➜ कुमारपाल, अजयपाल, मूलराज, भीमदेव द्वितीय; उसने सोलंकी अधीनता उतार फेंकी।

धारावर्ष का सफ़र

  1. सोलंकी अधीनता
  2. गौरी से युद्ध में गुजरात-सेनापति
  3. सोलंकियों से स्वतन्त्र

7. जालौर के परमार

  • जालौर की परमार सत्ता का आरम्भ 10वीं सदी से गिना जाता है; अनुमान है कि वह आबू वाली धारा की ही एक शाखा थी।
  • जालौर शिलालेख (1118 ई.) सात शासकों की जानकारी देता है।
  • जालौर पर वाक्पतिराज का राज 960–985 ई. के बीच रहा।

जालौर की सात पीढ़ियाँ

  1. वाक्पतिराज
  2. चन्दन
  3. देवराज
  4. अपराजित

ट्रिक: सातों के नाम की ट्रिक: वा-च-दे-अ-वि-धा-वी (वाक्पति, चन्दन, देवराज, अपराजित, विज्जल, धारावर्ष, वीसल)।

8. मालवा के परमार

मालवा के परमारों का मूल स्थान भी आबू था। राजधानी उज्जैन या धारानगरी रही, पर राजस्थान का बड़ा भू-भाग इनके पास था — कोटा राज्य का दक्षिणी हिस्सा, झालावाड़, वागड़ और प्रतापगढ़ का पूर्वी भाग।

शासकमुख्य बातें
मुंजमालवा का सबसे शक्तिशाली शासक; उपाधियाँ — वाक्पतिराज, अमोघवर्ष, उत्पलराज, पृथ्वीवल्लभ, श्रीवल्लभ; परमार महानता का संस्थापक; 997 ई. में दक्षिणी राजपूताने — बाँसवाड़ा, जालौर, किराडू — पर क़ब्ज़ा; मेवाड़ के शक्तिकुमार के समय आहड़ (आघाटपुर) नष्ट किया और चित्तौड़ लिया — गुहिलों को मूल प्रान्त छोड़ना पड़ा; “कवि वृष” भी कहा जाता था
भोजविजयों और विद्या-प्रेम के लिए प्रसिद्ध; चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण शिव मन्दिर; नागदा में भोजसर का निर्माण (कुम्भलगढ़ प्रशस्ति का कथन); सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला
जयसिंह (भोज का उत्तराधिकारी)वागड़ का राजा मंडलीक उसका सामन्त; लगभग 1135 में चालुक्य सिद्धराज ने मालवा ले लिया और परमार शक्ति ढलान पर आ गई
  • भोज की रचनाएँ: सरस्वती कण्ठाभरण, राजमृगांक, विद्वज्जनमण्डल, समरांगण, शृंगार मंजरीकथा, कूर्मशतक।
  • दरबार के विद्वान: वल्लभ, मेरुतुंग, वररुचि, सुबन्धु, अमर, राजशेखर, माघ, धनपाल, मानतुंग आदि।
काल / क्रमघटनाविवरण
997मुंज ने बाँसवाड़ा-जालौर-किराडू लिए
मुंज-कालआहड़ नष्ट; चित्तौड़ पर क़ब्ज़ामेवाड़ में शक्तिकुमार के समय
भोज-कालचित्तौड़ का त्रिभुवन नारायण मन्दिर

9. वागड़ के परमार

  • मालवा के कृष्णराज के दूसरे बेटे की सन्तानें वागड़ के परमार कहलाईं; डूँगरपुर–बाँसवाड़ा का भू-भाग (वागड़) उनके पास था।
  • राजधानी अर्थूणा / उत्थुणक (बाँसवाड़ा)।
  • 1059 ई. में मंडलीक ने बाँसवाड़ा के पाणाहेड़ा गाँव में मंडलीश्वर शिव का मन्दिर खड़ा करवाया।

वागड़ का हस्तान्तरण

  1. वागड़ के परमार
  2. अर्थूणा प्रशस्ति
  3. विजयराज (अन्तिम)

10. जैसलमेर के भाटी

रोचक तथ्य: जैसलमेर रियासत के लिए पण्डित नेहरू की उक्ति थी — “दुनिया का आठवाँ आश्चर्य”।

11. उत्पत्ति व राजधानियाँ

  • वंश का मूल चन्द्रवंशी यादवों की भाटी शाखा में खोजा जाता है; भाटी स्वयं को श्रीकृष्ण का वंशज कहते हैं।
  • यादव-वंशज भट्टी ने भटनेर (हनुमानगढ़) के आसपास राज्य जमाया; उसके पुत्र भूपत ने लगभग 285 ई. में भटनेर दुर्ग बनवाकर उसे राजधानी बनाया। भट्टी के नाम से ही ये भाटी कहलाए।
  • वंश के माडन राव ने लगभग 599 ई. में मारोठ बसाया और वहाँ के क़िले की नींव रखी।
  • विरुद: उत्तर भड़ किवाड़ भाटी और छत्राला यादवपति।

उपाधि का बदलाव

  1. राव
  2. देवराज — योगी रतननाथ का तिलक (852)
  3. रावल

12. जैसल से दूदा तक: साके

शासकमुख्य बातें
विजयराज (~1165)घनावा शिलालेख (1176) में महाराजा कहा गया; उपाधियाँ — परम भट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर
भोजविजयराज का पुत्र; गौरियों से लड़ते हुए वीरगति
रावल जैसलभोज का उत्तराधिकारी; लोद्रवा को असुरक्षित मानकर प्राकृतिक रूप से सुरक्षित स्थल पर नई राजधानी बनाई — वही उसके नाम से जैसलमेर; 12 जुलाई 1155 को त्रिकूट पहाड़ी पर दुर्ग की नींव
शालिवाहनजैसल का उत्तराधिकारी; दुर्ग का निर्माण पूरा करवाया
काल / क्रमघटनाविवरण
12 जुलाई 1155जैसलमेर दुर्ग की नींवरावल जैसल
1176घनावा शिलालेखविजयराज “महाराजा”
1308अलाउद्दीन की सेना का घेराकमालुद्दीन गुर्ग; फिर मलिक काफ़ूर

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. तिथि वाले चार प्राचीन लेख क्रम से: 371 विजयगढ़ (वरीक, बयाना), 423 गंगधार (औलीकर, झालावाड़), 625 वसन्तगढ़ (चावड़ा, भीनमाल), 1118 जालौर (परमार)।
  2. परमार का अर्थ है «शत्रु को मारने वाला»; चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज रासो में इन्हें आबू के वशिष्ठ-अग्निकुण्ड से प्रकट बताया है।
  3. आबू के परमारों की राजधानी चन्द्रावती (सिरोही) थी; नींव का श्रेय धूमराज को जाता है और सबसे प्रतापी सिन्धुराज «मरुमण्डल का महाराज» कहलाया।
  4. धारावर्ष (1163–1219) आबू का सबसे बलवान परमार था; उसने 56 वर्ष राज किया और सोलंकी अधीनता उतार फेंकी।
  5. लूणवशाही मन्दिर देलवाड़ा (आबू) में है, नेमिनाथ को समर्पित; निर्माता वास्तुपाल–तेजपाल।
  6. जालौर शिलालेख (1118) सात शासकों की सूची देता है; वाक्पतिराज का शासन 960–985 के बीच रहा।
  7. मालवा के परमारों में मुंज सबसे शक्तिशाली था; 997 में उसने बाँसवाड़ा, जालौर और किराडू पर क़ब्ज़ा किया, और लगभग 1135 में सिद्धराज ने मालवा ले लिया।
  8. वागड़ के परमारों की राजधानी अर्थूणा (बाँसवाड़ा) थी; मंडलीक ने 1059 में पाणाहेड़ा में मंडलीश्वर शिव मन्दिर बनवाया।
  9. रावल जैसल ने 12 जुलाई 1155 को त्रिकूट पहाड़ी पर जैसलमेर दुर्ग की नींव रखी; भाटी नाम यादव-वंशज भट्टी से चला।

अगले भाग में जैसलमेर के भाटियों की आगे की कथा — साके, महारावल, कला-निर्माण और 1949 का विलय।

पिछला भाग: जाट राजवंश (भरतपुर, धौलपुर): बदनसिंह और सूरजमल एवं जवाहरसिंह से रणजीतसिंह

अगला भाग: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: पाँच अन्य रियासतें (भाग 1)

इन्हें भी पढ़ें: जाट राजवंश (भरतपुर, धौलपुर) · राजस्थान के दुर्ग

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