सांगा का जीवन कई तारीख़ों और जगहों की लड़ी है — खातोली, बाड़ी, गागरोन, बयाना, खानवा — जिन्हें क्रम से जोड़ लें तो उत्तर अपने-आप बनने लगते हैं। इस भाग में कुम्भा का दरबार और उनका दुखद अन्त, उदा व रायमल का शासन, सांगा का परिचय और उनके युद्ध दिए हैं। फिर बाबर से खानवा की टक्कर और सांगा के बाद के बारह वर्ष आते हैं, जिनमें रतनसिंह द्वितीय, विक्रमादित्य, बनवीर और पन्नाधाय की कहानी है।
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1. कुम्भा का दरबार
| नाम | भूमिका |
|---|---|
| अत्रि भट्ट | संस्कृत विद्वान; कीर्तिस्तम्भ (विजय स्तम्भ) प्रशस्ति के रचयिता |
| महेश | अत्रि भट्ट का पुत्र |
| मंडन | प्रधान शिल्पी व साहित्यकार |
| नाथा | मंडन का भाई |
… शेष 5 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
अन्य जैन आचार्य व विद्वान — सोमसुन्दर सूरि, मुनि जिनसेन सूरि, मुनिसुन्दर, जयचन्द्र सूरि, भुवनकीर्ति, सुन्दरगणि, भुवनसुन्दर सूरि, टिल्लाभट्ट आदि।
रमाबाई (वागीश्वरी)
- कुम्भा की बेटी, बड़ी संगीतज्ञ; साहित्य में उन्हें वागीश्वरी कहा गया।
- ससुराल गिरनार (गुजरात) में — पति मंडलीक चतुर्थ।
- महमूद बेगड़ा के हमले में मंडलीक हारा और उसने इस्लाम अपना लिया; तब रमाबाई गुजरात छोड़ मेवाड़ आईं और जावर में बस गईं।
2. उदा, रायमल व उनके पुत्र
अन्तिम समय में कुम्भा उन्माद रोग से ग्रस्त थे। 1468 में कुम्भलगढ़ के मामादेव तालाब पर पूजा-भक्ति में बैठे कुम्भा को उनके ज्येष्ठ पुत्र उदयकरण (उदा) ने मार डाला।
| शासक | काल (ई.) | मुख्य घटनाएँ |
|---|---|---|
| उदा (उदयकरण) | 1468–1473 | सरदारों ने दूसरे पुत्र रायमल को ससुराल ईडर से बुलाया; रायमल ने जावर, दाड़िमपुर आदि में उदा के साथियों को हराया; दाड़िमपुर के युद्ध में उदा परास्त हुआ (5 वर्ष का शासन); डरकर पुत्रों सहित मांडू के सुल्तान ग़यासुद्दीन के पास गया, जहाँ अचानक बिजली गिरने से मृत्यु |
| रायमल | 1473–1509 | ग़यासुद्दीन उदा के बेटों सहसमल और सूरजमल को लेकर चढ़ आया — धासा में रायमल जीता; फिर सेनापति ज़फ़र ख़ाँ की सेना मांडलगढ़ के पास हारी; 1503 में ग़यासशाह का बेटा नासिर शाह चित्तौड़ तक चढ़ा, पर रायमल ने धन देकर उसे वापस भेज दिया |
- खेती को सहारा देने के लिए रायमल ने तीन जलाशय बनवाए — राम, शंकर, समयासंकट; चित्तौड़ दुर्ग में अद्भुत जी का शिव मंदिर बनवाया।
- मुख्य शिल्पी अर्जुन; विद्वान गोपाल भट्ट व महेश।
| राजकुमार | कहानी |
|---|---|
| पृथ्वीराज (सबसे बड़ा) | अच्छा धावक और कल्पनाशील होने से “उड़ना राजकुमार“; विवाह तारा से, जो टोडा के राव सुरतान की बेटी थी; अजमेर दुर्ग का जीर्णोद्धार कर पत्नी के नाम पर तारागढ़; बहनोई सिरोही के राव जगमाल के विषैले लड्डू से मृत्यु; कुम्भलगढ़ में 12 खम्भों की छतरी; 17 रानियाँ सती हुईं |
| जयमल (दूसरा) | तारा की सुन्दरता पर रीझकर ज़बरदस्ती विवाह चाहा और राव सुरतान व तारा से बदसलूकी की; क्रुद्ध सुरतान ने उसे मार दिया |
| सांगा (तीसरा) | पृथ्वीराज की तलवार की हूल से एक आँख गई; चाचा सारंगदेव ने बचाया; जयमल पीछे पड़ा — सेवन्त्री गाँव (राजसमंद) में राठौड़ बीदा ने शरण दी पर वह मारा गया; सांगा श्रीनगर (अजमेर) के कर्मचन्द पँवार के पास पहुँचा, जिसने अपनी पुत्री ब्याह दी; गद्दी मिलने तक वहीं रहा |
मेवाड़ में कोई और उत्तराधिकारी न बचा, तो रायमल ने अपने अन्तिम दिनों में अजमेर से सांगा को बुलाकर शासक बनाया। रायमल अपने जीवन में उत्तराधिकारी तय नहीं कर पाया था, इसी से पुत्रों और चचेरे भाइयों में वैमनस्य बढ़ा।
ट्रिक: तीन भाई — पृथ्वीराज (1) · जयमल (2) · सांगा (3); तारा के नाम पर तारागढ़ (अजमेर) और टोडा के राव सुरतान से जुड़ी दो मौतें।
3. राणा सांगा व खानवा
- जन्म ➜ 12 अप्रैल 1482
- माता ➜ रतन कुँवर
- राज्याभिषेक ➜ 24 मई 1509
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| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1517 | खातोली | इब्राहिम लोदी पर विजय। |
| 1518 | बाड़ी (धौलपुर) | फिर लोदी सेना पर विजय। |
| 1519 | गागरोन | महमूद ख़िलजी द्वितीय बंदी। |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
4. सांगा का परिचय
- उपनाम ➜ हिन्दूपत और सैनिकों का भग्नावशेष: युद्धों में एक हाथ और एक पैर गँवाया, शरीर पर 80 घाव खाए, फिर भी सैनिक की तरह लड़ता रहा।
- 1504 से 1508 तक गृह-कलह के कारण अज्ञातवास में रहा।
- अपने हितैषी कर्मचन्द पँवार को रावत की पदवी दी और बनेड़ा, फूलिया, मांडल, परबतसर, अजमेर समेत कई परगने जागीर में देकर उसे ताक़तवर सामन्त बना दिया।
| राज्य | सांगा के समकालीन शासक |
|---|---|
| दिल्ली | सिकन्दर लोदी (1482 – नवम्बर 1517) → इब्राहिम लोदी (नवम्बर 1517 – 1526) |
| मालवा | नासिरुद्दीन / नसीर शाह (मृत्यु दिसम्बर 1511) → महमूद ख़िलजी द्वितीय (1511–1531) |
| गुजरात | महमूद बेगड़ा (मृत्यु नवम्बर 1511) → मुज़फ़्फ़र शाह द्वितीय (1511–1526) |
याद रखें: तीनों पड़ोसी — दिल्ली (लोदी), मालवा (ख़िलजी), गुजरात (बेगड़ा/मुज़फ़्फ़र); 1511 में मालवा और गुजरात, दोनों के पुराने सुल्तान चल बसे।
5. सांगा के युद्ध
| युद्ध | वर्ष (ई.) | विरोधी | क्या हुआ |
|---|---|---|---|
| खातोली (कोटा) | 1517 | इब्राहिम लोदी (दिल्ली) | सांगा जीता; लोदी के एक बेटे को पकड़ा पर जुर्माना लेकर छोड़ दिया; इसी लड़ाई में सांगा का बायाँ हाथ कट गया और तीर से एक पैर बेकार हो गया |
| बाड़ी (धौलपुर) | 1518 | इब्राहिम लोदी (दिल्ली) | खातोली की हार का बदला लेने मियाँ हुसैन फ़रमूली व मियाँ माखन के नेतृत्व में सेना आई; सांगा की विजय |
| गागरोन | 1519 | महमूद ख़िलजी द्वितीय (मालवा) | मालवा से निकाले गए मेदिनीराय को सांगा ने गागरोन की जागीर दी; सुल्तान दण्ड देने चढ़ा, सांगा ने उसे बंदी बनाकर चित्तौड़ लाया; 6 माह रखकर एक शहज़ादे को ज़मानत में रख सुल्तान को छोड़ा |
ट्रिक: क्रम — खा-बा-गा-ई-बा-खा (खातोली, बाड़ी, गागरोन, ईडर, बयाना, खानवा); शुरू के चार 1517–1520, आख़िरी दो 1527।
6. बाबर से संघर्ष: खानवा
21 अप्रैल 1526 को पानीपत में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली ली। बाबर ने सांगा से लड़ने का बहाना ढूँढ़ा — आरोप कि सांगा वादे के मुताबिक़ पानीपत में मदद को नहीं आया। सांगा ने गागरोन की टुकड़ियाँ चित्तौड़ में जमा कीं, खण्डार और रणथम्भौर की सैनिक व्यवस्था मज़बूत की, और महमूद लोदी व हसन ख़ाँ मेवाती को शरण दी।
बयाना का युद्ध (16 फ़रवरी 1527)
पानीपत के बाद लौटती मुग़ल फ़ौज के नायक ने भरतपुर के बयाना दुर्ग पर क़ब्ज़ा जमा लिया। सांगा ने हमला किया; मेंहदी ख़्वाजा की सेना भाग गई और सांगा के सैनिकों ने किला ले लिया।
खानवा की तैयारी
- भागे सैनिकों से हाल सुन बाबर ने सेना जुटाई। काबुल से आए ज्योतिषी मुहम्मद शरीफ़ ने कहा कि मंगल पश्चिम में है, अतः पूर्व दिशा से लड़ने वाले बाबर की हार तय है।
- बाबर के सैनिकों ने सांगा की ताक़त देख लड़ने से इनकार किया। तब बाबर ने मदिरा त्यागने की क़सम खाई, सोने-चाँदी की सुराहियाँ-प्याले तुड़वाकर ग़रीबों में बँटवाए, मुग़ल व्यापारियों पर लगने वाला तमगा कर हटाने और सैनिकों को चाँदी का सिक्का देने की बात कही।
- अन्त में उसने इसे जेहाद (धर्मयुद्ध) बताकर सैनिकों को तैयार किया; खानवा में खाइयाँ खुदवाईं, तोपगाड़ियों को ज़ंजीरों से बँधवाया और पानीपत जैसी तरह तोपचियों, बन्दूक़चियों व घुड़सवारों को जमाया।
खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527)
- खानवा (भरतपुर) में गम्भीर नदी के किनारे; सुबह लगभग 9:30 बजे आरम्भ। पहली भिड़ंत में राजपूत भारी पड़े, फिर मुग़ल सेना का पलड़ा बढ़ता गया और सांगा के कई वीर मारे गए।
- सांगा के सिर पर तीर लगा; तब हलवद (काठियावाड़) के राजसिंह के बेटे झाला अज्जा ने उनका राज-मुकुट अपने सिर पर रख लिया; बेहोश सांगा को बसवा पहुँचाने का ज़िम्मा आमेर के पृथ्वीराज, जोधपुर के मालदेव और सिरोही के अखैराज ने सँभाला।
- बाबर की सेना कम और सांगा की अधिक थी, फिर भी जीत बाबर की हुई। विजय के बाद उसने मारे गए शत्रुओं की खोपड़ियों की मीनार खड़ी करवाई और ग़ाज़ी की उपाधि धारण की।
| सांगा की ओर से लड़े | रियासत / टिप्पणी |
|---|---|
| महमूद लोदी | इब्राहिम लोदी का चचेरा भाई |
| पृथ्वीराज कच्छवाहा | आमेर — वीरगति |
| मालदेव | मारवाड़ — राव गांगा का पुत्र |
| मेदिनीराय | चंदेरी — सांगा ने गागरोन की जागीर दी थी |
सांगा की हार के कारण
- सलहदी तँवर (रायसीन) और खानज़ादा (नागौर) का युद्ध के बीच बाबर की ओर मिल जाना।
- बाबर की तुलुगमा पद्धति, जो उसने उज़बेकों से सीखी थी।
- तोपों का भारत में पहला प्रयोग; राजपूत केवल धनुष-बाण, भाले, तलवारें और बर्छियों पर निर्भर थे।
ओझा के अनुसार हार का प्रमुख कारण यह था कि बयाना जीतने के तुरन्त बाद सांगा ने बाबर पर हमला नहीं किया और उसे तैयारी का पूरा समय दे दिया।
7. सांगा के बाद: 12 वर्ष
- बसवा (दौसा) ➜ घायल सांगा को पालकी में यहाँ लाया गया; होश आते ही वह फिर रणभूमि जाने को तैयार था।
- ईरिच ➜ सांगा ने सामन्तों को पत्र लिखे और बाबर को हराने की शपथ लेकर योजना बनाने ईरिच के मैदान में पहुँचा।
- कालपी ➜ साथियों ने ही सांगा को ज़हर दे दिया; 30 जनवरी 1528 को वहीं (आज के उत्तर प्रदेश में) निधन हुआ। शव मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) लाकर दाह-संस्कार हुआ; वहीं 8 खम्भों की छतरी।
रतनसिंह द्वितीय (1528–1531)
सांगा अपने जीवनकाल में ही हाड़ा-कन्या (बूँदी) कर्मावती (करमेती) को बहुत मानते थे; उन्होंने उसे और उसके पुत्रों विक्रमादित्य व उदयसिंह को रणथम्भौर की जागीर व दुर्ग दे दिया था। 1531 में बूँदी में आहेरिया उत्सव के समय सूरजमल हाड़ा ने रतनसिंह को बुलाया; शिकार के दौरान विवाद हुआ और दोनों लड़ते हुए मारे गए। (रतनसिंह धनबाई का पुत्र था।)
भोजराज सांगा के पुत्र थे, पत्नी मीराबाई (मेड़ता के रतनसिंह की पुत्री)। खातोली के युद्ध में घायल हुए और काफ़ी समय बाद उनकी मृत्यु हो गई।
विक्रमादित्य (1531–1536) और दूसरा साका
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1532 | बहादुरशाह का पहला हमला | गुजरात के बहादुरशाह ने मुहम्मद ख़ाँ असीरी व ख़ुदावन्द ख़ाँ को भेजा; सेनापति तातार ख़ाँ भी आया, फिर सुल्तान स्वयं। |
| 24 मार्च 1533 | संधि | रणथम्भौर का क़िला और धन सौंपकर कर्मावती ने बहादुरशाह से समझौता किया। |
| जनवरी 1535 | दूसरा हमला | घेरे का पूरा काम रूमी ख़ाँ के हाथ। |
साके से पहले कर्मावती ने दोनों बेटों को ननिहाल बूँदी पहुँचाया और प्रतापगढ़ (देवलिया) के रावत बाघसिंह को महाराणा की ओर से प्रतिनिधि ठहराया। बहादुरशाह ने जीतने के बाद चित्तौड़ बुरहान-उल-मुल्क बम्बानी को सौंपा।
बनवीर (1536–1540)
- 1536 में पृथ्वीराज सिसोदिया की दासी पुतल दे के पुत्र बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या की और शासक बन बैठा।
- वह उदयसिंह को मारने कुम्भा महल पहुँचा; पर पन्नाधाय को पहले ही ख़बर लग गई थी।
- पन्नाधाय ने उदयसिंह को खाली टोकरी में सुलाकर महल से बाहर भिजवाया और उसकी जगह अपने पुत्र चन्दन को सुला दिया; बनवीर चन्दन को मारकर चला गया।
| पन्नाधाय | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 8 मार्च 1490, माताजी की पाण्डोली (चित्तौड़गढ़) |
| ससुराल | कमेरी गाँव (आमेट, राजसमंद) |
| पति | पति सूरजमल चौहान (गुर्जर) मेवाड़ की सेना के सिपाही थे; 1535 के हमले में काम आए |
रिवीजन पॉइंटर्स
- कुम्भा के दरबार में अत्रि भट्ट ने विजय स्तम्भ की प्रशस्ति रची और मंडन प्रधान शिल्पी व साहित्यकार थे; बेटी रमाबाई वागीश्वरी कहलाईं।
- 1468 में कुम्भलगढ़ के मामादेव तालाब पर कुम्भा को उनके ज्येष्ठ पुत्र उदा (उदयकरण) ने मार डाला; उदा का शासन 1468–1473 रहा और दाड़िमपुर में वह हारा।
- रायमल (1473–1509) ने अन्तिम दिनों में सांगा को अजमेर से बुलाकर शासक बनाया; तीन भाई थे — पृथ्वीराज, जयमल और सांगा।
- सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 को हुआ और राज्याभिषेक 24 मई 1509 को; उपनाम हिन्दूपत।
- युद्ध-क्रम — खातोली (1517), बाड़ी (1518), गागरोन (1519); पहले दो इब्राहिम लोदी के विरुद्ध, तीसरा महमूद ख़िलजी द्वितीय के; खातोली में सांगा का बायाँ हाथ कटा।
- बाबर ने पानीपत (21 अप्रैल 1526) में लोदी को हराया; बयाना (16 फ़रवरी 1527) में सांगा जीता, पर खानवा (17 मार्च 1527) में जीत बाबर की हुई।
- सांगा की हार के कारण — सलहदी तँवर व खानज़ादा का बाबर से मिल जाना, तुलुगमा पद्धति और भारत में तोपों का पहला प्रयोग।
- सांगा का निधन 30 जनवरी 1528 को कालपी में हुआ; मांडलगढ़ में उनकी 8 खम्भों की छतरी है।
- 1536 में बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या की, और पन्नाधाय ने अपने पुत्र चन्दन को सुलाकर उदयसिंह को बचा लिया।
अगले भाग में उदयसिंह का दौर, चित्तौड़ का तीसरा साका, महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक, हल्दीघाटी, भामाशाह, दिवेर और चावण्ड आएँगे।
पिछला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: बप्पा से रावल रतनसिंह (भाग 2) एवं हम्मीर से मोकल
अगला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: उदयसिंह व प्रताप (भाग 1)
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