अंग्रेजी प्रभुत्व और उसके प्रभाव: 1818 से पहले की संधियाँ एवं 1817-18 की संधियाँ – Rajasthan History Chapter 35

1803-04 और 1817-18 की संधियाँ, उनके कारण-परिणाम और रियासतों के भीतरी मामलों में अंग्रेजी दख़ल।

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In this chapter (20 sections)
  1. एक नज़र में
  2. शुरुआती प्रयास
  3. वेलेजली का मसौदा व संधियाँ
  4. भरतपुर और कम्पनी
  5. संधियाँ रद्द
  6. 1817-18 की संधियाँ
  7. पृष्ठभूमि
  8. सामान्य शर्तें
  9. रियासत-वार सारणी
  10. संधियों के कारण
  11. अंग्रेजी प्रभुत्व के परिणाम
  12. आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप
  13. मेवाड़
  14. जयपुर
  15. जोधपुर
  16. कोटा व बीकानेर
  17. भरतपुर व अलवर
  18. सिरोही से बूँदी तक
  19. अजमेर पर अधिकार
  20. रैपिड फायर तथ्य

राजपूताने की रियासतें अंग्रेजों के पास शौक से नहीं गईं — मराठों की मार से बचने का सहारा ढूँढते हुए वे कम्पनी तक पहुँचीं, और बदले में अपनी बाहरी आज़ादी गँवा बैठीं। इस भाग में 1803-04 की शुरुआती संधियाँ, भरतपुर का घेरा और बार्लो द्वारा रद्दीकरण है, फिर 1817-18 की संधियों की पृष्ठभूमि, शर्तें और रियासत-वार सारणी। अंत में संधियों के परिणाम और भीतरी हस्तक्षेप के उदाहरण हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — अंग्रेजी प्रभुत्व और उसके प्रभाव, 5 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 चार्ट, 23 फ्लैशकार्ड और 13 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एक नज़र में

बसीन की संधि (1802) के बाद पेशवा अंग्रेजों की शरण में चला गया और 1803 में सिंधिया-भोंसले भी हार गए। राजपूताने की रियासतों को अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ही ऐसी इकलौती ताक़त दिखी जो मराठों के दबाव से बचा सकती थी — इसी भरोसे उन्होंने संधियों का रास्ता पकड़ा।

  • पहली संधि ➜ भरतपुर — 29 सित. 1803
  • सहायक संधि का जनक ➜ लॉर्ड वेलेजली
  • 1818 की संधियाँ कराने वाला ➜ चार्ल्स मेटकॉफ़ (दिल्ली रेजीडेंट)

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

काल / क्रमघटनाविवरण
1778–88राजाओं की पहली गुहारेंजयपुर और जोधपुर ने मराठों के विरुद्ध मदद माँगी, कम्पनी ने ध्यान नहीं दिया
1803–04पहली संधियाँभरतपुर, अलवर, जयपुर, जोधपुर और धौलपुर से
1805भरतपुर का घेरालेक किला न ले सका; 17 अप्रैल को फिर संधि
1806संधियाँ रद्दबार्लो ने अलवर-भरतपुर को छोड़ सब रद्द कीं

… शेष 9 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

2. शुरुआती प्रयास

काल / क्रमघटनाविवरण
1778जयपुरपृथ्वीसिंह (जयपुर) का वकील वार्ता के लिए गवर्नर जनरल के पास कलकत्ता पहुँचा
1781जोधपुरविजयसिंह ने मराठों के विरुद्ध अंग्रेजी मदद पाने की कोशिश की
1788जयपुरमहाराजा प्रतापसिंह ने भी वही प्रयास किया
  • अंग्रेजों से समझौते की पहल राजस्थान में सबसे पहले जयपुर और जोधपुर ने की।
  • पर कम्पनी तब देशी राज्यों के मामलों में न पड़ने की नीति पर चल रही थी, इसलिए इन अर्ज़ियों पर ध्यान नहीं दिया गया।
  • दूसरे आंग्ल-मराठा संघर्ष (1803–04) में मराठे परास्त हुए; सिंधिया को कमज़ोर करने की ग़रज़ से अब अंग्रेज ख़ुद संधियों के इच्छुक हो गए।

3. वेलेजली का मसौदा व संधियाँ

सहायक संधियों के जनक गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली के आदेश से लॉर्ड लेक ने राजपूत राजाओं को सात अनुच्छेदों का संधि-मसौदा भेजा।

  1. कम्पनी और राजा मित्र रहेंगे — एक के मित्र-शत्रु दूसरे के भी मित्र-शत्रु।
  2. कम्पनी राज्यों के आंतरिक मामलों में दख़ल नहीं देगी और कर की माँग नहीं करेगी।
  3. ज़रूरत पड़ने पर मित्र राज्य कम्पनी को सैनिक सहायता देंगे।

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

क्र.रियासतसंधि की तिथिशासक
1भरतपुर29 सित. 1803 (फिर 17 अप्रैल 1805)महाराजा रणजीत सिंह
2अलवर14 नव. 1803बख्तावर सिंह
3जयपुर12 दिस. 1803जगतसिंह द्वितीय
  • जनवरी 1804 में कीरत सिंह (धौलपुर) ने मराठों के हमलों से सुरक्षा पाने हेतु संधि कर ली।
  • उदयपुर और कोटा ने भी संधि चाही, पर वेलेजली ने अनुकूल उत्तर नहीं दिया।

ट्रिक: पाँच शुरुआती संधियों की क्रम-ट्रिक: भरतपुर → अलवर → जयपुर → जोधपुर → धौलपुर — सितम्बर, नवम्बर, दिसम्बर, दिसम्बर, जनवरी।

4. भरतपुर और कम्पनी

  • उत्तर भारत में भरतपुर पहला राज्य था जिससे कम्पनी ने संधि की — 29 सितम्बर 1803, महाराजा रणजीत सिंह के साथ।
  • जाट राजा ने 5,000 घुड़सवार आगरा भेजकर अंग्रेजों की मदद की।
  • लेक से मात खाकर होल्कर डीग आया तो रणजीत सिंह ने संधि का उल्लंघन करते हुए उसकी मदद को सेना रवाना की — नेतृत्व पुत्र लक्ष्मण सिंह और दीवान रामसिंह के पास।

नीति पर असर

  • भरतपुर तथा मालवा की नाकामी देखकर संचालक मंडल (कम्पनी का शीर्ष निकाय) ने वेलेजली की संधि-नीति को ठुकरा दिया।
  • इसी असहमति से वेलेजली ने पद छोड़ा; उसकी जगह कार्नवालिस जुलाई 1805 में गवर्नर जनरल बनकर आया।

याद रखें: भरतपुर की संधियाँ — पहली 29 सितम्बर 1803, दूसरी घेरा उठने पर 17 अप्रैल 1805।

5. संधियाँ रद्द

नीति का पलटना

  1. भरतपुर की विफलता
  2. वेलेजली का इस्तीफ़ा
  3. कार्नवालिस चाहता था सब संधियाँ रद्द करना
  • कार्नवालिस देशी राज्यों से हुई सभी संधियाँ ख़त्म करना चाहता था, पर जल्द ही उसकी मृत्यु हो गई।
  • उत्तराधिकारी जॉर्ज बार्लो ने 1806 में अलवर और भरतपुर को छोड़ बाक़ी सभी राजपूत राज्यों की संधियाँ रद्द कर दीं।

याद रखें: 1806 में बची दो संधियाँ — अलवर और भरतपुर।

6. 1817-18 की संधियाँ

1813 के बाद कम्पनी की रीति-नीति बदली — लॉर्ड हेस्टिंग्ज (गवर्नर जनरल) चाहता था कि भारत में कम्पनी ही सर्वोपरि शक्ति रहे। इसी का फल थी 1817–18 की संधियों की कड़ी।

7. पृष्ठभूमि

  • 1811 में सेटन की जगह चार्ल्स मेटकॉफ़ दिल्ली का रेजीडेंट बना।
  • उसने गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो को सुझाया कि मराठों, अमीर खाँ और पिंडारियों की तबाही रोकने के लिए राजपूत राज्यों का एक संघ ब्रिटिश संरक्षण में बने।
  • पराजित दौलतराव सिंधिया ने 5 नवम्बर 1817 को राजस्थानी राज्यों पर कम्पनी के अधिकार-सम्बन्ध को मान्य किया; होल्कर भी हारकर वही मान गया — राजस्थान से मराठा प्रभुत्व उठ गया।

संधियों तक का रास्ता

  1. 1811 मेटकॉफ़ रेजीडेंट
  2. संघ का सुझाव
  3. 1813 के बाद नीति-बदलाव

8. सामान्य शर्तें

  1. कम्पनी और राज्य में सदा मित्रता — एक के मित्र-शत्रु दोनों के मित्र-शत्रु।
  2. राज्य की रक्षा का दायित्व कम्पनी का।
  3. राज्य कम्पनी का आधिपत्य मानेगा और उसके अधीन रहकर सहयोग करेगा।

ट्रिक: खिराज से मुक्त रखे गए राज्य — करौली, किशनगढ़, जैसलमेर।

9. रियासत-वार सारणी

क्र.राज्यशासकतिथिख़ास बात
1करौलीहरबक्षपाल सिंह9 नव. 1817खिराज से मुक्त
2टोंकअमीर खाँ15 नव. 1817मेटकॉफ़ ने हस्ताक्षर किए
3कोटाउम्मेद सिंह26 दिस. 1817मेटकॉफ़ और झाला जालिमसिंह ने शर्तें तय कीं; जालिमसिंह ने 20 फ़रवरी 1818 को 2 पूरक धाराएँ जुड़वाकर गवर्नर जनरल की मंज़ूरी ली
4जोधपुरमानसिंह6 जन. 1818युवराज छत्रसिंह, बिशनराम व्यास, अमयराम व्यास ने हस्ताक्षर किए
काल / क्रमघटनाविवरण
9 नव. 1817करौलीपहली
15 नव. 1817टोंकअमीर खाँ
26 दिस. 1817कोटाजालिमसिंह
6 जन. 1818जोधपुरमानसिंह

10. संधियों के कारण

मततर्क
टॉड, मेल्कम, हेस्टिंग्ज आदि अंग्रेज विद्वानराजपूत राज्यों ने मराठा और पिंडारी आक्रमणों से छुटकारे के लिए संधियाँ कीं
आलोचनासंधि-वार्ता शुरू होने तक मराठे और पिंडारी कुचले जा चुके थे; कोटा, जोधपुर, उदयपुर के अलावा सभी रियासतें मराठों के आत्मसमर्पण के बाद ही आगे आईं; और संधि पर भी खिराज की देनदारी बनी रही

प्रमुख कारण — सामंती समस्या

  • मुगलों के आने के बाद शासकों और सामंतों के बीच गहरी खाई बन गई।
  • अपना बल बढ़ाने को सामंत गुट बनाने लगे।
  • ऐसे में शासकों ने अपने सामंतों पर लगाम लगाने के लिए अंग्रेजी संरक्षण अपनाया।

कारण की कड़ी

  1. मुगल सम्पर्क
  2. राजा-सामंत में दूरी
  3. सामंतों की गुटबन्दी

11. अंग्रेजी प्रभुत्व के परिणाम

  1. इन संधियों से राजपूत रियासतों की बाहरी आज़ादी ख़त्म हो गई और वे ब्रिटिश प्रभुत्व के दायरे में आ गईं।
  2. भीतर-बाहर की सुरक्षा मिलने से शासक उदासीन और भोग-विलासी हो गए; हर राज्य में अंग्रेज-समर्थक और अंग्रेज-विरोधी दो दल बने।
  3. नियमित खिराज, बकाया पर चक्रवृद्धि ब्याज और सैन्य-टुकड़ियों के ख़र्च से राज्यों की आर्थिक हालत बिगड़ी; सुधार के नाम पर रेजीडेंटों का दख़ल बढ़ा।

12. आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप

काल / क्रमघटनाविवरण
1818मेवाड़संधि के तुरंत बाद टॉड ने शासन-प्रबन्ध सँभाला
25 जून 1818अजमेरसिंधिया संधि से अंग्रेजों को
1 अक्टू. 1821कोटामांगरोल का युद्ध
जनवरी 1826भरतपुरपहली बार किले पर अंग्रेजी अधिकार

13. मेवाड़

  • अर्थव्यवस्था सुधारने के बहाने कर्नल टॉड ने ही सबसे पहले मेवाड़ का शासन-प्रबन्ध स्वयं सँभाल लिया।
  • 1827 में कैप्टन कॉब ने दख़ल दिया।
  • पॉलिटिकल एजेन्ट रॉबिन्सन ने 1840 व 1845 में महाराणा-सामंत समझौते का मसौदा बनाया।

14. जयपुर

  • मेजर ऑक्टरलोनी, कैप्टन स्टुअर्ट और कैप्टन रफ़ ने महारानी के विरोधियों का साथ देकर जयपुर के भीतरी मामलों में दख़ल दिया।
  • 1835 में शेखावाटी में शांति के नाम पर शेखावाटी ब्रिगेड बनी और उसका ख़र्च जयपुर पर डाला गया।
  • रकम न मिलने पर कम्पनी ने नमक के भंडार सांभर झील को अपने नियंत्रण में लेकर लागत निकाली।

जयपुर का 1835

  1. शेखावाटी ब्रिगेड
  2. ख़र्च जयपुर पर
  3. धन नहीं मिला

15. जोधपुर

  • महाराजा मानसिंह और सामंतों के टकराव ने अंग्रेजों को दख़ल का मौक़ा दिया।
  • दख़ल से रुष्ट मानसिंह 1832 में गवर्नर जनरल विलियम बैंटिंक द्वारा बुलाए अजमेर दरबार में गए ही नहीं।
  • शांति स्थापना के नाम पर छाण और कोट किराना परगनों के 21 गाँव ब्रिटिश नियंत्रण में ले लिए गए।

16. कोटा व बीकानेर

कोटा

  • संधि करते हुए जालिमसिंह ने दो पूरक धाराएँ जुड़वाईं; यही महाराव और उसके बीच खटास की जड़ बनीं।
  • महाराव किशोरसिंह से जालिमसिंह की भिड़ंत (मांगरोल का युद्ध, 1 अक्टूबर 1821) में अंग्रेज जालिमसिंह के साथ खड़े थे और जीत उसी की हुई।

बीकानेर

  • सूरतसिंह ने अंग्रेजी सहायता से अपने बाग़ी सरदारों को कुचला।
  • 1830–1847 के दौरान सरदारों के उपद्रव से बीकानेर में अव्यवस्था रही; महाराजा रतनसिंह की बार-बार पुकार पर भी अंग्रेजों ने फ़ौज नहीं भेजी।

17. भरतपुर व अलवर

  • रणधीर सिंह के निधन (1823) पर अंग्रेज दुर्जनशाल की जगह उसके चाचा बलदेव सिंह के साथ हो गए; बलदेव सिंह 1823–1825 तक शासक रहा।
  • बलदेव सिंह के बाद बलवन्त सिंह गद्दी पर था, पर दुर्जनशाल ने उसे बन्दी बनाकर सिंहासन छीन लिया और कम्पनी के हुक्म को ठुकरा दिया।
  • जनवरी 1826 में भरतपुर दुर्ग पहली दफ़ा अंग्रेजों के क़ब्ज़े में आया।

18. सिरोही से बूँदी तक

रियासतअंग्रेजी दख़ल
सिरोहीदबाव डालकर 1841 में आबू पर आवागमन की रोक हटवाई; 1845 में आबू पर सेनेटोरियम बनाने की अनुमति ली और AGG कार्यालय वहाँ ले गए — आबू पर अंग्रेजी अधिकार
डूँगरपुरआंतरिक शांति के बहाने दख़ल; जसवंत सिंह द्वितीय को हटाकर दलपतसिंह (प्रतापगढ़ शासक का पौत्र) को सत्ता दी
बाँसवाड़ाखिराज चुकाने में चूक पर दख़ल; महारावल भवानीसिंह के सलाहकार के रूप में स्पीयर्स की नियुक्ति

19. अजमेर पर अधिकार

  • 25 जून 1818 को कम्पनी और दौलतराव सिंधिया की संधि में अजमेर अंग्रेजों को मिल गया।
  • उसी वर्ष नसीराबाद में सैनिक छावनी बनी।
  • मेरवाड़ा क्षेत्र भी अजमेर में जोड़ा गया — इस प्रकार अंग्रेजी आधिपत्य वाला केन्द्रशासित प्रदेश अजमेर-मेरवाड़ा अस्तित्व में आया।

20. रैपिड फायर तथ्य

  • पहली संधि ➜ भरतपुर — 29 सित. 1803, महाराजा रणजीत सिंह के साथ
  • सहायक संधि का जनक ➜ लॉर्ड वेलेजली
  • 1806 में बची संधियाँ ➜ अलवर और भरतपुर (बार्लो ने बाकी सब रद्द कीं)
  • 1817-18 की संधियाँ कराने वाला ➜ चार्ल्स मेटकॉफ़ (दिल्ली रेजीडेंट)
  • 1817 की पहली संधि ➜ करौली — 9 नव. 1817
  • खिराज से मुक्त राज्य ➜ करौली, किशनगढ़, जैसलमेर
  • संधियों का प्रमुख कारण ➜ शासक-सामंत की खाई; सामंतों पर लगाम के लिए अंग्रेजी संरक्षण
  • कोटा की संधि ➜ 26 दिस. 1817; जालिमसिंह ने 2 पूरक धाराएँ जुड़वाईं
  • अजमेर कम्पनी को मिला ➜ 25 जून 1818, सिंधिया संधि से

अगले भाग में पूरी क्रांति का सार — कब, कहाँ, किसके नेतृत्व में — और क्रांति के सामान्य, तात्कालिक, आर्थिक व राजस्थान-विशेष कारण।

पिछला भाग: मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था: कर व लागें एवं सामंती व्यवस्था

अगला भाग: राजस्थान में 1857 की क्रांति: कारण व पृष्ठभूमि एवं प्रमुख केंद्र (भाग 1)

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