राजपूताने की रियासतें अंग्रेजों के पास शौक से नहीं गईं — मराठों की मार से बचने का सहारा ढूँढते हुए वे कम्पनी तक पहुँचीं, और बदले में अपनी बाहरी आज़ादी गँवा बैठीं। इस भाग में 1803-04 की शुरुआती संधियाँ, भरतपुर का घेरा और बार्लो द्वारा रद्दीकरण है, फिर 1817-18 की संधियों की पृष्ठभूमि, शर्तें और रियासत-वार सारणी। अंत में संधियों के परिणाम और भीतरी हस्तक्षेप के उदाहरण हैं।
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1. एक नज़र में
बसीन की संधि (1802) के बाद पेशवा अंग्रेजों की शरण में चला गया और 1803 में सिंधिया-भोंसले भी हार गए। राजपूताने की रियासतों को अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ही ऐसी इकलौती ताक़त दिखी जो मराठों के दबाव से बचा सकती थी — इसी भरोसे उन्होंने संधियों का रास्ता पकड़ा।
- पहली संधि ➜ भरतपुर — 29 सित. 1803
- सहायक संधि का जनक ➜ लॉर्ड वेलेजली
- 1818 की संधियाँ कराने वाला ➜ चार्ल्स मेटकॉफ़ (दिल्ली रेजीडेंट)
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1778–88 | राजाओं की पहली गुहारें | जयपुर और जोधपुर ने मराठों के विरुद्ध मदद माँगी, कम्पनी ने ध्यान नहीं दिया |
| 1803–04 | पहली संधियाँ | भरतपुर, अलवर, जयपुर, जोधपुर और धौलपुर से |
| 1805 | भरतपुर का घेरा | लेक किला न ले सका; 17 अप्रैल को फिर संधि |
| 1806 | संधियाँ रद्द | बार्लो ने अलवर-भरतपुर को छोड़ सब रद्द कीं |
… शेष 9 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
2. शुरुआती प्रयास
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1778 | जयपुर | पृथ्वीसिंह (जयपुर) का वकील वार्ता के लिए गवर्नर जनरल के पास कलकत्ता पहुँचा |
| 1781 | जोधपुर | विजयसिंह ने मराठों के विरुद्ध अंग्रेजी मदद पाने की कोशिश की |
| 1788 | जयपुर | महाराजा प्रतापसिंह ने भी वही प्रयास किया |
- अंग्रेजों से समझौते की पहल राजस्थान में सबसे पहले जयपुर और जोधपुर ने की।
- पर कम्पनी तब देशी राज्यों के मामलों में न पड़ने की नीति पर चल रही थी, इसलिए इन अर्ज़ियों पर ध्यान नहीं दिया गया।
- दूसरे आंग्ल-मराठा संघर्ष (1803–04) में मराठे परास्त हुए; सिंधिया को कमज़ोर करने की ग़रज़ से अब अंग्रेज ख़ुद संधियों के इच्छुक हो गए।
3. वेलेजली का मसौदा व संधियाँ
सहायक संधियों के जनक गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली के आदेश से लॉर्ड लेक ने राजपूत राजाओं को सात अनुच्छेदों का संधि-मसौदा भेजा।
- कम्पनी और राजा मित्र रहेंगे — एक के मित्र-शत्रु दूसरे के भी मित्र-शत्रु।
- कम्पनी राज्यों के आंतरिक मामलों में दख़ल नहीं देगी और कर की माँग नहीं करेगी।
- ज़रूरत पड़ने पर मित्र राज्य कम्पनी को सैनिक सहायता देंगे।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| क्र. | रियासत | संधि की तिथि | शासक |
|---|---|---|---|
| 1 | भरतपुर | 29 सित. 1803 (फिर 17 अप्रैल 1805) | महाराजा रणजीत सिंह |
| 2 | अलवर | 14 नव. 1803 | बख्तावर सिंह |
| 3 | जयपुर | 12 दिस. 1803 | जगतसिंह द्वितीय |
- जनवरी 1804 में कीरत सिंह (धौलपुर) ने मराठों के हमलों से सुरक्षा पाने हेतु संधि कर ली।
- उदयपुर और कोटा ने भी संधि चाही, पर वेलेजली ने अनुकूल उत्तर नहीं दिया।
ट्रिक: पाँच शुरुआती संधियों की क्रम-ट्रिक: भरतपुर → अलवर → जयपुर → जोधपुर → धौलपुर — सितम्बर, नवम्बर, दिसम्बर, दिसम्बर, जनवरी।
4. भरतपुर और कम्पनी
- उत्तर भारत में भरतपुर पहला राज्य था जिससे कम्पनी ने संधि की — 29 सितम्बर 1803, महाराजा रणजीत सिंह के साथ।
- जाट राजा ने 5,000 घुड़सवार आगरा भेजकर अंग्रेजों की मदद की।
- लेक से मात खाकर होल्कर डीग आया तो रणजीत सिंह ने संधि का उल्लंघन करते हुए उसकी मदद को सेना रवाना की — नेतृत्व पुत्र लक्ष्मण सिंह और दीवान रामसिंह के पास।
नीति पर असर
- भरतपुर तथा मालवा की नाकामी देखकर संचालक मंडल (कम्पनी का शीर्ष निकाय) ने वेलेजली की संधि-नीति को ठुकरा दिया।
- इसी असहमति से वेलेजली ने पद छोड़ा; उसकी जगह कार्नवालिस जुलाई 1805 में गवर्नर जनरल बनकर आया।
याद रखें: भरतपुर की संधियाँ — पहली 29 सितम्बर 1803, दूसरी घेरा उठने पर 17 अप्रैल 1805।
5. संधियाँ रद्द
नीति का पलटना
- भरतपुर की विफलता
- वेलेजली का इस्तीफ़ा
- कार्नवालिस चाहता था सब संधियाँ रद्द करना
- कार्नवालिस देशी राज्यों से हुई सभी संधियाँ ख़त्म करना चाहता था, पर जल्द ही उसकी मृत्यु हो गई।
- उत्तराधिकारी जॉर्ज बार्लो ने 1806 में अलवर और भरतपुर को छोड़ बाक़ी सभी राजपूत राज्यों की संधियाँ रद्द कर दीं।
याद रखें: 1806 में बची दो संधियाँ — अलवर और भरतपुर।
6. 1817-18 की संधियाँ
1813 के बाद कम्पनी की रीति-नीति बदली — लॉर्ड हेस्टिंग्ज (गवर्नर जनरल) चाहता था कि भारत में कम्पनी ही सर्वोपरि शक्ति रहे। इसी का फल थी 1817–18 की संधियों की कड़ी।
7. पृष्ठभूमि
- 1811 में सेटन की जगह चार्ल्स मेटकॉफ़ दिल्ली का रेजीडेंट बना।
- उसने गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो को सुझाया कि मराठों, अमीर खाँ और पिंडारियों की तबाही रोकने के लिए राजपूत राज्यों का एक संघ ब्रिटिश संरक्षण में बने।
- पराजित दौलतराव सिंधिया ने 5 नवम्बर 1817 को राजस्थानी राज्यों पर कम्पनी के अधिकार-सम्बन्ध को मान्य किया; होल्कर भी हारकर वही मान गया — राजस्थान से मराठा प्रभुत्व उठ गया।
संधियों तक का रास्ता
- 1811 मेटकॉफ़ रेजीडेंट
- संघ का सुझाव
- 1813 के बाद नीति-बदलाव
8. सामान्य शर्तें
- कम्पनी और राज्य में सदा मित्रता — एक के मित्र-शत्रु दोनों के मित्र-शत्रु।
- राज्य की रक्षा का दायित्व कम्पनी का।
- राज्य कम्पनी का आधिपत्य मानेगा और उसके अधीन रहकर सहयोग करेगा।
ट्रिक: खिराज से मुक्त रखे गए राज्य — करौली, किशनगढ़, जैसलमेर।
9. रियासत-वार सारणी
| क्र. | राज्य | शासक | तिथि | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| 1 | करौली | हरबक्षपाल सिंह | 9 नव. 1817 | खिराज से मुक्त |
| 2 | टोंक | अमीर खाँ | 15 नव. 1817 | मेटकॉफ़ ने हस्ताक्षर किए |
| 3 | कोटा | उम्मेद सिंह | 26 दिस. 1817 | मेटकॉफ़ और झाला जालिमसिंह ने शर्तें तय कीं; जालिमसिंह ने 20 फ़रवरी 1818 को 2 पूरक धाराएँ जुड़वाकर गवर्नर जनरल की मंज़ूरी ली |
| 4 | जोधपुर | मानसिंह | 6 जन. 1818 | युवराज छत्रसिंह, बिशनराम व्यास, अमयराम व्यास ने हस्ताक्षर किए |
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 9 नव. 1817 | करौली | पहली |
| 15 नव. 1817 | टोंक | अमीर खाँ |
| 26 दिस. 1817 | कोटा | जालिमसिंह |
| 6 जन. 1818 | जोधपुर | मानसिंह |
10. संधियों के कारण
| मत | तर्क |
|---|---|
| टॉड, मेल्कम, हेस्टिंग्ज आदि अंग्रेज विद्वान | राजपूत राज्यों ने मराठा और पिंडारी आक्रमणों से छुटकारे के लिए संधियाँ कीं |
| आलोचना | संधि-वार्ता शुरू होने तक मराठे और पिंडारी कुचले जा चुके थे; कोटा, जोधपुर, उदयपुर के अलावा सभी रियासतें मराठों के आत्मसमर्पण के बाद ही आगे आईं; और संधि पर भी खिराज की देनदारी बनी रही |
प्रमुख कारण — सामंती समस्या
- मुगलों के आने के बाद शासकों और सामंतों के बीच गहरी खाई बन गई।
- अपना बल बढ़ाने को सामंत गुट बनाने लगे।
- ऐसे में शासकों ने अपने सामंतों पर लगाम लगाने के लिए अंग्रेजी संरक्षण अपनाया।
कारण की कड़ी
- मुगल सम्पर्क
- राजा-सामंत में दूरी
- सामंतों की गुटबन्दी
11. अंग्रेजी प्रभुत्व के परिणाम
- इन संधियों से राजपूत रियासतों की बाहरी आज़ादी ख़त्म हो गई और वे ब्रिटिश प्रभुत्व के दायरे में आ गईं।
- भीतर-बाहर की सुरक्षा मिलने से शासक उदासीन और भोग-विलासी हो गए; हर राज्य में अंग्रेज-समर्थक और अंग्रेज-विरोधी दो दल बने।
- नियमित खिराज, बकाया पर चक्रवृद्धि ब्याज और सैन्य-टुकड़ियों के ख़र्च से राज्यों की आर्थिक हालत बिगड़ी; सुधार के नाम पर रेजीडेंटों का दख़ल बढ़ा।
12. आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1818 | मेवाड़ | संधि के तुरंत बाद टॉड ने शासन-प्रबन्ध सँभाला |
| 25 जून 1818 | अजमेर | सिंधिया संधि से अंग्रेजों को |
| 1 अक्टू. 1821 | कोटा | मांगरोल का युद्ध |
| जनवरी 1826 | भरतपुर | पहली बार किले पर अंग्रेजी अधिकार |
13. मेवाड़
- अर्थव्यवस्था सुधारने के बहाने कर्नल टॉड ने ही सबसे पहले मेवाड़ का शासन-प्रबन्ध स्वयं सँभाल लिया।
- 1827 में कैप्टन कॉब ने दख़ल दिया।
- पॉलिटिकल एजेन्ट रॉबिन्सन ने 1840 व 1845 में महाराणा-सामंत समझौते का मसौदा बनाया।
14. जयपुर
- मेजर ऑक्टरलोनी, कैप्टन स्टुअर्ट और कैप्टन रफ़ ने महारानी के विरोधियों का साथ देकर जयपुर के भीतरी मामलों में दख़ल दिया।
- 1835 में शेखावाटी में शांति के नाम पर शेखावाटी ब्रिगेड बनी और उसका ख़र्च जयपुर पर डाला गया।
- रकम न मिलने पर कम्पनी ने नमक के भंडार सांभर झील को अपने नियंत्रण में लेकर लागत निकाली।
जयपुर का 1835
- शेखावाटी ब्रिगेड
- ख़र्च जयपुर पर
- धन नहीं मिला
15. जोधपुर
- महाराजा मानसिंह और सामंतों के टकराव ने अंग्रेजों को दख़ल का मौक़ा दिया।
- दख़ल से रुष्ट मानसिंह 1832 में गवर्नर जनरल विलियम बैंटिंक द्वारा बुलाए अजमेर दरबार में गए ही नहीं।
- शांति स्थापना के नाम पर छाण और कोट किराना परगनों के 21 गाँव ब्रिटिश नियंत्रण में ले लिए गए।
16. कोटा व बीकानेर
कोटा
- संधि करते हुए जालिमसिंह ने दो पूरक धाराएँ जुड़वाईं; यही महाराव और उसके बीच खटास की जड़ बनीं।
- महाराव किशोरसिंह से जालिमसिंह की भिड़ंत (मांगरोल का युद्ध, 1 अक्टूबर 1821) में अंग्रेज जालिमसिंह के साथ खड़े थे और जीत उसी की हुई।
बीकानेर
- सूरतसिंह ने अंग्रेजी सहायता से अपने बाग़ी सरदारों को कुचला।
- 1830–1847 के दौरान सरदारों के उपद्रव से बीकानेर में अव्यवस्था रही; महाराजा रतनसिंह की बार-बार पुकार पर भी अंग्रेजों ने फ़ौज नहीं भेजी।
17. भरतपुर व अलवर
- रणधीर सिंह के निधन (1823) पर अंग्रेज दुर्जनशाल की जगह उसके चाचा बलदेव सिंह के साथ हो गए; बलदेव सिंह 1823–1825 तक शासक रहा।
- बलदेव सिंह के बाद बलवन्त सिंह गद्दी पर था, पर दुर्जनशाल ने उसे बन्दी बनाकर सिंहासन छीन लिया और कम्पनी के हुक्म को ठुकरा दिया।
- जनवरी 1826 में भरतपुर दुर्ग पहली दफ़ा अंग्रेजों के क़ब्ज़े में आया।
18. सिरोही से बूँदी तक
| रियासत | अंग्रेजी दख़ल |
|---|---|
| सिरोही | दबाव डालकर 1841 में आबू पर आवागमन की रोक हटवाई; 1845 में आबू पर सेनेटोरियम बनाने की अनुमति ली और AGG कार्यालय वहाँ ले गए — आबू पर अंग्रेजी अधिकार |
| डूँगरपुर | आंतरिक शांति के बहाने दख़ल; जसवंत सिंह द्वितीय को हटाकर दलपतसिंह (प्रतापगढ़ शासक का पौत्र) को सत्ता दी |
| बाँसवाड़ा | खिराज चुकाने में चूक पर दख़ल; महारावल भवानीसिंह के सलाहकार के रूप में स्पीयर्स की नियुक्ति |
19. अजमेर पर अधिकार
- 25 जून 1818 को कम्पनी और दौलतराव सिंधिया की संधि में अजमेर अंग्रेजों को मिल गया।
- उसी वर्ष नसीराबाद में सैनिक छावनी बनी।
- मेरवाड़ा क्षेत्र भी अजमेर में जोड़ा गया — इस प्रकार अंग्रेजी आधिपत्य वाला केन्द्रशासित प्रदेश अजमेर-मेरवाड़ा अस्तित्व में आया।
20. रैपिड फायर तथ्य
- पहली संधि ➜ भरतपुर — 29 सित. 1803, महाराजा रणजीत सिंह के साथ
- सहायक संधि का जनक ➜ लॉर्ड वेलेजली
- 1806 में बची संधियाँ ➜ अलवर और भरतपुर (बार्लो ने बाकी सब रद्द कीं)
- 1817-18 की संधियाँ कराने वाला ➜ चार्ल्स मेटकॉफ़ (दिल्ली रेजीडेंट)
- 1817 की पहली संधि ➜ करौली — 9 नव. 1817
- खिराज से मुक्त राज्य ➜ करौली, किशनगढ़, जैसलमेर
- संधियों का प्रमुख कारण ➜ शासक-सामंत की खाई; सामंतों पर लगाम के लिए अंग्रेजी संरक्षण
- कोटा की संधि ➜ 26 दिस. 1817; जालिमसिंह ने 2 पूरक धाराएँ जुड़वाईं
- अजमेर कम्पनी को मिला ➜ 25 जून 1818, सिंधिया संधि से
अगले भाग में पूरी क्रांति का सार — कब, कहाँ, किसके नेतृत्व में — और क्रांति के सामान्य, तात्कालिक, आर्थिक व राजस्थान-विशेष कारण।
पिछला भाग: मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था: कर व लागें एवं सामंती व्यवस्था
अगला भाग: राजस्थान में 1857 की क्रांति: कारण व पृष्ठभूमि एवं प्रमुख केंद्र (भाग 1)
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