राजस्थान में 1857 की क्रांति: प्रमुख केंद्र (भाग 2) एवं शासक, सामंत व पुरस्कार – Rajasthan History Chapter 37

आउवा, कोटा, भरतपुर, धौलपुर व टोंक के विद्रोह तथा शासकों की भूमिका, अंग्रेज़ों के पुरस्कार और सामंतों का सहयोग।

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In this chapter (8 sections)
  1. एरिनपुरा व आउवा
  2. कोटा — 15 अक्टूबर 1857
  3. भरतपुर, धौलपुर, टोंक, अलवर
  4. शासक, सामंत व पुरस्कार
  5. शासकों का रुख़
  6. अंग्रेज़ों के पुरस्कार
  7. सलूम्बर व कोठारिया के सामंत
  8. रैपिड फायर तथ्य

इस भाग की कहानी दो ध्रुवों में बँटी है — एक तरफ़ आउवा और कोटा के बाग़ी, दूसरी तरफ़ वे शासक जिन्होंने अंग्रेज़ों का साथ दिया और बदले में परगने, उपाधियाँ व ख़िलअतें पाईं। इसलिए हर लड़ाई के साथ उसकी तारीख़ और नतीजा, तथा हर रियासत के साथ उसके शासक की भूमिका जोड़कर पढ़ें। इसमें एरिनपुरा-आउवा, कोटा, भरतपुर, धौलपुर, टोंक, अलवर, शासकों का रुख़, पुरस्कार और सामंतों की भूमिका शामिल है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजस्थान में 1857 की क्रांति, 7 चॉक-बोर्ड चित्र, 2 नक्शे, 8 चार्ट, 24 फ्लैशकार्ड और 12 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एरिनपुरा व आउवा

एरिनपुरा का विद्रोह

  • 1835 में बनी एरिनपुरा छावनी में जोधपुर लीजन तैनात थी।
  • लीजन के 90 पूर्बिया सैनिक अभ्यास के लिए माउंट आबू में थे; नसीराबाद-नीमच की ख़बर सुनकर उन्होंने 21 अगस्त को वहीं विद्रोह कर दिया — AGG के बेटे ए. लॉरेन्स घायल हुए और कप्तान हॉल पिछले दरवाज़े से भाग निकला।
  • लूटे ख़ज़ाने के साथ वे 23 अगस्त को एरिनपुरा पहुँचे; यहाँ सूबेदार मोती खाँ, शीतलप्रसाद और तिलकराम की अगुवाई में विद्रोह हुआ। लेफ़्टिनेंट कॉनोली को बंदी बना लिया गया।

आउवा के ठाकुर का नेतृत्व

  • दिल्ली जाते हुए विद्रोहियों ने पाली के पास खैरवा में डेरा डाला; वहीं आउवा के ठाकुर कुशालसिंह चम्पावत ने उन्हें नेतृत्व दिया।
  • साथ आए ठिकाने ➜ गूलर (बिशनसिंह), आसोप (शिवनाथसिंह), आलनियावास (अजीतसिंह), लाम्बिया (पृथ्वीसिंह) आदि; क्रांतिकारियों की संख्या लगभग 6000 हो गई।
  • AGG ने जोधपुर महाराजा तख़्तसिंह को विद्रोह कुचलने को कहा; महाराजा ने किलेदार अनारसिंह और फ़ौजदार राजमल लोढ़ा की अगुवाई में फ़ौज भेजी।
लड़ाईतारीख़किसके बीचनतीजा
बिथौड़ा (पाली)8 सितम्बर 1857कुशालसिंह बनाम अंग्रेज़ + जोधपुर की संयुक्त सेना (हीथकोट, कुशलराज सिंघवी)क्रांतिकारियों की जीत; किलेदार अनारसिंह मारा गया; तोपें व रसद हाथ लगी
चेलावास18 सितम्बर 1857आउवा के सैनिक बनाम AGG लॉरेन्स व मॉक मैसन की सेनाक्रांतिकारियों की जीत; मॉक मैसन का सिर काटकर आउवा दुर्ग पर लटकाया गया
नारनौल (हरियाणा)16 नवम्बर 1857शिवनाथसिंह (आसोप) की टुकड़ी बनाम ब्रिगेडियर गेरार्डक्रांतिकारी हारे, गेरार्ड मारा गया; शिवनाथसिंह ने लौटकर आत्मसमर्पण किया, जागीर ज़ब्त
  • राजस्थानी साहित्य में चेलावास की लड़ाई “गोरों और कालों का युद्ध” कहलाती है।
  • होम्स की सेना आने पर जीत की आस न देख कुशालसिंह ने लाम्बिया ठाकुर पृथ्वीसिंह को क़िला सौंपा और सलूम्बर चले गए; बाद में कोठारिया के रावत जोधसिंह ने उन्हें शरण दी।
  • 8 अगस्त 1860 को कुशालसिंह ने नीमच में आत्मसमर्पण किया; जाँच के लिए मेजर टेलर आयोग बना।

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

ट्रिक: तीन तारीख़ें — 21 अगस्त (एरिनपुरा), 8 सितम्बर (बिथौड़ा, जीत), 18 सितम्बर (चेलावास, जीत)। नाम-क्रम — खैरवा → बिथौड़ा → चेलावास → नारनौल।

2. कोटा — 15 अक्टूबर 1857

काल / क्रमघटनाविवरण
15 सितम्बर 1857बर्टन को आदेशनीमच का विद्रोह दबने के बाद बर्टन को कोटा रवाना होने का आदेश मिला।
12 अक्टूबरबर्टन कोटा मेंदो पुत्रों के साथ पहुँचा और महाराव से जयलाल, रतनलाल, जीयालाल समेत 5–6 अधिकारियों को हटाकर अंग्रेज़ों को सौंपने को कहा।
15 अक्टूबरजन-विद्रोहराजकीय सेना व जनता ने लाला जयदयाल और मेहराब खाँ की अगुवाई में महल घेरा; महाराव रामसिंह द्वितीय नज़रबंद।

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • विद्रोहियों ने मेजर बर्टन, उसके दो पुत्रों (फ्रैंक व आर्थर) और डॉक्टर सैडलर कॉटन को मार डाला; बर्टन का कटा सिर भाले पर रखकर पूरे शहर में घुमाया गया।
  • महाराव से एक संधि-पत्र पर ज़बरदस्ती दस्तख़त कराए गए, जिसमें मानना पड़ा कि बर्टन और उसके बेटों को मारने का हुक्म महाराव ने ही दिया था।
  • महाराव ने उदयपुर महाराणा से आग्रह किया कि महारानी को कोटा से उदयपुर पहुँचाने का प्रबंध हो — शहर के हालात में रनिवास की मर्यादा सँभालना मुश्किल हो चला था।

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

दमन और दंड

  • जयदयाल और मेहराब खाँ पकड़े गए और फाँसी पर चढ़ाए गए।
  • बर्टन-वध की जाँच करने वाले आयोग ने दोष महाराव पर डाला; चूक के दंड में उनकी सलामी की तोपें 17 से घटकर 13 रह गईं।
  • करौली के मदनपाल को पुरस्कार में GCSI उपाधि मिली और 17 तोपों की सलामी पाने का हक़ भी।

ट्रिक: कोटा = 15 अक्टूबर (क्रांति) और 30 मार्च 1858 (मुक्ति); नेता जयदयाल (कायस्थ) व मेहराब खाँ (रिसालदार)।

3. भरतपुर, धौलपुर, टोंक, अलवर

रियासततारीख़क्या हुआ
भरतपुर31 मई 1857शासक जसवन्तसिंह नाबालिग थे, शासन मोरिसन सँभालता था; सेना के पीछे रह गए भाग ने विद्रोह किया। गुर्जर और मेव भी खुलकर साथ आए; हालात देख मोरिसन भरतपुर से निकलकर आगरा चला गया।
धौलपुरजुलाई व 12 अक्टूबर 1857शासक भगवन्तसिंह अंग्रेज़ों के साथ थे — मथुरा-करौली में विद्रोह दबाने सेना भेजी, अंग्रेज़ों को सुरक्षित आगरा पहुँचाया। जुलाई में गुर्जर नेता देवा के साथियों ने राजकोष लूटा; अक्टूबर में ग्वालियर-इंदौर के 5000 सैनिक घुसे और धौलपुर की सेना-अधिकारी भी उनसे मिल गए; रामचन्द्र व हीरालाल के साथी सैनिक तोपें छीनकर आगरा चले गए। शासक क़ैद, 2 माह विद्रोहियों का राज; पटियाला नरेश के 2000 सिक्ख सैनिकों ने दिसम्बर 1857 में उन्हें साफ़ किया।
टोंक14 जून 1857नवाब वजीरुद्दौला अंग्रेज़ों के पक्ष में; पर नवाब की सेना ने मीर आलम खाँ (नवाब के मामा) की अगुवाई में विद्रोह किया, नीमच के सैनिकों को बुलाकर नवाब का क़िला घेरा; 600 सैनिक बहादुरशाह ज़फ़र की मदद को दिल्ली गए; मीर आलम खाँ राजकीय सेना से लड़ते मारे गए।

याद रखें: बाद में टोंक के जागीरदार नासिर मुहम्मद खाँ तात्या टोपे के पक्ष में आ गए और टोंक अपने हाथ में ले लिया; शहर जयपुर के पॉलिटिकल एजेन्ट ईडन ने वापस दिलाया (देखें: तात्या टोपे)।

4. शासक, सामंत व पुरस्कार

बूँदी के रामसिंह को छोड़कर राजस्थान के लगभग सभी शासकों ने विप्लव दबाने में अंग्रेज़ों का पूरा साथ दिया। जयपुर अकेली ऐसी रियासत थी जहाँ राजा के साथ आम जनता भी अंग्रेज़ों के पक्ष में रही।

5. शासकों का रुख़

रियासतशासक की भूमिका
जयपुररामसिंह द्वितीय ने पॉलिटिकल एजेन्ट ईडन को हर तरह की मदद का वचन दिया; षड्यंत्र रचने वाले सादुल्ला खाँ को राज्य-निकाला दिया, विलायत खाँ और उस्मान खाँ को क़ैद किया और अपना ख़ज़ाना अंग्रेज़ों के लिए खोल दिया।
उदयपुर (मेवाड़)महाराणा स्वरूपसिंह ने अंग्रेज़ों के समर्थन की साफ़ घोषणा की, जून 1857 में जागीरदारों से हर तरह की मदद की अपील निकाली और पूरी सेना पॉलिटिकल एजेन्ट शावर्स को सौंप दी।
बीकानेरसरदारसिंह अपने 5000 सवार-पैदल सैनिकों समेत हाँसी–हिसार–सिरसा के रास्ते बाडलू (तब पंजाब) तक अभियान पर गए, सिरसा में विद्रोहियों को कुचला — राज्य की सीमा लाँघकर मदद करने वाले इकलौते शासक।
  • वीर सतसई में सूर्यमल्ल मिश्रण के अनुसार महाराव रामसिंह ने तात्या टोपे को बूँदी के राजकोष से 7 लाख रुपये लूट लेने दिए।
  • राजस्थान के जिन राजाओं-सामंतों ने मदद की, उन्हें ख़िलअत, उपहार और भूमि आदि से सम्मानित किया गया।

6. अंग्रेज़ों के पुरस्कार

रियासतक्या मिला
जयपुरकोटपूतली परगना और “सितारा-ए-हिन्द” की उपाधि
बीकानेर11 अप्रैल 1861 को टिब्बी परगने के 41 गाँव
जैसलमेर2000 रुपये मूल्य की ख़िलअत

7. सलूम्बर व कोठारिया के सामंत

मारवाड़ के सामंतों की तरह खुलकर लड़ाई में नहीं उतरे, पर सलूम्बर के रावत केसरीसिंह तथा राजसमंद के कोठारिया ठिकाने के रावत जोधसिंह चौहान ने अंग्रेज़ों के विरोधियों और उनके कुनबों को पनाह दी।

ठिकानासामंतक्या किया
सलूम्बररावत केसरीसिंहमहाराणा की कंपनी सरकार से हुई संधि का खुला विरोध किया; AGG लॉरेन्स ने महाराणा से कार्रवाई को कहा, पर महाराणा हिम्मत न जुटा सके। रेज़ीडेंट के बनाए कौलनामे पर भारी दबाव के बावजूद दस्तख़त नहीं किए — इस पर बाली तहसील (मिरगेसर) के कवि राघोदास सांदू ने उनकी ख़ूब प्रशंसा की।
कोठारियारावत जोधसिंह चौहानकोठारिया में आउवा के कुशालसिंह, पेशवा नाना साहब व उनके परिजनों को ठौर मिला; तात्या टोपे को रसद पहुँचाई; भीमजी चारण (गंगापुर में अंग्रेज़ अफ़सरों की संपत्ति लूटकर आए) को भी आश्रय दिया।

8. रैपिड फायर तथ्य

  • एरिनपुरा का विद्रोह ➜ 21 अगस्त 1857 को माउंट आबू में; 23 अगस्त को एरिनपुरा में
  • आउवा के नेता ➜ ठाकुर कुशालसिंह चम्पावत
  • बिथौड़ा की लड़ाई ➜ 8 सितम्बर 1857, क्रांतिकारियों की जीत; किलेदार अनारसिंह मारा गया
  • चेलावास की लड़ाई ➜ 18 सितम्बर 1857; मॉक मैसन मारा गया — «गोरों और कालों का युद्ध»
  • कोटा का जन-विद्रोह ➜ 15 अक्टूबर 1857; नेता लाला जयदयाल व मेहराब खाँ, मेजर बर्टन मारा गया
  • भरतपुर और टोंक ➜ भरतपुर में 31 मई 1857, टोंक में 14 जून 1857 (नेता मीर आलम खाँ)
  • शासकों में अपवाद ➜ बूँदी के रामसिंह; बाकी लगभग सभी ने अंग्रेज़ों का साथ दिया
  • जनता भी अंग्रेज़ों के पक्ष में रही ➜ केवल जयपुर रियासत में
  • सीमा लाँघकर मदद करने वाला इकलौता शासक ➜ बीकानेर के सरदारसिंह

अगले भाग में तात्या टोपे का राजस्थान आना, क्रांति के असफल रहने के कारण, प्रसिद्ध कथन और अमरचन्द बाँठिया, सूर्यमल्ल मिश्रण जैसे क्रांतिकारी।

पिछला भाग: राजस्थान में 1857 की क्रांति: कारण व पृष्ठभूमि एवं प्रमुख केंद्र (भाग 1)

अगला भाग: राजस्थान में 1857 की क्रांति: तात्या टोपे एवं असफलता व अन्य तथ्य

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