जयपुर बसाने वाले जयसिंह जितने ही रोचक उनके उत्तराधिकारी हैं, क्योंकि गद्दी की लड़ाई ने रियासत को बार-बार झकझोरा। यह भाग जयपुर नगर, वेधशालाएँ और अश्वमेध से शुरू होकर दरबार के विद्वान, सुधार और सेना तक जाता है; उसके बाद ईश्वरीसिंह से मानसिंह द्वितीय तक के शासक आते हैं। हर शासक को एक घटना से जोड़कर याद करना सबसे आसान रहेगा।
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1. जयपुर, वेधशालाएँ, अश्वमेध
- जयपुर की नींव ➜ 18 नवम्बर 1727
- वास्तुकार ➜ विद्याधर भट्टाचार्य (बंगाली)
- तैयार ➜ 1729
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- बंगाली वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य से नक़्शा बनवाकर सवाई जयसिंह ने 18 नवम्बर 1727 को जयपुर की नींव डाली; 1729 तक नगर बनकर तैयार हो गया।
- उसने पुण्डरीक यज्ञ (1713) आमेर के श्यामबाग में करवाया और दो अश्वमेध यज्ञ — 1734 और 1742 किए; मुख्य आचार्य पुण्डरीक रत्नाकर थे।
- जयपुर शासकों का निजी पुस्तकालय पोथीख़ाना उसी ने स्थापित किया।
ट्रिक: पाँच वेधशालाएँ — “उ-म-ज-ब-दि”: उज्जैन, मथुरा, जयपुर, बनारस, दिल्ली।
2. दरबार के विद्वान
| विद्वान | पहचान | रचना / योगदान |
|---|---|---|
| रत्नाकर भट्ट पुण्डरीक | महाराष्ट्रीय ब्राह्मण; दरबार के सबसे प्रकाण्ड विद्वान; मिर्ज़ा राजा जयसिंह के समय से दरबार में | जयसिंह कल्पद्रुम |
| जनार्दन भट्ट गोस्वामी | दरबारी विद्वान | शृंगार शतक, वैराग्य शतक, मंत्र चन्द्रिका |
| केवलराम | प्रसिद्ध ज्योतिषी | जयविनोद, रामविनोद, तारा सारणी, ब्रह्म सारणी आदि; साहित्य: अभिलाषा शतकम्, गंगास्तुति; लघुगणक (लॉगरिद्म) का फ़्रेंच से संस्कृत अनुवाद — विभाग सारिणी |
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ट्रिक: केवलराम = गणित-ज्योतिष + लघुगणक; जगन्नाथ = रेखागणित + सम्राट सिद्धान्त; कृष्ण भट्ट = काव्य।
3. सुधार और सेना
- सती प्रथा रोकने का प्रयास करने वाला सवाई जयसिंह पहला हिन्दू राजपूत राजा था।
- विधवा-पुनर्विवाह को बढ़ावा देने और उसे वैध ठहराने वाले नियम बनाकर लागू कराने की पहल राजस्थान में सबसे पहले उसी ने की।
- सेना में नागा-दादूपंथी साधुओं को भर्ती करने का आदेश भी उसी ने (1726) दिया।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1726 | सेना | नागा-दादूपंथियों की भर्ती का आदेश। |
| 1727 | जयपुर | नगर की नींव। |
| 1734 | अश्वमेध | पहला; हुरड़ा सम्मेलन का वर्ष। |
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4. जयपुर के बाद के शासक
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
|---|---|---|---|
| राजमहल (टोंक, बनास किनारे) | 1 मार्च 1747 | ईश्वरीसिंह बनाम माधोसिंह + मेवाड़, कोटा, बूँदी, मराठे | ईश्वरीसिंह जीता; ईसरलाट |
| बगरू | अगस्त 1748 | माधोसिंह + मराठे, होल्कर, उम्मेदसिंह (बूँदी), दुर्जनशाल (कोटा) बनाम ईश्वरीसिंह + सूरजमल की सेना | माधोसिंह जीता |
| मानपुर | 1748 | मुग़ल-जयपुर सेना बनाम अहमदशाह अब्दाली | अब्दाली हारा |
| कांकोड़ (टोंक) | 18 नवम्बर 1759 | माधोसिंह बनाम मल्हार राव होल्कर | माधोसिंह जीता |
5. सवाई ईश्वरीसिंह
- जयसिंह का बड़ा पुत्र होने से सितम्बर 1743 में ईश्वरीसिंह राजा बना, जबकि देबारी की शर्त के अनुसार माधोसिंह को बनना था; सौतेले भाइयों में संघर्ष छिड़ा।
- मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह ने ईश्वरीसिंह को अपने हाथ से टीके का दस्तूर किया।
- माधोसिंह ने 2 लाख रुपये देने का वादा करके मल्हार राव होल्कर से सैनिक मदद ली; होल्कर ने खांडेराव को 1000 सवारों के साथ भेजा।
- राजमहल (1 मार्च 1747): बनास किनारे ईश्वरीसिंह (सेनापति हरगोविन्द नाटाणी) ने माधोसिंह, मेवाड़, कोटा, बूँदी और मराठों की संयुक्त सेना को हराया; इसी जीत की याद में जयपुर में ईसरलाट (सरगासूली) बनवाई।
- मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह ने ज़्यादा रुपयों का लालच देकर पेशवा को अपनी तरफ़ कर लिया; पेशवा ने ईश्वरीसिंह का साथ छोड़ माधोसिंह का पक्ष लिया।
रोचक तथ्य: दो बार “लाट”: जीत की निशानी ईसरलाट ही उसकी आत्महत्या का स्थल बनी।
6. सवाई माधोसिंह प्रथम
- गद्दी ➜ 2 जनवरी 1751
- मराठों का क़त्लेआम ➜ 10 जनवरी 1751
- सवाई माधोपुर की नींव ➜ 1763
- ईश्वरीसिंह के जाने के बाद होल्कर और जयप्पा सिन्धिया ने 2 जनवरी 1751 को माधोसिंह को गद्दी देकर तय रक़म की माँग रखी; रक़म न मिलने पर मराठा सैनिक जयपुर में हुड़दंग करने लगे।
- 10 जनवरी 1751 को चार हज़ार मराठा सैनिक शहर के मन्दिर-बाज़ार देखने के बहाने भीतर आए; माधोसिंह ने उसी दोपहर सभी फाटक बन्द करा दिए और जनता व सैनिकों ने उनका संहार कर डाला।
- भटवाड़ा की जड़: माधोसिंह ने मुग़ल बादशाह अहमदशाह और अवध के नवाब सफ़दरजंग में समझौता कराया; बादशाह ने ख़ुश होकर उसे रणथम्भौर दुर्ग दे दिया — जो तब कोटा के राव शत्रुशाल के अधीन था; नाराज़ शत्रुशाल ने जयपुर पर चढ़ाई की और नवम्बर 1761 में जयपुर की सेना हारी (भटवाड़ा, बारां)।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 2 जन. 1751 | गद्दी | होल्कर और सिन्धिया ने गद्दी पर बैठाया। |
| 10 जन. 1751 | मराठों का क़त्लेआम | नगर के द्वार बन्द। |
| 18 नव. 1759 | कांकोड़ | होल्कर की सेना को हराया। |
| नव. 1761 | भटवाड़ा | कोटा से हार। |
7. पृथ्वीसिंह द्वितीय व प्रतापसिंह
- पृथ्वीसिंह द्वितीय (1768–1778) माधोसिंह का उत्तराधिकारी; उसके बाद माधोसिंह के पुत्र सवाई प्रतापसिंह (1778–1803) गद्दी पर आए।
- प्रतापसिंह को मराठों के सबसे अधिक आक्रमण झेलने पड़े; उसने मराठों के विरुद्ध राजपूतों को इकट्ठा किया।
- बोराज का युद्ध: मराठा सेनापति रायजी पटेल; ठाकुर सकतसिंह के बेटे जवानसिंह ने असाधारण वीरता दिखाते हुए प्राण त्यागे, जिस पर सीताराम रत्नू ने डिंगल काव्य जवान रासो रचा।
- तुंगा (28 जुलाई 1787): मराठों को 63 लाख देने का वादा करके प्रतापसिंह ने पैसे नहीं दिए तो महादजी सिंधिया ने आक्रमण किया; अंग्रेज़ों ने सहायता से इनकार किया, पर जोधपुर के विजयसिंह और मुग़ल सेनानायक मुहम्मद बेग हमदानी साथ आए। प्रतापसिंह और विजयसिंह ने सिंधिया को बुरी तरह हराया; लालसौट से लौटते सिंधिया ने कहा — “जीवित बचा तो जयपुर को ख़ाक में मिला दूँगा।”
| पहचान | विवरण |
|---|---|
| गंधर्व बाईसी | दरबार में 22 कवियों, ज्योतिषियों और संगीतज्ञों की मंडली |
| ब्रजनिधि | प्रतापसिंह का काव्य-नाम; रचनाओं का संकलन ब्रजनिधि ग्रन्थावली |
| राधा गोविन्द संगीत सार | जयपुर के संगीत सम्मेलन में रचा गया ग्रन्थ — मुख्य योगदान देवर्षि ब्रजपाल भट्ट का |
8. जगतसिंह द्वितीय से जयसिंह तृतीय
महाराजा जगतसिंह द्वितीय (1803–1818) — प्रतापसिंह के पुत्र।
| वर्ष | घटना | बात |
|---|---|---|
| 13 मार्च 1807 | गिंगोली (डीडवाना-कुचामन) | मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी (महाराणा भीमसिंह की बेटी) के रिश्ते की होड़ में अमीर ख़ाँ पिंडारी की मदद से जोधपुर के मानसिंह को हराया |
| 15 अप्रैल 1818 | अंग्रेज़ों से संधि | मराठों और पिंडारियों के हमलों से बचाने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि |
| 21 दिसम्बर 1818 | मृत्यु | जगतसिंह द्वितीय का देहान्त |
- जगतसिंह को रसकपूर नामक वेश्या से लगाव था; कहते हैं उसने आधा राज्य उसके नाम कर दिया और उसके नाम के सिक्के चलाए — इसी से “जयपुर का बदनाम शासक” कहलाया।
- उसकी मृत्यु पर पुत्र न होने से उत्तराधिकार संघर्ष चला; भटियाणी रानी और अंग्रेज़ रेजीडेंसी में तीखे विवाद हुए। अप्रैल 1819 में रानी के पुत्र होने पर उसे जयसिंह तृतीय (1818–1835) के रूप में गद्दी मिली और भटियाणी रानी रीजेन्ट बनीं।
- अंग्रेज़ों ने कैप्टन स्टेवार्ड को पॉलिटिकल एजेन्ट बनाया; अर्थव्यवस्था सुधारने को झुपाराम नियुक्त हुआ।
9. सवाई रामसिंह द्वितीय
- गद्दी ➜ 1835
- कौंसिल ➜ मेजर जॉन लुडलो की अध्यक्षता
- पॉलिटिकल एजेन्ट ➜ मेजर प्रिचार्ड (2 फ़रवरी 1848)
- जयसिंह तृतीय के बाद अल्पवयस्क रामसिंह द्वितीय गद्दी पर आया; राज-काज के लिए मेजर जॉन लुडलो के सभापतित्व में रीजेन्सी कौंसिल बनी।
- सती पर पाबन्दी लुडलो की कोशिशों का नतीजा थी; इन्हीं वर्षों में दहेज, दास-प्रथा और कन्या-हत्या पर भी रोक लगी।
- 2 फ़रवरी 1848 को लुडलो की जगह मेजर प्रिचार्ड पॉलिटिकल एजेन्ट बने; 1851 में वयस्क होने पर रामसिंह का विधिवत राज्याभिषेक हुआ।
| वर्ष | संस्था / निर्माण |
|---|---|
| 1839 | दीवानी और फ़ौजदारी न्यायालय |
| 1844 | महाराजा स्कूल |
| 1845 | संस्कृत स्कूल |
| 1861 | मेडिकल स्कूल |
10. माधोसिंह द्वितीय व मानसिंह द्वितीय
माधोसिंह द्वितीय (1880–1922) रामसिंह द्वितीय के दत्तक पुत्र थे — ईसरदा के ठाकुर के पुत्र, वास्तविक नाम कायमसिंह।
- 1902 में एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने इंग्लैण्ड गए।
- बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए मदन मोहन मालवीय को 5 लाख रुपये चन्दा दिया।
- 1904 में जयपुर रियासत में राजस्थान की सभी देशी रियासतों में सबसे पहले डाक टिकट और पोस्टकार्ड शुरू हुए।
- जन्म ➜ 21 अगस्त 1911, ईसरदा
- मूल नाम ➜ मोर मुकुट सिंह
- गद्दी ➜ 7 सितम्बर 1922 (11 वर्ष)
- सवाई मानसिंह द्वितीय (1922–1949) माधोसिंह द्वितीय के दत्तक पुत्र थे; कछवाहा वंश के अन्तिम शासक।
- वे पोलो के प्रसिद्ध खिलाड़ी थे; उनकी स्थापित घुड़सवार सेना ने द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों की ओर से कई मोर्चों पर भाग लिया।
- प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माईल ने जयपुर को चारदीवारी के बाहर सुनियोजित ढंग से बसाया — इसीलिए “आधुनिक जयपुर शहर का निर्माता”; उनकी याद में एमआई रोड।
- उनके समय में कृषि विभाग (1929), राजस्थान का पहला पंचायत क़ानून (1938), हाईकोर्ट (1942) बने।
रिवीजन पॉइंटर्स
- जयपुर की नींव सवाई जयसिंह ने 18 नवम्बर 1727 को बंगाली वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य की योजना से रखी; 1729 तक नगर तैयार हो गया।
- जयसिंह ने दो अश्वमेध यज्ञ किए — 1734 और 1742; वेधशालाएँ पाँच: उज्जैन, मथुरा, जयपुर, बनारस, दिल्ली।
- सती रोकने का प्रयास करने वाला पहला हिन्दू राजपूत राजा जयसिंह था; सेना में नागा-दादूपंथी साधुओं की भर्ती का आदेश उसने 1726 में दिया।
- ईश्वरीसिंह ने 1 मार्च 1747 को राजमहल (टोंक, बनास किनारे) में संयुक्त सेना को हराया; इसी जीत की याद में ईसरलाट बनी।
- अगस्त 1748 के बगरू युद्ध में माधोसिंह जीता; माधोसिंह प्रथम 2 जनवरी 1751 को गद्दी पर बैठे और 10 जनवरी 1751 को मराठा सैनिकों का संहार हुआ।
- प्रतापसिंह (1778–1803) ने मराठों के सबसे अधिक आक्रमण झेले; तुंगा (28 जुलाई 1787) में सिंधिया को बुरी तरह हराया।
- जगतसिंह द्वितीय (1803–1818) «जयपुर का बदनाम शासक» कहलाया; 15 अप्रैल 1818 को उसने अंग्रेज़ों से संधि की।
- माधोसिंह द्वितीय (1880–1922) के समय 1904 में जयपुर में राजस्थान की रियासतों में सबसे पहले डाक टिकट और पोस्टकार्ड शुरू हुए।
- सवाई मानसिंह द्वितीय (1922–1949) कछवाहा वंश के अन्तिम शासक थे; प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माईल को «आधुनिक जयपुर शहर का निर्माता» कहा जाता है।
अगले भाग में पूर्वी राजस्थान के जाट राज्य का परिचय — गोकुल, राजाराम और चूड़ामन के विद्रोह, फिर बदनसिंह और सूरजमल का स्वर्णकाल।
पिछला भाग: आमेर का कछवाहा राजवंश: मानसिंह प्रथम एवं मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम
अगला भाग: जाट राजवंश (भरतपुर, धौलपुर): बदनसिंह और सूरजमल एवं जवाहरसिंह से रणजीतसिंह
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