चौहानों को याद रखने का आसान तरीका यह है कि सारी शाखाएँ सांभर की एक ही जड़ से निकली हैं, बस आगे चलकर धाराएँ अलग-अलग दिशाओं में बँट गईं। इस भाग में शाखाओं और संस्थापकों की सूची, उत्पत्ति के सात मत और मूल स्थान दिए हैं। इसके बाद वासुदेव से अजयराज, अर्णोराज और विग्रहराज चतुर्थ तक के शासक आते हैं, और अन्त में पृथ्वीराज तृतीय का बचपन, महोबा व चालुक्यों से टक्कर तथा गहड़वालों से शत्रुता।
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1. एक नज़र में
चौहानों की सारी शाखाएँ सांभर (शाकम्भरी) की जड़ से निकलीं। एक धारा अजमेर → रणथम्भौर की ओर गई, दूसरी नाडौल से होकर जालौर, सिवाणा, सिरोही और बूँदी → कोटा तक पहुँची।
| शाखा | संस्थापक | वर्ष (ई.) | आज का क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| शाकम्भरी (सांभर) | वासुदेव | 551 | सांभर झील — जयपुर / नागौर |
| नाडौल | लक्ष्मण (लाखनसी) | 960 | नाडौल — पाली |
| अजमेर | अजयराज | 1113 | अजमेर |
| जालौर (सोनगरा) | कीर्तिपाल | 1181 | जालौर |
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| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 551 | वासुदेव | सांभर के चौहान राज्य की स्थापना |
| 960 | लक्ष्मण | नाडौल शाखा |
| 1113 | अजयराज | अजमेर नगर और चौहान राजधानी |
| 1181 | कीर्तिपाल | जालौर के सोनगरा चौहान |
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ट्रिक: संस्थापकों की क्रम-पंक्ति — वा·ल·अ·की·गो·दे·लू·मा = वासुदेव, लक्ष्मण, अजयराज, कीर्तिपाल, गोविन्दराज, देवा, लूम्बा, माधोसिंह (551 → 960 → 1113 → 1181 → 1194 → 1241 → 1311 → 1631)।
2. उत्पत्ति व मूल स्थान
चौहानों की उत्पत्ति पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। मुख्य मत सात हैं — अग्निवंशी, सूर्यवंशी, विदेशी, ब्राह्मणवंशी, चन्द्रवंशी, इन्द्रवंशी और खज जाति।
राजधानी का सफ़र
- अहिछत्रपुर (नागौर)
- शाकम्भरी (सांभर)
- अजमेर
3. उत्पत्ति के मत
| मत | समर्थक / प्रमाण |
|---|---|
| अग्निवंशी | चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो), मुहणोत नैणसी, सूर्यमल्ल मिश्रण — वशिष्ठ ऋषि ने आबू के अग्निकुण्ड से उत्पन्न किया |
| सूर्यवंशी | जयानक (पृथ्वीराज विजय), नयनचन्द्र सूरि (हम्मीर महाकाव्य), जोधराज (हम्मीर रासो), नरपति नाल्ह (बीसलदेव रासो), ओझा |
| विदेशी | कर्नल टॉड, वी.ए. स्मिथ, विलियम क्रुक — रीति-रिवाज के आधार पर; टॉड ने अग्निवंशी मानकर भी इन्हें मध्य एशिया से आया बताया |
| ब्राह्मणवंशी | जान कवि (कायम खाँ रासो), दशरथ शर्मा, भण्डारकर, बिजोलिया शिलालेख, चन्द्रावती का लेख |
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याद रखें: बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.) चौहानों को “विप्र श्रीवत्सगोत्रभूत” कहता है यानी वत्स गोत्र के ब्राह्मण।
ट्रिक: सूर्यवंशी मत के चार ग्रंथ — पृथ्वीराज विजय · हम्मीर महाकाव्य · हम्मीर रासो · बीसलदेव रासो; अग्निवंशी मत के तीन नाम — चन्दबरदाई, नैणसी, सूर्यमल्ल।
4. मूल स्थान व नाम
- आदि-क्षेत्र सपादलक्ष था, यानी सांभर झील के इर्द-गिर्द की धरती। पृथ्वीराज विजय, शब्दकल्पद्रुम कोष और लाडनूँ के लेख में उनका निवास जांगल देश, सपादलक्ष, अहिछत्रपुर आदि बताया गया है।
- इसीलिए उन्हें “सपादलक्षीय नृपति” भी कहा गया; सबसे पहली राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर)।
- राज्य बढ़ने पर राजधानी शाकम्भरी (सांभर) हुई और आगे चलकर अजमेर।
- मूल क्षेत्र ➜ सपादलक्ष
- पहली राजधानी ➜ अहिछत्रपुर
- दूसरी ➜ शाकम्भरी (सांभर)
5. शाकम्भरी व अजमेर के चौहान
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 551 | वासुदेव | सांभर में चौहान राज्य |
| 960 | वाक्पतिराज प्रथम का पुत्र लक्ष्मण | नाडौल की नींव |
| 973 | हर्ष शिलालेख | विग्रहराज द्वितीय के समय |
| 1105 | पृथ्वीराज प्रथम / अजयराज | पुष्कर में 700 चालुक्य मारे; अजयराज का आरंभ |
6. वासुदेव से पृथ्वीराज प्रथम
| शासक | रिश्ता | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| वासुदेव | आदिपुरुष | 551 ई. में सांभर झील के आसपास राज्य; राजधानी अहिछत्रपुर; बिजोलिया लेख (1170) के अनुसार सांभर झील उसी ने बनवाई; “चौहानों का आदि पुरुष” |
| गुवक प्रथम | नागभट्ट द्वितीय का सामन्त | चौहानों को प्रतिहारों की अधीनता से मुक्त कर स्वतंत्र शासन शुरू किया; हर्षनाथ मंदिर (सीकर) की नींव का श्रेय — यही चौहानों के इष्ट देव |
| गुवक द्वितीय | — | शक्ति बढ़ाने के लिए बहन कलावती का विवाह कन्नौज के भोजराज से किया |
| चन्दनराज | गुवक द्वितीय का पुत्र | दिल्ली के तोमरों को हराया; पत्नी रुद्राणी (आत्मप्रभा) शिवभक्त — रोज़ 1000 दीप जलाकर पुष्कर झील में बहाती थी |
याद रखें: चौहानों ने शुरू में प्रतिहारों की सामन्ती निभाई — गुवक प्रथम (नागभट्ट द्वितीय के) और सिंहराज (देवपाल के); स्वतंत्रता की पहल गुवक प्रथम ने की।
7. अजयराज
पृथ्वीराज प्रथम का पुत्र; चौहानों का दूसरा प्रतापी शासक। उसका काल “चौहानों के साम्राज्य-निर्माण का काल” कहलाता है।
| काम | ब्योरा |
|---|---|
| मालवा की विजय | परमार नरवर्मन को उज्जैन पर चढ़कर हराया; सेनापति सुल्हण बंदी; सीमा मालवा तक |
| अजमेर नगर (1113) | अजयमेरु नाम से बसाया; बीठली पहाड़ी पर अजयमेरु दुर्ग (तारागढ़); राजधानी सांभर से अजमेर |
| ग़ज़नी के मुसलमान | पृथ्वीराज विजय के अनुसार शासन के आरंभ में ही हराया |
अजयराज का क्रम
- मालवा विजय
- अजमेर नगर 1113
- तारागढ़
8. अर्णोराज
- आनाजी / अर्णोराज ➜ शासन 1133–1155 ई.; उपाधि परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर।
- राज्य-विस्तार को लेकर चालुक्य जयसिंह (सिद्धराज) से 1134 में मतभेद, अंत में सन्धि; जयसिंह ने बेटी कांचन देवी का विवाह अर्णोराज से किया।
- 1142 में कुमारपाल चालुक्य बना तो फिर संघर्ष हुआ।
- प्रबन्धकोष (राजशेखर सूरि) के अनुसार चौसर की बैठक में अर्णोराज और रानी देवल देवी (कुमारपाल की बहन) मज़ाक़ में एक-दूसरे के कुल को कोसने लगे; इससे ख़फ़ा होकर कुमारपाल चढ़ आया।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1134 | जयसिंह सिद्धराज | मतभेद → सन्धि → कांचन देवी से विवाह |
| 1142 | कुमारपाल | गद्दी पर आते ही चौहान-चालुक्य संघर्ष |
| 1145 | आबू के निकट | कुमारपाल की जीत; अजमेर तक पहुँचा; सन्धि |
9. विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव)
- बीसलदेव / विग्रहराज चतुर्थ (1158–1163) — पिता के हत्यारे जगदेव को हटाकर शासक बना।
- विद्वानों का आश्रयदाता, इसलिए जयानक भट्ट ने उपाधि दी “कवि-बान्धव”; मृत्यु पर पृथ्वीराज विजय का लेखक कहता है कि यह उपाधि अर्थहीन हो गई।
- साम्राज्य शिवालिक पहाड़ी, सहारनपुर और उत्तर प्रदेश तक फैला।
- चालुक्य कुमारपाल से पाली, नागौर और जालौर के क्षेत्र जीते; भण्डानकों को भी हराया।
| निशानी | ब्योरा |
|---|---|
| सरस्वती कण्ठाभरण | अजमेर की संस्कृत पाठशाला; मोहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वाकर मस्जिद बनवाई |
| दिल्ली-शिवालिक स्तम्भ लेख (1163) | उसने देश के मुसलमानों का सफ़ाया किया और उत्तराधिकारियों को आदेश दिया कि उन्हें अटक नदी के पार तक सीमित रखें |
| एकादशी पर पशुवध-निषेध | दरबारी विद्वान धर्मघोष सूरि के कहने पर |
10. जगदेव से सोमेश्वर तक
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| जगदेव | 1155–1158 | अर्णोराज का हत्यारा बेटा; बीसलदेव ने हटाया |
| अपरगांगेय | बीसलदेव के बाद | बीसलदेव का बेटा; जगदेव के बेटे पृथ्वीराज द्वितीय के हाथों मारा गया |
| पृथ्वीराज द्वितीय | 1164–1169 | पत्नी सुहिया देवी ने मेनाल में सुहवेश्वर शिव मंदिर बनवाया |
11. पृथ्वीराज तृतीय
- जन्म ➜ 1166 — अन्हिलवाड़ा (गुजरात)
- राज्यारोहण ➜ 1177, उम्र 11
- उपनाम ➜ दल पंगूल · राय पिथौरा
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1166 | जन्म | अन्हिलवाड़ा (अन्हिलपाटन), गुजरात |
| 1177 | राज्यारोहण | पिता सोमेश्वर की मृत्यु; उम्र 11 वर्ष |
| 1178 | गुड़गाँव का युद्ध | नागार्जुन का विद्रोह दबाया |
| 1182 | भण्डानक व महोबा | भण्डानकों का दमन; महोबा पर विजय |
12. बाल्यकाल व शुरुआती संघर्ष
- पिता सोमेश्वर के निधन (1177) पर पृथ्वीराज मात्र 11 वर्ष का बालक था, इसलिए माता कर्पूरी देवी ने कुशलता से शासन सँभाला।
- अल्पवयस्कता में शासन में मदद ➜ मुख्यमंत्री कदम्बवास (कैमास); सेनाध्यक्ष भुवनमल्ल।
- गद्दी पर बैठते ही उसने ख़ुद को चारों ओर से शत्रुओं से घिरा पाया और धीरे-धीरे उनका सफ़ाया शुरू किया।
आरंभिक कदम
- 11 साल में राजा (1177)
- माता का संरक्षण + कैमास
- नागार्जुन का दमन (1178)
13. महोबा व चालुक्यों से संघर्ष
महोबा विजय (तुमुल का युद्ध), 1182
- दिल्ली से लौटते पृथ्वीराज के घायल सिपाहियों को महोबा में चन्देल राजा परमार्दिदेव ने मरवा दिया।
- बदला लेने पृथ्वीराज बड़ी सेना लेकर चला; घबराकर परमार्दि ने पुराने सेनानायक आल्हा और ऊदल को वापस बुलाया।
- विजय पृथ्वीराज की हुई; आल्हा-ऊदल वीरता से लड़ते हुए मारे गए। पृथ्वीराज ने सामन्त पज्जुनराय को महोबा का अधिकारी बनाया।
चालुक्य भीमदेव द्वितीय से
- मारवाड़ में चौहानों और चालुक्यों की सरहदें मिलती थीं; भीमदेव द्वितीय की नज़र शाकम्भरी को अपने राज्य में जोड़ने पर थी।
- लड़ाइयों में कभी भीमदेव के सेनापति जगदेव प्रतिहार की जीत होती, कभी पृथ्वीराज की; 1184 में नागौर के युद्ध के दौरान सन्धि हो गई।
अच्छन कुमारी (इच्छिनी) की कथा
रासो-परम्परा की कथा में आबू के परमार नरेश सलख / जैतसिंह की पुत्री अच्छन कुमारी पृथ्वीराज के शौर्य की प्रशंसक थी और उसी से ब्याह चाहती थी; भीमदेव द्वितीय भी उससे विवाह चाहता था। भीमदेव ने आबू पर हमला किया, जैतसिंह ने सोमेश्वर से मदद माँगी और युद्ध में सोमेश्वर 1177 में मारा गया। आगे चलकर अच्छन पृथ्वीराज तृतीय की रानी बनी।
14. चौहान–गहड़वाल शत्रुता
- कन्नौज के जयचन्द गहड़वाल रिश्ते में पृथ्वीराज तृतीय के मौसेरे भाई थे और अपने राज्य की सीमाएँ बढ़ाने के इच्छुक थे।
- रासो-परम्परा ➜ दिल्ली के निःसन्तान राजा अनंगपाल तोमर ने अपने नाती पृथ्वीराज को दिल्ली सौंपी; इसी से जयचन्द और पृथ्वीराज में वैमनस्य बढ़ा।
घटनाक्रम
- संयोगिता (जयचन्द की पुत्री) का पृथ्वीराज से प्रेम
- जयचन्द ने स्वयंवर रखा — पृथ्वीराज को नहीं बुलाया
- अपमान के लिए उसकी मूर्ति द्वारपाल की जगह
| इतिहासकार / स्रोत | संयोगिता-कथा पर मत |
|---|---|
| अबुल फ़ज़ल | कथा का वर्णन किया |
| सी.वी. वैद्य, डॉ. गोपीनाथ शर्मा | कथा को स्वीकार करते हैं |
| डॉ. गौरीशंकर ओझा | इसे कपोल-कल्पना मानते हैं |
15. रैपिड फायर तथ्य
- सांभर के चौहान राज्य के संस्थापक ➜ वासुदेव (551 ई.)
- राजधानी का सफ़र ➜ अहिछत्रपुर (नागौर) → शाकम्भरी (सांभर) → अजमेर
- आदि-क्षेत्र ➜ सपादलक्ष, यानी सांभर झील के आसपास की धरती
- बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.) ➜ चौहानों को वत्स गोत्र का ब्राह्मण बताता है
- अजमेर नगर की स्थापना ➜ अजयराज, 1113 में; नाम अजयमेरु, दुर्ग तारागढ़
- कवि-बान्धव ➜ विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव), शासन 1158–1163
- सरस्वती कण्ठाभरण ➜ अजमेर की संस्कृत पाठशाला, जिसे ऐबक ने तुड़वाकर मस्जिद बनवाई
- पृथ्वीराज तृतीय ➜ जन्म 1166 अन्हिलवाड़ा में; राज्यारोहण 1177 में, उम्र 11 वर्ष
- महोबा विजय (तुमुल का युद्ध) ➜ 1182; आल्हा-ऊदल लड़ते हुए मारे गए
अगले भाग में पृथ्वीराज तृतीय की कहानी आगे बढ़ेगी — गौरी से संघर्ष और तराईन के दोनों युद्ध — फिर नाडौल की शाखा और रणथम्भौर के गोविन्दराज से हम्मीर के साके तक का सफ़र।
पिछला भाग: प्रतिहार वंश (गुर्जर–प्रतिहार): मण्डोर व भड़ौच शाखा एवं भीनमाल व कन्नौज शाखा
अगला भाग: चौहान राजवंश: पृथ्वीराज तृतीय (भाग 2) एवं नाडौल व रणथम्भौर
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