ताँबे की चद्दर पर लिखा दान-पत्र उस दौर की ज़मीन, लगान और राजनीति का सीधा दस्तावेज़ होता है, जबकि सिक्के राजा, चिह्न और व्यापार की गवाही देते हैं। इस भाग में मेवाड़ के ताम्र-पत्रों के बाद आहत व गण-सिक्के, खुदाई के स्थल, विदेशी, गुप्त व राजवंशों की मुद्राएँ और रियासतवार टकसालें आती हैं। आख़िर में पुरालेख सामग्री, मुग़ली व रियासती काग़ज़ और बहियों का ब्योरा है।
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1. मेवाड़ के ताम्र-पत्र
| ताम्र-पत्र | वर्ष (ई.) | शासक | क्या पता चलता है |
|---|---|---|---|
| पारसोली (चित्तौड़) | 1473 | रायमल | भूमि के प्रकार — पीवल, गोता, माल, मगरा; भूमि सब लागों से मुक्त |
| चिकली | 1483 | — (वागड़ी भाषा) | तब की लाग-बाग; पटेल, सुथार व ब्राह्मण खेती करते थे; खेतों को टुकड़ों में बाँटने की रीति |
| जालिया गाँव | 1532 | विक्रमादित्य | बाई लषा से विवाह (सं. 1589) पर पुरोहित जानाशंकर को माण्डलगढ़ में दान; विक्रमादित्य तब तक गद्दी पर बैठ चुके थे |
| पुर (भीलवाड़ा) | 1535 | विक्रमादित्य | बहादुरशाह के हमले के समय जौहर में उतरने से पहले हाड़ी रानी कर्मावती ने करण तिवाड़ी को दान में एक हल-भर भूमि दी |
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- पुर का दान-पत्र चित्तौड़ के दूसरे साके और जौहर की प्रथा की सटीक तिथि बताने वाला स्रोत है।
- पीपली दिखाता है कि हल्दीघाटी (1576) के तुरन्त बाद प्रताप ने मेवाड़ के मध्य भाग में प्रजा को दोबारा बसाना शुरू कर दिया था; ओडा (1577) और ढोल (1574) इसी व्यवस्था के संकेत हैं।
- पारसोली की भूमि-श्रेणियाँ (पीवल = सिंचित, माल, मगरा आदि) राजस्व-व्यवस्था समझने में काम आती हैं।
ट्रिक: तीन प्रताप-ताम्र-पत्र क्रम से — ढोल 1574 → पीपली 1576 → ओडा 1577; राजसमंद ज़िले में तीनों गाँव।
2. सिक्के (मुद्राएँ)
सिक्के राजा के नाम, चिह्न, काल और व्यापारिक सम्पर्क का ठोस प्रमाण होते हैं। राजस्थान के सिक्कों को तीन बड़े दौर में समझें — गण-सिक्के व आहत मुद्राएँ, विदेशी व साम्राज्यों के सिक्के और रियासती सिक्के।
3. आहत और गण-सिक्के
आहड़ की खुदाई
- आहड़ में 6 ताँबे के सिक्के, इंडो-ग्रीक मुद्राएँ और कुछ मुहरें मिलीं; समय तीसरी सदी ई.पू. से दूसरी सदी ई. तक।
- ताँबे के सिक्कों का अंकन पढ़ा नहीं जाता; एक पर त्रिशूल दिखता है।
- एक इंडो-ग्रीक मुद्रा पर दोनों हाथों में तीर लिए यूनानी देवता अपोलो और दूसरी ओर “महाराजन त्रतर्स” — यानी आहड़ का यूनानी शासकों से सम्बन्ध।
आहत (पंचमार्क) सिक्के
- ठप्पा ठोककर बनने के कारण ये आहत कहे गए; 1835 में जेम्स प्रिंसेप ने यह संज्ञा दी। माना जाता है कि यही भारत के सबसे पुराने सिक्के हैं।
- बौद्ध-जैन साहित्य में इन्हें लहापान और संस्कृत में शतमान, कार्षापण, पुराण, धरण, पण कहा गया।
- निखात निधियाँ ➜ बैराठ, इस्माइलपुर, सांभर, रैढ़, नगर, नगरी, नोह; बैराठ में एक कपड़े में बँधी 8 आहत मुद्राएँ, सांभर से 6 पंचमार्क सिक्के, रंगमहल से भी आहत मुद्राएँ मिलीं।
| वर्ग | क्षेत्र / स्थान | पहचान | समय |
|---|---|---|---|
| मालवगण | रैढ़, नगरी (चित्तौड़गढ़), सवाई माधोपुर, पूर्वी राजस्थान | “मालवानां जय” या सरदारों के नाम — माप्य, मजुप, मापेजय, मगजश | मौर्य-कुषाण-गुप्त की अधीनता का काल |
| सेनापति मुद्राएँ | रैढ़ (6 सिक्के — 5 चौकोर, 1 गोल) | ब्राह्मी में “वच्छघोष” | — |
| मित्र मुद्राएँ | — | सूर्यमित्र, ब्रह्ममित्र, ध्रुवमित्र नाम | दूसरी सदी ई.पू. |
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- राजन्य व यौधेय ➜ दोनों गण (जाति-विशेष) द्वारा बने सिक्के हैं।
- सांभर की एक बहुत छोटी यौधेय मुद्रा पर दो पंक्तियों में ब्राह्मी में “बबुधना” व “गण” लिखा है; माना जाता है कि यह सम्भवतः रोहतक से आई।
ट्रिक: गण-सिक्कों की पहचान: मालव = जय, सेनापति = वच्छघोष, मित्र = सूर्य/ब्रह्म/ध्रुव, राजन्य = नन्दी + खरोष्ठी, यौधेय = नन्दी + यूप।
4. खुदाई के प्रमुख स्थल
| स्थल | ज़िला | क्या मिला | क्या सिद्ध / ख़ास |
|---|---|---|---|
| रैढ़ | टोंक | 3075 चाँदी के पंचमार्क; ताँबे के मालव-मित्र-सेनापति-इंडो-ससैनियन (गण-मुद्राएँ); यूनानी अपोलोडोटस का सिक्का; 7 चौकोर सिक्के जिन पर “वपू”; गुप्तकालीन 6 स्वर्ण-मुद्राएँ पास के भेड़ (टोंक) से | भारत में खुदाई में एक जगह से सर्वाधिक सिक्के; ये प्राचीनतम मुद्राएँ (छठी–दूसरी सदी ई.पू.), नाम धरण/पण; “वपू” के बारे में केदारनाथ पुरी — किसी मालव सरदार के |
| नगर (कर्कोट नगर) | टोंक | कार्लाइल को मालवों के लगभग 6,000 ताँबे के सिक्के | मालवगण की टकसाल; मालव जनपद के सर्वाधिक सिक्के; दूसरी सदी ई.पू.–चौथी सदी ई. |
| रंगमहल | श्रीगंगानगर | 105 ताँबे के सिक्के; कनिष्क प्रथम, हविष्क, वाजिष्क, कनिष्क तृतीय व मुरण्डा की मुद्राएँ | कुषाणोत्तर कालीन “मुरण्डा”; बस्ती कनिष्क तृतीय के काल में बसी और दूसरी–छठी सदी तक रही |
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- रंगमहल ➜ अधिकांश सिक्कों के चिह्न घिस गए; कुछ पंचमार्क/गण-मुद्राएँ दूसरी सदी ई.पू. की; एक सिक्के पर कनिष्क प्रथम भाले पर झुके, लम्बे कोट और वेदी सहित अंकित।
- बैराठ के 28 इंडो-ग्रीक सिक्कों में से 16 मिनेन्डर के हैं।
5. विदेशी, गुप्त व राजवंशों के सिक्के
| सिक्का / वर्ग | कहाँ / कब | पहचान |
|---|---|---|
| इंडो-ससैनियन | राजस्थान में पाँचवीं से बारहवीं सदी तक; कांसीन्द्रा (सिरोही) में सातवीं-नौवीं सदी के सिक्कों का बड़ा भंडार; आहोर (जालौर), कतिजेसर, पुंजपुर, पौचलासा, काकरवा (चित्तौड़) | ईरान के ससैनियन नरेशों के सिक्कों की शैली |
| कुषाण | खेतड़ी (झुंझुनू), जमवारामगढ़ (जयपुर), बीकानेर | सोने व ताँबे के |
| गुप्त | नगलाछैल (बयाना, भरतपुर) — लगभग 1800 सोने के; भेड़ (टोंक) से 6; अहेड़ा (अजमेर), मौराली व सांभर (जयपुर), सुखपुरा, रैढ़ (टोंक) | ब्राह्मी लिपि; बयाना में सर्वाधिक चन्द्रगुप्त द्वितीय “विक्रमादित्य” के, फिर कुमारगुप्त प्रथम व समुद्रगुप्त के |
| आदि वराह शैली | गुर्जर प्रतिहार | ससैनियन शैली का असर; आगे यज्ञकुण्ड व “श्री मदादि वराह” (नागरी), पीछे सूर्यचक्र व वराह; ताँबा मिली चाँदी |
- बयाना का स्वर्ण-भंडार गुप्तकालीन सोने के सिक्कों का सबसे बड़ा भंडार है।
- सांभर के नालियासर से कुमारगुप्त प्रथम की चाँदी की मुद्राएँ मिलीं, जिन पर मयूर है — इससे साबित होता है कि तब स्वामी कार्तिकेय की पूजा लोकप्रिय थी।
- इनमें अजयदेव, सोमदेव और पृथ्वीराज तृतीय के सिक्के ख़ास मशहूर हैं। सोमेश्वर के सिक्के पर एक ओर बैल और दूसरी ओर नाम; अजयदेव के सिक्के पर एक ओर लक्ष्मी और दूसरी ओर नाम।
6. मेवाड़ व आसपास की मुद्राएँ
| मुद्रा | राज्य / टकसाल | विवरण |
|---|---|---|
| द्रम व रूपक | मेवाड़ | चाँदी के; ताँबे के सिक्के कर्षापण; सिक्कों की शैली इंडो-सेसेनियन |
| ढीगला | मेवाड़ | चाँदी-ताँबे के सिक्के; नगरी (मध्यमिका) से आज भी मिलते हैं, जिन पर “शिवि जनपद” भी लिखा रहता था |
| गधिया मुद्रा | हूण | हूणों द्वारा चलाए चाँदी-ताँबे के सिक्के |
| गुहिल के सिक्के | मेवाड़ | आगरा से मिले गुहिल के 2000 चाँदी के सिक्के इसका प्रमाण |
याद रखें: स्वरूपशाही पर “चित्रकूट उदयपुर” (मेवाड़ का नाम) और “दोस्ती लंधन” (अंग्रेज़ों से दोस्ती) — दोनों लेख एक साथ याद रखें।
7. मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही
| रियासत | सिक्का | विवरण |
|---|---|---|
| जोधपुर (मारवाड़) | पंचमार्क्ड | प्राचीन काल में; वृक्ष, पशु, धनुष, सूर्य, पुरुष के चिह्न |
| द्रम / गुप्त / ससैनियन | क्षत्रपों के समय द्रम; गुप्तों के समय गुप्त-सिक्के; हूणों के असर से ईरानी ससैनियन सिक्के | |
| विजयशाही | महाराजा विजयसिंह की टकसाल; सोने-चाँदी-ताँबे के; 1781–1858 तक चले; फ़ारसी में “सिक्का … मुबारक बादशाह आलम”; 1858 से विक्टोरिया का नाम; भीमसिंह व मानसिंह के समय भी चाँदी के विजयशाही बने | |
| गजशाही | जोधपुर में भी उल्लेख |
याद रखें: जोधपुर के कुल चार टकसाल-नगर: जोधपुर, नागौर, पाली, सोजत।
8. जयपुर, हाड़ौती व पूर्वी रियासतें
| रियासत | सिक्का | विवरण |
|---|---|---|
| जयपुर | मुगली सिक्के | मुग़लों से सम्बन्ध के कारण; अकबर से निकटता के कारण कछवाहों को सबसे पहले टकसाल की अनुमति मिली |
| झाड़शाही | सिक्कों पर छह टहनियों के झाड़ का चिह्न; 1760 से ताँबे का | |
| माधोशाही / हाली | माधोसिंह के समय “शाह आलम बहादुर” नाम; रुपया हाली सिक्का भी कहलाता | |
| रसकपूर के सिक्के | टॉड (कर्नल) के मुताबिक़ जगतसिंह ने अपनी प्रेमिका रसकपूर के नाम से सिक्के ढलवाए |
9. रियासतवार सिक्का-सूची
| क्र. | रियासत / टकसाल | सिक्के |
|---|---|---|
| 1 | जयपुर | झाड़शाही, मुहम्मदशाही, हाली, माधोशाही रुपया |
| 2 | अलवर | रावशाही रुपया, रावशाही टका |
| 3 | भरतपुर | शाहआलमी |
| 4 | धौलपुर | तमंचाशाही |
- ग्रंथ ➜ द करेन्सीज़ ऑफ़ द हिन्दू स्टेट्स ऑफ़ राजपूताना
- लेखक ➜ वेब
- वर्ष ➜ 1893
10. पुरालेख सामग्री
आज से पहले के ज़माने में सरकारी, अर्ध-सरकारी और आम लोगों द्वारा लिखे गए सब काग़ज़-साधन पुरालेख हैं। ये इतिहास के मूल स्रोतों में गिने जाते हैं।
- इनका विशाल संग्रह राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर और उसके अधीन ज़िला अभिलेखागारों में है।
- अभिलेखागार के अजमेर रिकॉर्ड में दरगाह रिकॉर्ड, इस्तमरारी रिकॉर्ड और एजेंसी रिकॉर्ड प्रमुख हैं।
- उदयपुर रिकॉर्ड के प्रमुख अंश: देवस्थान-बहियाँ, सिलहखाना व बख़्शीख़ाना के दस्तावेज़ तथा मेहता संग्रामसिंह व श्यामलदास संग्रह के बस्ते।
11. मुग़ली व दरबारी काग़ज़
| काग़ज़ | क्या होता था |
|---|---|
| फ़रमान | सामंतों, शहज़ादों, विदेशी राजाओं अथवा रैयत के लिए मुग़ल सम्राट की ओर से निकला हुक्म |
| मन्सूर | बादशाह की मौजूदगी में शहज़ादे द्वारा जारी शाही आदेश |
| निशान | बादशाह के परिवार के सदस्य (शहज़ादे, बेगमें) द्वारा अपनी मुहर के साथ मनसबदारों को जारी आदेश |
| सनद | बादशाह की ओर से अधीन राजा या सामंत को जागीर देने की स्वीकृति |
- खरीतों के संग्रह को खतूत संग्रह कहते हैं; जयपुर राज्य के रिकॉर्ड में फ़ारसी-उर्दू में लिखा खरीता-संग्रह “खतूत-ए-महाराजान” कहलाता है।
12. रियासती काग़ज़
परवाना वह पत्र है जो राजा अपने अधीनस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों को भेजता था। इनसे रियासतों की राजनीति, समाज, धर्म और अर्थव्यवस्था की तस्वीर बनती है।
- कोटा राज्य का रिकॉर्ड ➜ 6,000 बस्ते
- परवानों के भाग ➜ 4
- क्रम ➜ तिथि के अनुसार
| परवाने का भाग | क्या है |
|---|---|
| दोवर्की | रोज़ के प्रशासन, लड़ाई के खर्च व घायलों के इलाज जैसे मामलों के दोहरी परत वाले काग़ज़ |
| जमाबंदी | राजस्व, चुंगी और जंगलात के हिसाब वाले पत्र |
| मुल्की | राज्य की आमदनी और कर्मचारियों के वेतन के हिसाब की बहियाँ |
| काग़ज़ | क्या दर्ज होता था |
|---|---|
| सयाद हजूर (सियाह हुजूर) | राजपरिवार की दैनिक ज़रूरतों के खर्च का ब्यौरा |
| दस्तूर कौमवार | राज्य के अधिकारियों के नाम और जातिवार ब्यौरा; जयपुर में बसी जातियों की प्रथाएँ, मेले, पर्व; आय-व्यय, भेंट-उपहार और युद्ध में काम आए लोगों को दी गई “इज़्ज़त” (बीकानेर अभिलेखागार में जयपुर से जुड़ा अंश) |
| मरदुमशुमारी | राज्य की जनगणना का विवरण |
13. बहियाँ
बहियाँ रखने की रीत राजपूत रियासतों में मध्यकाल से चली आ रही थी; इनमें किसी काम या घटना का लेखा रखा जाता था। रियासतों में इनके कई प्रकार थे।
| बही | क्या दर्ज होता था |
|---|---|
| हकीकत बही | राजा की दैनिक गतिविधियाँ, मिलने वाले राजनैतिक लोग, राजनैतिक-सामाजिक-धार्मिक घटनाओं का ब्यौरा; विशेषकर जोधपुर की मिलती हैं |
| ओहदा बही | बीकानेर अभिलेखागार में 7; जोधपुर के शासकों के आदेश और भ्रष्ट कर्मचारियों का वर्णन |
| कागद री बही | व्यापारिक मार्ग, परिवहन के साधन व शुल्क, कर, हुंडियाँ, नियम-पत्र, स्थानीय व अन्तर्प्रान्तीय व्यापार, मार्गों की सुरक्षा, मुद्रा, व्यापारियों को शासकों की छूट |
| हुकुमत री बही | शासकीय आदेशों की नकल |
- सबसे प्राचीन बही ➜ महाराणा राजसिंह (1652–1680) के समय की
- दूसरी प्राचीन बही ➜ जोधपुर की हकूमत री बही
- ओहदा बही (बीकानेर) ➜ 7
14. रैपिड फायर तथ्य
- पुर का ताम्र-पत्र (1535) ➜ जौहर से पहले हाड़ी रानी कर्मावती ने करण तिवाड़ी को भूमि दी; विक्रमादित्य का काल
- प्रताप के तीन ताम्र-पत्र ➜ ढोल 1574 ➜ पीपली 1576 ➜ ओडा 1577; तीनों गाँव राजसमंद में
- आहत (पंचमार्क) सिक्के ➜ माने जाते हैं भारत के सबसे पुराने; यह नाम जेम्स प्रिंसेप ने 1835 में दिया
- खुदाई में एक जगह से सर्वाधिक सिक्के ➜ रैढ़ (टोंक) — 3075 चाँदी के
- मालवों के लगभग 6,000 ताँबे के सिक्के ➜ नगर (कर्कोट नगर), टोंक
- गुप्तकालीन सोने के सिक्कों का सबसे बड़ा भंडार ➜ नगला छैल, बयाना (भरतपुर) — लगभग 1800
- रंगमहल ➜ श्रीगंगानगर; 105 ताँबे के सिक्के, कुषाण शासकों की मुद्राएँ
- जयपुर की झाड़शाही ➜ सिक्के पर छह टहनियों के झाड़ का चिह्न
- सबसे प्राचीन बही ➜ महाराणा राजसिंह (1652–1680) के समय की
अगले भाग में नया अध्याय — प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: काल-विभाजन, खुदाइयों का इतिहास और पत्थर के औज़ारों वाला पाषाण युग।
पिछला भाग: राजस्थान के इतिहास के स्रोत: शिलालेख व प्रशस्तियाँ (भाग 2)
अगला भाग: प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: पाषाण युग
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