गुहिल वंश की शाखाओं को याद रखने की कुंजी यह है कि हर रियासत कहाँ से निकली और उसे शुरू किसने किया। इस भाग में शेखावाटी के कछवाहे और किशनगढ़ के राठौड़ पहले आते हैं, फिर डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा के गुहिल। अन्त में रणथम्भौर से चित्तौड़ तक के साकों की तालिका और उनका क्रम दिया गया है, जो प्रायः अलग से रटने वाला हिस्सा होता है।
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1. शेखावाटी के कछवाहे
- शेखावाटी का नाम राव शेखा पर पड़ा — आमेर के कछवाहा सरदार मोकलजी के पुत्र।
- जयपुर राज्य ने शेखा को बरवाड़ा और नान के आसपास के 24 गाँव की जागीर दी; महाराव शेखा ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर अलग रियासत बनाई। 1469 ई. में अमरसर (जयपुर) राजधानी बनाई।
- 1488 ई. में रलावता गाँव (सीकर) में शेखा की मृत्यु हुई; उनके वंशज शेखावत।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| पंचपाणे के पाँच ठिकाने | आज का ज़िला |
|---|---|
| बिसाऊ | झुंझुनूं |
| डूँडलोद | झुंझुनूं |
| मण्डावा | झुंझुनूं |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: पंचपाणे की ट्रिक: बि-डूँ-मण्-मल-नव — बिसाऊ, डूँडलोद, मण्डावा, मलसीसर, नवलगढ़।
शेखावाटी का उदय
- मोकल (आमेर)
- शेखा — 24 गाँव
- स्वतन्त्र घोषणा; अमरसर 1469
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
2. किशनगढ़ का राठौड़ वंश
किशनसिंह ने, जो मारवाड़ के मोटा राजा उदयसिंह के बेटे थे, 1609 में राठौड़ों की तीसरी रियासत — किशनगढ़ — की स्थापना की। मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने उन्हें महाराजा की उपाधि दी।
| शासक | मुख्य बातें |
|---|---|
| किशनसिंह | 1612 में किशनगढ़ नगर बसाकर राजधानी बनाया; इनकी हत्या गजसिंह ने की, जो जोधपुर महाराजा सूरसिंह का पुत्र था |
| रूपसिंह | रूपनगढ़ क़िला बनवाया; सामूगढ़ (1658) में औरंगज़ेब के विरुद्ध लड़ते वीरगति |
| मानसिंह | बहन चारुमति का विवाह औरंगज़ेब से तय था, पर मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने उससे विवाह कर लिया |
| सावंतसिंह | स्वयं कवि; विद्वानों-कवियों के आश्रयदाता; “नागरीदास” नाम से रचना, संग्रह नागर समुच्चय; कृष्णभक्त — राज-पाट छोड़ वृन्दावन गए, वहीं निधन; इनके समय राज्य के दो हिस्से — किशनगढ़ क्षेत्र बहादुरसिंह को, रूपनगढ़ क्षेत्र सरदारसिंह को |
गद्दी का क्रम (मुख्य)
- किशनसिंह 1609
- रूपसिंह
- मानसिंह
- सावंतसिंह
रोचक तथ्य: किशनगढ़ की दो राजकुमारियाँ अलग-अलग कथाओं में आती हैं — चारुमति (मानसिंह की बहन; औरंगज़ेब की जगह महाराणा राजसिंह से विवाह) और रूपकंवर (जैसलमेर के मूलराज द्वितीय से 1772 में विवाह)।
3. मेवाड़ की गुहिल शाखाएँ
| रियासत | शुरुआत | संस्थापक | अन्तिम शासक |
|---|---|---|---|
| डूँगरपुर | 1178 | सामन्तसिंह | लक्ष्मणसिंह (1918–1948) |
| बाँसवाड़ा | 1527 | जगमाल | चन्द्रवीरसिंह (1944–1948) |
| प्रतापगढ़ | 15वीं सदी / 1473 | क्षेमसिंह; सूरजमल | रामसिंह (1929–1948) |
4. डूँगरपुर का गुहिल वंश
मेवाड़ के गुहिल शासक क्षेमसिंह के पुत्र सामन्तसिंह 12वीं सदी में वागड़ आए और छोटा राज्य जमाया — राजधानी बड़ौदा (वटप्रदक)। शासकों ने रावल व महारावल की उपाधियाँ लीं।
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| सामन्तसिंह | — | 1177 में नाडौल के चौहान कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर आक्रमण करके चित्तौड़ लिया; मेवाड़ छूटने पर सामन्तसिंह ने वागड़ के शासक चौरसीमल को हराया — 1178 में वागड़ में गुहिल वंश की स्थापना, राजधानी बड़ौदा; कुछ समय बाद गुजरात के भीमदेव द्वितीय ने उन्हें निकालकर बड़ौदा के गुहिल विजयपाल को दे दिया; सामन्तसिंह की वीरगति तराईन में हुई, जहाँ वे पृथ्वीराज तृतीय के साथी थे |
| जयत सिंह | ~1221 | सामन्तसिंह के वंशज; 1221 के आसपास वागड़ पर पुनः अधिकार |
| वीरसिंह | 1286–1303 | डूँगरिया भील को हराया; राज्य का विस्तार |
| डूँगरसिंह | — | राजधानी बड़ौदा से डूँगरपुर लाया |
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1177 | कीर्तिपाल (नाडौल) का मेवाड़ पर हमला | |
| 1178 | सामन्तसिंह — वागड़ में गुहिल वंश | राजधानी बड़ौदा |
| 1527 | खानवा; वागड़ का बँटवारा | डूँगरपुर / बाँसवाड़ा |
| 1573 | बीलपण का युद्ध | आसकरण |
ट्रिक: आसकरण के समय की तीन तिथियाँ: 1573 (बीलपण), 1577 (अधीनता), 1578 (प्रताप का हमला)।
5. बाँसवाड़ा का गुहिल वंश
- बाँसवाड़ा बंसिया / बिशना भील ने बसाया था; बाद में 16वीं सदी में जगमाल (डूँगरपुर) ने इसे भीलों से जीत लिया।
- उदयसिंह (1497–1527) ने राज्य को पूर्व-पश्चिम बाँटा; माही नदी के पूर्व का भाग बाँसवाड़ा, उसका पहला शासक छोटा पुत्र जगमाल (1527)।
- जगमाल के बाद जयसिंह और प्रतापसिंह; प्रतापसिंह ने 1576 में अकबर की अधीनता स्वीकार की।
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| समरसिंह | 1615–1660 | 1615 की मुग़ल–मेवाड़ संधि में बाँसवाड़ा मेवाड़ के अन्तर्गत माना गया; 1617 में माण्डू में जहाँगीर से मिले और बाँसवाड़ा को मेवाड़ से स्वतन्त्र करा लिया |
| कुशलसिंह | 1660–1688 | मुग़ल–मेवाड़ संघर्ष (1679–81) में नया फ़रमान लेकर फिर मेवाड़ से अलग |
| विशनसिंह | 1712–1737 | मेवाड़ का दबाव बढ़ता रहा; 1728 में मराठों को ख़िराज देना स्वीकार |
| उम्मेदसिंह | 1816–1819 | मराठों, पिण्डारियों व भीलों से बचने को ए.जी.जी. के प्रतिनिधि जेम्स कॉल्डफ़ील्ड से दिसम्बर 1818 में संधि |
याद रखें: डूँगरपुर–बाँसवाड़ा का बँटवारा: 1527 (उदयसिंह की खानवा में मृत्यु का वर्ष) — माही के पूर्व बाँसवाड़ा, पश्चिम डूँगरपुर।
6. प्रतापगढ़ (देवलिया) का गुहिल वंश
- क्षेमसिंह, महाराणा मोकल का दूसरा पुत्र, मेवाड़ का महाराणा बनना चाहता था; कुम्भा के गद्दी पर बैठने पर उसे छोटी जागीर मिली। मौक़ा पाकर उसने सादड़ी पर अधिकार किया, पर कुम्भा ने सादड़ी लौटा ली, तब वह महमूद ख़िलजी (मालवा) की शरण में पहुँचा।
- सादड़ी हाथ न आई, तो क्षेमसिंह की सन्तानों को मालवा के सुल्तान की मेहरबानी से मालवा का एक टुकड़ा मिल गया — वही क्षेत्र प्रतापगढ़ कहलाया।
- प्राचीन नाम देवलिया — स्थानीय आदिवासी सरदार की विधवा के नाम से; बाद में प्रतापगढ़।
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| सूरजमल | 1473–1530 | क्षेमसिंह का पुत्र; मालवा के दस्तों के साथ मेवाड़ से भिड़ने आया; देवलिया राजधानी |
| बाघसिंह | 1530–1535 | चित्तौड़ के दूसरे साके में बहादुरशाह के विरुद्ध लड़ते वीरगति |
| तेजसिंह | 1563–1593 | अकबर की अधीनता स्वीकारी, पर कभी दरबार न गया; हमेशा महाराणा प्रताप का पक्षधर; उत्तराधिकारी भानुसिंह (1593–1597) |
| सिहा | 1597–1628 | जहाँगीर के विरुद्ध बग़ावत करने वाले महावत ख़ाँ को शरण दी |
7. शाहपुरा के गुहिल
- 14 अक्टूबर 1631 को सुजानसिंह ने शाहपुरा को स्वतन्त्र रियासत के रूप में बसाया; मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के नाम पर शाहपुरा नाम रखा गया।
- महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय ने 1717 में शाहपुरा को 23 गाँव दिए।
- 1724 में जहाजपुर परगना शासक भरतसिंह को इस शर्त पर मिला कि वे बाक़ी सामन्तों की भाँति महाराणा के दरबार में हाज़िरी देंगे।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 14 अक्टूबर 1631 | शाहपुरा की स्थापना | सुजानसिंह |
| 1717 | 23 गाँव मिले | संग्रामसिंह द्वितीय से |
| 1724 | जहाजपुर परगना | भरतसिंह |
8. साकों की तालिका
| साका | वर्ष | आक्रमणकारी | स्थानीय शासक | केसरिया | जौहर | विशेष |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 1. रणथम्भौर | 1301 | अलाउद्दीन ख़िलजी | हम्मीर देव चौहान | हम्मीर व अन्य राजपूत योद्धा | रानी रंगदेवी | राजस्थान का प्रथम साका |
| 2. चित्तौड़ (प्रथम) | 1303 | अलाउद्दीन ख़िलजी | रावल रतनसिंह | गोरा, बादल व अन्य | रानी पद्मिनी | वर्णन तारीख़-ए-अलाई में |
| 3. चित्तौड़ (द्वितीय) | 1535 | गुजरात का बहादुरशाह | विक्रमादित्य | बाघसिंह रावत व अन्य | कर्मावती, जवाहरबाई व अन्य | — |
| 4. चित्तौड़ (तृतीय) | 1568 | अकबर | उदयसिंह | जयमल राठौड़ व फतेहसिंह | फूलकंवर व अन्य | — |
9. साकों का गणित
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1301 | रणथम्भौर | हम्मीर; रानी रंगदेवी |
| 1303 | चित्तौड़ (प्रथम) | रतनसिंह; पद्मिनी |
| 1310 | सिवाणा (प्रथम) | शीतलदेव |
| 1311 | जालौर; जैसलमेर (प्रथम) | कान्हड़देव; मूलराज |
रिवीजन पॉइंटर्स
- शेखावाटी का नाम राव शेखा पर पड़ा; 1469 में उन्होंने अमरसर को राजधानी बनाया और 1488 में उनकी मृत्यु हुई।
- पंचपाणे के पाँच ठिकाने: बिसाऊ, डूँडलोद, मण्डावा, मलसीसर, नवलगढ़ — ट्रिक «बि-डूँ-मण्-मल-नव»।
- किशनसिंह ने 1609 में राठौड़ों की तीसरी रियासत किशनगढ़ बसाई; जहाँगीर ने उन्हें महाराजा की उपाधि दी।
- सावंतसिंह «नागरीदास» नाम से रचना करते थे और कृष्णभक्त होकर वृन्दावन चले गए; चारुमति ने औरंगज़ेब की जगह महाराणा राजसिंह से विवाह किया।
- डूँगरपुर में 1178 में सामन्तसिंह ने गुहिल वंश की स्थापना की, राजधानी बड़ौदा; बाद में डूँगरसिंह राजधानी डूँगरपुर ले आया।
- बाँसवाड़ा का पहला शासक जगमाल (1527) था; माही के पूर्व में बाँसवाड़ा और पश्चिम में डूँगरपुर।
- प्रतापगढ़ (देवलिया) में सूरजमल ने 1473–1530 तक राज किया; बाघसिंह चित्तौड़ के दूसरे साके में लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए।
- शाहपुरा को सुजानसिंह ने 14 अक्टूबर 1631 को बसाया और शाहजहाँ के नाम पर उसका नाम रखा।
- राजस्थान का प्रथम साका रणथम्भौर का (1301, हम्मीर देव और रानी रंगदेवी); चित्तौड़ के तीन साके 1303, 1535 और 1568 में हुए।
अगले भाग में मध्यकालीन प्रशासन और सामंती व्यवस्था — राजधानी का शासन-तंत्र, रियासत से गाँव तक की इकाइयाँ, और ज़मीन, किसान व लगान की व्यवस्था।
पिछला भाग: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: पाँच अन्य रियासतें (भाग 1)
अगला भाग: मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था: केन्द्रीय प्रशासन एवं भूमि व भू-राजस्व
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