अतीत की सबसे ठोस गवाही वही होती है जो पत्थर पर खुदी हो, क्योंकि उसे न कोई बदल सकता है, न मिटा सकता है। इस भाग में पहले इतिहास जानने के चार वर्ग समझाए गए हैं, फिर प्राचीन लेख, यूप-स्तम्भ लेख, गुप्त काल से 8वीं सदी तक के लेख और प्रतिहार, गुहिल व चौहान लेख क्रम से आते हैं। हर लेख के साथ वर्ष, स्थान और शासक की जोड़ी बनाकर पढ़ें, तालिकाएँ आसानी से याद हो जाएँगी।
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1. एक नज़र में
अतीत की जानकारी देने वाली चीज़ों को चार खानों में रखा जाता है — पत्थर पर खुदे लेख (शिलालेख व प्रशस्तियाँ), ताँबे पर लिखे दान-पत्र, सिक्के और कागज़-बही में सुरक्षित पुरालेख। फ़ारसी लेख शिलालेखों की ही एक अलग शाखा हैं।
- सबसे पुराना शिलालेख ➜ बड़ली, 443 ई.पू.
- सबसे पुराना फ़ारसी लेख ➜ अजमेर, 1200 ई.
- पंचमार्क सिक्कों का सबसे बड़ा ढेर ➜ रैढ़ — 3075 चाँदी के
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 443 ई.पू. | बड़ली का लेख | राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख, ब्राह्मी लिपि में। |
| लगभग 250 ई.पू. | अशोक के लेख | भाब्रू व बैराठ — मौर्य सत्ता का प्रमाण। |
| द्वितीय सदी ई.पू. | घोसुण्डी का लेख | भागवत धर्म व अश्वमेध का वर्णन। |
| 224–278 ई. | यूप-स्तम्भ लेख | बिचपुरिया, नांदसा, बर्नाला, बड़वा। |
… शेष 5 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: क्रम याद रखें: पत्थर → ताँबा → धातु-मुद्रा → काग़ज़, यानी शिलालेख, ताम्र-पत्र, सिक्के, पुरालेख।
2. शिलालेख व प्रशस्तियाँ
पत्थर की शिला, दीवार या खम्भे पर लिखी कोई भी सूचना शिलालेख (अभिलेख) कहलाती है। जब ऐसा लेख किसी शासक की उपलब्धियों का गुणगान करे, तो उसे प्रशस्ति कहते हैं।
- शुरुआती लेखों की भाषा संस्कृत है; बाद के लेखों में संस्कृत के साथ फ़ारसी, उर्दू और राजस्थानी भी मिलती हैं।
- राजपूताने की प्राचीन लिपि ब्राह्मी थी; आगे चलकर नागरी/देवनागरी आम हो गई।
| प्रशस्तिकार / रचयिता | लेख |
|---|---|
| दामोदर | अपराजित का शिलालेख (661) |
| पुण्य (नागभट्ट का पुत्र) | मानमोरी का शिलालेख (713) |
| गुणभद्र | बिजोलिया का लेख (1170) |
| जयमंगलाचार्य (जैन साधु) | सुंधा पर्वत लेख (1262) |
… शेष 6 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 443 ई.पू. | बड़ली | सबसे प्राचीन लेख। |
| लगभग 250 ई.पू. | अशोक के लेख | भाब्रू व बैराठ। |
| 423 ई. | गंगधार | औलिकर शासक विश्ववर्मा का लेख। |
| 713 ई. | मानमोरी | मोरी वंश; टॉड ने समुद्र में फेंका। |
ट्रिक: आठ उप-शाखाएँ काल के क्रम में हैं: मौर्य-पूर्व → यूप → गुप्तोत्तर → प्रतिहार-गुहिल → परमार-चौहान → मेवाड़ 13वीं → कुम्भा काल → 16वीं–18वीं सदी।
3. प्राचीन लेख
| लेख | वर्ष (ई.) | स्थान | शासक / वंश | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| बड़ली | 443 ई.पू. | बड़ली गाँव, भिनाय (अजमेर) | — | राजस्थान का सबसे पुराना लेख; ब्राह्मी लिपि |
| भाब्रू | लगभग 250 ई.पू. | बैजक पहाड़ी, बैराठ (कोटपुतली-बहरोड़) | अशोक | प्राकृत भाषा, ब्राह्मी लिपि |
| बैराठ (लघु शिलालेख) | लगभग 250 ई.पू. | भीम डूँगरी की तलहटी, बैराठ | अशोक | रूपनाथ व सहसराम लेखों जैसा; घिसकर अपठनीय |
बड़ली का लेख
- अजमेर संग्रहालय में रखा है; एक स्तम्भ के टूटे टुकड़े पर खुदा हुआ।
- भिलोत माता मंदिर से मिला; गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे 1912 ई. में खोजा।
अशोक के दो लेख
- दोनों बैराठ-विराटनगर की पहाड़ियों से मिले, जो आज कोटपुतली-बहरोड़ में हैं।
- भाब्रू लेख ➜ बैजक की पहाड़ी पर मिला; कैप्टन बर्ट ने खोजा। बैराठ से 12 मील दूर भाब्रू गाँव के कारण बर्ट ने (भ्रमवश) इसे यह नाम दे दिया।
- इसमें अशोक बुद्ध, धम्म और संघ में अपनी आस्था जताता है — यानी वह बौद्ध था और इस इलाक़े पर मौर्य शासन था।
ध्यान दें: भाब्रू लेख की खोज का वर्ष 1840 माना जाता है; कई जगह 1837 भी छपा मिलता है। यह लेख अब कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी में है।
नगरी और घोसुण्डी
- नगरी का लेख ➜ ओझा को मिला, जिसे उन्होंने उदयपुर संग्रहालय में रखवाया। इसकी लिपि घोसुण्डी लेख से मिलती-जुलती है।
- घोसुण्डी लेख ➜ चित्तौड़ से सात मील दूर कई टुकड़ों में मिला। गजवंशी सर्वतात (पाराशरी-पुत्र) ने अश्वमेध यज्ञ किया, और संकर्षण-वासुदेव के पूजा-स्थल को पत्थर की चारदीवारी से घेरा गया — ऐसा इसमें दर्ज है।
- यह लेख बताता है कि द्वितीय सदी ई.पू. में भागवत धर्म फैल चुका था। इसे सबसे पहले भंडारकर ने पढ़ा; अब उदयपुर संग्रहालय में है।
4. यूप-स्तम्भ लेख
| लेख | वर्ष (ई.) | स्थान | किसने / कौन-सा यज्ञ | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| नांदसा | 225 | नांदसा गाँव, गंगापुर (भीलवाड़ा) | शक्तिगुणरूप — षष्ठीरात्र यज्ञ | तालाब में डूबा 12 फुट लम्बा गोल स्तम्भ; गर्मी में ही पढ़ा जाता है; स्थापना सोम ने की |
| बर्नाला (पहला) | 227 | बर्नाला (सवाई माधोपुर) | वर्धन (सोहर्त गोत्र) — सात यूप | कृत संवत 284, चैत्र पूर्णिमा |
| बड़वा | 238–39 | बड़वा, अंता (बारां) | मौखरी महासेनापति बल के पुत्र बलवर्धन, सोमदेव, बलसिंह — त्रिरात्र यज्ञ | तीन यूप; राजस्थान में मौखरी वंश का पहला उल्लेख |
- यूप वह लकड़ी/पत्थर का खम्भा है जो यज्ञ-भूमि में गाड़ा जाता था; इन पर यज्ञ करने वाले का नाम व यज्ञ का प्रकार खोदा जाता था।
- ये लेख बताते हैं कि तीसरी सदी में उत्तर भारत के पौराणिक/वैदिक यज्ञ राजस्थान में भी चलन में थे।
- बड़वा के तीनों यूप मौखरी वंश के लेख हैं; भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी।
ध्यान दें: बिचपुरिया लेख का वर्ष कृत संवत 321 (≈ 264 ई.) लिया गया है; कुछ सूचियों में 274 ई. भी लिखा है।
5. गुप्त काल से 8वीं सदी
| लेख | वर्ष (ई.) | स्थान | शासक / वंश | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| गंगधार | 423 | गंगधार (झालावाड़) | औलिकर — विश्ववर्मा | मंत्री मयूराक्षक ने विष्णु मंदिर, तांत्रिक शैली का मातृगृह व बावड़ी बनवाई |
| नगरी | 424 | नगरी (चित्तौड़गढ़) | — | भाषा संस्कृत, लिपि नागरी; 8 पंक्तियाँ |
| भ्रमर माता | 490 | छोटी सादड़ी (प्रतापगढ़) | गौर वंश; औलिकर — आदित्यवर्द्धन | 17 पंक्तियों का संस्कृत पद्य-लेख |
| गोठ मंगलोद | 608 | दधिमाता मंदिर, गोठ मंगलोद (नागौर) | — | वि.सं. 665 / गुप्त संवत 289; पश्चिमी राजस्थान का सबसे पुराना ज्ञात लेख |
गंगधार, नगरी और भ्रमर माता
- गंगधार (423) ➜ औलिकर राजा विश्ववर्मा के मंत्री मयूराक्षक ने विष्णु का मंदिर और तांत्रिक शैली का मातृगृह बनवाया और एक बावड़ी खुदवाई।
- नगरी (424) ➜ डी.आर. भंडारकर को नगरी की खुदाई में मिला; अब अजमेर संग्रहालय में है। आठ पंक्तियों में थोड़े ही शब्द पढ़े जा सकते हैं।
- भ्रमर माता (490) ➜ यह 17 पंक्तियों का संस्कृत पद्य-लेख पाँचवीं सदी की राजनीति समझने में मदद करता है। नाम-सूची: गौर वंश — पुण्यशोम, राज्यवर्द्धन, यशोगुप्त; औलिकर वंश — आदित्यवर्द्धन।
गोठ मंगलोद, बसंतगढ़ और सामोली
- गोठ मंगलोद (608) ➜ दधिमाता मंदिर पर विक्रम संवत 665 और गुप्त संवत 289, दोनों दर्ज हैं। इससे पता चलता है कि आसपास का इलाक़ा दाहिमा क्षेत्र कहलाता था।
- बसंतगढ़ (625) ➜ चावड़ा शासक वर्मलात को अर्बुद देश का स्वामी बताता है और सामन्त प्रथा पर रोशनी डालता है। इसमें अर्बुदांचल के शासक राज्जिल और उसके पुत्र सत्यदेव का वर्णन भी है। यह अजमेर राजकीय संग्रहालय में है।
- सामोली (646) ➜ गुहिल राजा शीलादित्य के समय का है और गुहिलों का समय तय करने में काम आता है। इसमें “विजयी”, “यटनगर”, “आरण्यकगिरि”, “अरण्यवासिनी”, “महत्तर” जैसे शब्द आए हैं। संकेत है कि जावर (अरण्यगिरि) में ताँबे-जस्ते की खान इसी युग से चल रही थी; आज का जावर माता मंदिर तब अरण्यवासिनी का मंदिर था।
अपराजित, शंकरघट्टा और मानमोरी
- अपराजित (661) ➜ नागदा के पास कुण्डेश्वर मंदिर में ओझा को मिला और उन्होंने उदयपुर के विक्टोरिया हॉल संग्रहालय में रखवाया। गुहिल शासकों की क्रमिक विजयों का पता देता है; अपराजित ने शक्तिशाली वराहसिंह को हराकर अपना सेनापति बनाया।
- शंकरघट्टा (713) ➜ गम्भीरी नदी के तट पर मिला; 17 पंक्तियों वाला। इसमें राजा मानभंग का वर्णन है, जो संभवतः वही मानमोरी है जिसके लेख का ज़िक्र टॉड ने किया।
- मानमोरी (713) ➜ पूठोली गाँव के पास मानसरोवर झील पर एक स्तम्भ पर था। इसमें अमृत-मंथन की कथा और महेश्वर, भीम, भोज तथा मान (भोज का पुत्र, मोरी वंश) का वर्णन है; मानसरोवर झील बनवाने का भी उल्लेख है। लेख चित्तौड़ के आरम्भिक इतिहास और वंश-क्रम की गुत्थियाँ सुलझाने तथा तत्कालीन समाज को समझने में उपयोगी है।
6. प्रतिहार, गुहिल व चौहान लेख
| लेख | वर्ष (ई.) | स्थान | शासक / वंश | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| बुचकला | 815 | बुचकला (बिलाड़ा के पास, जोधपुर) | प्रतिहार — नागभट्ट (वत्सराज का पुत्र) | पार्वती मंदिर के सभामंडप में; प्रतिहार शासकों व सामंतों के नाम |
| मण्डोर | 837 | मंडोर (जोधपुर) | प्रतिहार — बाउक | मंडोर शाखा के प्रतिहारों की पीढ़ियाँ |
| घटियाला (चार लेखों का समूह) | 861 | घटियाली (फलौदी) | प्रतिहार — कक्कुक | संस्कृत; रचयिता मग, उत्कीर्णक कृष्णेश्वर |
| घटियाला (दो लेख) | 861 | घटियाली (फलौदी) | प्रतिहार — हरिश्चन्द्र की वंश-कथा | संस्कृत व प्राकृत (महाराष्ट्री) |
मंडोर के प्रतिहार — बुचकला, मंडोर, घटियाला
- बुचकला (815) ➜ ब्रह्मभट्ट नानूराम ने खोजा; प्रतिहार वंश के शासकों और सामंतों के नामों का स्रोत।
- मंडोर (837) ➜ मूल रूप से किसी विष्णु मंदिर में लगा था; बाउक ने इसे खुदवाया। इसे घटियाला के दोनों लेखों के साथ पढ़ने पर प्रतिहारों के बारे में कई नई बातें मिलती हैं।
- घटियाला चार-लेख समूह ➜ जैन मंदिर “माता की साल” के पास एक स्तम्भ के दो ओर खुदा; पहले में 20, दूसरे में 11, तीसरे में 2 और चौथे में 4 पंक्तियाँ हैं।
- इनमें कक्कुक को न्यायप्रिय, जनहितैषी, दुष्टों को दण्ड देने वाला, दीनों का रक्षक और वीर बताया गया है। चौथे श्लोक के अनुसार उसने दो स्तम्भ और लगवाए — एक घटियाली में, दूसरा मंडोर में।
गुहिल लेख — सारणेश्वर, नाथ, आहड़
- सारणेश्वर प्रशस्ति (953) ➜ उदयपुर के श्मशान में बने सारणेश्वर महादेव मंदिर के सभामंडप में मिली; संभवतः पहले आहड़ के वराह मंदिर में थी। इसमें गुहिल अल्लट, उसकी माता महालक्ष्मी और पुत्र नरवाहन का ज़िक्र है।
- नाथ प्रशस्ति (971) ➜ एकलिंगजी के मंदिर से कुछ ऊँचाई पर बने लकुलीश मंदिर में है, इसलिए नाम “एकलिंगजी की नाथ प्रशस्ति”; मेवाड़ के राजनीतिक व सांस्कृतिक इतिहास के लिए उपयोगी।
- आहड़ देवकुलिका लेख (977) ➜ मेवाड़ के अल्लट, नरवाहन और शक्तिकुमार के नाम; इन तीनों के काल में अक्षपटलाधीश पद पर रहे अधिकारियों का ब्यौरा; लेख के अनुसार अल्लट की भयंकर गदा के प्रहार से उसका प्रबल शत्रु देवपाल रण में गिरा।
चौहान लेख — हर्षनाथ और किणसरिया
- हर्षनाथ (973, वि.सं. 1030) ➜ सांभर के चौहान विग्रहराज द्वितीय के समय का। चौहानों के कुलदेव हर्ष और शिव के मंदिर अल्लट ने 956 ई. में बनवाए थे; हर्षनाथ पाशुपत आचार्यों का केन्द्र रहा।
- वंशक्रम: गुवक → चन्द्रराज → गुवक द्वितीय → चन्दन → वाक्पतिराज → सिंहराज → विग्रहराज। इस लेख में वागड़ के लिए “वार्गट” शब्द आया है।
- तोमर (तंवर) सरदार सलवण — घमण्डी — को सिंहराज ने पराजित किया।
7. रैपिड फायर तथ्य
- सबसे पुराना शिलालेख ➜ बड़ली (443 ई.पू.), ब्राह्मी लिपि में
- सबसे पुराना फ़ारसी लेख ➜ अजमेर, 1200 ई.
- पंचमार्क सिक्कों का सबसे बड़ा ढेर ➜ रैढ़ — 3075 चाँदी के
- भाब्रू लेख के खोजकर्ता ➜ कैप्टन बर्ट; अब कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी में
- घोसुण्डी लेख ➜ द्वितीय सदी ई.पू.; भागवत धर्म व अश्वमेध का वर्णन
- यूप-स्तम्भ लेख ➜ नांदसा, बर्नाला, बड़वा; बड़वा में मौखरी वंश का राजस्थान में पहला उल्लेख
- पश्चिमी राजस्थान का सबसे पुराना ज्ञात लेख ➜ गोठ मंगलोद (608)
- मानमोरी लेख (713) ➜ मोरी वंश से जुड़ा; टॉड ने इसे समुद्र में फेंका
- क्रम याद रखें: शिलालेख, ताम्र-पत्र, सिक्के, पुरालेख — यानी पत्थर, ताँबा, धातु-मुद्रा, काग़ज़।
अगले भाग में परमार, चौलुक्य व चौहान लेख, मेवाड़ के लेख, फ़ारसी भाषा के लेख और ताँबे की चद्दरों पर लिखे दान-पत्रों की शुरुआत।
अगला भाग: राजस्थान के इतिहास के स्रोत: शिलालेख व प्रशस्तियाँ (भाग 2)
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