राजपूतों की उत्पत्ति: एक नज़र में – Rajasthan History Chapter 9

राजपूत काल की शुरुआत, «राजपूत» शब्द का अर्थ और अग्निकुण्ड, ब्राह्मण, विदेशी, भारतीय क्षत्रिय व मिश्रित मूल के सभी मत।

8 min read Updated Notes in Hindi
In this chapter (17 sections)
  1. एक नज़र में
  2. राजपूत काल
  3. “राजपूत” शब्द
  4. अग्निकुण्ड से उत्पत्ति
  5. अग्निकुण्ड की कथा
  6. समर्थक और आलोचक
  7. ब्राह्मणों से उत्पत्ति
  8. प्रवर्तक व तर्क
  9. शिलालेख व ग्रन्थ
  10. कर्नल टॉड
  11. स्मिथ · कनिंघम · भंडारकर
  12. भारतीय क्षत्रिय मूल
  13. सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी
  14. वैदिक आर्यों की सन्तान
  15. मिश्रित मूल व निष्कर्ष
  16. वंश-रियासत तालिका
  17. रैपिड फायर तथ्य

राजपूतों के इतिहास का सबसे उलझा सवाल यही है कि वे आए कहाँ से — और हर मत के साथ उसका प्रवर्तक तथा उसका आलोचक जुड़ा हुआ है। इसलिए किसने क्या कहा और किसने खंडन किया, इन जोड़ियों को साथ-साथ याद रखना ज़रूरी है। इस भाग में राजपूत काल और शब्द का अर्थ, अग्निकुण्ड की कथा, ब्राह्मण मूल, विदेशी मूल (टॉड, स्मिथ, कनिंघम, भंडारकर), भारतीय क्षत्रिय मूल, मिश्रित मूल का निष्कर्ष और अंत में राजवंश-रियासत तालिका दी गई है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राजपूतों की उत्पत्ति, 4 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 चार्ट, 24 फ्लैशकार्ड और 12 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एक नज़र में

मतप्रमुख प्रवर्तक / समर्थकखंडन करने वाले
अग्निकुण्डचन्दबरदाई (प्रवर्तक), मुहणौत नैणसी, सूर्यमल्ल मिश्रणओझा, दशरथ शर्मा, सी.वी. वैद्य, ईश्वरीप्रसाद
ब्राह्मण वंशडॉ. भंडारकर, डॉ. गोपीनाथ शर्माओझा, सी.वी. वैद्य, दशरथ शर्मा
विदेशी (शक/सीथियन)कर्नल जेम्स टॉडडॉ. ओझा
सूर्य–चन्द्रवंशीअग्निपुराण, डॉ. दशरथ शर्मा—

… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: विदेशी मूल के तीन जोड़े — टॉड → शक, स्मिथ → हूण, कनिंघम → कुषाण; भारतीय मूल के नाम — ओझा और वैद्य (वैदिक आर्य/क्षत्रिय)।

2. राजपूत काल

राजपूत राजवंश कैसे उभरे

  1. हर्ष की मृत्यु (647 ई.)
  2. गुप्तकालीन राजनीतिक एकता टूटी
  3. उत्तर भारत में अनेक छोटे राज्य

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

काल / क्रमघटनाविवरण
647 ई.हर्षवर्धन की मृत्युराजपूत काल की शुरुआत मानी जाती है।
7वीं शताब्दी“राजपूत” शब्द का पहला प्रयोगयह संस्कृत राजपुत्र का बिगड़ा रूप है।
8वीं शताब्दी तकशब्द का अर्थजाति नहीं — शासक वर्ग या कुलीन क्षत्रिय।

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

हर्ष के बाद गुप्तों वाली राजनीतिक एकता बिखर गई, और उसकी जगह कई छोटी रियासतें आपस में भिड़ती रहीं। इन्हीं झगड़ों से जो नए राजवंश उभरे, वे राजपूत कहलाए।

याद रखें: दो तारीख़ें याद रखें — 647 ई. (हर्ष की मृत्यु) और 1206 ई. (दिल्ली पर गुलामों का अधिकार); सुविधा के लिए 700–1200 ई.।

3. “राजपूत” शब्द

  • राजपूत शब्द संस्कृत राजपुत्र का ही रूपान्तर है; सातवीं शताब्दी में इसका प्रयोग मिलने लगता है।
  • तुर्क–मुस्लिम हमलों के पूर्व इस भूमि के हर शासक को बस क्षत्रिय कहा जाता था; आगे चलकर वही शासक-वर्ग राजपूत नाम से पुकारा जाने लगा।

ओझा का मत

गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के अनुसार यह शब्द नया नहीं है — प्राचीन ग्रन्थों में इसका ख़ूब प्रयोग है।

ग्रन्थलेखक
अर्थशास्त्रचाणक्य (कौटिल्य)
नाटककालिदास
हर्षचरितबाणभट्ट

ध्यान दें: आठवीं सदी तक “राजपूत” = शासक वर्ग / कुलीन क्षत्रिय, कोई जाति नहीं।

4. अग्निकुण्ड से उत्पत्ति

ट्रिक: अग्निकुण्ड के चार वंश — प्रतिहार, परमार, चालुक्य (सोलंकी) और चौहान; चौथा सबसे बलवान।

5. अग्निकुण्ड की कथा

कथा के पाँच चरण

  1. आबू पर ऋषि यज्ञ कर रहे थे
  2. दानवों ने यज्ञ अपवित्र किया
  3. वशिष्ठ ने यज्ञ से तीन योद्धा उपजाए
  • इस मत के प्रवर्तक चन्दबरदाई हैं, ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो।
  • आबू पर्वत पर विश्वामित्र, गौतम, अगस्त्य आदि ऋषि अनुष्ठान करते थे; दानव मांस, हड्डियाँ और मल-मूत्र डालकर उसे अपवित्र कर देते थे।
  • असुरों को मिटाने के लिए वशिष्ठ ने हवन-कुण्ड से तीन वीर प्रकट किए — प्रतिहार, परमार, चालुक्य।
  • तीनों रक्षा न कर सके, तब वशिष्ठ ने चौथा योद्धा उपजाया — पहले तीनों से ज़्यादा ताक़तवर और शस्त्रों से लैस; नाम पड़ा वाहमान (चौहान)।
  • ग्रन्थ ➜ पृथ्वीराज रासो
  • प्रवर्तक ➜ चन्दबरदाई (सर्वप्रथम)
  • स्थान ➜ आबू पर्वत

6. समर्थक और आलोचक

पक्षविद्वानकथन
समर्थनचन्दबरदाईरासो में मत का पहला प्रतिपादन
समर्थनमुहणौत नैणसीअग्निकुण्ड मत का समर्थन
समर्थनसूर्यमल्ल मिश्रणअग्निकुण्ड मत का समर्थन
खंडनडॉ. ओझारासो के सहारे इन चार वंशों को अग्निवंशी मानना विद्वानों की हठधर्मिता है

7. ब्राह्मणों से उत्पत्ति

इस मत के अनुसार कुछ बड़े राजपूत वंश मूलतः ब्राह्मण थे। सबसे पहले डॉ. भंडारकर ने गुहिलों को नागर ब्राह्मण बताया; बाद में गोपीनाथ शर्मा ने इसे आगे बढ़ाया।

8. प्रवर्तक व तर्क

  • गुहिलों को नागर ब्राह्मण कुल से निकला हुआ सबसे पहले डॉ. भंडारकर ने ठहराया।
  • आधार बिजौलिया शिलालेख है, जो वासुदेव चौहान के वंशज सामन्त को वत्स गोत्र का ब्राह्मण ठहराता है।
  • भंडारकर का तर्क है कि ब्राह्मण राजशेखर ने अवन्ती सुन्दरी (चौहान कुल की) से विवाह किया — यही चौहानों के ब्राह्मण मूल की पक्की दलील है।

9. शिलालेख व ग्रन्थ

साक्ष्यकिसके लिएक्या कहता है
बिजौलिया शिलालेखचौहानसामन्त — वत्स गोत्रीय ब्राह्मण
मंडोर शिलालेख (जोधपुर)प्रतिहारब्राह्मण हरिश्चन्द्र और उनकी पत्नी भद्रा की सन्तान
आबू के प्रतिहारप्रतिहारवशिष्ठ ऋषि की सन्तान
कुम्भलगढ़ प्रशस्तिगुहिल (बप्पा रावल)आनन्दपुर का ब्राह्मण वंश

ब्राह्मण-मूल की यह बात ओझा, सी.वी. वैद्य और दशरथ शर्मा को मंज़ूर नहीं थी।

10. कर्नल टॉड

  • बाहर से आने का विचार सबसे पहले कर्नल जेम्स टॉड ने उठाया — उनके हिसाब से राजपूत शक (सीथियन) लोगों की सन्तान हैं।
  • टॉड ने अग्निकुण्ड की कथा को भी स्वीकारा। एनाल्स एण्ड एन्टिक्विटिज़ ऑफ़ राजस्थान में उनका कहना है कि ये परदेशी लोग लगभग छठी शताब्दी में भारत में घुसे, यहाँ की सत्ता जीती और राजा बन बैठे।
  • बाद में अग्नि संस्कार से शुद्ध करके उन्हें भारत की जाति-व्यवस्था में क्षत्रिय वर्ण में ले लिया गया।

टॉड का क्रम

  1. विदेशी जातियाँ (शक/सीथियन) छठी सदी में आईं
  2. भारतीय राज्य जीते
  3. अग्नि संस्कार से शुद्धि

11. स्मिथ · कनिंघम · भंडारकर

विद्वानमततर्क / कथन
वी.ए. स्मिथहूणों की सन्तानअर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया के अनुसार राजपूत आठवीं–नौवीं शताब्दी में अचानक दिखाई दिए
कनिंघमयू–ची (कुषाण)राजपूतों को यू–ची जाति का वंशज मानकर कुषाणों से जोड़ा
डॉ. भंडारकरगुर्जरराजपूत गुर्जरों की सन्तान हैं जो हूणों के साथ आए

12. भारतीय क्षत्रिय मूल

इन मतों के अनुसार राजपूत बाहर से नहीं आए — वे प्राचीन भारत के क्षत्रिय हैं: कोई सूर्यवंश या चन्द्रवंश से, तो कोई वैदिक आर्यों के राजन्य वर्ग से।

13. सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी

साक्ष्यक्या कहता है
अग्निपुराणराजपूत चन्द्रवंशी कृष्ण–अर्जुन तथा सूर्यवंशी राम व लव–कुश की सन्तति हैं
डॉ. दशरथ शर्माराजपूतों को सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी कहा
हर्षनाथ शिलालेख (सीकर)चौहानों को सूर्यवंशी बताया

14. वैदिक आर्यों की सन्तान

डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा और सी.वी. वैद्य के अनुसार राजपूत भारत के आर्यों में राजन्य (क्षत्रिय) वर्ग से निकले हैं।

तर्कआधार
अस्त्र-पूजाराजपूत प्राचीन क्षत्रियों की तरह शस्त्र पूजते हैं
यज्ञ और बलिप्राचीन आर्यों की भाँति इनमें आस्था रही
शारीरिक बनावटसुडौल गठन, ऊँची नाक और लम्बा सिर — आर्य लक्षण
  • मनुस्मृति राजपूतों का आदि ब्रह्मा को बताती है।
  • ऋग्वेद की कल्पना में क्षत्रिय ब्रह्मा की भुजाओं से जन्मे।

15. मिश्रित मूल व निष्कर्ष

  • सबसे ज़्यादा स्वीकार्य मिश्रित मूल का सिद्धान्त है, जिसके पक्ष में देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय खड़े हैं।
  • राजपूतों की उत्पत्ति के लिए कोई एक निश्चित मत तय करना कठिन है।
  • यह प्रश्न आज भी अनुसंधान का विषय है।
वर्गमतप्रमुख नाम
विदेशीशक/सीथियन · कुषाण · हूण · गुर्जरटॉड · कनिंघम · स्मिथ · भंडारकर
भारतीय क्षत्रियसूर्य–चन्द्र · वैदिक आर्यअग्निपुराण · दशरथ शर्मा · ओझा · वैद्य
ब्राह्मण / अग्निब्राह्मण वंश; अग्निकुण्डभंडारकर · गोपीनाथ शर्मा; चन्दबरदाई

16. वंश-रियासत तालिका

क्र.राजवंशरियासतें
1गुहिलमेवाड़, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, शाहपुरा
2चौहानसाँभर, अजमेर, रणथम्भौर, नाडौल, जालौर, सिरोही, हाड़ौती, गागरोन
3राठौड़जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़
4कच्छवाहाआमेर, जयपुर, अलवर

17. रैपिड फायर तथ्य

  • राजपूत काल की शुरुआत ➜ हर्षवर्धन की मृत्यु, 647 ई.
  • «राजपूत» शब्द ➜ संस्कृत राजपुत्र का रूपान्तर; सातवीं शताब्दी से प्रयोग, आठवीं सदी तक अर्थ शासक वर्ग, जाति नहीं
  • अग्निकुण्ड मत के प्रवर्तक ➜ चन्दबरदाई (ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो, स्थान आबू पर्वत)
  • अग्निकुण्ड के चार वंश ➜ प्रतिहार, परमार, चालुक्य (सोलंकी) और चौहान
  • गुहिलों को नागर ब्राह्मण बताने वाले पहले विद्वान ➜ डॉ. भंडारकर
  • विदेशी मूल के तीन जोड़े ➜ टॉड → शक, स्मिथ → हूण, कनिंघम → कुषाण
  • सूर्य–चन्द्रवंशी मत ➜ अग्निपुराण व डॉ. दशरथ शर्मा; हर्षनाथ शिलालेख (सीकर) चौहानों को सूर्यवंशी कहता है
  • वैदिक आर्यों के राजन्य वर्ग से उत्पत्ति ➜ ओझा और सी.वी. वैद्य का मत
  • सबसे ज़्यादा स्वीकार्य मत ➜ मिश्रित मूल, जिसके पक्ष में देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय हैं

अगले भाग में प्रतिहार वंश का नाम, उसकी उत्पत्ति के मत, मूल स्थान और शाखाओं की सूची आएगी, साथ ही नागभट्ट प्रथम से मिहिरभोज तक का सफ़र।

पिछला भाग: पौराणिक स्वरूप व जनपद युग: मौर्य व विदेशी आक्रमण एवं गुप्त व हूण

अगला भाग: प्रतिहार वंश (गुर्जर–प्रतिहार): मण्डोर व भड़ौच शाखा एवं भीनमाल व कन्नौज शाखा

इन्हें भी पढ़ें: प्रतिहार वंश (गुर्जर–प्रतिहार) · चौहान राजवंश

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