चौहान राजवंश: जालौर, सिवाणा व सिरोही एवं हाड़ौती — बूँदी व कोटा – Rajasthan History Chapter 13

जालौर, सिवाणा और सिरोही की चौहान शाखाएँ, दो साके तथा हाड़ौती में बूँदी-कोटा के शासकों का क्रम।

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In this chapter (13 sections)
  1. सोनगरा चौहान — उदय
  2. कान्हड़देव व जालौर का साका
  3. सिवाणा का साका
  4. सिरोही के देवड़ा चौहान
  5. सिरोही — मुग़ल से आज़ादी तक
  6. हाड़ौती — बूँदी व कोटा
  7. बूँदी की स्थापना
  8. बूँदी और मुग़ल
  9. बूँदी में मराठे व अंत
  10. कोटा का उदय
  11. कोटा के शासक
  12. झाला जालिमसिंह
  13. रैपिड फायर तथ्य

जालौर, सिवाणा, सिरोही और फिर बूँदी-कोटा — चौहानों की ये धाराएँ एक ही कहानी के दो छोर हैं: एक तरफ़ अलाउद्दीन से भिड़ंत और साके, दूसरी तरफ़ मुग़लों व मराठों के साथ बदलते रिश्ते। इस भाग में सोनगरा चौहानों का उदय, कान्हड़देव और जालौर का साका, सिवाणा का साका, सिरोही के देवड़ा चौहान, फिर हाड़ौती में बूँदी की स्थापना, मुग़ल और मराठा दौर, कोटा का उदय और झाला जालिमसिंह को समेटा गया है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — चौहान राजवंश, 6 चॉक-बोर्ड चित्र, 1 नक्शे, 8 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. सोनगरा चौहान — उदय

  • संस्थापक कीर्तिपाल (नाडौल शाखा); 1181 में जालौर को परमारों से छीना।
  • जालौर के किले को सुवर्णगिरि / सोनगढ़ कहा जाता है, इसलिए ये सोनगरा चौहान कहलाए।
शासककालउपलब्धि
कीर्तिपाल1181–1182जालौर में स्वतंत्र चौहान राज्य की स्थापना
समरसिंह1182–1205मज़बूत परकोटा व शस्त्रागार बनवाया; बेटी लीलादेवी चालुक्य भीमदेव द्वितीय (गुजरात) को ब्याही
उदयसिंह1205–1257इल्तुतमिश के अधिकार वाले मण्डोर और नाडौल जीते; गुजरात के लवण प्रसाद को हराया; 1228 में इल्तुतमिश का घेरा — अंत में सन्धि; 1254 में नासिरुद्दीन महमूद हारकर लौटा

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

2. कान्हड़देव व जालौर का साका

जालौर के चौहानों में कान्हड़देव (1305–1311) सबसे शक्तिशाली था; समकालीन दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी।

काल / क्रमघटनाविवरण
1298रास्ता देने से इनकारसामन्तसिंह के काल में गुजरात जाती उलूग ख़ाँ-नुसरत ख़ाँ की सेना को जालौर से गुज़रने नहीं दिया
1305ऐन-उल-मुल्क मुल्तानीशाही सेना आई; कान्हड़देव और अलाउद्दीन में सन्धि
दिल्ली दरबारफ़रिश्ता का वृत्तान्तमुल्तानी समझा-बुझाकर दिल्ली ले गया; दरबार का माहौल स्वाभिमान के विपरीत; कान्हड़देव लड़ाई की चुनौती देकर लौटा

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • विजेता अलाउद्दीन ने नगर को जलालाबाद नाम दिया तथा परमार भोज की संस्कृत पाठशाला ढहाकर वहाँ मस्जिद खड़ी कराई।
  • कान्हड़देव के बन्धु मालदेव सोनगरा ने झुककर अधीनता मान ली और आगे चलकर चित्तौड़ दुर्ग की रखवाली पाई।
  • कान्हड़देव पर आकर सोनगरा चौहानों की जालौर-गद्दी का अंत हुआ।
ग्रंथरचनाकार / संदर्भ
कान्हड़दे प्रबन्धपद्मनाभ — अखयराज के शासनकाल में
वीरमदेव सोनगरा री बातांपद्मनाभ — अखयराज के काल में

3. सिवाणा का साका

  • सेनापति कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में अलाउद्दीन की सेना ने 1310 में सिवाणा (बालोतरा) पर हमला किया।
  • शासक सीतलदेव (कान्हड़देव का भतीजा); उसके सेनापति भावला पँवार ने विश्वासघात कर किले के मुख्य जलस्रोत भाण्डेलाव तालाब को गोमांस से दूषित करवाया।
  • सीतलदेव के नेतृत्व में वीरों का केसरिया और मीणादे के नेतृत्व में स्त्रियों का जौहर।

ट्रिक: दोनों साकों में ग़द्दार — सिवाणा: भावला पँवार और जालौर: दहिया बीका; नए नाम — खैराबाद और जलालाबाद।

4. सिरोही के देवड़ा चौहान

  • संस्थापक राव लूम्बा जालौर की देवड़ा शाखा से जुड़ा था, इसलिए ये देवड़ा चौहान कहलाए; कुलदेव सारणेश्वर महादेव।
  • प्राचीन साहित्य में सिरोही अर्बुद प्रदेश; कर्नल टॉड के अनुसार मूल नाम शिवपुरी।
  • लूम्बा ने 1311 में परमारों से आबू और चन्द्रावती छीनकर स्वतंत्र सत्ता बनाई; राजधानी चन्द्रावती; 1321 में मृत्यु।
शासककालमुख्य बातें
शिवभान1392–1424चन्द्रावती पर मुस्लिम हमलों से बचने के लिए सरणवा पहाड़ियों पर दुर्ग; 1405 में शिवपुरी नगर (अब पुरानी सिरोही)
सहसमल1424–14511425 में वर्तमान सिरोही बसाई और राजधानी बनाई; महाराणा कुम्भा ने हराकर आबू व बसन्तगढ़ ले लिए
लाखा1451–1483मेवाड़ के शासक ऊदा के समय आबू पर पुनः अधिकार

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

5. सिरोही — मुग़ल से आज़ादी तक

  • रायसिंह के पश्चात गद्दी पर क्रम से दूदा (उसका भाई), उदयसिंह, मानसिंह, सुरतान आए।
  • उदयसिंह (1553–1562) ➜ राव दूदा के पुत्र, अपने चचेरे भाई मानसिंह को लोहियाणा की जागीर से बेदख़ल किया, जो मेवाड़ जा बसा; 1562 में शीतला (चेचक) से देहान्त।
  • सुरतान देवड़ा (1571–1610) ➜ बादशाही हुक्म से सिरोही का आधा भाग प्रताप के छोटे भाई जगमाल के नाम किया गया; सुरतान ने 1583 के दत्ताणी के युद्ध में जगमाल को हराकर मार दिया और शाही सेना हारी; इसी लड़ाई में दुरसा आढ़ा को चोट लगी।
  • इसके बाद रायसिंह द्वितीय, अखैराज द्वितीय (1620–1673), उदयभान, बैरीसाल, छत्रसाल, सुरतान द्वितीय, मानसिंह, पृथ्वीराज, जगतसिंह, बैरीसाल द्वितीय, उदयभान द्वितीय।

ट्रिक: सिरोही के नाम की सीढ़ी — चन्द्रावती (लूम्बा) → शिवपुरी (शिवभान, 1405) → वर्तमान सिरोही (सहसमल, 1425)।

6. हाड़ौती — बूँदी व कोटा

राजस्थान का दक्षिण-पूर्वी भाग हाड़ौती है — हाड़ा चौहानों के शासन के कारण यह नाम पड़ा। पहले यहाँ मीणाओं का अधिकार था; बूंदा मीणा के नाम पर बूँदी। कुम्भाकालीन रणकपुर अभिलेख (1439) में बूँदी का नाम “वृन्दावती” मिलता है।

रियासतअंग्रेज़ों से सन्धिशासकअंतिम शासक
कोटा26 दिसम्बर 1817उम्मेदसिंह प्रथमभीमसिंह द्वितीय
बूँदी10 फरवरी 1818विष्णुसिंहबहादुरसिंह
सिरोही11 सितम्बर 1823शिवसिंहअभयसिंह

7. बूँदी की स्थापना

शासककालमुख्य बातें
देवीसिंह (देवा हाड़ा)1241–1243मेवाड़ के बम्बावदा का सरदार, चौहानों की हाड़ा शाखा से; 1241 में मीणा-सत्ता तोड़कर बूँदी राज्य बसाया; 1243 में जीते-जी पुत्र समरसिंह को हाड़ौती सौंपी
समरसिंह1243 के बादकोटिया भीलों को परास्त कर 1264 में कोटा लिया और बेटे जैत्रसिंह को सौंपा; जैत्रसिंह ने कोटा में किला और गुलाब महल बनवाया
नरपाल / नापूजी—अलाउद्दीन खिलजी से जूझते हुए 1304 में वीरगति
  • इसी काल में मेवाड़ के लाखा ने बूँदी पर चढ़कर बम्बावदा व माण्डलगढ़ क्षेत्र हथिया लिए; महमूद ख़िलजी ने मांडू से आकर तीन बार बूँदी पर हमले किए।

8. बूँदी और मुग़ल

शासककालमुख्य बातें
राव सूर्जन1554–1585मेवाड़ की अधीनता तोड़ी; रणथम्भौर लिया; 1569 में अकबर के घेरे के समय झुका और पाया — “राव राजा”, 5000 का मनसब, जागीर में 26 परगने बूँदी पास व 26 बनारस पास; बनारस-चुनार की सूबेदारी; बड़ा पुत्र दूदा बूँदी सँभालता; चन्द्रशेखर ने लगभग 1578 में सूर्जन चरित रचा; 1585 में बनारस में मृत्यु
राव भोज1585–1608अकबर की ओर से मानसिंह के संग उड़ीसा, गुजरात, अहमदनगर की मुहिमों में लड़ा; बेटे हृदय नारायण को कोटा की गद्दी (अकबर की मंज़ूरी से) दिलाई
राव रतनसिंह1608–1631जहाँगीर से 5000 का मनसब; न्यायप्रिय होने से “रामराज”, चित्रकला-प्रेमी होने से “सर बुलन्द राय”; खुर्रम के विद्रोह को दबाने में बड़ी भूमिका; 1631 में मृत्यु
राव छत्रसाल1631–1658गोपीनाथ का पुत्र (रतनसिंह का पौत्र); दारा के पक्ष से लड़ते हुए सामूगढ़ (1658) में वीरगति
  • सूर्जन से पूर्व बूँदी के राजा मेवाड़ के आश्रित रहे।
  • रतनसिंह के बाद बूँदी की गद्दी पौत्र छत्रसाल को मिली; उनके बेटे माधोसिंह को कोटा की सत्ता शाहजहाँ ने सौंपी।

9. बूँदी में मराठे व अंत

उत्तराधिकार का झगड़ा

  1. बुद्धसिंह की कछवाही रानी (सवाई जयसिंह की बहन) का पुत्र भवानीसिंह — बुद्धसिंह ने बेटा मानने से इनकार किया
  2. 1729 — जयसिंह ने बुद्धसिंह को पद से हटाया और करवड़ के जागीरदार सालिमसिंह हाड़ा के दूसरे बेटे दलेलसिंह को गद्दी दी
  3. उसी समय बुद्धसिंह की चुण्डावत रानी से पुत्र उम्मेदसिंह का जन्म
शासककालमुख्य बातें
राव दलेलसिंह1729–1748बुद्धसिंह की रानी ने मल्हारराव होल्कर को राखी बाँधकर भाई बनाया और 6 लाख रुपये (प्रतापसिंह के हाथ) देकर बूँदी पर हमले का न्योता दिया; 1734 में होल्कर-सिन्धिया ने दलेलसिंह को उतारकर उम्मेदसिंह को बिठा दिया — यही राजस्थान में मराठों की पहली दस्तक थी; सेना लौटते ही जयसिंह ने दलेलसिंह को फिर गद्दी पर बैठा दिया
राव उम्मेदसिंह1748–1770कोटा के दुर्जनशाल और होल्कर की सहायता से गद्दी पाई; “श्री जी”; बूँदी के किले में चित्रशाला और उम्मेद महल; जयपुर-बूँदी संघर्ष में घोड़ा हंजा (हुंजा)
राव अजीतसिंह1770–1773पिता ने तीर्थयात्रा पर जाते हुए शासन सौंपा; 1773 में मृत्यु, फिर उम्मेदसिंह ने 1773–1804 राजकाज सँभाला

10. कोटा का उदय

बूँदी से कोटा

  1. कोटा आरंभ में बूँदी का हिस्सा; रतनसिंह के समय हृदय नारायण अधीनस्थ शासक
  2. 1623 — खुर्रम की बग़ावत के दौरान सूसी की लड़ाई में हृदय नारायण मैदान छोड़ भागा
  3. जहाँगीर ने कोटा उससे छीना
  • राव माधोसिंह (1631–1648) ➜ कोटा का पहला स्वतंत्र एवं विधिवत् शासक।
  • मुग़ल सेना के साथ खानेजहाँ लोदी (1631) और जुझार सिंह बुन्देला (1635) के विद्रोह दबाए; कन्धार और मध्य एशिया के अभियानों में भाग लिया; शाहजहाँ ने पुरस्कार में “बाद रफ़्तार” नामक घोड़ा दिया।

11. कोटा के शासक

शासककालमुख्य बातें
मुकुन्दसिंह1648–1658दारा के पक्ष से धरमत के युद्ध में वीरगति
जगतसिंह1658–1683औरंगज़ेब के दक्षिण-अभियान में; दक्षिण में ही मृत्यु
किशोरसिंह प्रथम1684–1696अधिकांश समय दक्षिण भारत में मराठों से संघर्ष; वहीं मृत्यु
रामसिंह प्रथम1696–1707आंबा के युद्ध में भाई बिशनसिंह व हरनाथसिंह को हराकर राजा; रायगढ़ पर मुग़ल अधिकार में भूमिका; आज़म की ओर से लड़ते जाजऊ (1707) में मारा गया

12. झाला जालिमसिंह

  • पद ➜ कोटा का दीवान
  • उपनाम ➜ कोटा का दुर्गादास राठौड़
  • झालरापाटन ➜ स्थापना 1796
  • राजस्थान के इतिहास का चर्चित व्यक्तित्व और कूटनीतिज्ञ; 1762 से 1768 तक मेवाड़ की सेवा में, महाराणा ने “राजराणा” की उपाधि दी।
  • भटवाड़ा की जीत (1761) का श्रेय उसी को; झालरापाटन शहर उसी का बसाया (1796)।
  • राव उम्मेदसिंह प्रथम के समय रुपये चुकाकर व कूटनीति से कोटा को मराठों से और चतुराई से पिंडारियों से सुरक्षित रखा; अमीर ख़ाँ पिण्डारी की माँ और बेगमों को शेरगढ़ (वर्तमान बारां) में रखा।

जालिमसिंह की कहानी

  1. मेवाड़ की सेवा (1762–68)
  2. भटवाड़ा विजय (1761)
  3. गुमानसिंह ने निकाला → लालाजी बल्लाल की मध्यस्थता से वापस
  4. उम्मेदसिंह के समय चरम शक्ति

13. रैपिड फायर तथ्य

  • सोनगरा चौहानों के संस्थापक ➜ कीर्तिपाल, जिसने 1181 में जालौर को परमारों से छीना; किला सुवर्णगिरि / सोनगढ़ कहलाया
  • जालौर का सबसे शक्तिशाली शासक ➜ कान्हड़देव (1305–1311), समकालीन सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी
  • सिवाणा का साका ➜ 1310 में; शासक सीतलदेव, ग़द्दार भावला पँवार (भाण्डेलाव तालाब दूषित किया)
  • दोनों साकों के ग़द्दार ➜ सिवाणा में भावला पँवार और जालौर में दहिया बीका
  • सिरोही ➜ संस्थापक राव लूम्बा (1311); नाम-क्रम चन्द्रावती → शिवपुरी (1405) → वर्तमान सिरोही (1425)
  • दत्ताणी का युद्ध ➜ 1583 में सुरतान देवड़ा ने जगमाल को हराकर मार दिया
  • बूँदी की स्थापना ➜ देवीसिंह (देवा हाड़ा), 1241 में मीणा-सत्ता तोड़कर
  • कोटा का पहला स्वतंत्र शासक ➜ राव माधोसिंह (1631–1648)
  • झाला जालिमसिंह ➜ कोटा का दीवान, उपनाम कोटा का दुर्गादास राठौड़; झालरापाटन की स्थापना 1796

अगले भाग में मेवाड़ के गुहिल राजवंश का परिचय, उसकी उत्पत्ति के मत और बप्पा रावल से शुरू होने वाला गुहिलों का शुरुआती उत्थान आएगा।

पिछला भाग: चौहान राजवंश: पृथ्वीराज तृतीय (भाग 2) एवं नाडौल व रणथम्भौर

अगला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: परिचय व उत्पत्ति एवं बप्पा से रावल रतनसिंह (भाग 1)

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के दुर्ग · मेवाड़ का गुहिल राजवंश

पूरी श्रृंखला: राजस्थान का इतिहास — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न चौहान राजवंश के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
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