मेवाड़ का गुहिल राजवंश: उदयसिंह व प्रताप (भाग 1) – Rajasthan History Chapter 17

उदयसिंह का शासन, चित्तौड़ का तीसरा साका, प्रताप का राज्याभिषेक और हल्दीघाटी की तैयारी।

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In this chapter (6 sections)
  1. उदयसिंह व प्रताप
  2. महाराणा उदयसिंह (1537–72)
  3. अकबर का हमला: तीसरा साका
  4. प्रताप: जन्म से अकबर के दूत
  5. हल्दीघाटी: तैयारी व सेनाएँ
  6. रैपिड फायर तथ्य

मेवाड़ के इतिहास में उदयसिंह का समय वह मोड़ है जहाँ एक तरफ़ चित्तौड़ का तीसरा साका दिखता है और दूसरी तरफ़ प्रताप की तैयारी शुरू होती है। इसलिए दोनों को जोड़कर पढ़ना सबसे आसान रहता है। इस भाग में उदयसिंह का शासन-काल, अकबर के हमले के साथ तीसरा साका, प्रताप का जन्म से लेकर अकबर के दूतों तक का सफ़र और हल्दीघाटी की तैयारी व सेनाएँ क्रमवार दी गई हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — मेवाड़ का गुहिल राजवंश, 14 चॉक-बोर्ड चित्र, 5 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. उदयसिंह व प्रताप

  • प्रताप का जन्म ➜ 9 मई 1540, कुम्भलगढ़
  • राज्याभिषेक ➜ 28 फ़रवरी 1572, गोगुन्दा
  • हल्दीघाटी ➜ 18 जून 1576

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

2. महाराणा उदयसिंह (1537–72)

काल / क्रमघटनाविवरण
1537राज्याभिषेककुम्भलगढ़ दरबार में 15 वर्ष की उम्र में; सरदारों — कोठारिया के रावत ख़ान, केलवा के जग्गा, बागौर के रावत सांगा — ने स्वामी माना।
1540मावली का युद्धउदयसिंह ने बनवीर की सेना (नेतृत्व कुँवरसी तँवर, जो मारा गया) को मावली (उदयपुर) में हराकर चित्तौड़ लिया; मारवाड़ के राव मालदेव ने मदद की।
1544शेरशाह सूरीहमले की नौबत आने से पहले ही जहाजपुर में शेरशाह को चित्तौड़ की चाबियाँ दे दीं और अधीनता क़बूल की।
1545कालींजरशेरशाह के मरते ही उदयसिंह ने उसके प्रतिनिधि (ख़्वास ख़ाँ) को बाहर कर दिया।

… शेष 5 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • जैवन्ता बाई उदयसिंह की रानी बनीं — उनके पिता पाली के अखैराज सोनगरा थे।
  • शेरशाह के सामने झुकने से उदयसिंह मेवाड़ का पहला शासक बना जिसने अफ़ग़ान अधीनता स्वीकार की।
  • हरमाड़ा की वजह — समझौते के अनुसार हाजी ख़ाँ को अपनी पातर रंगराय उदयसिंह को देनी थी, पर उसने नहीं दी; उदयसिंह ने हमला किया पर हारा।

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

रानीपुत्र / बात
जयवन्ता बाई (अखैराज सोनगरा की पुत्री)पुत्र प्रताप
धीरबाई (रानी भटियाणी) — जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्रीअति सुन्दर, प्रिय रानी; 5 पुत्र — जगमाल, सागर, आगर, पच्चन, सिम्हा; इनके कहने पर उदयसिंह ने जगमाल को उत्तराधिकारी बनाया
सज्जाबाई सोलंकिनीपुत्र शक्तिसिंह व वीरमदेव — शक्तिसिंह के वंशज शक्तावत

ट्रिक: उदयसिंह के सालों की लड़ी — 1537 गद्दी · 1540 मावली · 1544 शेरशाह · 1557 हरमाड़ा · 1559 उदयपुर · 1566 जैताणा · 1568 साका · 1572 मृत्यु।

3. अकबर का हमला: तीसरा साका

  • 1562 ➜ अकबर ने मिर्ज़ा शर्फ़ुद्दीन को मेड़ता लेने भेजा; मिर्ज़ा ने घेरा डाला और सुरंग खुदवाई; समझौते के बाद जयमल ने किला खाली किया और चित्तौड़ आकर उदयसिंह का आश्रय लिया। उसी साल हारा हुआ मालवा का बाज बहादुर भी उदयसिंह की शरण में आया।
  • 1567 ➜ अकबर ने संदेश भेजा कि जयमल और बाज बहादुर को सौंपकर अधीनता मानो; उदयसिंह ने फ़रमान ठुकराया।
  • अकबर मांडलगढ़ होते हुए चित्तौड़ पहुँचा और घेरा डाला। दुर्ग की रक्षा का दायित्व उदयसिंह ने जयमल पर डाला और स्वयं राव नैतसी समेत कुछ सरदारों को लेकर गोगुन्दा की पहाड़ियों में जा बसे।
  • क़रीब 5 माह बाद मुग़लों ने दो सुरंगें खोदकर बारूद से प्राचीर का हिस्सा उड़ा दिया। रात में जयमल की अगुवाई में राजपूत दीवार की मरम्मत कर रहे थे, तभी अकबर ने “संग्राम” नामक बन्दूक़ से गोली चलाई जो जयमल के पैर में लगी।
  • अगली सुबह फाटक खुले और लड़ते हुए जयमल राठौड़, पत्ता (फत्ता) सिसोदिया तथा कल्ला राठौड़ वीरगति पा गए।
वीरपरिचय
जयमल राठौड़मेड़ता के; अकबर से हारकर उदयसिंह की शरण में आए; उदयसिंह ने बदनौर की जागीर दी; तीसरे साके में दुर्ग-रक्षा का भार इन्हीं पर
पत्ता (फत्ता) सिसोदियामूलतः आमेट (राजसमंद) के; युद्ध में पागल हाथी ने सूँड से उठाकर पटक दिया, जिससे मृत्यु
कल्ला राठौड़जयमल के भतीजे; घेरे के बाद मुग़लों से लड़ते किले में घुसे (इन्हें घुसाने में सेनापति रणधीर सिंह वीरगति पाए); साके में घायल ताऊ जयमल को कंधे पर बैठाकर लड़े
साकाहमलावरशासककेसरियाजौहर
पहला — 1303अलाउद्दीन ख़िलजीरावल रतनसिंहगोरा-बादलपद्मिनी (1600 स्त्रियाँ)
दूसरा — 1535बहादुरशाह (गुजरात)विक्रमादित्यरावत बाघसिंह, सज्जासिंहकर्मावती (13,000)
तीसरा — 1568अकबरउदयसिंहजयमल, पत्ता, कल्लाफूलकँवर (7000)

ट्रिक: तीनों साकों में रानियाँ — प-क-फू = पद्मिनी (1303), कर्मावती (1535), फूलकँवर (1568); दो साकों में क़त्ले-आम (1303 और 1568, दोनों में 30,000)।

4. प्रताप: जन्म से अकबर के दूत

  • पिता ➜ उदयसिंह
  • माता ➜ जयवन्ता बाई
  • नाना ➜ अखैराज सोनगरा (पाली)
  • जन्म ➜ 9 मई 1540, कुम्भलगढ़ दुर्ग के कटारगढ़ से सटी जूनी कचहरी में; तिथि — विक्रम सम्वत् 1597 की ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, रविवार। बचपन का नाम कीका (भील बच्चों के प्यार का नाम)।
  • नाना अखैराज सोनगरा राव मालदेव की तरफ़ से गिरि-सुमेल की लड़ाई में खेत रहे थे।
  • पत्नी अजबदे पँवार — बिजोलिया के सामन्त रामरख पँवार की पुत्री; विवाह 1557 में; प्रिय रानी। इन्हीं से पुत्र अमरसिंह — जन्म 16 मार्च 1559, मचीन्द (राजसमंद)।

राज्याभिषेक की कशमकश

  • उदयसिंह के निधन के दिन ही रानी की ज़िद और कुछ सरदारों की हामी से जगमाल का राजतिलक कर डाला गया।
  • प्रताप के मामा मानसिंह सोनगरा और ग्वालियर के रामशाह तँवर ने विरोध किया।
  • सलूम्बर के रावत कृष्णदास और देवगढ़ के रावत सांगा ने बड़े सामन्तों की रज़ामंदी लेकर जगमाल को गद्दी से उतारा और 28 फ़रवरी 1572 को गोगुन्दा में प्रताप का राज्याभिषेक किया — तब उम्र 32 वर्ष। कृष्णदास ने ही प्रताप की कमर में तलवार बाँधी।
  • त्योहार के दिन उदयसिंह के निधन से त्योहार का शोक-निवारण करने की परिपाटी के अनुसार प्रताप ने “अहेड़ा की शिकार” की।

अकबर से सम्बन्ध

  • 1570 के अकबर के नागौर दरबार में मेवाड़ को छोड़कर अधिकांश राजपूतों ने अधीनता स्वीकार कर ली।
  • प्रताप ने झुकने के बजाय मेवाड़ की आज़ादी बचाए रखने का निश्चय किया; सबसे पहले सामन्तों और भीलों को संगठित किया।
  • भीलों को सेना में पहली बार ऊँचे ओहदे देकर प्रताप ने उनका मान बढ़ाया; कुम्भा की ही भाँति उन्होंने भीलों की लड़ाकू ताक़त पहचानी। राज चिह्न में भील और प्रताप, दोनों की आकृतियाँ एकलिंग जी की मूर्ति के दोनों ओर इसी का सबूत हैं।
क्रमशिष्टमंडलसमय
1जलाल ख़ाँ कोरची (दरबारी)नवम्बर 1572
2मानसिंह कच्छवाहाजून 1573
3भगवन्तदाससितम्बर 1573

चारों दूत प्रताप को राज़ी न कर सके। मानसिंह का मिशन (टॉड व नैणसी के अनुसार) — जून 1573 में गुजरात से लौटते हुए वह उदयपुर आया; प्रताप ने उसे उदयसागर झील पर ठहराया और भोज रखा, पर भोजन के समय खुद न आकर पुत्र कुँवर अमरसिंह को भेजा। मानसिंह ने इसे अपमान समझा और बिना भोजन किए लौट गया।

5. हल्दीघाटी: तैयारी व सेनाएँ

  • सारे प्रयास विफल होने पर अकबर स्वयं 18 मार्च 1576 को अजमेर पहुँचा। हल्दीघाटी की योजना अजमेर के मैगज़ीन दुर्ग में बनी और आक्रमण की ज़िम्मेदारी मानसिंह को सौंपी गई।
  • अप्रैल 1576 में मानसिंह शाही फ़ौज के साथ अजमेर से रवाना हुआ, मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) पहुँचा और 2 माह वहीं डेरा डाला; फिर मोही होते हुए खमनौर के पास मोलेला गाँव (राजसमंद) में पड़ाव डाला।
नाम देने वालायुद्ध का नाम
अब्दुल क़ादिर बदायूँनी (मुन्तख़ब-उत-तवारीख़ में आँखों देखा हाल)गोगुन्दा का युद्ध
अबुल फ़ज़ल (अकबरनामा)खमनोर का युद्ध
कर्नल टॉडमेवाड़ की थर्मोपली
  • लड़ाई की तिथि 18 जून 1576; इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 21 जून।
  • प्रताप कुम्भलगढ़ से गोगुन्दा की ओर आए और गोगुन्दा-खमनौर की पहाड़ियों के बीच लोहसिंग (उदयपुर) में पड़ाव डाला।
पक्षसेनापति / टुकड़ी
मुग़ल — प्रधान सेनापतिमानसिंह (केन्द्र में)
मुग़ल — सहयोगीआसफ़ ख़ाँ, ग़ाज़ी ख़ाँ, महतर ख़ाँ, ख़्वाजा ग़यासुद्दीन अली, सैयद अहमद ख़ाँ, सैयद हाशिम ख़ाँ, सैयद राजू, जगन्नाथ कच्छवाहा, माधोसिंह
मुग़ल — आगे का दस्ता80 चुने सैनिक — हाशिम बारहा; उनके पीछे हरावल — जगन्नाथ कच्छवाहा
मुग़ल — बायाँ भागग़ाज़ी ख़ाँ व लूणकरण कच्छवाहा

संख्या पर मतभेद — बदायूँनी मानसिंह की सेना 5,000 और प्रताप की 3,000 बताता है; वीर विनोद में मुग़ल सेना 80,000।

6. रैपिड फायर तथ्य

  • प्रताप का जन्म ➜ 9 मई 1540, कुम्भलगढ़
  • प्रताप का राज्याभिषेक ➜ 28 फ़रवरी 1572, गोगुन्दा (तब उम्र 32 वर्ष)
  • मावली का युद्ध ➜ 1540, उदयसिंह ने बनवीर को हराकर चित्तौड़ पाया
  • शेरशाह के आगे झुकने वाला ➜ उदयसिंह, अफ़ग़ान अधीनता मानने वाला मेवाड़ का पहला शासक
  • तीसरा साका ➜ 1568, अकबर बनाम उदयसिंह; केसरिया जयमल, पत्ता और कल्ला ने किया
  • तीनों साके ➜ 1303 (पद्मिनी), 1535 (कर्मावती), 1568 (फूलकँवर)
  • हल्दीघाटी की तिथि ➜ 18 जून 1576 (गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 21 जून)
  • हल्दीघाटी के नाम ➜ बदायूँनी: गोगुन्दा, अबुल फ़ज़ल: खमनोर, टॉड: मेवाड़ की थर्मोपली

अगले भाग में हल्दीघाटी का पूरा युद्ध-क्रम, उसके बाद का संघर्ष, भामाशाह की मदद, दिवेर की जीत और चावण्ड की राजधानी।

पिछला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: महाराणा कुम्भा (1433–68) (भाग 2) एवं राणा सांगा व खानवा

अगला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: उदयसिंह व प्रताप (भाग 2) एवं अमरसिंह से भूपालसिंह (भाग 1)

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