मेवाड़ के इतिहास में उदयसिंह का समय वह मोड़ है जहाँ एक तरफ़ चित्तौड़ का तीसरा साका दिखता है और दूसरी तरफ़ प्रताप की तैयारी शुरू होती है। इसलिए दोनों को जोड़कर पढ़ना सबसे आसान रहता है। इस भाग में उदयसिंह का शासन-काल, अकबर के हमले के साथ तीसरा साका, प्रताप का जन्म से लेकर अकबर के दूतों तक का सफ़र और हल्दीघाटी की तैयारी व सेनाएँ क्रमवार दी गई हैं।
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1. उदयसिंह व प्रताप
- प्रताप का जन्म ➜ 9 मई 1540, कुम्भलगढ़
- राज्याभिषेक ➜ 28 फ़रवरी 1572, गोगुन्दा
- हल्दीघाटी ➜ 18 जून 1576
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2. महाराणा उदयसिंह (1537–72)
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1537 | राज्याभिषेक | कुम्भलगढ़ दरबार में 15 वर्ष की उम्र में; सरदारों — कोठारिया के रावत ख़ान, केलवा के जग्गा, बागौर के रावत सांगा — ने स्वामी माना। |
| 1540 | मावली का युद्ध | उदयसिंह ने बनवीर की सेना (नेतृत्व कुँवरसी तँवर, जो मारा गया) को मावली (उदयपुर) में हराकर चित्तौड़ लिया; मारवाड़ के राव मालदेव ने मदद की। |
| 1544 | शेरशाह सूरी | हमले की नौबत आने से पहले ही जहाजपुर में शेरशाह को चित्तौड़ की चाबियाँ दे दीं और अधीनता क़बूल की। |
| 1545 | कालींजर | शेरशाह के मरते ही उदयसिंह ने उसके प्रतिनिधि (ख़्वास ख़ाँ) को बाहर कर दिया। |
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- जैवन्ता बाई उदयसिंह की रानी बनीं — उनके पिता पाली के अखैराज सोनगरा थे।
- शेरशाह के सामने झुकने से उदयसिंह मेवाड़ का पहला शासक बना जिसने अफ़ग़ान अधीनता स्वीकार की।
- हरमाड़ा की वजह — समझौते के अनुसार हाजी ख़ाँ को अपनी पातर रंगराय उदयसिंह को देनी थी, पर उसने नहीं दी; उदयसिंह ने हमला किया पर हारा।
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| रानी | पुत्र / बात |
|---|---|
| जयवन्ता बाई (अखैराज सोनगरा की पुत्री) | पुत्र प्रताप |
| धीरबाई (रानी भटियाणी) — जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री | अति सुन्दर, प्रिय रानी; 5 पुत्र — जगमाल, सागर, आगर, पच्चन, सिम्हा; इनके कहने पर उदयसिंह ने जगमाल को उत्तराधिकारी बनाया |
| सज्जाबाई सोलंकिनी | पुत्र शक्तिसिंह व वीरमदेव — शक्तिसिंह के वंशज शक्तावत |
ट्रिक: उदयसिंह के सालों की लड़ी — 1537 गद्दी · 1540 मावली · 1544 शेरशाह · 1557 हरमाड़ा · 1559 उदयपुर · 1566 जैताणा · 1568 साका · 1572 मृत्यु।
3. अकबर का हमला: तीसरा साका
- 1562 ➜ अकबर ने मिर्ज़ा शर्फ़ुद्दीन को मेड़ता लेने भेजा; मिर्ज़ा ने घेरा डाला और सुरंग खुदवाई; समझौते के बाद जयमल ने किला खाली किया और चित्तौड़ आकर उदयसिंह का आश्रय लिया। उसी साल हारा हुआ मालवा का बाज बहादुर भी उदयसिंह की शरण में आया।
- 1567 ➜ अकबर ने संदेश भेजा कि जयमल और बाज बहादुर को सौंपकर अधीनता मानो; उदयसिंह ने फ़रमान ठुकराया।
- अकबर मांडलगढ़ होते हुए चित्तौड़ पहुँचा और घेरा डाला। दुर्ग की रक्षा का दायित्व उदयसिंह ने जयमल पर डाला और स्वयं राव नैतसी समेत कुछ सरदारों को लेकर गोगुन्दा की पहाड़ियों में जा बसे।
- क़रीब 5 माह बाद मुग़लों ने दो सुरंगें खोदकर बारूद से प्राचीर का हिस्सा उड़ा दिया। रात में जयमल की अगुवाई में राजपूत दीवार की मरम्मत कर रहे थे, तभी अकबर ने “संग्राम” नामक बन्दूक़ से गोली चलाई जो जयमल के पैर में लगी।
- अगली सुबह फाटक खुले और लड़ते हुए जयमल राठौड़, पत्ता (फत्ता) सिसोदिया तथा कल्ला राठौड़ वीरगति पा गए।
| वीर | परिचय |
|---|---|
| जयमल राठौड़ | मेड़ता के; अकबर से हारकर उदयसिंह की शरण में आए; उदयसिंह ने बदनौर की जागीर दी; तीसरे साके में दुर्ग-रक्षा का भार इन्हीं पर |
| पत्ता (फत्ता) सिसोदिया | मूलतः आमेट (राजसमंद) के; युद्ध में पागल हाथी ने सूँड से उठाकर पटक दिया, जिससे मृत्यु |
| कल्ला राठौड़ | जयमल के भतीजे; घेरे के बाद मुग़लों से लड़ते किले में घुसे (इन्हें घुसाने में सेनापति रणधीर सिंह वीरगति पाए); साके में घायल ताऊ जयमल को कंधे पर बैठाकर लड़े |
| साका | हमलावर | शासक | केसरिया | जौहर |
|---|---|---|---|---|
| पहला — 1303 | अलाउद्दीन ख़िलजी | रावल रतनसिंह | गोरा-बादल | पद्मिनी (1600 स्त्रियाँ) |
| दूसरा — 1535 | बहादुरशाह (गुजरात) | विक्रमादित्य | रावत बाघसिंह, सज्जासिंह | कर्मावती (13,000) |
| तीसरा — 1568 | अकबर | उदयसिंह | जयमल, पत्ता, कल्ला | फूलकँवर (7000) |
ट्रिक: तीनों साकों में रानियाँ — प-क-फू = पद्मिनी (1303), कर्मावती (1535), फूलकँवर (1568); दो साकों में क़त्ले-आम (1303 और 1568, दोनों में 30,000)।
4. प्रताप: जन्म से अकबर के दूत
- पिता ➜ उदयसिंह
- माता ➜ जयवन्ता बाई
- नाना ➜ अखैराज सोनगरा (पाली)
- जन्म ➜ 9 मई 1540, कुम्भलगढ़ दुर्ग के कटारगढ़ से सटी जूनी कचहरी में; तिथि — विक्रम सम्वत् 1597 की ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, रविवार। बचपन का नाम कीका (भील बच्चों के प्यार का नाम)।
- नाना अखैराज सोनगरा राव मालदेव की तरफ़ से गिरि-सुमेल की लड़ाई में खेत रहे थे।
- पत्नी अजबदे पँवार — बिजोलिया के सामन्त रामरख पँवार की पुत्री; विवाह 1557 में; प्रिय रानी। इन्हीं से पुत्र अमरसिंह — जन्म 16 मार्च 1559, मचीन्द (राजसमंद)।
राज्याभिषेक की कशमकश
- उदयसिंह के निधन के दिन ही रानी की ज़िद और कुछ सरदारों की हामी से जगमाल का राजतिलक कर डाला गया।
- प्रताप के मामा मानसिंह सोनगरा और ग्वालियर के रामशाह तँवर ने विरोध किया।
- सलूम्बर के रावत कृष्णदास और देवगढ़ के रावत सांगा ने बड़े सामन्तों की रज़ामंदी लेकर जगमाल को गद्दी से उतारा और 28 फ़रवरी 1572 को गोगुन्दा में प्रताप का राज्याभिषेक किया — तब उम्र 32 वर्ष। कृष्णदास ने ही प्रताप की कमर में तलवार बाँधी।
- त्योहार के दिन उदयसिंह के निधन से त्योहार का शोक-निवारण करने की परिपाटी के अनुसार प्रताप ने “अहेड़ा की शिकार” की।
अकबर से सम्बन्ध
- 1570 के अकबर के नागौर दरबार में मेवाड़ को छोड़कर अधिकांश राजपूतों ने अधीनता स्वीकार कर ली।
- प्रताप ने झुकने के बजाय मेवाड़ की आज़ादी बचाए रखने का निश्चय किया; सबसे पहले सामन्तों और भीलों को संगठित किया।
- भीलों को सेना में पहली बार ऊँचे ओहदे देकर प्रताप ने उनका मान बढ़ाया; कुम्भा की ही भाँति उन्होंने भीलों की लड़ाकू ताक़त पहचानी। राज चिह्न में भील और प्रताप, दोनों की आकृतियाँ एकलिंग जी की मूर्ति के दोनों ओर इसी का सबूत हैं।
| क्रम | शिष्टमंडल | समय |
|---|---|---|
| 1 | जलाल ख़ाँ कोरची (दरबारी) | नवम्बर 1572 |
| 2 | मानसिंह कच्छवाहा | जून 1573 |
| 3 | भगवन्तदास | सितम्बर 1573 |
चारों दूत प्रताप को राज़ी न कर सके। मानसिंह का मिशन (टॉड व नैणसी के अनुसार) — जून 1573 में गुजरात से लौटते हुए वह उदयपुर आया; प्रताप ने उसे उदयसागर झील पर ठहराया और भोज रखा, पर भोजन के समय खुद न आकर पुत्र कुँवर अमरसिंह को भेजा। मानसिंह ने इसे अपमान समझा और बिना भोजन किए लौट गया।
5. हल्दीघाटी: तैयारी व सेनाएँ
- सारे प्रयास विफल होने पर अकबर स्वयं 18 मार्च 1576 को अजमेर पहुँचा। हल्दीघाटी की योजना अजमेर के मैगज़ीन दुर्ग में बनी और आक्रमण की ज़िम्मेदारी मानसिंह को सौंपी गई।
- अप्रैल 1576 में मानसिंह शाही फ़ौज के साथ अजमेर से रवाना हुआ, मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) पहुँचा और 2 माह वहीं डेरा डाला; फिर मोही होते हुए खमनौर के पास मोलेला गाँव (राजसमंद) में पड़ाव डाला।
| नाम देने वाला | युद्ध का नाम |
|---|---|
| अब्दुल क़ादिर बदायूँनी (मुन्तख़ब-उत-तवारीख़ में आँखों देखा हाल) | गोगुन्दा का युद्ध |
| अबुल फ़ज़ल (अकबरनामा) | खमनोर का युद्ध |
| कर्नल टॉड | मेवाड़ की थर्मोपली |
- लड़ाई की तिथि 18 जून 1576; इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 21 जून।
- प्रताप कुम्भलगढ़ से गोगुन्दा की ओर आए और गोगुन्दा-खमनौर की पहाड़ियों के बीच लोहसिंग (उदयपुर) में पड़ाव डाला।
| पक्ष | सेनापति / टुकड़ी |
|---|---|
| मुग़ल — प्रधान सेनापति | मानसिंह (केन्द्र में) |
| मुग़ल — सहयोगी | आसफ़ ख़ाँ, ग़ाज़ी ख़ाँ, महतर ख़ाँ, ख़्वाजा ग़यासुद्दीन अली, सैयद अहमद ख़ाँ, सैयद हाशिम ख़ाँ, सैयद राजू, जगन्नाथ कच्छवाहा, माधोसिंह |
| मुग़ल — आगे का दस्ता | 80 चुने सैनिक — हाशिम बारहा; उनके पीछे हरावल — जगन्नाथ कच्छवाहा |
| मुग़ल — बायाँ भाग | ग़ाज़ी ख़ाँ व लूणकरण कच्छवाहा |
संख्या पर मतभेद — बदायूँनी मानसिंह की सेना 5,000 और प्रताप की 3,000 बताता है; वीर विनोद में मुग़ल सेना 80,000।
6. रैपिड फायर तथ्य
- प्रताप का जन्म ➜ 9 मई 1540, कुम्भलगढ़
- प्रताप का राज्याभिषेक ➜ 28 फ़रवरी 1572, गोगुन्दा (तब उम्र 32 वर्ष)
- मावली का युद्ध ➜ 1540, उदयसिंह ने बनवीर को हराकर चित्तौड़ पाया
- शेरशाह के आगे झुकने वाला ➜ उदयसिंह, अफ़ग़ान अधीनता मानने वाला मेवाड़ का पहला शासक
- तीसरा साका ➜ 1568, अकबर बनाम उदयसिंह; केसरिया जयमल, पत्ता और कल्ला ने किया
- तीनों साके ➜ 1303 (पद्मिनी), 1535 (कर्मावती), 1568 (फूलकँवर)
- हल्दीघाटी की तिथि ➜ 18 जून 1576 (गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 21 जून)
- हल्दीघाटी के नाम ➜ बदायूँनी: गोगुन्दा, अबुल फ़ज़ल: खमनोर, टॉड: मेवाड़ की थर्मोपली
अगले भाग में हल्दीघाटी का पूरा युद्ध-क्रम, उसके बाद का संघर्ष, भामाशाह की मदद, दिवेर की जीत और चावण्ड की राजधानी।
पिछला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: महाराणा कुम्भा (1433–68) (भाग 2) एवं राणा सांगा व खानवा
अगला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: उदयसिंह व प्रताप (भाग 2) एवं अमरसिंह से भूपालसिंह (भाग 1)
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