राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: मेवाड़ की गुहिल शाखाएँ – Rajasthan History Chapter 32

शेखावाटी, किशनगढ़ और मेवाड़ की गुहिल शाखाओं की रियासतें, साथ में साकों की तालिका और उनका क्रम।

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In this chapter (10 sections)
  1. शेखावाटी के कछवाहे
  2. किशनगढ़ का राठौड़ वंश
  3. मेवाड़ की गुहिल शाखाएँ
  4. डूँगरपुर का गुहिल वंश
  5. बाँसवाड़ा का गुहिल वंश
  6. प्रतापगढ़ (देवलिया) का गुहिल वंश
  7. शाहपुरा के गुहिल
  8. साकों की तालिका
  9. साकों का गणित
  10. रिवीजन पॉइंटर्स

गुहिल वंश की शाखाओं को याद रखने की कुंजी यह है कि हर रियासत कहाँ से निकली और उसे शुरू किसने किया। इस भाग में शेखावाटी के कछवाहे और किशनगढ़ के राठौड़ पहले आते हैं, फिर डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा के गुहिल। अन्त में रणथम्भौर से चित्तौड़ तक के साकों की तालिका और उनका क्रम दिया गया है, जो प्रायः अलग से रटने वाला हिस्सा होता है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश, 10 चॉक-बोर्ड चित्र, 11 चार्ट, 42 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. शेखावाटी के कछवाहे

  • शेखावाटी का नाम राव शेखा पर पड़ा — आमेर के कछवाहा सरदार मोकलजी के पुत्र।
  • जयपुर राज्य ने शेखा को बरवाड़ा और नान के आसपास के 24 गाँव की जागीर दी; महाराव शेखा ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर अलग रियासत बनाई। 1469 ई. में अमरसर (जयपुर) राजधानी बनाई।
  • 1488 ई. में रलावता गाँव (सीकर) में शेखा की मृत्यु हुई; उनके वंशज शेखावत।

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

पंचपाणे के पाँच ठिकानेआज का ज़िला
बिसाऊझुंझुनूं
डूँडलोदझुंझुनूं
मण्डावाझुंझुनूं

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: पंचपाणे की ट्रिक: बि-डूँ-मण्-मल-नव — बिसाऊ, डूँडलोद, मण्डावा, मलसीसर, नवलगढ़।

शेखावाटी का उदय

  1. मोकल (आमेर)
  2. शेखा — 24 गाँव
  3. स्वतन्त्र घोषणा; अमरसर 1469

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

2. किशनगढ़ का राठौड़ वंश

किशनसिंह ने, जो मारवाड़ के मोटा राजा उदयसिंह के बेटे थे, 1609 में राठौड़ों की तीसरी रियासत — किशनगढ़ — की स्थापना की। मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने उन्हें महाराजा की उपाधि दी।

शासकमुख्य बातें
किशनसिंह1612 में किशनगढ़ नगर बसाकर राजधानी बनाया; इनकी हत्या गजसिंह ने की, जो जोधपुर महाराजा सूरसिंह का पुत्र था
रूपसिंहरूपनगढ़ क़िला बनवाया; सामूगढ़ (1658) में औरंगज़ेब के विरुद्ध लड़ते वीरगति
मानसिंहबहन चारुमति का विवाह औरंगज़ेब से तय था, पर मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने उससे विवाह कर लिया
सावंतसिंहस्वयं कवि; विद्वानों-कवियों के आश्रयदाता; “नागरीदास” नाम से रचना, संग्रह नागर समुच्चय; कृष्णभक्त — राज-पाट छोड़ वृन्दावन गए, वहीं निधन; इनके समय राज्य के दो हिस्से — किशनगढ़ क्षेत्र बहादुरसिंह को, रूपनगढ़ क्षेत्र सरदारसिंह को

गद्दी का क्रम (मुख्य)

  1. किशनसिंह 1609
  2. रूपसिंह
  3. मानसिंह
  4. सावंतसिंह

रोचक तथ्य: किशनगढ़ की दो राजकुमारियाँ अलग-अलग कथाओं में आती हैं — चारुमति (मानसिंह की बहन; औरंगज़ेब की जगह महाराणा राजसिंह से विवाह) और रूपकंवर (जैसलमेर के मूलराज द्वितीय से 1772 में विवाह)।

3. मेवाड़ की गुहिल शाखाएँ

रियासतशुरुआतसंस्थापकअन्तिम शासक
डूँगरपुर1178सामन्तसिंहलक्ष्मणसिंह (1918–1948)
बाँसवाड़ा1527जगमालचन्द्रवीरसिंह (1944–1948)
प्रतापगढ़15वीं सदी / 1473क्षेमसिंह; सूरजमलरामसिंह (1929–1948)

4. डूँगरपुर का गुहिल वंश

मेवाड़ के गुहिल शासक क्षेमसिंह के पुत्र सामन्तसिंह 12वीं सदी में वागड़ आए और छोटा राज्य जमाया — राजधानी बड़ौदा (वटप्रदक)। शासकों ने रावल व महारावल की उपाधियाँ लीं।

शासककालमुख्य बातें
सामन्तसिंह—1177 में नाडौल के चौहान कीर्तिपाल ने मेवाड़ पर आक्रमण करके चित्तौड़ लिया; मेवाड़ छूटने पर सामन्तसिंह ने वागड़ के शासक चौरसीमल को हराया — 1178 में वागड़ में गुहिल वंश की स्थापना, राजधानी बड़ौदा; कुछ समय बाद गुजरात के भीमदेव द्वितीय ने उन्हें निकालकर बड़ौदा के गुहिल विजयपाल को दे दिया; सामन्तसिंह की वीरगति तराईन में हुई, जहाँ वे पृथ्वीराज तृतीय के साथी थे
जयत सिंह~1221सामन्तसिंह के वंशज; 1221 के आसपास वागड़ पर पुनः अधिकार
वीरसिंह1286–1303डूँगरिया भील को हराया; राज्य का विस्तार
डूँगरसिंह—राजधानी बड़ौदा से डूँगरपुर लाया
काल / क्रमघटनाविवरण
1177कीर्तिपाल (नाडौल) का मेवाड़ पर हमला
1178सामन्तसिंह — वागड़ में गुहिल वंशराजधानी बड़ौदा
1527खानवा; वागड़ का बँटवाराडूँगरपुर / बाँसवाड़ा
1573बीलपण का युद्धआसकरण

ट्रिक: आसकरण के समय की तीन तिथियाँ: 1573 (बीलपण), 1577 (अधीनता), 1578 (प्रताप का हमला)।

5. बाँसवाड़ा का गुहिल वंश

  • बाँसवाड़ा बंसिया / बिशना भील ने बसाया था; बाद में 16वीं सदी में जगमाल (डूँगरपुर) ने इसे भीलों से जीत लिया।
  • उदयसिंह (1497–1527) ने राज्य को पूर्व-पश्चिम बाँटा; माही नदी के पूर्व का भाग बाँसवाड़ा, उसका पहला शासक छोटा पुत्र जगमाल (1527)।
  • जगमाल के बाद जयसिंह और प्रतापसिंह; प्रतापसिंह ने 1576 में अकबर की अधीनता स्वीकार की।
शासककालमुख्य बातें
समरसिंह1615–16601615 की मुग़ल–मेवाड़ संधि में बाँसवाड़ा मेवाड़ के अन्तर्गत माना गया; 1617 में माण्डू में जहाँगीर से मिले और बाँसवाड़ा को मेवाड़ से स्वतन्त्र करा लिया
कुशलसिंह1660–1688मुग़ल–मेवाड़ संघर्ष (1679–81) में नया फ़रमान लेकर फिर मेवाड़ से अलग
विशनसिंह1712–1737मेवाड़ का दबाव बढ़ता रहा; 1728 में मराठों को ख़िराज देना स्वीकार
उम्मेदसिंह1816–1819मराठों, पिण्डारियों व भीलों से बचने को ए.जी.जी. के प्रतिनिधि जेम्स कॉल्डफ़ील्ड से दिसम्बर 1818 में संधि

याद रखें: डूँगरपुर–बाँसवाड़ा का बँटवारा: 1527 (उदयसिंह की खानवा में मृत्यु का वर्ष) — माही के पूर्व बाँसवाड़ा, पश्चिम डूँगरपुर।

6. प्रतापगढ़ (देवलिया) का गुहिल वंश

  • क्षेमसिंह, महाराणा मोकल का दूसरा पुत्र, मेवाड़ का महाराणा बनना चाहता था; कुम्भा के गद्दी पर बैठने पर उसे छोटी जागीर मिली। मौक़ा पाकर उसने सादड़ी पर अधिकार किया, पर कुम्भा ने सादड़ी लौटा ली, तब वह महमूद ख़िलजी (मालवा) की शरण में पहुँचा।
  • सादड़ी हाथ न आई, तो क्षेमसिंह की सन्तानों को मालवा के सुल्तान की मेहरबानी से मालवा का एक टुकड़ा मिल गया — वही क्षेत्र प्रतापगढ़ कहलाया।
  • प्राचीन नाम देवलिया — स्थानीय आदिवासी सरदार की विधवा के नाम से; बाद में प्रतापगढ़।
शासककालमुख्य बातें
सूरजमल1473–1530क्षेमसिंह का पुत्र; मालवा के दस्तों के साथ मेवाड़ से भिड़ने आया; देवलिया राजधानी
बाघसिंह1530–1535चित्तौड़ के दूसरे साके में बहादुरशाह के विरुद्ध लड़ते वीरगति
तेजसिंह1563–1593अकबर की अधीनता स्वीकारी, पर कभी दरबार न गया; हमेशा महाराणा प्रताप का पक्षधर; उत्तराधिकारी भानुसिंह (1593–1597)
सिहा1597–1628जहाँगीर के विरुद्ध बग़ावत करने वाले महावत ख़ाँ को शरण दी

7. शाहपुरा के गुहिल

  • 14 अक्टूबर 1631 को सुजानसिंह ने शाहपुरा को स्वतन्त्र रियासत के रूप में बसाया; मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के नाम पर शाहपुरा नाम रखा गया।
  • महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय ने 1717 में शाहपुरा को 23 गाँव दिए।
  • 1724 में जहाजपुर परगना शासक भरतसिंह को इस शर्त पर मिला कि वे बाक़ी सामन्तों की भाँति महाराणा के दरबार में हाज़िरी देंगे।
काल / क्रमघटनाविवरण
14 अक्टूबर 1631शाहपुरा की स्थापनासुजानसिंह
171723 गाँव मिलेसंग्रामसिंह द्वितीय से
1724जहाजपुर परगनाभरतसिंह

8. साकों की तालिका

साकावर्षआक्रमणकारीस्थानीय शासककेसरियाजौहरविशेष
1. रणथम्भौर1301अलाउद्दीन ख़िलजीहम्मीर देव चौहानहम्मीर व अन्य राजपूत योद्धारानी रंगदेवीराजस्थान का प्रथम साका
2. चित्तौड़ (प्रथम)1303अलाउद्दीन ख़िलजीरावल रतनसिंहगोरा, बादल व अन्यरानी पद्मिनीवर्णन तारीख़-ए-अलाई में
3. चित्तौड़ (द्वितीय)1535गुजरात का बहादुरशाहविक्रमादित्यबाघसिंह रावत व अन्यकर्मावती, जवाहरबाई व अन्य—
4. चित्तौड़ (तृतीय)1568अकबरउदयसिंहजयमल राठौड़ व फतेहसिंहफूलकंवर व अन्य—

9. साकों का गणित

काल / क्रमघटनाविवरण
1301रणथम्भौरहम्मीर; रानी रंगदेवी
1303चित्तौड़ (प्रथम)रतनसिंह; पद्मिनी
1310सिवाणा (प्रथम)शीतलदेव
1311जालौर; जैसलमेर (प्रथम)कान्हड़देव; मूलराज

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. शेखावाटी का नाम राव शेखा पर पड़ा; 1469 में उन्होंने अमरसर को राजधानी बनाया और 1488 में उनकी मृत्यु हुई।
  2. पंचपाणे के पाँच ठिकाने: बिसाऊ, डूँडलोद, मण्डावा, मलसीसर, नवलगढ़ — ट्रिक «बि-डूँ-मण्-मल-नव»।
  3. किशनसिंह ने 1609 में राठौड़ों की तीसरी रियासत किशनगढ़ बसाई; जहाँगीर ने उन्हें महाराजा की उपाधि दी।
  4. सावंतसिंह «नागरीदास» नाम से रचना करते थे और कृष्णभक्त होकर वृन्दावन चले गए; चारुमति ने औरंगज़ेब की जगह महाराणा राजसिंह से विवाह किया।
  5. डूँगरपुर में 1178 में सामन्तसिंह ने गुहिल वंश की स्थापना की, राजधानी बड़ौदा; बाद में डूँगरसिंह राजधानी डूँगरपुर ले आया।
  6. बाँसवाड़ा का पहला शासक जगमाल (1527) था; माही के पूर्व में बाँसवाड़ा और पश्चिम में डूँगरपुर।
  7. प्रतापगढ़ (देवलिया) में सूरजमल ने 1473–1530 तक राज किया; बाघसिंह चित्तौड़ के दूसरे साके में लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए।
  8. शाहपुरा को सुजानसिंह ने 14 अक्टूबर 1631 को बसाया और शाहजहाँ के नाम पर उसका नाम रखा।
  9. राजस्थान का प्रथम साका रणथम्भौर का (1301, हम्मीर देव और रानी रंगदेवी); चित्तौड़ के तीन साके 1303, 1535 और 1568 में हुए।

अगले भाग में मध्यकालीन प्रशासन और सामंती व्यवस्था — राजधानी का शासन-तंत्र, रियासत से गाँव तक की इकाइयाँ, और ज़मीन, किसान व लगान की व्यवस्था।

पिछला भाग: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: पाँच अन्य रियासतें (भाग 1)

अगला भाग: मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था: केन्द्रीय प्रशासन एवं भूमि व भू-राजस्व

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