मारवाड़ के राठौड़ों की कहानी एक छोटे दल से शुरू होती है, जिसे कई मत कन्नौज से आया बताते हैं और धीरे-धीरे वह जोधपुर जैसी राजधानी तक पहुँचता है। मूल को लेकर इतिहासकारों में मतभेद भी है, इसलिए नाम और मत साथ-साथ याद रखने पड़ते हैं। इस भाग में मारवाड़ व राठौड़ नाम, उत्पत्ति के मत, समय-रेखा, और सीहा से चूण्डा तथा रणमल्ल से सातलदेव तक का क्रम दिया गया है।
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1. मारवाड़ और राठौड़ नाम
मारवाड़ / मरुदेश नाम कभी सतलज से सागर तक के पूरे विस्तार के लिए चलता था; आज यह अरावली के पश्चिम में बसे हिस्से की पहचान है।
राठौड़ शब्द कैसे बना
- संस्कृत: राष्ट्रकूट
- प्राकृत: रट्टऊड
- राडउड
- कुलदेवी ➜ नागणेची माता
- दूसरा नाम ➜ चक्रेश्वरी
- संस्थापक ➜ राव सीहा
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ट्रिक: राठौड़ = राष्ट्रकूट का बिगड़ा रूप — राष्ट्रकूट → रट्टऊड → राठौड़।
2. उत्पत्ति के मत
राठौड़ों के मूल को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। ग्रन्थ-अनुसार मुख्य दावे नीचे की सारणी में हैं।
| स्रोत / इतिहासकार | दावा |
|---|---|
| राज रत्नाकर व भाटों की पोथियाँ | राठौड़ हिरण्यकश्यप की सन्तान हैं |
| दयालदास (अपनी ख्यात में) | सूर्यवंशी; ब्राह्मण-वंश में जन्मे भल्लराव के पुत्र का नाम रोटेश्वरी देवी के नाम पर “रठवर” रखा गया — उसके वंशज रठवर → राठौड़ |
| मुहणौत नैणसी, पृथ्वीराज रासो, जोधपुर राज्य की ख्यात | मारवाड़ के राठौड़ कन्नौज से आए |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- ओझा के मत में इस इलाक़े पर पहले गुर्जर प्रतिहारों की सत्ता थी; वे ढीले पड़े तो बदायूँ से आई राठौड़ टोली ने उसे अपने क़ब्ज़े में लेकर वंश की नींव रखी।
- नैणसी, रेऊ और टॉड ➜ तीनों कन्नौज की ओर जाते हैं; ओझा बदायूँ की ओर।
ट्रिक: कन्नौज = नैणसी · रेऊ · टॉड; बदायूँ = ओझा।
3. राजवंश की समय-रेखा
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1240 | राव सीहा | पाली क्षेत्र में राठौड़ सत्ता की नींव; 1273 में बीठू में वीरगति |
| 1291 | धूहड़ | नागणेची की मूर्ति नगाणा में स्थापित |
| 1394 | चूण्डा | मण्डोर दहेज में; सामन्त प्रथा की शुरुआत |
| 1453 | आँवल-बाँवल संधि | कुम्भा और जोधा के बीच सीमा तय; मण्डोर पर जोधा का अधिकार |
… शेष 11 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
4. कार्यकाल के चार्ट
याद रखें: कुल मिलाकर जोधा का शासन सबसे लम्बा है (51 वर्ष), उसके बाद विजयसिंह (41) और मानसिंह / जसवंत सिंह प्रथम (40-40)।
5. सीहा से चूण्डा
याद रखें: आरम्भिक क्रम: सीहा → आस्थान → धूहड़ → रायपाल → कनकपाल → जालणसी → छाड़ा → तीड़ा → सलखा → (वीरमदेव) → चूण्डा।
6. राव सीहा (1240–73)
मारवाड़ में राठौड़ों की जड़ जमाने वाले आदि पुरुष राव सीहा हैं; उनके पिता का नाम सेतराम था।
कन्नौज से मारवाड़
- 1194 चन्दावर: जयचन्द की हार
- हरिश्चन्द्र कन्नौज में
- इल्तुतमिश ने कन्नौज लिया
- सीहा लगभग 200 साथियों के साथ पश्चिम की ओर निकला; पहला पड़ाव कोल्हूमठ गाँव रहा।
- वहाँ एक सोलंकी सरदार से मेल हुआ। सीहा की मदद से उसने लूटमार करने वाले लाखाफुलानी को हराया और बदले में अपनी बहन पार्वती सोलंकी का विवाह सीहा से कर दिया।
- भील-मीणा लुटेरों से परेशान पालीवाल ब्राह्मणों (मुखिया जसोधर) ने सीहा से रक्षा माँगी। फलौदी के जगमाल को साथ लेकर सीहा ने लुटेरों को शान्त किया; बदले में उसे ज़मीन मिली और वह वहीं रम गया। आगे चलकर पूरा पाली उसके क़ब्ज़े में आ गया।
लाख झंवर और वीरगति
- द्वारिका-यात्रा के दौरान सीहा ने पाली की रक्षा में एक मुस्लिम शासक से युद्ध किया। कहा जाता है कि एक लाख लोग मारे या घायल हुए, इसलिए यह लाख झंवर कहलाया; स्थान धौला चौतरा (पाली) के नाम से जाना जाता है।
- बीठू गाँव (पाली) के शिलालेख के अनुसार 9 अक्टूबर 1273 को गौ-रक्षा के लिए मुसलमानों से लड़ते हुए सीहा शहीद हुआ; पत्नी पार्वती उसके साथ सती हुई। वहाँ छतरी बनी है।
7. आस्थान से सलखा
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| आस्थान | 1273–91 | मूँदोच गाँव में शक्ति जुटाई; डाभी राजपूत साथ मिलाए; खेड़ (बालोतरा) जीता; भील सरदार को हराया; ईडर अपने भाई सोनिग को सौंपा। 1291 में जलालुद्दीन खिलजी के पाली-आक्रमण में लगभग 140 साथियों के साथ वीरगति |
| धूहड़ | 1291–1309 | कर्नाटक से कुलदेवी चक्रेश्वरी (नागणेची) की प्रतिमा लाकर नगाणा (बालोतरा) में प्रतिष्ठित की। 1309 में मण्डोर की रक्षा में प्रतिहारों से लड़ते वीरगति; तरसींगढ़ी (पचपदरा) में देवली |
| रायपाल | 1309–13 | खेड़ पर शासन; जैसलमेर पर कब्ज़ा किया तो भाटी शत्रु बने; पिता के वध का प्रतिशोध लेते हुए मण्डोर जीत लिया; बाड़मेर के पास परमारों को हराया; भाटियों-तुर्कों से लड़ते वीरगति |
| कनकपाल | 1313–23 | तुर्क-भाटी गठजोड़ से हुई लड़ाई में ज्येष्ठ पुत्र भीम समेत वीरगति |
मल्लीनाथ और वीरमदेव
- मल्लीनाथ सलखा का ज्येष्ठ पुत्र था; महेवा की गद्दी उसके पास रही। उसके पुत्र जगमाल और भाई वीरमदेव में खटपट रहती थी, इसलिए वीरमदेव महेवा छोड़कर खेड़ के पास रहने लगा।
- 1383 में वीरमदेव ने जोहियों को हराकर उनका राज्य लेना चाहा; इसी संघर्ष में वह मारा गया। उसका पुत्र था चूण्डा।
8. राव चूण्डा (1394–1423)
चूण्डा का उत्थान
- पिता की मृत्यु (उम्र 6 वर्ष)
- कलाऊ के आल्हा चारण का संरक्षण
- ताऊ मल्लीनाथ से तालीडी की जागीर
- वीरमदेव के निधन पर चूण्डा (चामुण्डराय) मात्र 6 वर्ष का बालक था। माता ने उसे पहले कलाऊ के आल्हा चारण के संरक्षण में छोड़ा; बड़ा होने पर ताऊ मल्लीनाथ ने उसे तालीडी की जागीर देकर अपने पास रखा।
- रिश्ता जोड़ते हुए इन्दा प्रतिहार मुखिया ने बेटी के साथ मण्डोर का गढ़ दहेज में सौंप दिया। इन्दा लोग चूण्डा के सामन्त बनकर रहे और मण्डोर राठौड़ों की राजधानी बना।
- मारवाड़ में सामन्त प्रथा की शुरुआत चूण्डा ने की, पर इसका विकास जोधा के समय हुआ।
वीरगति और उत्तराधिकार
- नागौर पर हमले के लिए पूगल के भाटियों ने मुल्तान से सेनानायक सलीम को बुलाया; उनके साथ जैसलमेर के भाटी तथा जांगलू के सांखला भी हो लिए। इसी हमले में 15 मार्च 1423 को चूण्डा वीरगति पा गए।
- जोधपुर की चाँद बावड़ी चूण्डा की सोनगरा रानी चाँद कँवर की बनवाई हुई है।
- चूण्डा ने ज्येष्ठ पुत्र रणमल्ल की जगह छोटे बेटे कान्हा को वारिस ठहराया; रुष्ट रणमल्ल महाराणा लाखा (मेवाड़) की शरण में जा बसा।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1383 | वीरमदेव की मृत्यु | जोहियों से संघर्ष; चूण्डा तब 6 वर्ष का |
| 1394 | चूण्डा का शासन आरम्भ | इन्दा प्रतिहारों से मण्डोर दहेज में |
| 1423 | चूण्डा की वीरगति | 15 मार्च — नागौर पर भाटियों का आक्रमण |
9. रणमल्ल से गांगा
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1427 | रणमल्ल | मेवाड़ की मदद से मण्डोर पर अधिकार |
| 1438 | रणमल्ल की हत्या | मेवाड़ी सरदारों का षड्यंत्र |
| 1453 | आँवल-बाँवल संधि | कुम्भा–जोधा; सीमा का बिन्दु सोजत |
| 1459 | जोधपुर | मेहरानगढ़ के साथ बसा |
10. राव रणमल्ल (1427–38)
- महाराणा लाखा ने सेवा से प्रसन्न होकर रणमल्ल को धणला (पाली) की जागीर दी।
- मेवाड़-प्रवास में रणमल्ल ने बहन हंसाबाई को लाखा से ब्याहा; उनके पुत्र मोकल (रणमल्ल के भाँजे) 1421 में मेवाड़ के महाराणा बने।
- मेवाड़ से मिली मदद के बल पर 1427 में रणमल्ल ने नरबद को पछाड़कर मण्डोर हासिल किया।
रणमल्ल की कहानी
- चूण्डा का ज्येष्ठ पुत्र
- कान्हा को गद्दी → मेवाड़ गए
- बहन हंसाबाई–लाखा
11. राव जोधा (1438–89)
भगोड़े से राजा तक
- पिता की हत्या के समय मेवाड़ में
- कुम्भा की सेना से बचकर भागा
- काहूनी (बीकानेर के पास) में शरण
- पिता की हत्या के समय जोधा मेवाड़ में ही था; कुम्भा की सेना ने पीछा किया तो वह बीकानेर के पास काहूनी गाँव में शरण लेकर बचा।
- आँवल-बाँवल की संधि (1453) ➜ हंसाबाई की मध्यस्थता से राणा कुम्भा और राव जोधा के बीच हुई; दोनों राज्यों की सीमा तय हुई और मुख्य बिन्दु सोजत रहा।
- 1453 में जोधा ने अक्का सिसोदिया और अहाड़ा हिंगोला को हराकर मण्डोर (मारवाड़) पर अधिकार किया।
जोधा के अन्त में
- रानी जसमादे (हाड़ी) के कहने पर जोधा ने सातलदेव को उत्तराधिकारी बनाया।
- 1489 में जोधा की मृत्यु हुई।
बीकानेर की राठौड़ शाखा की नींव 1465 में जोधा के दूसरे बेटे राव बीका ने जांगल-देश जीतकर रखी।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1438 | गद्दी | पिता रणमल्ल की हत्या के बाद |
| 1453 | मण्डोर | अक्का सिसोदिया व अहाड़ा हिंगोला हारे; आँवल-बाँवल |
| 1459 | जोधपुर + मेहरानगढ़ | राजधानी मण्डोर से हटी |
12. राव सातलदेव (1489–92)
- सातल ने सातलमेर कस्बा बसाया — आज का पोकरण (जैसलमेर ज़िला)।
- अजमेर के हाकिम मल्लू खाँ ने 1490 में धोखे से सातल के अनुज वरसिंह को बुलवाकर क़ैद कर लिया; ख़बर मिलते ही सातल ने अजमेर पर धावा बोलकर उसे आज़ाद करवाया।
- 1492 में मल्लू खाँ फिर मेड़ता पर चढ़ आया, किन्तु सातल ने उसे करारी शिकस्त दी।
घुड़ला की कथा
- मल्लू खाँ की सेना भाग रही थी
- पीपाड़ में 140 कन्याएँ गणगौर पूज रही थीं
- सेनापति घुड़ले खाँ ने अपहरण किया
इस विजय की याद में मारवाड़ में घुड़ला पर्व/नृत्य शुरू हुआ।
रिवीजन पॉइंटर्स
- राठौड़ शब्द का क्रम — राष्ट्रकूट → रट्टऊड → राठौड़; कुलदेवी नागणेची माता, जिनका दूसरा नाम चक्रेश्वरी है।
- कन्नौज से आगमन मानने वाले नैणसी, रेऊ और टॉड हैं, जबकि बदायूँ से आगमन ओझा का मत है।
- मारवाड़ में राठौड़ सत्ता की नींव राव सीहा ने डाली; 9 अक्टूबर 1273 को बीठू (पाली) में वीरगति पाई और पत्नी पार्वती सती हुईं।
- आरम्भिक क्रम — सीहा → आस्थान → धूहड़ → रायपाल → कनकपाल → जालणसी → छाड़ा → तीड़ा → सलखा → (वीरमदेव) → चूण्डा।
- चूण्डा को इन्दा प्रतिहारों से मण्डोर दहेज में मिला; सामन्त प्रथा की शुरुआत उन्होंने की और विकास जोधा के समय हुआ।
- आँवल-बाँवल की संधि (1453) कुम्भा और जोधा के बीच हंसाबाई की मध्यस्थता से हुई; सीमा का बिन्दु सोजत रहा।
- जोधपुर मेहरानगढ़ के साथ 1459 में बसा; बीकानेर शाखा की नींव 1465 में जोधा के पुत्र बीका ने रखी।
- वंश में सबसे लम्बा शासन जोधा का है — 51 वर्ष।
- सातलदेव ने सातलमेर (आज का पोकरण) बसाया, और घुड़ला पर्व उन्हीं की विजय की याद में शुरू हुआ।
अगले भाग में सूजा और गांगा के बाद मारवाड़ के सबसे शक्तिशाली शासक मालदेव — उपाधियाँ, विजयें, रानियाँ, गिरी-सुमेल की हार — और फिर चन्द्रसेन व मोटा राजा उदयसिंह तक का मुग़ल दौर।
पिछला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: अमरसिंह से भूपालसिंह (भाग 2)
अगला भाग: मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: रणमल्ल से गांगा (भाग 2) एवं राव मालदेव — शौर्य युग
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